Tag Archives: hooliganism

कर्नाटक में गुण्डागर्दी पर गाँधीजी

टेलिविजन से जुड़े एक मित्र ने परसों रात फोन किया । ‘गांधी भी पब- कल्चर के विरुद्ध थे’ – ‘वे तो शराबबन्दी के हक में थे ।’  ‘पतित पावन सीताराम’ वाले भी थे । तब क्या वे मंगलूर की राम सेने के ‘बहादुरों’ की घृणित कारवाइयों से खुश नहीं होते ?

         कर्नाटक के धारवाड़ शहर की एक यूरोपियन महिला असहयोग आन्दोलन के प्रति सहानुभूतिक थी । आन्दोलन के लिए एक आयोजन के द्वारा चन्दा इकट्ठा करने की योजना थी । पहले तय हुआ कि भारतीय स्कूली बच्चों द्वारा नाटक खेला जाएगा । फिर अभिवावको की सलाह पर गायन और सुभाषित ( काव्य पाठ ) करना तय हुआ । कार्यक्रम के दौरान और उसके बाद आयोजकों और अतिथियों पर पथराव हुआ । ब्राह्मणेतर आन्दोलन के दौरान भी कर्नाटक में सभाओं में पथराव की परम्परा रही है यह गांधी जानते थे ।

     ऐसे तौर-तरीके वाले लम्पट गाँधी के जमाने में भी थे , उस इलाके ( कर्नाटक )में भी थे और गांधी ऐसी घटनाओं से नावाकिफ़ भी नहीं थे । इस घटना का विवरण खुद की  टिप्पणी के साथ उन्होंने अपने अखबार ‘यंग इण्डिया’ में छापा था । जिस व्यक्ति ने घटना का विवरण भेजा था उसने छापने का आग्रह करते हुए अलग ख़त भी लिखा था । सम्पादक ने घटना का विवरण छापते वक्त यह भी कहना उचित समझा कि यह सार्वजनिक महत्व का मामला है इसलिए ऐसे मामलों के लिए अखबार में स्थान होगा ही और उसकीचर्चा तो सहर्ष की जाएगी ।

     गांधी ने यह जरूर कहा कि उनकी जल्द ही हुई धारवाड़ यात्रा के दरमियान यदि यह सूचना मिल जाती तब वे खुद इसकी तफ़तीश कर लेते । पूरे घटनाक्रम की बाबत उन्होंने अपनी स्थिति बिलकुल स्पष्ट कर दी थी :

” मेरी स्थिति साफ़ है । चाहे जितना भी भड़काऊ कार्यक्रम हो ,  ‘नौजवानों की भीड़ ‘ द्वारा गुण्डई को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। उस कार्यक्रम को न होने देने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था ,खास कर चूँकि लड़कियों के पालकों को कोई आपत्ति नहीं थी । लोकतंत्र की यह सबसे सच्ची कसौटी है कोई भी अपने इच्छानुरूप कार्य कर सकता है यदि वह किसी दूसरे की जान – माल को नुकसान नहीं पहुँचा रहा है । लम्पटई और गुण्डई द्वारा सार्वजनिक मूल्यों की रक्षा करना असंभव है । लोकमत द्वारा ही समाज को पाक और सेहतमन्द रखा जा सकता है । यदि धारवाड़ के युवा लड़कियों के मंच पर सार्वजनिक प्रदर्शन के खिलाफ़ थे तब उन्हें आम सभाये करनी चाहिए थी तथा अन्य तरीकों से अपने पक्ष में जनमत बनाना चाहिए था ।

असहयोगियों से नि:सन्देह यह उम्मीद की जाती है कि वे न सिर्फ़ धारवाड़ जैसी कथित घटना में भाग लें अपितु ऐसी हिंसक घटनाएं अन्य लोगों द्वारा भी न हो पाएं यह देखें ।

असहयोग की सफलता असहयोगियों द्वारा हिंसा की सभी ताकतों पर नियंत्रण करने की क्षमता पर निर्भर है । यह संभव है कि सभी लोग त्याग और बलिदान के कार्यक्रमों में भाग नहीं ले सकेंगे परन्तु सभी को कथनी और करनी में अहिंसा की अनिवार्यता को पहचानना होगा ही । “

   गांधी का लिखा मूल अंग्रेजी आलेख – यहाँ

    नशाबन्दी और शराब तथा विदेशी कपड़ों की दुकानों के समक्ष महिलाओं द्वारा पिकेटिंग के कार्यक्रमों के बारे में सब ने सुना होगा । असहयोग आन्दोलन के दरमियान श्री राम सेने जैसी लम्पटई की घटनाये और भी होती थीं । ‘महात्मा गांधी की जय’ का नारा लगा कर भी लम्पटई की घटनायें होती थी । जैसे मंगलूर और ओड़िशा के लम्पटों ने ‘भारतमाता की जय’ का नारा लगा कर स्त्रियों के साथ अश्लील आचरण , मार-पीट और बलात्कार किया ।

    राष्ट्र-तोड़क राष्ट्रवाद की विचारधारा से लैस इस लम्पट सेना का लक्ष्य स्पष्ट है – ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना । उस हिन्दू राष्ट्र का समाज कैसा होगा ? स्त्रियों की उस समाज में क्या स्थिति होगी समय-समय पर स्पष्ट होता रहा है । स्त्री को सम्पत्ति में बराबर का हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का गोलवलकर ने विरोध किया था , देवराला में सति होने की घटना का विजयराजे सिंधिया ने समर्थन किया था । बेचारे येदुरप्पा को भी नागपुर के ‘आदेश-निर्देश’ पर चलना पड़ रहा है । प्रचारकों के विवाह पर  कैथॉलिक पादरियों की तरह रोक थी । कुछ प्रचारकों ने गोलवलकर के समक्ष विवाह करने की इच्छा जतायी थी तब उन्होंने जवाब दिया था , ” यूँ, तो कुत्ते भी निर्वाह कर लेते हैं ! “

9 टिप्पणियां

Filed under hooliganism