कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
कि कोई टोके
कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर

मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
पता नहीं
क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट

लेकिन आज जब मैंने
एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
तो मैंने सुनी अपने भीतर
एक हरी – भरी चीख

एक डरी – डरी चीख
मेरे भीतर से निकली

मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
पता नहीं
क्योंकि लोगों के भीतर
मैं पेड़ की तरह उगा नहीं

क्योंकि मैंने किसी को कभी
न छाया दी न फल न वसंत की आहट.

– राजेन्द्र राजन .

18 टिप्पणियाँ

Filed under hindi, hindi poems, rajendra rajan

18 responses to “कविता : पेड़ : राजेन्द्र राजन

  1. बहूत सुन्दर लिखा है आपने राजेंद्र जी

  2. लोग तो फ़ल , छाया और वसंत का उल्लास देने वाले पेड़ों पर भी रहम नहीं करते ,इंसनी जज़्बातों की तो कहे ही कौन ?

  3. बहुत ही बिंदास रचना . बधाई बधाई

  4. अच्छी कविता है, पढवाने के लिए आभार।

  5. “मेरी चीख लोगों ने सुनी या नहीं
    पता नहीं
    क्योंकि लोगों के भीतर
    मैं पेड़ की तरह उगा नहीं”

    सचमुच, एक बेहतरीन रचना

  6. संगीता पुरी

    बहुत ही सुंदर …

  7. पिंगबैक: दो कविताएं : श्रेय , चिड़िया की आंख , राजेन्द्र राजन « समाजवादी जनपरिषद

  8. लेकिन आज जब मैंने
    एक जवान पेड़ को कटते हुए देखा
    तो मैंने सुनी अपने भीतर
    एक हरी – भरी चीख
    Arthpurn kavita, Badhai.

  9. बहुत सुंदर !
    कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
    घुघूती बासूती

  10. geetghazal

    बहुत सुन्दर रचना….बहुत बहुत बधाई….
    ——- प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

  11. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

  12. ”छुटपन में ऐसा होता था अक्सर
    कि कोई टोके
    कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज
    इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हारे भीतर

    मेरे भीतर पेड़ उगा या नहीं
    पता नहीं
    क्योंकि मैंने किसी को कभी
    न छाया दी न फल न वसंत की आहट..”
    असरदार पंक्तियाँ !

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