सरकार और खेल : अशोक सेक्सरिया

१९८२ के एशियाई खेल , १९५२ में साढ़े छ: लाख रु. की लागत से आयोजित प्रथम एशियाई खेलों की ही परिणति हैं । प्रथम एशियाई खेलों द्वारा अंगरेजों के राज में खेलों का जो ढाँचा बना था उसे ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया गया । खेलों के बारे में आजाद देश में कोई नीति नहीं बनाई गई । नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में खेल कैसे हों  , यह कभी बहस का मुद्दा ही नहीं बना । एक ही लक्ष्य बनता गया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में किसी भी प्रकार से ज्यादा-से-ज्यादा सफलता प्राप्त की जाये (खेलों में भारत की हार होने पर संसद में हमेशा हल्ला हुआ है ) । इस कारण देशवासियों की जरूरत के रूप में खेलों की कल्पना नहीं हुई है और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगितायें जीतने के लिए खेलों को ज्यादा-से-ज्यादा संगठित रूप देने , प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने और सफ़ल राष्ट्रों की तकनीकी की नकल करने की अधकचरी कोशिशें चालू हुईं । देहाती खेल-कूद प्रतियोगिता शुरु की गई तो उद्देश्य देहातों से विश्व विजेता प्राप्त करना था , देहात के लोगों के लिए ख्ले के अवसर जुटाना नहीं । जैसे यह मान लिया जाता है कि गरीबों को रोटी से मतलब है , लोकतंत्र से नहीं , वैसे ही मान लिया गया कि गरीबों को खेल की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में खेलों का सारा तामझाम ( विकास कत्तई नहीं कहेंगे ) , विशिष्ट वर्ग की अन्तरराष्ट्रीय सफलता प्राप्त करने की वासना मिटाने और बढ़ती आबादी को बम्बइया फिल्मों जैसा एक और घटिया उत्तेजना भरा मनोरंजन प्रदान करने के लिए खड़ा होता गया । इसी का नतीजा यह है कि खेलों में औद्योगिक घरानों का प्रवेश हो रहा है , उनकी टीमें बन रही हैं , उनके सौजन्य से प्रतियोगितायें हो रही हैं और गावस्कर-जैसे पेशेवर लखपति खिलाड़ियों का उदय हो रहा है ।

सरकार कम्युनिस्ट देशों की तरह खेलों का संगठन करने में असमर्थता और अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करने की वासना के चलते ( यह शासक वर्गों की सम्रुद्ध राष्ट्रों के सम्पन्न लोगों – जैसा रहन – सहन प्राप्त करने की वासना का दूसरा रूप है) पिछले ७-८ वर्षों से खेलों के बारे में उपभोक्तावादी मनोवृत्ति को बढ़ा रही है । इसके पीछे शहरी आबादी को बहलाकर समस्याओं से बेखबर करने की साजिश  के साथ यह ’ महान विचार ’ भी काम कर रहा है कि खेलों के प्रति उन्माद बढ़ाने से ( रात के तीन बजे तक विश्वकप फुटबाल के मैच टेलिविजन पर दिखाये जाते हैं ) देश में विश्व विजेता खिलाड़ी पैदा हो सकेंगे ।

जारी : अगली किश्त : साम्यवादी रूस और खेल

पिछले भाग :

क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ?

हिटलर और खेल

खेल और व्यापार ,

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6 टिप्पणियाँ

Filed under खेल Games

6 responses to “सरकार और खेल : अशोक सेक्सरिया

  1. shyam kori uday

    … अपने देश में खेल ‘एक खेल’ बन गया है, खेल नीतियों में अमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है अन्यथा …….. !!!!!!

  2. पिंगबैक: शैशव

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