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शैशव पर हावी धर्म , न्याय, कट्टरपंथ और गूगल

” इस्लाम में धर्मान्तरण कैसे करें ? धर्मान्तरण करके मुसलिम बनने हेतु चैट द्वारा मदद लें”

एक शानदार खबर के शीर्षक के ठीक नीचे उपर्युक्त इश्तेहार दिया हुआ है । विज्ञापन एक संस्था का है और यह विज्ञापन गूगल द्वारा प्रसारित है । गूगल ने धर्म , धर्म कबूलना , हिन्दू , मुस्लिम, ईसाई जैसे शब्द पढ़कर  विज्ञापन लगा दिया होगा। धर्मान्तरण की बाबत स्वामी विवेकानन्द के विचार हमें याद रखने चाहिए । धर्म के तथाकथित अलम्बरदारों के गले न उतरने वाली बात कह गये हैं स्वामी विवेकानन्द ।

खबर से जुड़े़ युवा जोड़े को इस एक-लाईना इश्तेहार से जरूर कोफ़्त हुई होगी , यह और कोई समझे न समझे मैं समझ सकता हूँ । मेरे साथ भी गूगल ने ऐसी ही बेहूदगी की थी । मैंने कोका कोला द्वारा भू्मिगत जल – दोहन के खिलाफ़ बनारस में चल रहे आन्दोलन की रपट लिखी थी जो कई वेब साईट्स पर छपी थी । इस रिपोर्ट के साथ कोका कोला से जुड़े विज्ञापन गूगल ने नत्थी कर दिए थे । कितनी बड़ी नाइंसाफ़ी ? जब गूगल से पत्राचार किया तब उनकी नीति मुझे बता दी गयी । ’ चाहे तो अपनी मेल तथा अपनी साईट्स पर कोका कोला के विज्ञापन रोक सकते हैं । ’ लेकिन दूसरों की साइट्स द्वारा यह करवाना टेढ़ी खीर थी ।

बहरहाल , उपर्युक्त इश्तेहार कल छपी किस खबर से जुड़ा है ? यह जुड़ा है मुम्बई के वरसोवा में रहने वाले अदिति शेड्डे तथा उनके पति आलिफ़ सुर्ती के तीन माह के बेटे से  । अदिति और आलिफ़ को वृहन्मुम्बई नगर निगम से अपने बेटे का जन्म प्रमाण पत्र पाने में कितनी हुज्जत करनी पड़ी इसकी खबर है । यह दम्पति चाहते थे कि बेटे के जन्म प्रमाण पत्र में ’ धर्म ’ का कॉलम खाली हो ।   बच्चे के बारे में यह फैसला उन दोनों ने झटके-पटके में नहीं लिया था।  अदिति बताती है कि गर्भ धारण के कुछ माह बाद ही उन्होंने यह फैसला कर लिया था कि बच्चे पर किसी धर्म की पहचान हम नहीं थोपेंगे।

” हम किसी धर्म के खिलाफ़ नहीं हैं परन्तु अपने शिशु का धर्म तय करने वाले हम कौन होते हैं ? हम बालक को विभिन्न धर्मों के मूल्यों के बीच रखेंगे । जब वह बड़ा हो जाएगा तब वह कोई भी पंथ चुनने अथवा किसी भी पंथ को न चुनने के लिए आज़ाद होगा ।”

इस दम्पति का यह निर्णय विनोबा के विचार से मेल खाता है । उनका मानना था कि हाई स्कूल परीक्षा देने की उम्र तक पहुंचने के पहले बच्चों का कोई धर्म नहीं होना चाहिए । इस्लाम में भी धर्म आचरण सम्बन्धी नियम अबोध बच्चों पर लागू नहीं होते । इस मूल भावना को स्वीकार कर लेने पर राजस्थान के कई समूहों में जैसे गोद में बच्चों को लेकर बाल-विवाह बिना प्रशासन की रोक टोक के हजारों की संख्या में सम्पन्न किया जाते है। वैसा मुसलमान बच्चों के लिए भी हराम माना जाना चाहिए । दहेज उत्पीड़न रोकने के लिए बने कानून जैसे सभी धर्मावलम्बियों पर लागू होते हैं वैसे ही बाल-विवाह निरोधक कानून भी लागू होना चाहिए ।

परन्तु बच्चों और महिलाओं पर अमानवीय परम्पराओं को थोपने का ठीका सभी धर्मों के ठेकेदार लिए बैठे होते हैं । वे न बाल विवाह के खिलाफ़ कुछ करते हैं और सती प्रथा को भी धर्म और परम्परा के अनुसार बताते हैं । सती विरोधी कानून में सती का मन्दिर बनाना और उसकी पूजा करना भी जुर्म बताया गया है । बाल विवाह जैसी कुरीतियों को रोकने के लिए जब कानून लाया जा रहा था (शारदा एक्ट आदि) तब रा्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु गोलवलकर ने उसका विरोध किया था । सभी सामाजिक सुधार समाज की भीतर से आते हैं , ठेकेदार बनने वालों को उनसे खतरा होता है।

इसीलिए हम पाते हैं कि हमारे अन्दर का साम्प्रदायिक मानस दूसरे समुदाय के महिलाओं और बच्चों के प्रति अति संवेदनशील और मानवीय हो उठता है । वैसी संवेदनशीलता अपने समूह के महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाले परम्परागत अन्याय के प्रति इन तत्वों को कत्तई नहीं दिखती । बल्कि यही लोग उन सड़ी गली परम्पराओं के हक़ में खड़े हो जाते हैं । कई सामाजिक सर्वेक्षणों के अनुसार हिन्दुओं में बहुपत्नी का प्रमाण अब मुसलमानों से बढ़ गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ की छूट के बावजूद बहु पत्नी प्रथा समाप्त सी है । मुस्लिम समाज भी एक से अधिक पत्नी वाले पुरुषों को हेय दृष्टि से देखता है । क्या यह कल्पना की जा सकते हैं कि आर एस एस मुस्लिम महिलाओं और बच्चों को संगठित करने और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कुछ कर सकता है ? सवर्ण – अवर्ण विवाह करने वाले जोड़ों को सम्मानित करने की एक स्वस्थ परम्परा महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों में समतावादी संगठनों द्वारा चलाई गई है । सामाजिक यथास्थिति बरकरार रखने वाली शक्तियां कभी भी जातिविहीन , स्त्री-पुरुष समता की दिशा में सक्रिय नहीं होतीं । कारण साफ़ है : उनके कल्पना का ’हिन्दू राष्ट्र’ जातिविहीन नहीं है । आज सामाजिक रूप से जो तबके ताकतवर हालत में हैं वे भी नहीं चाहेंगे कि उनकी इस शक्ति सम्पन्न हालत में कोई तब्दीली आवे इसलिए वे भी ऐसे लक्ष्य के प्रति अनुकूल होते हैं । कुछ दिनों पहले मुझसे एक पाठक ने पूछा था कि जनेऊ और फिरकापरस्ती का क्या सम्बन्ध है ?

युनिसेफ की ’विश्व के बच्चों की स्थिति : २००९’ के  अनुसार भारत में २०-२४ वर्ष की ४७ फीसदी महिलायें बाल-विवाह की उम्र मे (१८ से नीचे) विवाहित हुई थीं । इनमें ५६ फीसदी ग्रामीण इलाकों की थी । दुनिया भर के बाल विवाहों का ४० फीसदी भारत में होता है । (सन्दर्भ तालिका )

जन्म प्रमाणपत्र हासिल करना इतना आसान न था । अस्पताल प्रशासन को जब पता चला कि यह दोनों धर्म का कॉलम खाली छोड़ने वाले हैं तो उनके कान खड़े हो गये । हर अस्पताल को जन्म के १५ दिन के अन्दर वृहन्मुम्बई महानगर निगम को सूचना देनी पड़ती है जिसके आधार पर महानगर निगम जन्म प्रमापत्र जारी करता है । ” आपको महानगर निगम के अधिकारी से बतियाना पड़ेगा ।” अस्पताल के एक कर्मचारी ने उन्हें बताया ।
” चूंकि अदिति मराठी भाषी है इसलिए मैंने कॉर्पोरेशन वालों को फरियाने के लिए कहा ।” एक फिल्म निर्माण और वितरण कम्पनी के क्रिएटिव डाईरेक्टर आलिफ़ ने कहा । अदिति महानगर निगम के अंधेरी स्थित दफ़्तर में पहुंची ।
” क्या तुम्हें अपनी हिन्दू पहचान पर शर्म है ? तुम क्यों नहीं चाहती कि तुम्हारा बच्चा हिन्दू जाना जाए ? ” एक अफ़सर ने अदिति से उर्रठई से पूछा । अदिति ने पलटकर अफ़सर से कहा ,” मुझे अपनी हिन्दू पृष्टभूमि पर गर्व है परन्तु मैं हिन्दू धर्म का पालन नहीं करती । क्या धर्म निरपेक्ष , लोकतांत्रिक देश में अभिभावक अपने बच्चे का कोई धर्म न बताने का निर्णय नहीं ले सकते ?”
अफ़सर के गले यह बात नहीं उतरनी थी । उसने एक तकनीकी समस्या ( गूगल की श्रेणी की ) बताई । जन्म प्रमाणपत्र जिन मशीनों की मदद से निकलता है वह कोई भी कॉलम खाली रहने पर आवेदन खारिज कर देती है ।” अदिति के टस से मस न होने पर उसे एक ऊपर के अफ़सर के पास ले जाया गया। ” इस अफ़सर ने मुझे धैर्य पूर्वक सुना और कहा कि वह मेरी भावनाओं की कद्र करता है । उसने वही तकनीकी समस्या दोहरा दी लेकिन यह कहा कि मेरी पूरी नौकरी के दरमियान ऐसा निवेदन कभी नहीं किया गया । इस पर मैंने कहा कि हमेशा कोई न कोई तो प्रथम बनता ही है । ”
बस, दम्पति निराश होने ही वाले थे । उक्त कॉलम को भरने के लिए उनके पास चार विकल्प थे – हिन्दू , मुस्लिम, ईसाई तथा अन्य । अदिति का कहना है कि ’अन्य’ में भी पहचान -विशेष  बताने की बात थी- अन्य कौन सा? वह अफ़सर से और बहसी लेकिन आखिरकार बिना ’अन्य’ का विवरण दिए ’अन्य’ भरने पर मान गयी । ” यह सिर्फ़ प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए किया है,हमें पता है कि हमारे बच्चे का कोई धर्म नहीं है । ”
इस फैसले तक पहुंचने की वजह वे दोनों अपनी उदार परवरिश को मानते हैं । अदिति कुवैत में बड़ी हुई थी जहाँ उसके कई सहपाठी मुस्लिम थे । उसे कुरान की कुछ आयतें भी कंठस्थ हो गई थीं ।

आबिद सुरती और नारायण देसाई

आलिफ़ प्रसिद्ध लेखक कार्टूनिस्ट (डब्बूजी के जनक) आबिद सुर्ती के पुत्र हैं । ओशो रजनीश , अटल बिहारी वाजपेयी और अमिताभ बच्चन को आबिद भाई अपना प्रशंसक बताते हैं (डब्बूजी के कारण)। ७५ वर्षीय आबिद कहते हैं , ” अपने दोनों बच्चों पर कोई धार्मिक पहचान थोपने का विचार मैंने कभी नहीं किया । मैं बिना धर्म के जिक्र के उनका जन्म प्रमाणपत्र हासिल करने में विफल रहा। मैं खुश हूँ कि मेरे बेटे और बहु ने इसमें कामयाबी हासिल की है । ”

सम्बन्धित खबरें , पोस्ट तथा लेख जिनके आधार पर लिखा गया है :

१. आलिफ़-अदिति के बेटे के धर्म सम्बन्धी खबर: टाईम्स ऑफ़ इंडिया

२. स्त्री-पुरुष समता और निजी कानून : डॉ. स्वाति (२) , (३)

३. भारत में बाल-विवाह पर तथ्य : अंग्रेजी विकीपीडिया

४.  ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं – स्वामी विवेकानन्द

५. राष्ट्र की रीढ़ : स्वामी विवेकानन्द

६. सती-प्रथा पर भारतीयतावादियों से कुछ सवाल : किशन पटनायक

७. रामायण की सती अयोध्या में नहीं लंका में है : किशन पटनायक

८. विकृतियों से लड़कर नई भारतीयता का सृजन करेंगे : किशन पटनायक

९. हिन्दू बनाम हिन्दू : राममनोहर लोहिया

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सांप्रदायिकता : हम क्या करें ? क्या न करें

  1. साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली किसी भी दुष्प्रवृत्ति के शिकार हम खुद न हों , और समाज में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली कोशिशों के खिलाफ़ खड़े हों , फिर चाहे ऐसी कोशिश हिन्दुओं के द्वारा हो या मुसलमानों के द्वारा हो या अन्य किसी भी धर्म को मानने वालों के द्वारा हो ।
  2. केन्द्र व राज्य सरकारों का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी धर्म विशेष के अनुष्ठान में राज्य एवं शासन के प्रतिनिधि के रूप में शामिल नहीं हो , न ऐसे अनुष्ठानों को राज्य द्वारा किसी प्रकार की विशेष सहायता मिले , और न ही राजकीय उद्घाटन , शिलान्यास आदि के आयोजन किसी धर्म-विशेष के अनुष्ठान से शुरु हों । धर्म-निरपेक्ष राज्य की संवैधानिक घोषणा का यह सर्वथा उल्लंघन है । हम ऐसे आयोजनों के खिलाफ जनमत का दबाव पैदा करें ।
  3. एक धर्म की उपासना विधियों , उत्सवों ,पर्वों , के आयोजनों से दूसरे धर्मों की उपासना विधियों,उत्सवों-पर्वों में बाधा पहुँचे , ऐसी व्यवस्था क्यों चलनी चाहिए ? क्या मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि धार्मिक केन्द्रों में लाउडस्पीकरों का उपयोग और उत्तेजनात्मक घोषणाओं का उग्र उद्घोष इसी तरह बराबर होते रहना चाहिए , जैसे आजकल हो रहा है ? नहीं । क्योंकि इससे हमारी भक्ति-भावना में वृद्धि नहीं होती , हमारी प्रतिक्रियात्मक , प्रतिशोधात्मक भावनाओं का इजहार होता है ।
  4. हम अपनी धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनायें दूसरे पर थोपने की कोशिश न करें । हमारे विचार-आचार में तेज होगा तो वह दूसरों को भी प्रेरित करेगा , यहीं तक अपनी भावनाओं को मर्यादित रखें ।
  5. हम यह न भूलें कि कोई एक गलती करता है तो उसके जवाब में हम दस गलती करके अपना ही नुकसान करते हैं । अत: हम न गलती करेंगे , न गलती होने देंगे , न जुल्म करेंगे , न जुल्म सहेंगे की नीति पर चलें ।
  6. हम उन अखबारों , प्रचार-माध्यमों,नेताओं,संगठनों का बहिष्कार एवं विरोध करें , जो साम्प्रदायिकता के जहर को फैलाते हैं । अखबारों में छपने वाले ऐसे लेखों-टिप्पणियों का विरोध हम लिखित रूप में लेख-टिप्पणियाँ-सम्पादक के नाम पत्र लिखकर करें –  जिनसे साम्प्रदायिकता का जहर समाज में फैलता हो ।इसके अलावा स्वतंत्र रूप से पर्चे छापकर करें तथा अन्य लोकशिक्षण के माध्यमों से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लोगों को जागृत-संगठित करें ।
  7. हम जो भी धर्म , जीवन-शैली ,उपासना पद्धति अपनाते हों ,अपनाएँ,लेकिन अपने से भिन्न दूसरे धर्मों , जीवन-शैलियों , उपासना – पद्धतियों के प्रति सहिष्णु एवं उदार रहें । हमारी इस वृत्ति से ही परस्पर संवाद-सम्बन्ध कायम रहेगा और संवादों-सम्बन्धों के आधार पर ही हम एक दूसरे की कमियों को , यदि होगी तो , दूर करने में सहायक होंगे ।
  8. आर्थिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक गैर-बराबरी समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी है। क्या हम इतिहास के इस तथ्य को नकार सकते हैं कि हमारी इसी सामाजिक कमजोरी के चलते भारतीय समाज और राष्ट्र कमजोर हुआ है , टूटा है,गुलाम हुआ है,हिंसा-प्रतिहिंसा का शिकार हुआ है ? यदि आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- गैरबराबरी बनी रही , बढ़ती रही तो कोई भी धर्म-सम्प्रदाय भारतीय समाज-राष्त्र को विघटित होने से नहीं रोक पायेगा । पेट भरने , तन ढकने , सर छुपाने के लिए समुचित आवास व्यवस्था एवं शिक्षा- स्वास्थ्य आदि की प्राथमिक मानवीय जरूरतें पूरी करने की अनिवार्य मांग को धार्मिक-उन्माद उभाड़कर लम्बे अर्से तक टाला नहीं जा सकता है । सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम तक विभिन्न रूपों में यह मांगें तीव्र और खतरनाक रूप ले चुकी हैं । इसलिए जरूरी है कि समाज की इस कमजोरी को दूर करने का , मानवीय बराबरी की व्यवस्था लाने का राष्ट्रव्यापी संघर्ष तज करने में हम अपनी सक्रिय भूमिका निभायें ।

निवेदक

गुरुदर्शन सिंह , विनोद कुमार ( साम्यवादी ,छुद्र एवं द्वंद्व )

जगनारायण , डॉ. स्वाति , डॉ. सोमनाथ त्रिपाठी , अफ़लातून (समता संगठन)

रामचन्द्र राही ,चन्द्रभूषण,भगवान बजाज,डॉ. मारकण्डे सिंह(सर्वोदय कार्यकर्ता)

श्री दिनेशराय द्विवेदी , वरिष्ट अधिवक्ता , राजस्थान .

1992 में प्रकाशित.

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साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ?

  1. साम्प्रदायिकता है – अपनी पूजा-पाठ-उपासना-विधियों , खान-पान,रहन-सहन के तौर-तरीकों , जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना , उनके प्रति नफरत , द्वेष-भाव पालना और फैलाना ।अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक, राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  2. अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  3. हमारा समाज , हमारा देश एक बार इस प्रकार की अलगाववादी-प्रवृत्ति का शिकार होकर विघ्हतन के अत्यन्त दुखान्त दौर से गुजर चुका है । क्या हम उसे फिर फिर दोहराया जाना देखना-भोगना चाहते हैं ? यदि नहीं तो फिर धर्म के आधार पर राज्य और राष्ट्र की बात जिस किसी भी धर्म वाले के द्वारा क्यों न कही जाती हो , हम उसका डटकर विरोध क्यों नहीं करते ? सोचिये , क्या धर्म के नाम पर राष्ट्र की बात कहने या उसका समर्थन करने से अन्तत: हम उस मान्यता के ही पक्षधर नहीं बनते , जिसमें धर्म को अलग राष्ट्र का आधार माना गया था और जिस मान्यता के कारण भारत विभाजित हुआ था ?
  4. जब धर्म के नाम पर राष्ट्र बनेगा , तो नस्ल , जाति ,भाषा आदि के आधार पर राष्ट्र बनने से कौन रोक सकेगा ? कैसे रोक सकेगा ? तो फिर , इतनी विविधता वाले वर्तमान भारतीय राष्ट्र की तस्वीर क्या होगी ? धर्म पर आधारित राज्य-राष्ट्र की बात करने वाले या उनका समर्थन करने वाले कभी इस पर गौर करेंगे ? धर्माधारित राज्य-राष्ट्र की मांग करना भारतीय समाज एवं राष्ट्र के विघटन का आवाहन है । और वास्तविकता तो यह है कि धर्माधारित राष्ट्र राज्य-राष्ट्र की माँग के पीछे अनेक आर्थिक , राजनीतिक निहित हित साधने के लक्ष्य छिपे होते हैं ।

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

  1. धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की हर कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है , चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति , समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो । थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं । इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं । इन दलों ने चुनाव में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए समझौते भी किए हैं , सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है । यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति नहीं की होती तो धर्म-सम्प्रदायाधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हर्गिज़ नहीं मिलता । जब धर्म-सम्प्रदाय की रजनीति होगी तो साफ़ है कि छद्म से अधिक खुली साम्प्रदायिकता ताकतवर बनेगी।
  2. पूँजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित – वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं , जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं । हमें याद रखना चाहिए कि धर्म सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहे वे हिन्दू हों , मुसलमान हों , सिख हों , इसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले , आम तौर पर वही लोग हैं , जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं – पूँजीपति , पुराने राजे – महाराजे , नवाबजादे , नौकरशाह और नये- नये सत्ताधीश , सत्ता के दलाल ! और समाज का प्रबुद्ध वर्ग , जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा , आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है ,अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है !
  3. और , हम-आप भी , जो इनमें से नहीं हैं , धार्मिक-उन्माद में पड़कर यह भूल जाते हैं कि भविष्य का निर्माण इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से नहीं होता । अगर इतिहास में हुए रक्तरंजित सत्ता , धर्म , जाति , नस्ल , भाषा आदि के संघर्षों का बदला लेने की हमारी प्रवृत्ति बढ़ी , तो एक के बाद एक इतिहास की पर्तें उखड़ेंगी और सैंकड़ों नहीं हजारों सालों के संघर्षों , जय-पराजयों का बदला लेनेवाला उन्माद उभड़ सकता है ।फिर तो , कौन सा धर्म-समूह है जो साबुत बचेगा ? क्या हिन्दू-समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होंगे ? क्या इस्लाम के मानने वाले एक पंथ के लोग दूसरे पंथ बदला नहीं लेंगे ? दुनिया के हर धर्म में पंथभेद हैं और उनमें संघर्ष हुए हैं । तो बदला लेने की प्रवृत्ति मानव-समाज को कहाँ ले जायेगी ? क्या इतिहास से हम सबक नहीं सीखेंगे ?  क्या क्षमा , दया , करुणा , प्यार-मुहब्बत , सहिष्णुता ,सहयोग आदि मानवीय गुणों का वर्द्धन करने के बदले प्रतिशोध , प्रतिहिंसा , क्रूरता , नफ़रत , असहिष्णुता , प्रतिद्वन्द्विता को बढ़ाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालना और बढ़ाना चाहते हैं ?
  4. वक्त आ गया है कि हम भारतीय समाज में बढ़ती विघटनकारी प्रवृत्तियों को गहराई से समझें और साम्प्रदायिकता के फैलते जहर को रोकें । [ जारी ]

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