साम्यवादी रूस और खेल : अशोक सेक्सरिया

अन्तरराष्ट्रीय खेलकूद में कम्युनिस्ट देशों की अभूतपूर्व सफलता , हमारी सरकार को उनकी भी नकल करने को प्रोत्साहित करती है ( जैसे पटियाला , बंग्लोर , ग्वालियर , राई , पूना के राष्ट्रीय खेल संस्थान जो रूस के राष्ट्रीय खेल स्कूलों के ही भारतीय खेल संस्करण हैं ) लेकिन उनके जैसा खेल-संगठन करने की न इच्छा-शक्ति है और न क्षमता , इसलिए खेलों का सारा ढाँचा इंग्लैण्ड और अमरीका की ही नकल में खड़ा हो रहा है । रूस में क्रान्ति के बाद बहस चली थी कि खेल कैसे हों । एक मत यह था कि प्रतियोगिताएं पूंजीवादी समाज की देन हैं , समाजवादी समाज में उनकी उपयोगिता नहीं ; जन-स्वास्थ्य उन्नत करने पर ध्यान देना है , प्रतियोगिताओं पर नहीं । यह मत पूरी तरह तो माना नहीं गया पर १९२८ तक प्रतियोगिताओं की जगह फ़िज़िकल कल्चर ( व्यायाम , स्वास्थ्य-उन्नति के कार्यक्रम ) पर ही जोर रहा। लेकिन स्टालिन द्वारा विरोधियों के सफ़ाये के साथ और पंचवर्षीय योजनाओं के साथ द्रुत औद्योगीकरण व आधुनिकीकरण के चलते प्रतियोगिताओं पर जोर बढ़ता गया । १९४९ में पारटी ने घोषणा की ” खेल-कूद में दक्षता को बढ़ाना है ताकि विश्व – प्रतियोगिताओं में सफलता मिले । ” १९५२ में रूस ने पहली बार ओलम्पिक में भाग लिया । तबसे कम्युनिस्ट देशों ( खासकर रूस और पूर्वी जरमनी ) ने अपनी केन्द्रीकृत व्यवस्था का उपयोग कर अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में असाधारण सफलता प्राप्त की । लेकिन यह भी कहना होगा कि उन्होंने अपने यहाँ बहुत बड़ी आबादी को खेल के अवसर भी प्रदान किए ।

यहां रूस की चरचा का उद्देश्य यह है कि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के साथ पबलिक स्कूलों के उदय के कारण १९वीं सदी में खेल-कूद का जो नक्शा बना और जो यूरोप और ब्रिटिश साम्राज्य में चल पड़ा , उसको जो चुनौती मिल सकती थी , वह रूस के भी प्रतियोगिता तत्व अपना लेने के कारण नहीं मिली । इससे पिछले ५०-६० सालों से खेलों में खेल के जो मूल तत्व (उमंग और सहजता) खत्म होता गया है और वे ज्यादा-से-ज्यादा संगठित किए जा रहे हैं जिससे वे किसी-न-किसी निश्चित प्रणाली के तहत होते हैं और राष्ट्र की इज्जत के सवाल और उन्माद के जनक बन जाते हैं । जब खेलों में जीतना सर्वोपरि हो जाता है , तकनीकों का विज्ञानसम्मत विकास किया जाना लगता है और दर्शकों पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता है , तब वे खेल नहीं रह जाते , दक्ष प्रदर्शन हो जाते हैं । हमारे यहां यही हो रहा है ।

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3 responses to “साम्यवादी रूस और खेल : अशोक सेक्सरिया

  1. पिंगबैक: एक नयी खेल नीति : अशोक सेक्सरिया « शैशव

  2. पिंगबैक: राष्ट्रमंडल खेल २०१०-आखिर किसके लिए? « यही है वह जगह

  3. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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