दोनों मूरख , दोनों अक्खड़ / भवानीप्रसाद मिश्र

चलो भाई चारे को बोओ

अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
हाट से लौटे,
ठाट से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे .

बात बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं.
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची.
अब वह जीता,अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे –
सबके खिले हुए थे चेहरे !

मगर एक कोई था फक्कड,
मन का राजा कर्रा – कक्कड;
बढा भीड को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड कर.

अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
गर्जन गूंजी,रुकना पडा,
सही बात पर झुकना पडा !

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लडने में मत खोऒ
चलो भाई चारे को बोऒ!

खाली सब मैदान पडा है,
आफ़त का शैतान खडा है,
ताकत ऐसे ही मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ.
                    -भवानी प्रसाद मिश्र

 कुछ अन्य बाल कविताएं :

चार कौए उर्फ चार हौए

सूरज का गोला

तब कैसा मौसम ठंडा जी – राजेन्द्र राजन

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

नल की हडताल

  साभार : अनहदनाद


5 टिप्पणियाँ

Filed under भवानी प्रसाद मिश्र, nursery rhymes , kids' poetry

5 responses to “दोनों मूरख , दोनों अक्खड़ / भवानीप्रसाद मिश्र

  1. शायद भाई चारे की फसल ही सर्वत्र शांति ला सके। इसी उम्मीद पर इसे बोना जारी रखें हम सब।

  2. भई वाह …
    मज़ा आ गया भवानीभाई की इस अनूठी कविता में
    शुक्रिया…

  3. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

  4. ये तो मेरे पाठयक्रम मे थी, कक्षा ३ या ४ मे !

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s