देश की माटी ,देश का जल/रवीन्द्रनाथ ठाकुर/अनु. भवानीप्रसाद मिश्र

देश की माटी देश का जल

हवा देश की देश के फल

सरस बनें प्रभु सरस बने

देश के घर और देश के घाट

देश के वन और देश के बाट

सरल बनें प्रभु सरल प्रभु

देश के तन और देश के मन

देश के घर के भाई -बहन

विमल बनें प्रभु विमल बनें

– रवीन्द्रनाथ ठाकुर /अनुवाद- भवानीप्रसाद मिश्र

5 टिप्पणियाँ

Filed under भवानी प्रसाद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ravindranath tagore, hindi poems, poem

5 responses to “देश की माटी ,देश का जल/रवीन्द्रनाथ ठाकुर/अनु. भवानीप्रसाद मिश्र

  1. bahut dino pahley padfhi kavita fir yaad dila di aapney .Bhavani bhai ne wakai is kavita me mool ki saman arthvatta bhar di hai.swagat apka ,geet ka bhi

  2. आपकी ऐसी प्रविष्टियाँ खूब लुभाती हैं मुझे !
    रचना की प्रस्तुति का आभार ।

  3. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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