क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ? – अशोक सेक्सरिया

एशियाई खेलों को लेकर देश भर में जब भयंकर उन्माद फैलाया जा रहा है, तब यह प्रश्न उठाना कि यह खेल वास्तव में खेल हैं भी कि नहीं – मूर्खता लगता है । मूर्खता के डर से आदमी सोचना बंद कर देता है और उस पागलपन में शामिल हो जाता है जो सरकार , कम्पनियां और अखबार एशियाई खेलों को लेकर फैला रहे हैं । आखिर , हमारे जैसे गरीब और भिखमंगे देश में , जहाँ आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रह रही है और जिसकी सरकार ने हाल में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से रिरियाकर ५ हजार करोड़ रुपये का ऋण लिया हो , एक हजार करोड़ रुपये खरच कर खेलों का आयोजन करना पागलपन नहीं है तो और क्या है ? अगर पागलपन नहीं , तो फिर बीमार बच्चे या बीमार बाप की दवा पर न खरच कर टेलिविजन खरीदने पर खरचने – जैसी क्रूरता और कृतघ्नता है ।
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खेल उमंग की सहज अभिव्यक्ति है । उनका आदिरूप हम बच्चों में देखते हैं , वे हमेशा खेलते रहते हैं । अकेला बच्चा भी खेलता रहता है । हम देखते हैं कि कोई अकेला बच्चा , कुछ न मिला तो रास्ते पड़ी सिगरेट की डिबिया को ही ठोकर मारता या अपने पास की किसी चीज को उछालता और लपकता हुआ खेल की सृष्टि कर रहा है । एशियाई खेलों के स्टेडियम बनानेवाले मजदूरों के मरियल बच्चे भी , माँ – बाप के काम पर चले जाने पर , निश्चय ही खेलते होंगे ।
बच्चों के खेल में प्रतियोगिता के बजाय उमंग और आनंद की ही प्रधानता होती है । इस आनंद की एक छवि यहाँ रखते हैं –

” वह शहर का गंदा मुहल्ला था । उसकी संकरी गली से गुजरते ही लगता था , बदन की कमीज मैली हो गयी है । कहीं कोई थूक रहा था तो कोई मूत रहा था । मिठाई की दूकान में सजी हुई मठाइयां देखकर ही दिमाग में मक्खियां भिनभिनाने लगती थीं । गली के किनारे आते – जाते लोगों के बीच दो बच्चे लकड़ी की तख्तियों ( पटरों ) और प्लास्टिक की चिड़िया से आधे बैडमिन्टन और आधे टेबल -टेनिस जैसा कोई खेल खेल रहे थे । उनके बीच कोई जाल नहीं था । जाल की कल्पना उनके मन में थी । मैले और गन्दे होने के बावजूद खेलते हुए दोनों बड़े सुन्दर मालूम पड़ रहे थे । एक पल वह रुक गया और उनका खेल देखने लगा । उसने देखा कि वे खेल खेल रहे हैं , हार – जीत नहीं रहे हैं । दोनों अपनी तख्तियों से चिड़िया को इस तरह मार रहे हैं कि वह जमीन पर न गिरे । मिल – जुल कर खेल को साध रहे हैं लेकिन यह मिलना – जुलना ऐसा भी नहीं कि मिलीभगत हो जाए । एक बच्चा चिड़िया को इस तरह मारता था कि दूसरे बच्चे को उसे लौटाने में दिक्कत तो हो पर इतनी नहीं कि चिड़िया जमीन पर गिर जाये । उनका इरादा हारने – जीतने का नहीं था , खेल खेलने का था , सो वे बच्चे होने पर भी एक ऐसे संतुलन की तलाश में थे जिसमें थोड़ी चुनौती तो हो पर हार – जीत के बजाय आनन्द-ही-आनन्द हो । “

तो खेल का यही तत्व और सत्व है कि उसमें आनन्द हो , सहजता हो और ऊपर से थोपा गया कोई संगठन न हो । बच्चों के खेल में यदि उसे बड़े बिगाड़ न दें , यही तत्व रहता है । लेकिन आदमी सब समय तो बच्चा नहीं रहता , वह बड़ा हो जाता है ; पर उस सहज उमंग को खोना नहीं चाहता जिसे उसने बचपन में जाना था । इसीलिए वह खेलना चाहता है , अपने अंगों में थिरकन पैदा करना चाहता है ; लेकिन बच्चे की तरह खेल नहीं पाता , इसलिए वह ज्यादा-से-ज्यादा इस बात की कोशिश करता है कि बच्चे की तरह खेले । इस कोशिश में वह बचपन के सत्य को पुन: निर्मित करता है , इसीलिए उसका खेल अभिनय होता है ; पर इतना अभिनय भी नहीं कि खेल रह ही न जाए । बच्चों और बड़ों के खेल में यही सूक्ष्म अंतर है । खेल का संसार बड़ों के लिए उमंग – भरे अभिनय का संसार है , जिसके नियम , कायदे और कानून ऐसे नहीं हैं कि जिनसे उन्हें डर लगे । यह जीवन की जटिलताओं से मुक्ति का अहसास दिलाने वाला और प्रसन्न रखने वाला संसार है । इसमें तमगे नहीं हो सकते , हार-जीत नहीं हो सकती और न ही दो लाख मजदूरों के शोषण से निर्मित अश्लील वैभव ।

( जारी )

आगे : हिटलर और खेल

14 टिप्पणियाँ

Filed under खेल Games

14 responses to “क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ? – अशोक सेक्सरिया

  1. दो लाख मजदूरों के शोषण से निर्मित अश्लील वैभव!
    बिलकुल सही।

  2. Is aalekh ki prastuti ke liye aabhar
    Delhi mein to Commonwealth Games ho rahe hain Asian Games nahin?

  3. rahul srivastava

    नमस्ते सर ,

    पूरे आदर से मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ , दरसल में आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ , क्या आप खाना खाते हैं ?, क्योंकि अभी भी यहाँ लोग भूख से मरते हैं , ये आपकी तरफ से क्रूरता नहीं है की आप खाना खाते हैं और दूसरे बिना खाए मर रहे हैं ! अच्छा ये बताइए अगर हमारे देश में अगर एक खेल की प्रतियगिता हो रही है तो क्या इससे लोग रोजगार नहीं पा रहे , क्या हमारे देश में इससे पर्यटन नहीं बढेगा ? क्या जो खेल खेलते हैं वो क्या बाहर के देश से आते हैं ? क्या उनका भला नहीं होता? क्या देश का सम्मान कोई चीज नहीं है ? क्या आप अभी भी खेल को खेल ही समझ रहे हैं ? १०० अरब की आबादी का देश और ओलम्पिक्स में केवल एक ही स्वर्ण पदक , हमारे बगल के देश श्रीलंका में हमसे २ गुने पर्यटक आते हैं भाई साहब गरीबी हटाने के लिए काम करना पड़ता है , वामपंथियों की तरह बातें नहीं . पढोगे , लिखोगे बनोगे नवाब , खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब जैसी कहावतों की वजह से ही हम इतने पीछे हैं . कहना तो बहुत कुछ चाहता था पर इतने समझदार हैं , समझ गए होंगे . मेरे ब्लॉग पर भी पधारें .
    http://mutinity.blogspot.com/

  4. “तो खेल का यही तत्व और सत्व है कि उसमें आनन्द हो , सहजता हो और ऊपर से थोपा गया कोई संगठन न हो । ”
    पूर्णतया सहमत ! मोल की बात !
    प्रविष्टि का आभार । शेष की प्रतीक्षा ।

  5. Main bhi Rahul jee ki baton se ittefaq rakhta hoon. Commonwealth games yahan nahin honge to kahin aur honge. aur humare desh ke khiladi usmein bhag lene jayenge. Kisi bhi bharteey khiladi ka ye sapna hota hai apni qabiliyat ko in uchhstar ki pratispardha mein dikhla sake. Agar wo pratispardha agar apne desh mein apne logon ke samne ho rahi ho isse garv ki baat aur kya ho sakti hai ?

    Main 1982 mein jab ek chhota bachcha tha tab Jawaharlal Stadium ke prangan mein khelon ki opening ceremony ki taiyari ko chhupte chhupate andar jaakar dekh aaya tha. Itna bada stadium, Ravi shankar ka sangeet aap soch nahin sakte usne cricket ke itar bhi khelon mein kitni dilchaspi badha dee thi. Agar aap aisi pratiyogita ka aayojan nahin karenge,to khelon ke prati dilchaspi kaise badhegi? Infrastructure kaise banega? Naye swapnon ka nirman kaise hoga.!

  6. I too agree with Rahul. Games are another way of controlling killer instincts of humans at the end of the day humans are also animals and that is the basic cause of all the wars and conflicts. sports help in curbing those instnicts and at the same times gives the pleasure of winning. Not everyone can win but at the same time not everyone can win time all the time. But winning at the sports does not result in loss off human lives as it happens in cruel sports and wars.

  7. jasvir

    कामन-वैल्‍थ खेलों के नाम पर हो रहे खिलवाड़ के मुददे पर लिखा यह ब्‍लाग अत्‍यंत सार्थक है| अभी परसों ही बाल-सहयोग ( दिल्‍ली ) में Slum ke बच्‍चों को पानी की लकीर से गैलरी नामक खेल की बाउंडरी बनाते हुए देखा |

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