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सांप्रदायिकता : हम क्या करें ? क्या न करें

  1. साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली किसी भी दुष्प्रवृत्ति के शिकार हम खुद न हों , और समाज में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली कोशिशों के खिलाफ़ खड़े हों , फिर चाहे ऐसी कोशिश हिन्दुओं के द्वारा हो या मुसलमानों के द्वारा हो या अन्य किसी भी धर्म को मानने वालों के द्वारा हो ।
  2. केन्द्र व राज्य सरकारों का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी धर्म विशेष के अनुष्ठान में राज्य एवं शासन के प्रतिनिधि के रूप में शामिल नहीं हो , न ऐसे अनुष्ठानों को राज्य द्वारा किसी प्रकार की विशेष सहायता मिले , और न ही राजकीय उद्घाटन , शिलान्यास आदि के आयोजन किसी धर्म-विशेष के अनुष्ठान से शुरु हों । धर्म-निरपेक्ष राज्य की संवैधानिक घोषणा का यह सर्वथा उल्लंघन है । हम ऐसे आयोजनों के खिलाफ जनमत का दबाव पैदा करें ।
  3. एक धर्म की उपासना विधियों , उत्सवों ,पर्वों , के आयोजनों से दूसरे धर्मों की उपासना विधियों,उत्सवों-पर्वों में बाधा पहुँचे , ऐसी व्यवस्था क्यों चलनी चाहिए ? क्या मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि धार्मिक केन्द्रों में लाउडस्पीकरों का उपयोग और उत्तेजनात्मक घोषणाओं का उग्र उद्घोष इसी तरह बराबर होते रहना चाहिए , जैसे आजकल हो रहा है ? नहीं । क्योंकि इससे हमारी भक्ति-भावना में वृद्धि नहीं होती , हमारी प्रतिक्रियात्मक , प्रतिशोधात्मक भावनाओं का इजहार होता है ।
  4. हम अपनी धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनायें दूसरे पर थोपने की कोशिश न करें । हमारे विचार-आचार में तेज होगा तो वह दूसरों को भी प्रेरित करेगा , यहीं तक अपनी भावनाओं को मर्यादित रखें ।
  5. हम यह न भूलें कि कोई एक गलती करता है तो उसके जवाब में हम दस गलती करके अपना ही नुकसान करते हैं । अत: हम न गलती करेंगे , न गलती होने देंगे , न जुल्म करेंगे , न जुल्म सहेंगे की नीति पर चलें ।
  6. हम उन अखबारों , प्रचार-माध्यमों,नेताओं,संगठनों का बहिष्कार एवं विरोध करें , जो साम्प्रदायिकता के जहर को फैलाते हैं । अखबारों में छपने वाले ऐसे लेखों-टिप्पणियों का विरोध हम लिखित रूप में लेख-टिप्पणियाँ-सम्पादक के नाम पत्र लिखकर करें –  जिनसे साम्प्रदायिकता का जहर समाज में फैलता हो ।इसके अलावा स्वतंत्र रूप से पर्चे छापकर करें तथा अन्य लोकशिक्षण के माध्यमों से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लोगों को जागृत-संगठित करें ।
  7. हम जो भी धर्म , जीवन-शैली ,उपासना पद्धति अपनाते हों ,अपनाएँ,लेकिन अपने से भिन्न दूसरे धर्मों , जीवन-शैलियों , उपासना – पद्धतियों के प्रति सहिष्णु एवं उदार रहें । हमारी इस वृत्ति से ही परस्पर संवाद-सम्बन्ध कायम रहेगा और संवादों-सम्बन्धों के आधार पर ही हम एक दूसरे की कमियों को , यदि होगी तो , दूर करने में सहायक होंगे ।
  8. आर्थिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक गैर-बराबरी समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी है। क्या हम इतिहास के इस तथ्य को नकार सकते हैं कि हमारी इसी सामाजिक कमजोरी के चलते भारतीय समाज और राष्ट्र कमजोर हुआ है , टूटा है,गुलाम हुआ है,हिंसा-प्रतिहिंसा का शिकार हुआ है ? यदि आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- गैरबराबरी बनी रही , बढ़ती रही तो कोई भी धर्म-सम्प्रदाय भारतीय समाज-राष्त्र को विघटित होने से नहीं रोक पायेगा । पेट भरने , तन ढकने , सर छुपाने के लिए समुचित आवास व्यवस्था एवं शिक्षा- स्वास्थ्य आदि की प्राथमिक मानवीय जरूरतें पूरी करने की अनिवार्य मांग को धार्मिक-उन्माद उभाड़कर लम्बे अर्से तक टाला नहीं जा सकता है । सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम तक विभिन्न रूपों में यह मांगें तीव्र और खतरनाक रूप ले चुकी हैं । इसलिए जरूरी है कि समाज की इस कमजोरी को दूर करने का , मानवीय बराबरी की व्यवस्था लाने का राष्ट्रव्यापी संघर्ष तज करने में हम अपनी सक्रिय भूमिका निभायें ।

निवेदक

गुरुदर्शन सिंह , विनोद कुमार ( साम्यवादी ,छुद्र एवं द्वंद्व )

जगनारायण , डॉ. स्वाति , डॉ. सोमनाथ त्रिपाठी , अफ़लातून (समता संगठन)

रामचन्द्र राही ,चन्द्रभूषण,भगवान बजाज,डॉ. मारकण्डे सिंह(सर्वोदय कार्यकर्ता)

श्री दिनेशराय द्विवेदी , वरिष्ट अधिवक्ता , राजस्थान .

1992 में प्रकाशित.

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साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ?

  1. साम्प्रदायिकता है – अपनी पूजा-पाठ-उपासना-विधियों , खान-पान,रहन-सहन के तौर-तरीकों , जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना , उनके प्रति नफरत , द्वेष-भाव पालना और फैलाना ।अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक, राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  2. अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  3. हमारा समाज , हमारा देश एक बार इस प्रकार की अलगाववादी-प्रवृत्ति का शिकार होकर विघ्हतन के अत्यन्त दुखान्त दौर से गुजर चुका है । क्या हम उसे फिर फिर दोहराया जाना देखना-भोगना चाहते हैं ? यदि नहीं तो फिर धर्म के आधार पर राज्य और राष्ट्र की बात जिस किसी भी धर्म वाले के द्वारा क्यों न कही जाती हो , हम उसका डटकर विरोध क्यों नहीं करते ? सोचिये , क्या धर्म के नाम पर राष्ट्र की बात कहने या उसका समर्थन करने से अन्तत: हम उस मान्यता के ही पक्षधर नहीं बनते , जिसमें धर्म को अलग राष्ट्र का आधार माना गया था और जिस मान्यता के कारण भारत विभाजित हुआ था ?
  4. जब धर्म के नाम पर राष्ट्र बनेगा , तो नस्ल , जाति ,भाषा आदि के आधार पर राष्ट्र बनने से कौन रोक सकेगा ? कैसे रोक सकेगा ? तो फिर , इतनी विविधता वाले वर्तमान भारतीय राष्ट्र की तस्वीर क्या होगी ? धर्म पर आधारित राज्य-राष्ट्र की बात करने वाले या उनका समर्थन करने वाले कभी इस पर गौर करेंगे ? धर्माधारित राज्य-राष्ट्र की मांग करना भारतीय समाज एवं राष्ट्र के विघटन का आवाहन है । और वास्तविकता तो यह है कि धर्माधारित राष्ट्र राज्य-राष्ट्र की माँग के पीछे अनेक आर्थिक , राजनीतिक निहित हित साधने के लक्ष्य छिपे होते हैं ।

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

  1. धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की हर कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है , चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति , समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो । थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं । इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं । इन दलों ने चुनाव में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए समझौते भी किए हैं , सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है । यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति नहीं की होती तो धर्म-सम्प्रदायाधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हर्गिज़ नहीं मिलता । जब धर्म-सम्प्रदाय की रजनीति होगी तो साफ़ है कि छद्म से अधिक खुली साम्प्रदायिकता ताकतवर बनेगी।
  2. पूँजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित – वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं , जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं । हमें याद रखना चाहिए कि धर्म सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहे वे हिन्दू हों , मुसलमान हों , सिख हों , इसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले , आम तौर पर वही लोग हैं , जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं – पूँजीपति , पुराने राजे – महाराजे , नवाबजादे , नौकरशाह और नये- नये सत्ताधीश , सत्ता के दलाल ! और समाज का प्रबुद्ध वर्ग , जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा , आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है ,अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है !
  3. और , हम-आप भी , जो इनमें से नहीं हैं , धार्मिक-उन्माद में पड़कर यह भूल जाते हैं कि भविष्य का निर्माण इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से नहीं होता । अगर इतिहास में हुए रक्तरंजित सत्ता , धर्म , जाति , नस्ल , भाषा आदि के संघर्षों का बदला लेने की हमारी प्रवृत्ति बढ़ी , तो एक के बाद एक इतिहास की पर्तें उखड़ेंगी और सैंकड़ों नहीं हजारों सालों के संघर्षों , जय-पराजयों का बदला लेनेवाला उन्माद उभड़ सकता है ।फिर तो , कौन सा धर्म-समूह है जो साबुत बचेगा ? क्या हिन्दू-समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होंगे ? क्या इस्लाम के मानने वाले एक पंथ के लोग दूसरे पंथ बदला नहीं लेंगे ? दुनिया के हर धर्म में पंथभेद हैं और उनमें संघर्ष हुए हैं । तो बदला लेने की प्रवृत्ति मानव-समाज को कहाँ ले जायेगी ? क्या इतिहास से हम सबक नहीं सीखेंगे ?  क्या क्षमा , दया , करुणा , प्यार-मुहब्बत , सहिष्णुता ,सहयोग आदि मानवीय गुणों का वर्द्धन करने के बदले प्रतिशोध , प्रतिहिंसा , क्रूरता , नफ़रत , असहिष्णुता , प्रतिद्वन्द्विता को बढ़ाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालना और बढ़ाना चाहते हैं ?
  4. वक्त आ गया है कि हम भारतीय समाज में बढ़ती विघटनकारी प्रवृत्तियों को गहराई से समझें और साम्प्रदायिकता के फैलते जहर को रोकें । [ जारी ]

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‘कई के नाम में राम है लेकिन् वास्ता दूर् तक नहीं’

पीलीभीत से भाजपा प्रत्याशी वरुण गांधी का औपचारिक नाम फिरोज वरुण गांधी होने की चर्चा मैंने कल ही की थी । इस पोस्ट को उम्मीद से ज्यादा ’टीपें’ मिल गयी ।

एक विचारधारा विशेष के विद्वान ने कहा है –

उदहारण के लिए कई के नाम में राम है लेकिन वास्ता दूर तक नहीं…!

नाम में जिनके राम है उनका राम मन्दिर से दूर का वास्ता नहीं रहा है – यह भारतीय समाज का कितना कटु यथार्थ है ! उत्तर भारत की शूद्र जातियों में नाम के पीछे राम लगाने की परम्परा रही है। जैसे जगजीवन राम , कांशी राम । अपने नाम के साथ राम को जोड़े रखने वाले इन तबकों को लम्बे समय तक मन्दिरों में प्रवेश की मनाही थी । इनके मन्दिरों के पुजारी या महन्त होने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है ।

बहरहाल , तुलसीदास ’अधम ते अधम , अधम अति नारी’– शबरी को राम द्वारा कैसे आश्वस्त किया गया यह इस संवाद द्वारा बताते हैं :

शबरी : केहि विधि अस्तुति करहु तुम्हारी,अधम जाति मैं जड़मति धारी ।

अधम ते अधम अधम अति नारी , तिन्हिमय मैं मति-मन्द अधारी ॥

राम :     कह रघुपति सुनु धामिनी बाता , मानहु एक भगति कर नाता ।

जाति – पाति कुल धर्म बड़ाई , धनबल परिजन गुन चतुराई ।

भगतिहीन नर सोहे कैसा , बिनु जल वारिधी देखी जैसा ॥

अपने नाम के साथ राम को लगा कर रखने वालों के भक्ति के नाते को नकारने वालों को इनका ’वास्ता दूर तक नहीं’ दिखाई देगा । गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों से ऐसे समूह को विशेष परेशानी रहती है :

परहित सरिस धरम नहि भाई , परपीड़ा सम नहि अधमाई ।

अधम -दर्शन पालन करने वाले इन लोगों के बारे में इसलिए कहना पड़ता है :

लेते हैं ये राम का नाम ,करते हैं रावण का काम ।


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क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

साम्प्रदायिकता क्या है ? उसके खतरे क्या हैं ? ( पिछला भाग )

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ? कौन है इसके लिए जिम्मेदार ?

  1. धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की हर कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है , चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति , समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो । थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं । इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं । इन दलों ने चुनाव में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए समझौते भी किए हैं , सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है । यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति नहीं की होती तो धर्म-सम्प्रदायाधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हर्गिज़ नहीं मिलता । जब धर्म-सम्प्रदाय की रजनीति होगी तो साफ़ है कि छद्म से अधिक खुली साम्प्रदायिकता ताकतवर बनेगी।
  2. पूँजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित – वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं , जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं । हमें याद रखना चाहिए कि धर्म सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहे वे हिन्दू हों , मुसलमान हों , सिख हों , इसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले , आम तौर पर वही लोग हैं , जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं – पूँजीपति , पुराने राजे – महाराजे , नवाबजादे , नौकरशाह और नये- नये सत्ताधीश , सत्ता के दलाल ! और समाज का प्रबुद्ध वर्ग , जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा , आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है ,अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है !
  3.  और , हम-आप भी , जो इनमें से नहीं हैं , धार्मिक-उन्माद में पड़कर यह भूल जाते हैं कि भविष्य का निर्माण इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से नहीं होता । अगर इतिहास में हुए रक्तरंजित सत्ता , धर्म , जाति , नस्ल , भाषा आदि के संघर्षों का बदला लेने की हमारी प्रवृत्ति बढ़ी , तो एक के बाद एक इतिहास की पर्तें उखड़ेंगी और सैंकड़ों नहीं हजारों सालों के संघर्षों , जय-पराजयों का बदला लेनेवाला उन्माद उभड़ सकता है ।फिर तो , कौन सा धर्म-समूह है जो साबुत बचेगा ? क्या हिन्दू-समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होंगे ? क्या इस्लाम के मानने वाले एक पंथ के लोग दूसरे पंथ बदला नहीं लेंगे ? दुनिया के हर धर्म में पंथभेद हैं और उनमें संघर्ष हुए हैं । तो बदला लेने की प्रवृत्ति मानव-समाज को कहाँ ले जायेगी ? क्या इतिहास से हम सबक नहीं सीखेंगे ?  क्या क्षमा , दया , करुणा , प्यार-मुहब्बत , सहिष्णुता ,सहयोग आदि मानवीय गुणों का वर्द्धन करने के बदले प्रतिशोध , प्रतिहिंसा , क्रूरता , नफ़रत , असहिष्णुता , प्रतिद्वन्द्विता को बढ़ाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालना और बढ़ाना चाहते हैं ?
  4. वक्त आ गया है कि हम भारतीय समाज में बढ़ती विघटनकारी प्रवृत्तियों को गहराई से समझें और साम्प्रदायिकता के फैलते जहर को रोकें । [ जारी ]

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साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ?

  1. साम्प्रदायिकता है – अपनी पूजा-पाठ-उपासना-विधियों , खान-पान,रहन-सहन के तौर-तरीकों , जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना , उनके प्रति नफरत , द्वेष-भाव पालना और फैलाना ।
  2.  अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  3. हमारा समाज , हमारा देश एक बार इस प्रकार की अलगाववादी-प्रवृत्ति का शिकार होकर विघ्हतन के अत्यन्त दुखान्त दौर से गुजर चुका है । क्या हम उसे फिर फिर दोहराया जाना देखना-भोगना चाहते हैं ? यदि नहीं तो फिर धर्म के आधार पर राज्य और राष्ट्र की बात जिस किसी भी धर्म वाले के द्वारा क्यों न कही जाती हो , हम उसका डटकर विरोध क्यों नहीं करते ? सोचिये , क्या धर्म के नाम पर राष्ट्र की बात कहने या उसका समर्थन करने से अन्तत: हम उस मान्यता के ही पक्षधर नहीं बनते , जिसमें धर्म को अलग राष्ट्र का आधार माना गया था और जिस मान्यता के कारण भारत विभाजित हुआ था ?
  4. जब धर्म के नाम पर राष्ट्र बनेगा , तो नस्ल , जाति ,भाषा आदि के आधार पर राष्ट्र बनने से कौन रोक सकेगा ? कैसे रोक सकेगा ? तो फिर , इतनी विविधता वाले वर्तमान भारतीय राष्ट्र की तस्वीर क्या होगी ? धर्म पर आधारित राज्य-राष्ट्र की बात करने वाले या उनका समर्थन करने वाले कभी इस पर गौर करेंगे ? धर्माधारित राज्य-राष्ट्र की मांग करना भारतीय समाज एवं राष्ट्र के विघटन का आवाहन है । और वास्तविकता तो यह है कि धर्माधारित राष्ट्र राज्य-राष्ट्र की माँग के पीछे अनेक आर्थिक , राजनीतिक निहित हित साधने के लक्ष्य छिपे होते हैं । [जारी]

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