पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 से संवाद

‘ शैशव ‘ में सब निर्मल होता है । ‘लौंडपन’ में दिमागी मल की गुंजाइश । इसलिए घुटने में दिमाग लिए लोगों की चर्चा इस चिट्ठे पर सर्वथा अनुचित है । फिर भी, जिनके घरों में संडास नहीं होते उन्हें खुले मैदान मे जाने की छूट तो है ही – उन्हें निपटने का मौलिक अधिकार है । हमें सफाई से प्रेम है , गन्दगी से नहीं । अस्तु, यह संडास-सफाई का पुनीत कार्य ।

    बहरहाल , हमारे चिट्ठे समाजवादी जनपरिषद पर पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 की घिनौनी हरकत पर नाक बन्द कर गौर करें । राही मासूम रज़ा की एक बहुचर्चित कहानी है – ‘सबसे सस्ता गोश्त ‘ । मस्जिद में सूअर का गोश्त फेंकने वाले मुस्लिम और मन्दिर में गोमांस रखने वाले हिन्दुओं का जिक्र उस कहानी में है । लेकिन कथित राष्ट्रवादियों का राष्ट्रवाद उनकी फिरकापरस्ती के सामने दब-दुब जाता है, चूंकि फिरकापरस्ती उनका मूल गुण है । ये घिनौने लोग पीटर उर्फ रमेश एक साथ बनने में संजाल पर छोड़े जा रहे ‘अंगूठा-निशान’ (IP पता) की व्यवस्था करना नहीं सीख पाए हैं । सचमुच यदि वे पीटर और रमेश एक साथ बन पाते , तो क्या बात होती ! लेकिन दंगाई मानसिकता की नंगई छुपाये नहीं छुपती ।

    ‘पीटर’ पूछते हैं – ईसाई और दलित ? किसी असलम के मन में भी सवाल उठना चाहिए कि पसमान्दा जातियाँ क्यों ? कोई सिख जसवीर पूछ सकता है कि ज्ञानी जैल सिंह और बूटा सिंह की कौन सी जातियाँ थीं ?

   फर्जी पीटर भले ही न जानता हो अथवा उसने आंखों पर पट्टी बाँध ली हो असली पीटर यह जानते हैं कि उन्हें दलित ईसाइयों के बारे में कोई हल निकालना है । जैसे काशी के मणिकर्णिका घाट की ‘चरण-पादुका’ पर हर आम हिन्दू की लाश नहीं जल सकती वैसे ही भारत में ईसाई कब्रिस्तानों में दलित ईसाई की कब्र पीछे हुआ करती है । अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में अंसारियों के बीच ‘गोरकऊ – डोमरऊ’ भेद का विवरण अच्छी तरह दिया हुआ है ।

    जन्म से लगायत मृत्यु के बाद तक की जाति की तंग गली हर भारतीय का पीछा नहीं छोड़ती । पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ 220.226.30.26 जैसों को बताना होगा कि उनके सपनों के हिन्दू राष्ट्र की समाज व्यवस्था वर्णाधारित होगी या नहीं ?

    ओडिशा की दलित पाण जाति कभी हिन्दू-समाज का पंचम वर्ण हुआ करते थे आज दक्षिण ओड़िशा के पचास फीसदी से अधिक पाण-भाई  दलित ईसाई हैं और संवैधानिक विशेष अवसर की माँग कर रहे हैं । आदिवासियों में , जो वर्णाश्रम से अलग रहे हैं सिर्फ़ २० फीसदी धर्मान्तरित हुए हैं (ओड़िशा के आँकड़े) । लाहौर के जाति तोड़ो सम्मेलन के लिए बाबा साहब ने जातिविहीन समाज का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जो साधन बताये थे उनमें ‘धर्म चिकित्सा’ और ‘धर्मान्तरण’ भी थे ।

    भारतीय जनता पार्टी ओडिशा में बीजू जनता दल के साथ सरकार में है और ऐसी लम्बी अवधियाँ भी रहीं जब केन्द्र और सूबे दोनों में भाजपा सत्ता में थी । उन अवधियों में ओड़िशा अथवा देश के किसी भी अन्य प्रान्त में जबरदस्ती अथवा धोखे से धर्मान्तरण के कितने मामले पंजीकृत हुए ? पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 बतायेंगे ?

      वैमन्स्यपूर्ण हिंसा का शिकार हजारों दलित युवा सरकारी शिबिरों से ‘माओवादियों’ के साथ शामिल होने के लिए सरकारी शरणार्थी – शिबिर छोड़ देते हैं इसकी चिन्ता पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 को कत्तई नहीं है । माओवादियों का एक नेता मीडिया कर्मियों को बुला कर घोषित करता है – ‘लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या हमारे समूह ने की है’ , फिर भी पीटरों उर्फ़ रमेशों उर्फ़ 220.226.30.26 को चूंकि धार्मिक विद्वेष की ही तालीम मिली है इसलिए इस राजनैतिक चुनौती को वे स्वीकार नहीं कर पाते ।  

   हर हत्या निंदनीय है इसलिए लक्ष्मणानन्द की हत्या भी पूर्णतया निन्दनीय है । पाण पुरुषों की जान लो और उनकी औरतों को ‘गन्दा करो’– इन महान उद्गारों को प्रकट करने वाला , दो व्यक्तियों की हत्याओं के मामले में बरसों जेल रहा- स्वामी । स्वामी , जिनको अशोक सिंघल और तोगड़िया साक्षात प्रणिपात किया करते थे , चूँकि उनका अपना गिरोह कमजोर है ! लक्ष्मणानन्द के यह उद्धरण उसी ईटीवी के पास हैं जो माओवादियों के नेता का बयान दिखा रहा है । 

    बहरहाल , भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने वाले , मातृभाषा में न बोल पाने वाले मुख्य मन्त्री नवीन पटनायक ने आज मांग की है कि बजरंग दल एक कट्टरपंथी संगठन है , केन्द्र उस पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाता ? हम इस बयान को निहायत बचकाना मानते हैं ।

    हमारा दल समाजवादी जनपरिषद साम्प्रदायिकता के विरुद्ध दक्षिण ओड़िशा में कल आयोजित हुए सफल बन्द के आयोजकों में एक था ।

   जो चाल चलेगा हिटलर की , हिटलर की तरह मिट जाएगा ।

 भाजपा की पकड़ी चोरी- मुँह में राम, बगल में छुरी ।

 लेते हैं ये राम का नाम , करते हैं रावण का काम ।

लड़े हैं तुमसे कदम-कदम पर , लड़ेंगे तुमसे कदम कदम पर ।

 

   

   

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6 टिप्पणियाँ

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6 responses to “पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 से संवाद

  1. आपका आलेख पढ़ कर लगा की हिन्दी ब्लॉग्गिंग जगत में कम से कम चंद लोग तो हैं जो सच कहने का सहस रखते हैं, वरना तो अधिकतर यहाँ हिट्स पाने के लिए वाहियात हेडिंग देकर इंसानी कत्ले आम को सही ठहराने पर लगे हैं, आखिर क्या फर्क कर सकते हैं इनमें और अल कायदा में अब हिंदू मुस्लिम एकता शायाद वहशीपन की हदों में मिलेगी हमें

  2. वे संवाद नहीं करते केवल ज़हर फैलाते हैं।

  3. आपका आलेख पढ़ कर लगा की कम से कम ब्लॉग्गिंग जगत में चंद लोग तो हैं जो सच कहने का सहस रखते हैं और जिनके अंदर संवेदना जिन्दा है, वरना अधिकतर तो हिट्स पाने के लिए वाहियात हेडिंग देकर जहर घोलने वाले आलेख लिख कर मानव हत्या के इस नापाक क्रिया को सही ठहराने पर तुले हैं, आखिर क्या फरक इनमें और अल कायदा के जाहिलों में…..

  4. आपका आलेख बातों को बड़ी बेबाकी से साफ-साफ सामने रखता है . इससे ज्यादा बेहतर और दो टूक ढंग से और क्या कहा जा सकता है . इसे सिर्फ़ वही नहीं समझ सकेगा जो यह ठान चुका है कि उसे तो समझना ही नहीं है .

  5. छिपी हुई सच्‍चाई को सामने लाने का शुक्रिया। आश है, इससे लोग कुछ सीख लेंगे।

  6. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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