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साम्यवादी रूस और खेल : अशोक सेक्सरिया

अन्तरराष्ट्रीय खेलकूद में कम्युनिस्ट देशों की अभूतपूर्व सफलता , हमारी सरकार को उनकी भी नकल करने को प्रोत्साहित करती है ( जैसे पटियाला , बंग्लोर , ग्वालियर , राई , पूना के राष्ट्रीय खेल संस्थान जो रूस के राष्ट्रीय खेल स्कूलों के ही भारतीय खेल संस्करण हैं ) लेकिन उनके जैसा खेल-संगठन करने की न इच्छा-शक्ति है और न क्षमता , इसलिए खेलों का सारा ढाँचा इंग्लैण्ड और अमरीका की ही नकल में खड़ा हो रहा है । रूस में क्रान्ति के बाद बहस चली थी कि खेल कैसे हों । एक मत यह था कि प्रतियोगिताएं पूंजीवादी समाज की देन हैं , समाजवादी समाज में उनकी उपयोगिता नहीं ; जन-स्वास्थ्य उन्नत करने पर ध्यान देना है , प्रतियोगिताओं पर नहीं । यह मत पूरी तरह तो माना नहीं गया पर १९२८ तक प्रतियोगिताओं की जगह फ़िज़िकल कल्चर ( व्यायाम , स्वास्थ्य-उन्नति के कार्यक्रम ) पर ही जोर रहा। लेकिन स्टालिन द्वारा विरोधियों के सफ़ाये के साथ और पंचवर्षीय योजनाओं के साथ द्रुत औद्योगीकरण व आधुनिकीकरण के चलते प्रतियोगिताओं पर जोर बढ़ता गया । १९४९ में पारटी ने घोषणा की ” खेल-कूद में दक्षता को बढ़ाना है ताकि विश्व – प्रतियोगिताओं में सफलता मिले । ” १९५२ में रूस ने पहली बार ओलम्पिक में भाग लिया । तबसे कम्युनिस्ट देशों ( खासकर रूस और पूर्वी जरमनी ) ने अपनी केन्द्रीकृत व्यवस्था का उपयोग कर अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में असाधारण सफलता प्राप्त की । लेकिन यह भी कहना होगा कि उन्होंने अपने यहाँ बहुत बड़ी आबादी को खेल के अवसर भी प्रदान किए ।

यहां रूस की चरचा का उद्देश्य यह है कि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के साथ पबलिक स्कूलों के उदय के कारण १९वीं सदी में खेल-कूद का जो नक्शा बना और जो यूरोप और ब्रिटिश साम्राज्य में चल पड़ा , उसको जो चुनौती मिल सकती थी , वह रूस के भी प्रतियोगिता तत्व अपना लेने के कारण नहीं मिली । इससे पिछले ५०-६० सालों से खेलों में खेल के जो मूल तत्व (उमंग और सहजता) खत्म होता गया है और वे ज्यादा-से-ज्यादा संगठित किए जा रहे हैं जिससे वे किसी-न-किसी निश्चित प्रणाली के तहत होते हैं और राष्ट्र की इज्जत के सवाल और उन्माद के जनक बन जाते हैं । जब खेलों में जीतना सर्वोपरि हो जाता है , तकनीकों का विज्ञानसम्मत विकास किया जाना लगता है और दर्शकों पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता है , तब वे खेल नहीं रह जाते , दक्ष प्रदर्शन हो जाते हैं । हमारे यहां यही हो रहा है ।

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सरकार और खेल : अशोक सेक्सरिया

१९८२ के एशियाई खेल , १९५२ में साढ़े छ: लाख रु. की लागत से आयोजित प्रथम एशियाई खेलों की ही परिणति हैं । प्रथम एशियाई खेलों द्वारा अंगरेजों के राज में खेलों का जो ढाँचा बना था उसे ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया गया । खेलों के बारे में आजाद देश में कोई नीति नहीं बनाई गई । नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में खेल कैसे हों  , यह कभी बहस का मुद्दा ही नहीं बना । एक ही लक्ष्य बनता गया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में किसी भी प्रकार से ज्यादा-से-ज्यादा सफलता प्राप्त की जाये (खेलों में भारत की हार होने पर संसद में हमेशा हल्ला हुआ है ) । इस कारण देशवासियों की जरूरत के रूप में खेलों की कल्पना नहीं हुई है और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगितायें जीतने के लिए खेलों को ज्यादा-से-ज्यादा संगठित रूप देने , प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने और सफ़ल राष्ट्रों की तकनीकी की नकल करने की अधकचरी कोशिशें चालू हुईं । देहाती खेल-कूद प्रतियोगिता शुरु की गई तो उद्देश्य देहातों से विश्व विजेता प्राप्त करना था , देहात के लोगों के लिए ख्ले के अवसर जुटाना नहीं । जैसे यह मान लिया जाता है कि गरीबों को रोटी से मतलब है , लोकतंत्र से नहीं , वैसे ही मान लिया गया कि गरीबों को खेल की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में खेलों का सारा तामझाम ( विकास कत्तई नहीं कहेंगे ) , विशिष्ट वर्ग की अन्तरराष्ट्रीय सफलता प्राप्त करने की वासना मिटाने और बढ़ती आबादी को बम्बइया फिल्मों जैसा एक और घटिया उत्तेजना भरा मनोरंजन प्रदान करने के लिए खड़ा होता गया । इसी का नतीजा यह है कि खेलों में औद्योगिक घरानों का प्रवेश हो रहा है , उनकी टीमें बन रही हैं , उनके सौजन्य से प्रतियोगितायें हो रही हैं और गावस्कर-जैसे पेशेवर लखपति खिलाड़ियों का उदय हो रहा है ।

सरकार कम्युनिस्ट देशों की तरह खेलों का संगठन करने में असमर्थता और अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करने की वासना के चलते ( यह शासक वर्गों की सम्रुद्ध राष्ट्रों के सम्पन्न लोगों – जैसा रहन – सहन प्राप्त करने की वासना का दूसरा रूप है) पिछले ७-८ वर्षों से खेलों के बारे में उपभोक्तावादी मनोवृत्ति को बढ़ा रही है । इसके पीछे शहरी आबादी को बहलाकर समस्याओं से बेखबर करने की साजिश  के साथ यह ’ महान विचार ’ भी काम कर रहा है कि खेलों के प्रति उन्माद बढ़ाने से ( रात के तीन बजे तक विश्वकप फुटबाल के मैच टेलिविजन पर दिखाये जाते हैं ) देश में विश्व विजेता खिलाड़ी पैदा हो सकेंगे ।

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खेल और व्यापार : अशोक सेक्सरिया

प्राय: सभी देशों में सरकार , उद्योग , जनसंचार के माध्यम ( मीडिया ) और सेना ने प्रतियोगात्मक खेलों के प्रति जनमानस में जबरदस्त आकर्षण पैदा करने की कोशिश की है । अगर हम एशियाई खेलों के आयोजन के सिलसिले में इन चारों की भूमिका के बारे में सोचने की कोशिश करें तो साफ़ नज़र आयेगा कि ये चारों मिलकर एशियाई खेलों का उन्माद पैदा कर रहे हैं । यह एक मिलीभगत है । सरकार की भूमिका तो इतनी स्पष्ट है कि उसकी चर्चा ही व्यर्थ है । उद्योगों यानी कम्पनियों को इन खेलों के माध्यम से अपना धुंआधार विज्ञापन करने और अनुपयोगी और विलासितापूर्ण वस्तुओं का बाजार तैयार करने का एक बहुत बड़ा  अवसर दिया जा रहा है । ( यह एक भयानक चीज है इससे सरकार और उद्योगपतियों का गठबंधन इस तरह मजबूत हो रहा है कि इससे उद्योगपतियों की मुनाफ़ाखोरी इस तरह बढ़ेगी जिससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का बढ़ना और अनावश्यक वस्तुओं का निर्माण बढ़ना अनिवार्य है )। खेलों के तावीज (मस्कॉट,शुभंकर ) का व्यापार हम देख रहे हैं । अप्पू के छापे की कमीज का कपड़ा और गंजियां दूर दूर तक पहुंच रहे हैं। बड़े शहरों में अभी ही घरेलू नौकरों के बदन पर , मालिकों के साहबजादों के बदन से उतरी हुई अप्पू छाप की गंजी दिखाई देने लगी है । पनवाड़ियों और बस्तियों के शोहदों के बदन पर भी यह दिखती है । इसे शायद इन्दिरा गांधी एशियाई खेलों में गरीब की हिस्सेदारी मानेंगी ।

कम्पनियों की विज्ञापनबाजी का आलम तो यह है कि ऐसा लगता है कि हमने अमरीका जैसा स्तर प्राप्त कर लिया है । धनी देशों में खेल प्रतियोगितायें आजकल ज्यादातर बड़ी कम्पनियों के सौजन्य से होती हैं , जो इन्हें विज्ञापन का माध्यम बनाती हैं । इंगलैंड में पिछले साल सिगरेट कंपनियों के सौजन्य से खेल प्रतियोगिता का प्रबल विरोध करते हुए दस प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्रियों ने जिनमें आठ रायल मेडिकल कालेज के अध्यक्ष थे , खेल मंत्री को पत्र लिखा था । इस पत्र पर टिप्पणी करते हुए ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने लिखा : ’  अगर सरकार प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्रियों की मांग (कंपनियों पर प्रतिबन्ध) स्वीकार नहीं करती तो , इसके दो ही अर्थ होंगे – या तो सिगरेट पीने से स्वास्थ्य बिगड़ने की बात गलत है या सरकार ने जनस्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेवारी को तिलांजलि दे दी है ” जब बीसवीं सदी के चिकित्साशास्त्र का इतिहास लिखा जायेगा तो ऐसी अनुमति देने वाली ( सिगरेट कंपनियों द्वारा प्रतियोगिता आयोजित करने की अनुमति) सरकार के सदस्य लोगों की बीमारी बढ़ाने के अपराध में कटघरे में खड़े किए जायेंगे । ” हमारे देश में सिगरेट कंपनियां सिर्फ़ खेलों का ही नहीं , नृत्य-संगीत के कार्यक्रम यहां तक कि चित्र प्रदर्शनियों का आयोजन कर रही हैं । हमारे देश में चाकलेट खिलाकर बच्चों के दांत नष्त करने वाली कैडबरी कंपनी को बच्चों की खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजन करने की अनुमति मिली हुई है । कहने का मतलब यह है कि एशियाई खेलों से इस प्रवृत्ति को भयानक रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है । उद्योगपतियों से सरकार का यह गठबंधन घोषणा करता है कि सरकार कैम्पा-कोला पिलाना कर्तव्य मानती है , जल पिलाना नहीं ।

जनसंचार के माध्यमों रेडियो, टेलिविजन ,अखबारों – द्वारा जो शोर मचाया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि उनका काम  सिरफ़ सरकार और उद्योगपतियों के लिए जन मानस में एशियाई खेलों के प्रति उन्माद को बढ़ाना है । वे बार-बार यही दुहरा रहे हैं कि एशियाई खेलों के स्टेडियम विश्व कोटि के हैं और जिन चीजों में विश्व कोटि हासिल नहीं की जा सकी है उनका आयात कर लिया गया है । यह किस कीमत पर हुआ है , स्टेडियम आदि बनाने में किस प्रकार तमाम श्रम-कानूनों का उल्लंघन हुआ है और निर्माणस्थलों पर मजदूरों का कितना भयंकर शोषण हुआ है , इस बारे में इक्के-दुक्के लेख छपे हैं ( रेडियो,टेलिविजन के अनुसार तो भारत में शोषण नाम की किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है ) और वे कुछ वैसे ही हैं जैसे किसी आधुनिका को लिपस्टिक-पाउडर खरीदने के बाद गाड़ी में बैठते – बैठते एकाएक याद आ जाए कि उसे जीरा भी खरीदना था और वह ड्राईवर को जीरा लाने भेज  दे ।

टेलीविजन में एशियाई खेलों को लेकर जो कार्यक्रम आते हैं उनमें एक डी मेलो साहब खिलाड़ियों , आयोजनकर्ताओं और विदेशी विशेषज्ञों से पूछते हैं कि जिन सुविधाओं की व्यवस्था की गै है वे विश्वस्तर हैं न ! और, उन्हें हर बार जवाब मिलता है कि सब विश्वकोटि का है । इस विश्वकोटि का एक ही मतलब है कि हमारा शासकवर्ग देशवासियों को दु:ख-दैन्य के महासमुद्र में डुबाकर अपने लिये विश्वकोटि का रहन -सहन ही नहीं विश्वकोटि का मनोरंजन भी भी चाहता है ।

एशियाई खेलों में सेना की महत्वपूर्ण भूमिका है । उसके सहयोग के बिना सरकार इतने बड़े आयोजन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी । लेकिन ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ओलंपिक खेल और एशियाई खेल जैसे आयोजनों की मूलप्रकृति ( उग्र राष्ट्रीयतावाद , हार-जीत,सैनिक किस्म की रस्में , शक्ति-प्रदर्शन आदि ) सैनिक होती हैं और वे जनमानस में सैन्यशक्ति के प्रति सम्मान और आकर्षण पैदा करते हैं । तथाकथित कम्युनिस्ट देशों में तो सेना के लिए योग्य जवान प्राप्त करना खेल-कूद की नीति का एक बड़ा उद्देश्य होता है । हमारे देश में एशियाई खेलों के आमन्त्रण के आयोजन से खेल-कूद के क्षेत्र में सेना की भूमिका और बढ़ेगी । अ.भा. खेल कूद के अध्यक्ष के रूप में रिटायर सेनाध्यक्षों – जनरल करियप्पा , कुमारमंगलम , साम मानेकशा – को बैठाने की परम्परा तो बन ही चुकी है ।

सरकारीकरण , व्यापारीकरण , सैन्यीकरण और प्रोपैगैंडा का वास्तविक खेलों से कोई वास्ता नहीं होता और न होना चाहिए , लेकिन एशियाई खेलों का इनके सिवाय किसी अन्य चीज से वास्ता है ही नहीं । उल्लास , उमंग और सहजता से इनका कोई रिश्ता नहीं ।

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आरंभ में प्रश्न उठाया गया था कि – एशियाई खेल क्या वास्तव में खेल हैं ? हमने देखा उनमें खेल का मूल तत्त्व ही नहीं है । लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती , वह एक और प्रश्न खड़ा कर जाती है – हमारे देश में खेल कैसे हों ?

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हिटलर और खेल : अशोक सेक्सरिया

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१९ नवम्बर से एशियाई खेलों के नाम पर जो अश्लीलता होने जा रही है , उसमें कहीं भी वह खेल नहीं होगा जिसकी हमने ऊपर चर्चा की । इनमें तमगे बटेंगे , राष्ट्रगानों की धुनें बजेंगी और हारने का मातम व जीतने की बेहयाई होगी।  ऐसे में एशियाई खेलों को हम खेल क्यों मानें ? १९३६ में हिटलर ने बरलिन में ओलम्पिक खेलों का जो आयोजन करना चाहा था , वही कमोबेश इनमें किया जा रहा है । ओलिम्पिक के आयोजन में नाजियों ने पैसे की कोई परवाह नहीं की । न्यूरमबर्ग रैलियों के लगातार आयोजन से उन्होंने जो अनुभव प्राप्त किया था , उसे बहुत कारगर ढंग से ओलिम्पिक खेलों के आयोजन में लगाया | नाजियों की दृष्टि में ओलिम्पिक के आयोजन में खरच किया गया एक भी पैसा बेकार नहीं गया क्योंकि इससे उन्होंने दुनिया-भर में अपना जो धुंआधार प्रचार किया , वे किसी अन्य तरीके से नहीं कर सकते थे । नाजियों के यहूदी विद्वेष के कारण बरलिन में ओलिम्पिक करने के बारे में जो आपत्ति थी , उसे दूर करने के लिए हिटलर ने यह भ्रम भी फैलाया कि जरमनी की टीम में यहूदी लिये जायेंगे । ओलिम्पिक खेलों के आयोजन के पीछे हिटलर का उद्देश्य देशों के बीच प्रेम और मैत्री बढ़ाना नहीं था । उसका उद्देश्य विशुद्ध रूप से राजनीतिक था । अन्तरराष्ट्रीय खेलों का आयोजन होता ही है सरकारों की छवि निखारने के लिए । एशियाई खेलों का भी उद्देश्य यही है । दुनिया की ऋणदात्री संस्थाओं को भी दिखाना है कि भारत ऐसा देश है जिसे ऋण दिया जा सकता है ।

जहाँ तक अन्तर्राष्ट्रीय खेलों से भाईचारा और मैत्री बढ़ाने की बात है , वह एक झूठी किंवदन्ती है । थोड़े ही दिनों में भारत क्रिकेट मैच होंगे , देखिएगा हम हिन्दुस्तानियों में पाकिस्तान के प्रति कैसा प्रेम उमड़ता है ! प्रेम बढ़ता है एक देश के कलाकारों , लेखकों के दूसरे देश जाने से और यहाँ के कलाकारों लेखकों के साथ आदान – प्रदान करने से , क्योंकि कलाकारों और लेखकों के बीच मैच नहीं होते । पिछली बार पाकिस्तानी टीम हमारे यहाँ आई थी तो हमने उसको हरा कर भेजा , इस बार हम जायेंगे तो वे हमे हराकर भेजेंगे । अन्तरराष्ट्रीय खेलों का सभ्य रिवाज यह है कि मेजबान राष्ट्र मेहमान राष्ट्र को चोरी , बदमाशी और समर्थकों के जोर से हराकर विदा करता है । एशियाई – खेलों में भारतीय फुटबाल टीम को यही आशा है कि दर्शकों के जोर के दम पर वह शायद एकदम फिसड्डी साबित न हो ( यह प्रशिक्षक का मत है ) । समाजवादी लेखक जार्ज आरवेल ने अन्तरराष्ट्रीय खेलों के चरित्र के बारे में लिखा था :

” अगर कोई ठोस उदाहरणों से , जैसे १९३६ के ओलिम्पिक भी इस बात को न जान पाए कि अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगितायें अन्तरराष्ट्रीय घृणा (के अतिरेक व उन्माद ) को जन्म देती हैं तो वह मोटी – मोटी बातों से ही इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि – महत्वपूर्ण खेलकूद (सिरियस स्पोर्ट्स) का समानता और न्याय की भावनाओं से कोई वास्ता नहीं है । ये तो घृणा , ईर्ष्या , घमंड , नियमों की अवज्ञा करने और हिंसा को देखकर परपीड़क आनन्द प्राप्त करने से अभिन्न रूप से जुड़ें हुए हैं । ये ऐसे युद्ध हैं जिनमें गोलीबारी के सिवाय सब-कुछ (सारी बुराइयाँ युद्ध की ) होता है । “

आरवेल ने चालीस साल पहले जब यह लिखा तब उनके दिमाग में १९३६ के ओलिम्पिक खेल और कुछ अन्तरराष्ट्रीय फुटबाल मैच थे । तबसे खेलों में जिन बुराइयों की आरवेल ने चर्चा की है , वे कई गुना बढ़ गयी हैं । हिंसा तो खेल-कूद की अनिवार्य अंग बनती जा रही है । खिलाड़ियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनमें ’ किलर इन्स्टिंक्ट ’ होगी यानी जीतने के लिए प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी को मार डालने तक की प्रवृत्ति । दर्शकों को तबतक पैसे वसूल होते नहीं दिखते जबतक उनको यह नहीं लगता कि खिलाड़ी उनका मनोरंजन करने के लिए ’पर और मार नहीं ’ रहे हैं । किसी खिलाड़ी के असफल रहने पर उसे धिक्कारा जाता है कि उसमें ’ किलर इन्स्टिंक्ट ’ ( ’हत्या करने की मूल प्रवृत्ति ’ ) नहीं है । ऐसे में खिलाड़ी अपने में ’किलर इन्स्टिंक्ट’ लाते हैं और जो बेचारे ला नहीं पाते वे दिखाने के लिए हिंसा का स्वांग करते हैं । इस तरह हिंसा बढ़ती ही जाती है । अब किसी भी तरह जीतना उद्देश्य बनता जाए तो यह होगा ही । खेलों से हिंसा का जो उन्माद बनता है वह नया है । जैसे नशेवान और ज्यादा नशा चाहता है , वैसे ही दर्शक खेल के मैदान में ज्यादा-से-ज्यादा हिंसा चाहता है ताकि उसका उन्माद बढ़े ।

( जारी )

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क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ? – अशोक सेक्सरिया

एशियाई खेलों को लेकर देश भर में जब भयंकर उन्माद फैलाया जा रहा है, तब यह प्रश्न उठाना कि यह खेल वास्तव में खेल हैं भी कि नहीं – मूर्खता लगता है । मूर्खता के डर से आदमी सोचना बंद कर देता है और उस पागलपन में शामिल हो जाता है जो सरकार , कम्पनियां और अखबार एशियाई खेलों को लेकर फैला रहे हैं । आखिर , हमारे जैसे गरीब और भिखमंगे देश में , जहाँ आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रह रही है और जिसकी सरकार ने हाल में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से रिरियाकर ५ हजार करोड़ रुपये का ऋण लिया हो , एक हजार करोड़ रुपये खरच कर खेलों का आयोजन करना पागलपन नहीं है तो और क्या है ? अगर पागलपन नहीं , तो फिर बीमार बच्चे या बीमार बाप की दवा पर न खरच कर टेलिविजन खरीदने पर खरचने – जैसी क्रूरता और कृतघ्नता है ।
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खेल उमंग की सहज अभिव्यक्ति है । उनका आदिरूप हम बच्चों में देखते हैं , वे हमेशा खेलते रहते हैं । अकेला बच्चा भी खेलता रहता है । हम देखते हैं कि कोई अकेला बच्चा , कुछ न मिला तो रास्ते पड़ी सिगरेट की डिबिया को ही ठोकर मारता या अपने पास की किसी चीज को उछालता और लपकता हुआ खेल की सृष्टि कर रहा है । एशियाई खेलों के स्टेडियम बनानेवाले मजदूरों के मरियल बच्चे भी , माँ – बाप के काम पर चले जाने पर , निश्चय ही खेलते होंगे ।
बच्चों के खेल में प्रतियोगिता के बजाय उमंग और आनंद की ही प्रधानता होती है । इस आनंद की एक छवि यहाँ रखते हैं –

” वह शहर का गंदा मुहल्ला था । उसकी संकरी गली से गुजरते ही लगता था , बदन की कमीज मैली हो गयी है । कहीं कोई थूक रहा था तो कोई मूत रहा था । मिठाई की दूकान में सजी हुई मठाइयां देखकर ही दिमाग में मक्खियां भिनभिनाने लगती थीं । गली के किनारे आते – जाते लोगों के बीच दो बच्चे लकड़ी की तख्तियों ( पटरों ) और प्लास्टिक की चिड़िया से आधे बैडमिन्टन और आधे टेबल -टेनिस जैसा कोई खेल खेल रहे थे । उनके बीच कोई जाल नहीं था । जाल की कल्पना उनके मन में थी । मैले और गन्दे होने के बावजूद खेलते हुए दोनों बड़े सुन्दर मालूम पड़ रहे थे । एक पल वह रुक गया और उनका खेल देखने लगा । उसने देखा कि वे खेल खेल रहे हैं , हार – जीत नहीं रहे हैं । दोनों अपनी तख्तियों से चिड़िया को इस तरह मार रहे हैं कि वह जमीन पर न गिरे । मिल – जुल कर खेल को साध रहे हैं लेकिन यह मिलना – जुलना ऐसा भी नहीं कि मिलीभगत हो जाए । एक बच्चा चिड़िया को इस तरह मारता था कि दूसरे बच्चे को उसे लौटाने में दिक्कत तो हो पर इतनी नहीं कि चिड़िया जमीन पर गिर जाये । उनका इरादा हारने – जीतने का नहीं था , खेल खेलने का था , सो वे बच्चे होने पर भी एक ऐसे संतुलन की तलाश में थे जिसमें थोड़ी चुनौती तो हो पर हार – जीत के बजाय आनन्द-ही-आनन्द हो । “

तो खेल का यही तत्व और सत्व है कि उसमें आनन्द हो , सहजता हो और ऊपर से थोपा गया कोई संगठन न हो । बच्चों के खेल में यदि उसे बड़े बिगाड़ न दें , यही तत्व रहता है । लेकिन आदमी सब समय तो बच्चा नहीं रहता , वह बड़ा हो जाता है ; पर उस सहज उमंग को खोना नहीं चाहता जिसे उसने बचपन में जाना था । इसीलिए वह खेलना चाहता है , अपने अंगों में थिरकन पैदा करना चाहता है ; लेकिन बच्चे की तरह खेल नहीं पाता , इसलिए वह ज्यादा-से-ज्यादा इस बात की कोशिश करता है कि बच्चे की तरह खेले । इस कोशिश में वह बचपन के सत्य को पुन: निर्मित करता है , इसीलिए उसका खेल अभिनय होता है ; पर इतना अभिनय भी नहीं कि खेल रह ही न जाए । बच्चों और बड़ों के खेल में यही सूक्ष्म अंतर है । खेल का संसार बड़ों के लिए उमंग – भरे अभिनय का संसार है , जिसके नियम , कायदे और कानून ऐसे नहीं हैं कि जिनसे उन्हें डर लगे । यह जीवन की जटिलताओं से मुक्ति का अहसास दिलाने वाला और प्रसन्न रखने वाला संसार है । इसमें तमगे नहीं हो सकते , हार-जीत नहीं हो सकती और न ही दो लाख मजदूरों के शोषण से निर्मित अश्लील वैभव ।

( जारी )

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