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शेरों को बसाने के लिए उजड़ते गाँव की कहानी : बाबा मायाराम

जिंदगी की उथल-पुथल में पिछड़ जाते हैं बच्चे

आमतौर पर विस्थापन का समाधान पुनर्वास से निकाल लिया जाता है। लेकिन विस्थापन एक उलझी हुई प्रक्रिया है। यह उतनी सीधी और आसान नहीं है जितनी ऊपर से दिखती है। पुनर्वास का अर्थ सिर्फ मकान और मुआवजा भर नहीं है, जीवन की और भी जरूरतें हैं। पानी, ईंधन, चारा, खेती, रोजगार सब कुछ चाहिए, जो नई जगह पर प्राय: नहीं मिलती।

अगर हम बोरी अभयारण्य से विस्थापित गांव धांई का उदाहरण लें तो हम पाएंगे कि नई धांई जहां विस्थापितों को बसाया गया है, उनका जीवन और मुश्किल हो गया है। उनका पूरी तरह से पुनर्वास नहीं हुआ है। साथ ही पड़ोसी गांव डोबझिरना का जीवन भी प्रभावित हो रहा है जिसके पास इस गांव को बसाया गया है। ऐसे जीवन संघर्ष में बच्चों की पोषण और परवरिश प्रभावित होना स्वाभाविक है। जी्वन संघर्ष में अक्सर बच्चे पिछड़ जाते हैं।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बोरी अभयारण्य भारत का पहला आरक्षित वन है। अब बोरी अभयारण्य, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान और पचमढ़ी अभयारण्य को मिलाकर सतपुड़ा टाईगर रिजर्व बनाया गया है। इसमे सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के 8 गांव, बोरी अभयारण्य के 17 गांव, पचमढ़ी अभयारण्य के 50 गांव शामिल हैं। कुल मिलाकर, आदिवासियों के लगभग 75 गांव हैं और इतने ही गांव बाहर सीमा से लगे हुए हैं। इनमें से अंदर के लगभग 50 गांवों को हटाने की योजना है। ये सभी गांव पूरी तरह जंगल, भूमि ओर पानी (तवा जलाशय) पर आश्रित है। वर्ष 2005 में धाईं को विस्थापित कर बाबई तहसील के सेमरी हरचंद के पास बसाया गया था। यह सतपुड़ा टाईगर रिजर्व का पहला विस्थापित गांव है। धाईं कोरकू आदिवासियों का गांव है।

नदी के बदले सूखा हैण्ड पम्प

नदी के बदले सूखा हैण्ड पम्प

आज नई धांई में नदी के बदले हैंडपंप है। बोरी अभयारण्य के अंदर पुरानी धांई में नदी थी। वहां पानी इफरात था, आज वे बूंद -बूंद के लिए मोहताज है। खेतों में सिंचाई का साधन तो नहीं ही है, साथ में पीने के पानी का भी गहरा संकट है। यहां के पनकू का कहना है कि यहां 97 मकानों के बीच 6 हैंडपंप हैं जिसमें से एक खराब है और दो में कम पानी आता है। सिर्फ एक ही हैंडपंप चल रहा है जिससे पीने के पानी की बड़ी समस्या है। इस गर्मी भर भीषण जल संकट रहा। इसी प्रकार तीन कुए खोदे गए हैं जो सूखे पड़े हैं। ट्यूबवेल हैं जिनसे फसल के समय पानी मिलता है, जिसमें बिजली कटौती एक समस्या है।

विस्थापितों को जो 5-5 एकड़ जमीन दी गई है, उसे खेती लायक तैयार नहीं किया गया है। ग्रामीणों के मुताबिक जो जमीन उन्हें दी गई है वहां पेड़ थे। खेतों से पेड़ों के पूरे ठूंठ नहीं निकाले गए है। इस कारण पूरे खेत में फसल नहीं लगा पा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि विस्थापितों को बसाने के लिए नई धांई के आसपास करीब 40 हजार पेड़ काटे गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वनविभाग ने जो वायदे किए थे वे निभाए नहीं हैं। तवा नहर की शाखा से सिंचाई का वायदा किया था, वह भी पूरा नहीं हुआ है।

यहां पानी और चारे की व्यवस्था नहीं होने के कारण मवेशी मर गए और जो बचे उन्हें चारे-पानी के अभाव में बेच दिया। अब खेती करने के लिए बैल भी नहीं बचे हैं। लिहाजा, खेती को कौली (किराए पर) देना पड़ता है। यहां ऐसे भी खेत के मालिक है जो उनके खेत पर रखवाली का काम कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपना खेत किसी को कौली पर दे दिया। जिस किसान को कौली पर खेत दिया उसने खेत मालिक को ही रखवाली पर रख लिया। ऐसी विडंबना शायद ही कहीं और देखने को मिले। किसान अपने ही खेत में मजदूर बन गया। पनकू का कहना है कि खेतों में ज्यादा ठूंठ होने के कारण अब कौली पर कोई खेत नहीं लेते।

बोरी अभयारण्य के अंदर पुराने गांव में कोरकू आदिवासियों का जीवन जंगल पर आधारित था। वे जंगल से अपना जीवकोपार्जन करते थे। वहां वे तेंदू, अचार, गोंद, फल-फूल, भमोड़ी ( मशरूम), कंद-मूल ननमाटी, जंगली रताड़ू, बेचांदी, कडुमाटी, भमोड़ी (कुकरमुत्ता) आदि बहुतायत में मिलते थे। वहां पाए जानेवाले जिन कंदों में कडुवापन होता है उन्हें विशेष पद्धति से दूर कर लेते थे । बेल को उबालकर खाते थे। अगर एक दो दिन भोजन न मिले तो जंगल से ही गुजारा चल जाता है। यह सब उनके भूख के दिनों के साथी हैं। लेकिन यहां जलाऊ लकड़ी के अलावा जंगल से बहुत ही कम चीजें मिल पाती हैं।

जीने का कोई और सहारा नहीं होने के कारण महिलाओं को सिरगट्ठा ( जलाऊ लकड़ी) बेचने का काम करना पड़ता है। इसके पहले उन्होंने कभी यह काम नहीं किया है। वे जलाऊ लकड़ी का गट्ठा बांधना और उतना वजन लेकर चलना सीख रही हैं। वे अपने गांव से उसे 5-6 किलोमीटर दूर सेमरी हरचंद में ले जाकर बेचती हैं। यह उनके लिए नया और कड़ी मेहनत वाला काम है। इसमें पूरे दो दिन लग जाते हैं। एक दिन वे जंगल जाकर लकड़ी एकत्र करती हैं और दूसरे दिन उसे बेचने ले जाना। बदले में जो 40-50 रू मिलते हैं उससे राशन और रोजाना इस्तेमाल होनेवाली चीजें खरीदते हैं।

नई धांई के पुनर्वास से इसके पड़ोसी गांव डोबझिरना के लोगों की समस्या बढ़ गई है। क्योंकि धांई वालों को डोबझिरना के लोगों की जमीन दे दी। यह कहा जा सकता है कि उनके पास जमीन के पट्टे नहीं थे लेकिन वे 20-25 सालों से उस जमीन को जोत-बो रहे थे। अब इन दोनों गांवों में तनाव हो गया है।

यहां के जंगल पर दबाव बढ़ता जा रहा है। अब यहां बोरी अभयारण्य का एक और गांव बोरी आ गया है। यानी जंगल पर दबाव बढता ही जाएगा। चारा, ईंधन, वनोपज आदि के लिए छीनाझपटी बढ़ जाएगी।

ऐसी स्थिति में विस्थापितों के बच्चों को अपने परिवार के साथ नई परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है। यहां के निवासी अधार सिंह के घर में यहां आने के बाद तीन मौतें (पत्नी, पुत्र और नाती) हो गई हैं। अधार सिंह का कहना है कि खाने को नहीं है तो इलाज कहां से करवाए? इस मुसीबत के कारण उनकी छोटी बेटी रजनी ने स्कूल छोड़ दिया। अधारसिंह अपने एक नाती की पढ़ाई को लेकर भी चिंतित है।

्प्रभावित शैशव

्प्रभावित शैशव

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है ऐसे बड़े निर्णय करते समय जिससे लोगों की जिंदगी में भारी उथल-पुथल आती है, गहरे विचार-विमर्श की जरूरत होती है। सामाजिक-आर्थिक अध्ययन की जरूरत होती है। कई बार यह होता है जिन्हें हटाया जा रहा है उन्हें  पता ही नही होता उन्हें क्यों और किस उद्देश्य से हटाया जा रहा है। शेरों के संरक्षण के लिए जिन आदिवासियों को हटाया गया है या हटाया जा रहा है। कई जानकार लोगों की मान्यता है कि वन्य जीवों का संरक्षण आदिवासियों के साथ भी हो सकता है, उन्हें हटाने की जरूरत नहीं है।

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