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चलो दिल्ली ! – श्यामनारायण पाण्डेय

आज नेताजी की जन्म तिथि है। उन्होंने रंगून से ‘चलो दिल्ली’ का जब आवाहन किया था तब श्यामनारायण पांडे ने कविता लिखी थी। अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था। मैंने ’74 के आसपास याद की थी।एक लाइन भूला हूँ,किसी को याद हो तो बता दें,आभारी रहूँगा।
रगों में खूँ उबलता है,
हमारा जोश कहता है।
जिगर में आग उठती है,
हमारा रोष कहता है।
उधर कौमी तिरंगे को,
संभाले बोस कहता है।
बढ़ो तूफ़ान से वीरों,
चलो दिल्ली ! चलो दिल्ली!
अभी आगे पहाड़ों के,
यहीं बंगाल आता है,
हमारा नवगुरुद्वारा,
यही पंजाब आता है।
जलाया जा रहा काबा,
लगी है आग काशी में,
युगों से देखती रानी,
हमारी राह झांसी में।
जवानी का तकाजा है,
रवानी का तकाजा है,
तिरंगे के शहीदों की
कहानी का तकाजा है।
बुलाती है हमें गंगा,
बुलाती घाघरा हमको।
हमारे लाडलो आओ,
बुलाता आगरा हमको।
…… ने पुकारा है,
हमारे देश के लोहिया,
उषा, जय ने पुकारा है।
गुलामी की कड़ी तोड़ो,
तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो।
लगा कर होड़ आंधी से,
जमीं से आसमां जोड़ो।
शिवा की आन पर गरजो,
कुँवर बलिदान पर गरजो,
बढ़ो जय हिन्द नारे से,
कलेजा थरथरा दें हम।
किले पर तीन रंगों का,
फरहरा फरफरा दें हम।
– श्यामनारायण पांडे।

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2013 में मेरा ब्लॉग ‘शैशव’

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2013 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Sydney Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 20,000 times in 2013. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 7 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

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‘भारतीय जनता की मां को श्रद्धांजलि / सुभाषचन्द्र बोस’

पिछले साल किसी ने भारत सरकार से पूछा ,’भारत का कोई राष्ट्रपिता भी है ?’ अधिकारिक तौर पर जवाब मिला कि सरकार ने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया। सरकार के जवाब से उत्साहित होकर कुछ लोगों ने इसका खूब प्रचार किया । सरकार अगर प्रश्नकर्ता को सही जवाब देना चाहती तो उसे राष्ट्रीय आन्दोलन की दो विभूतियों को तरजीह देनी पड़ती। पहले व्यक्ति वे जिन्होंने किसी को राष्ट्रपिता कहा और दूसरे वे जिन्हें यह संबोधन दिया गया।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने बर्मा से राष्ट्र के नाम रेडियो-प्रसारण में ‘चलो दिल्ली’ का आवाहन किया और वैसे ही एक प्रसारण में गांधीजी को राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया। यहां नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का २२ फरवरी का बयान पुनर्प्रकाशित कर रहा हूं। इस बयान में उन्होंने कस्तूरबा को ‘भारतीय जनता की मां’ कहा है।
(२२ फरवरी , १९४४ को श्रीमती कस्तूरबा गांधी के निधन पर दिया गया वक्तव्य)

    श्रीमती कस्तूरबा गांधी नहीं रहीं । ७४ वर्ष की आयु में पूना में अंग्रेजों के कारागार में उनकी मृत्यु हुई । कस्तूरबा की की मृत्यु पर देश के अड़तीस करोड़ अस्सी लाख और विदेशों में रहने वाले मेरे देशवासियों के गहरे शोक में मैं उनके साथ शामिल हूं । उनकी मृत्यु दुखद परिस्थितियों में हुई लेकिन एक गुलाम देश के वासी के लिए कोई भी मौत इतनी सम्मानजनक और इतनी गौरवशाली नहीं हो सकती । हिन्दुस्तान को एक निजी क्षति हुई है । डेढ़ साल पहले जब महात्मा गांधी पूना में बंदी बनाए गए तो उसके बाद से उनके साथ की वह दूसरी कैदी हैं , जिनकी मृत्यु उनकी आंखों के सामने हुई । पहले कैदी महादेव देसाई थे , जो उनके आजीवन सहकर्मी और निजी सचिव थे। यह दूसरी व्यक्तिगत क्षति है जो महात्मा गांधी ने अपने इस कारावास के दौरान झेला है ।
    इस महान महिला को जो हिन्दुस्तानियों के लिए मां की तरह थी , मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और इस शोक की घड़ी में मैं गांधीजी के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं । मेरा यह सौभाग्य था कि मैं अनेक बार श्रीमती कस्तूरबा के संपर्क में आया और इन कुछ शब्दों से मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगा । वे भारतीय स्त्रीत्व का आदर्श थीं , शक्तिशाली, धैर्यवान , शांत और आत्मनिर्भर। कस्तूरबा हिन्दुस्तान की उन लाखों बेटियों के लिए एक प्रेरणास्रोत थीं जिनके साथ वे रहती थीं और जिनसे वे अपनी मातृभूमि के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मिली थीं । दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के बाद से ही वे अपने महान पति के साथ परीक्षाओं और कष्टों में शामिल थीम और यह सामिप्य तीस साल तक चला । अनेक बार जेल जाने के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ लेकिन अपने चौहत्तरवे वर्ष में भी उन्हें जेल जाने से जरा भी डर न लगा । महात्मा गांधी ने जब भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया,उस संघर्ष में कस्तूरबा पहली पंक्ति में उनके साथ खड़ी थीं हिन्दुस्तान की बेटियों के लिए एक चमकते हुए उदाहरण के रूप में और हिन्दुस्तान के बेटों के लिए एक चुनौती के रूप में कि वे भी हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में अपनी बहनों से पीछे नहीं रहें ।
    कस्तूरबा गांधी

    कस्तूरबा गांधी


    कस्तूरबा एक शहीद की मौत मरी हैं । चार महीने से अधिक समय से वे हृदयरोग से पीड़ित थीं । लेकिन हिन्दुस्तानी राष्ट्र की इस अपील को कि मानवता के नाते कस्तूरबा को खराब स्वास्थ्य के आधार पर जेल से छोड़ दिया जाए , हृदयहीन अंग्रेज सरकार ने अनसुना कर दिया । शायद अंग्रेज यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि महात्मा गांधी को मानसिक पीड़ा पहुंचा कर वे उनके शरीर और आत्मा को तोड़ सकते थे और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर सकते थे । इन पशुओं के लिए मैं केवल अपनी घृणा व्यक्त कर सकता हूं जो दावा तो आजादी , न्याय और नैतिकता का करते हैं लेकिन असल में ऐसी निर्मम हत्या के दोषी हैं । वे हिन्दुस्तानियों को समझ नहीं पाए हैं । महात्मा गांधी या हिन्दुस्तानी राष्ट्र को अंग्रेज चाहे कितनी भी मानसिक पीड़ा या शारीरिक कष्ट दें , या देने की क्षमता रखें, वे कभी भी गांधीजी को अपने अडिग निर्णय से एक इंच भी पीछे नहीं हटा पाएंगे । महात्मा गांधी ने अंग्रेजों हिन्दुस्तान छोड़ने को कहा और एक आधुनिक युद्ध की विभीषिकाओं से इस देश को बचाने के लिए कहा । अंग्रेजों ने इसका ढिठाई और बदतमीजी से जवाब दिया और गांधीजी को एक सामान्य अपराधी की तरह जेल में ठूस दिया । वे और उनकी महान पत्नी जेल में मर जाने को तैयार थे लेकिन एक परतंत्र देश में जेल से बाहर आने को तैयार नहीं थे । अंग्रेजों ने यह तय कर लिया था कि कस्तूरबा जेल में अपने पति की आंखों के सामने हृदयरोग से दम तोड़ें । उनकी यह अपराधियों जैसी इच्छा पूरी हुई है , यह मौत हत्या से कम नहीं है । लेकिन देश और विदेशों में रहने वाले हम हिन्दुस्तानियों के लिए श्रीमती कस्तूरबा की दुखद मृत्यु एक भयानक चेतावनी है कि अंग्रेज एक-एक करके हमारे नेताओं को मारने का ह्रुदयहीन निश्चय कर चुके हैं। जब तक अंग्रेज हिन्दुस्तान में हैं , हमारे देश के प्रति उनके अत्याचार होते रहेंगे। केवल एक ही तरीका है जिससे हिन्दुस्तान के बेटे और बेटियां श्रीमती कस्तूरबा गांधी की मौत का बदला ले सकते हैं, और वह यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य को हिन्दुस्तान से पूरी तरह नष्ट कर दें। पूर्वी एशिया में रहने वाले हिन्दुस्तानियों के कंधों पर यह एक विशेष उत्तरदायित्व है , जिन्होंने हिन्दुस्तान के अंग्रेज शासकों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया है। यहां रहने वाले सभी बहनों का भी उस उत्तरदायित्व में भाग है । दुख की इस घड़ी में हम एक बार फिर उस पवित्र शपथ को दोहराते हैं कि हम अपना सशस्त्र संघर्ष तब तक जारी रखेंगे , जब तक अंतिम अंग्रेज को भारत से भगा नहीं दिया जाता ।
    (नेताजी संपूर्ण वांग्मय,पृ.१७७,१७८,टेस्टामेंट ऑफ सुभाष बोस, पृ. ६९-७० )

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2010 in review

The stats helper monkeys at WordPress.com mulled over how this blog did in 2010, and here’s a high level summary of its overall blog health:

Healthy blog!

The Blog-Health-o-Meter™ reads Wow.

Crunchy numbers

Featured image

The average container ship can carry about 4,500 containers. This blog was viewed about 14,000 times in 2010. If each view were a shipping container, your blog would have filled about 3 fully loaded ships.

 

In 2010, there were 34 new posts, growing the total archive of this blog to 180 posts. There were 16 pictures uploaded, taking up a total of 11mb. That’s about a picture per month.

The busiest day of the year was May 17th with 158 views. The most popular post that day was ज्ञानजी की पोस्ट के सकारात्मक परिणाम भी हैं.

Where did they come from?

The top referring sites in 2010 were hi.wordpress.com, blogvani.com, google.co.in, laltu.blogspot.com, and kashivishvavidyalay.wordpress.com.

Some visitors came searching, mostly for साम्प्रदायिकता, गुलाब, hindi poems on child labour, पेड़, and अल्लामा इकबाल.

Attractions in 2010

These are the posts and pages that got the most views in 2010.

1

ज्ञानजी की पोस्ट के सकारात्मक परिणाम भी हैं May 2010
9 comments

2

साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ? September 2008
9 comments

3

आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये : भवानी प्रसाद मिश्र November 2007
16 comments

4

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ? September 2008
9 comments

5

ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं ? – स्वामी विवेकानन्द January 2008
17 comments

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कविता / खबरदार ! वे आ रहे हैं / राजेन्द्र राजन

[ पिछले दिनों घुघूतीबासूती ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारतीय मूल के इंग्लैण्ड के एक नागरिक द्वारा खरीदे जाने पर एक पोस्ट लिखी । उसे पढ़कर मुझे १९९२-९३ में कवि-मित्र राजेन्द्र राजन द्वारा लिखी यह कविता याद आई ।

श्यामलाल ’पागल’और विपुल द्वारा बनाये गये पोस्टर चित्रों के साथ इस कविता की चित्र प्रदर्शनी को कई राज्यों में दिखाया था ]

स्वागत करो

सजाओ वन्दनवार

वे आ रहे हैं

दुनिया के बड़े-बड़े महाजन

सेठ – साहूकार

तुम्हारी नीलामी में

बोलियाँ बोलने

वे आ रहे हैं

तुम्हारे खेतों की

तुम्हारी फसलों की

तुम्हारे बीजों की

तुम्हारे फलों की

तुम्हारे बैलों की

तुम्हारे हलों की

नीलामी में बोलियाँ बोलने

वे आ रहे हैं

स्वागत करो

पहनाओ गले में हार

उन आगन्तुकों में नहीं हैं वे

जो आए थे पुराने जमानों में

नालन्दा और तक्षशिला

ज्ञान की प्यास लिए

वे आ रहे हैं

मुनाफ़े की आस लिए

जैसे आई थी ईस्ट इंडिया कंपनी

बढ़ने लगी दिन दूनी रात चौगुनी

बनाने लगी किले

फिर जिले

और फिर सारा देश

हो गया उसका उपनिवेश

वे आ रहे हैं

ईस्ट इंडिया कंपनी के

नए बही-खाते लिए

गले में कारीगरों के कटे अंगूठों की मालाएं पहने

भोपाल की जहरीली गैस छोड़ते

वे आ रहे हैं .

खबरदार !

कोई उन्हें रोके नहीं

कोई उन्हें टोके नहीं

उनके इशारों पर नाचती है सरकार

वे हैं हमारे शाही मेहमान

महाप्रभु दयावान

उन्हें बुला रहे हैं देश के तमाम

अमीर – उमरा हाकिम – हुक्काम

उनके लिए ला रहे हैं वे

अन्त: पुर के नए साज – सामान

स्वागत करो

खड़े हो जाओ बांधकर कतार

वे आरहे हैं

विकास के महान ठेकेदार

जो बाँटते हैं उधार

मुद्राकोष के विटामिन

और विश्व बैंक की प्रोटीन

और भी कई तरह की बोतलें रंगीन

जो हैं कमजोर और बीमार

वे कर लें अपनी सेहत में सुधार

आज जिनकी है सेहत ठीक

कल उसे देंगे वे बिगाड़

ताकि चलता रहे इलाज का उनका व्यापार

वे आ रहे हैं

नई गुलामी के सूत्रधार

लेकर डॉलर के हथियार

वे खरीदेंगे पूरे संसार को

बेचेंगे जादुई प्रचार

उन्हें आते हैं कई चमत्कार

वे बदल देंगे तुम्हारा दिमाग

तुम्हारी आँखें

तुम्हारा दिल

तुम्हारी चाल

तुम्हारी भाषा

तुम्हारे संस्कार

तुम्हारी अकल होगी बस नकल

तुम्हारी कला बन जाएगी चकला

संस्कृति होगी तुम्हारी

हिप-हिप हुला-हुला

हिप-हिप हुला-हुला

वे करेंगे तुम्हारा पूरा कायाकल्प

होंगे तुम गुलाम

नहीं लोग आजादी का नाम

भूल जाओगे लड़ने का विचार

नहीं उठेगा कोई भी उजला संकल्प

जो सूत्र वे बोलेंगे एक बार

तुम उसे दोहराओगे बारम्बार

वे खायेंगे तुम टपकाओगे लार

वे फटकारेंगे

तुम करोगे उनकी जय जयकार

तुम नाचोगे जब पड़ेगी तुम पर मार

इसे तुम कहते रहो सुधार

तुम्हार महिमा अपरम्पार

उनकी माया है विकराल

हर मुल्क हर शर में हैं

उनके पिट्ठू

उनके दलाल

जो कहते हैं उन्हें

दुनिया के खेवनहार

समझाते हैं हमें

भरोसा मत रखो

अपनी मेहनत पर

अपनी बु्द्धि पर

अपनी ताकत पर

अपनी हिम्मत पर

वे आयेंगे करेंगे तुम्हारा बेड़ापार

मत थामो खुद अपनी पतवार

वे आ रहे हैं

करने तुम्हारे मुल्क का उद्धार

उन्हें मिल गये हैं भारी मददगार

तुम्हारे ही कर्णधार

जो डरने को तैयार

जो झुकने को तैयार

जो बिकने को तैयार

कहें वे जो सब करने को तैयार

उन्हें सौंप रहे हैं वे

तुम्हारे घर के सब अधिकार

वे बना देंगे

तुम्हारे ही घर में तुम्हें किराएदार

जो चाहते हैं इसे करना इनकार

आज उठें वे करें ये ललकार

सत्ताधीशों का स्वेच्छाचार नहीं है हमारा देश

न पिशाचों का बाजार नहीं है हमारा देश

गिरवी सौदा फंदा व्यापार नहीं है हमारा देश

दासानुदास बंधुआ लाचार नहीं है हमारा देश

मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश

जो गूँजता है जमीन से आसमान तक

सारे बंधन तोड़

उठेगी जब भी यह ललकार

उन्हें बुलाने वाले तब कहीं नहीं होगंगे

उनके चरण चूमने वाले तब कहीं नीं होंगे

अपने अन्त:पुर से वे फेंक दिए जायेंगे

इतिहास की काल-कोठरी में

उन्हें खाएगा उनका अंधकार

हमारे ही कंधों पर यह भार

जो मिट जायेंगे मगर

करेंगे हर गुलामी का प्रतिकार

हमारे ही कंधों पर यह भार

इतिहास जिनसे करता है हिसाब

भविष्य को जो देते हैं जवाब

हमारे ही कंधों पर यह भार

जो चाहते हैं आज

कि दुनिया बने एक समाज

न पागल सत्ता की अंधी चाल

न पूंजी का व्यभिचार

हमारे ही कंधों पर यह भार

जो सुन सकते हैं वक्त की पुकार

हमारे ही कंधों पर यह भार ।

– राजेन्द्र राजन





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ग़रीबों का पैसा राष्ट्रमंडल खेलों के नाम?-क्रिस मॉरिस, बीबीसी

– क्रिस मॉरिस

बीबीसी के दक्षिण एशिया संवाददाता

सूचना का अधिकार क़ानून के तहत पाई गई आधिकारिक जानकारी आधार पर तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक ग़रीबी उन्मूलन की योजनाओं से करोड़ों रुपए की धनराशि दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लगाई जा रही है.

ये रिपोर्ट ‘हाउसिंग ऐंड लेंड राइट्स नेटवर्क’ नामक संस्था ने तैयार की है. संस्था का कहना है कि उसने इस बारे में सूचना का अधिकार क़ानून के तहत सरकार से जानकारी उपलब्ध की है.

इस संस्था ने मांग की है कि इस मामले में स्वतंत्र जाँच कराई जानी चाहिए और पता लगाना चाहिए कि ये कैसे होने दिया जा रहा है.

दिल्ली में सरकारी अधिकारियों का कहना है कि वे इन आरोपों पर ग़ौर कर रहे हैं.

‘दो हज़ार प्रतिशत वृद्धि’

ये रिपोर्ट भारत की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा करती है और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए योजनाएँ बनाने और धन जुटाने के तरीक़ो पर सवाल खड़े करती है.

रिपोर्ट कहती है कि समाज के पिछड़े तबकों और ग़रीब वर्ग की मदद के लिए रखे गए करोड़ों रुपयों की राशि को और मक़सदों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रमंडल खेलों पर हो रहा ख़र्च नियंत्रण के बाहर चला गया है और खेलों का बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए पहले प्रस्तावित राशि के मुकाबले में अब 2000 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ोतरी हुई है.  (चित्र:बीबीसी)

साथ ही खेलों की वजह से एक लाख से अधिक लोगों को अपने घरों को छोड़ना पड़ा है. रिपोर्ट के अनुसार इस साल अक्तूबर में शुरु होने वाली खेलों से पहले 40 हज़ार और परिवार विस्थापित हो सकते हैं.

इस रिपोर्ट को तैयार किया है एक पूर्व सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार अधिकारी मिलून कोठारी, जिन्होंने बीबीसी को बताया है कि संस्था के पास इन आरोपों की पुष्टि करने के लिए स्पष्ट सबूत हैं.

कोठारी के मुताबिक दिल्ली को एक विश्व-स्तर के शहर के रुप में दिखाने की होड़ में सरकार लोगों के प्रति अपनी क़ानूनी और नैतिक प्रतिबद्धता को भूल रही है.

साभार : बीबीसी (मूल स्रोत )

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आज क्या है ?

माघ पूर्णिमा के दिन सन्त रविदास की जयन्ती मनाई जाती है । किसी अन्य कवि के लिए उसके जन्म स्थान में, जनम दिन पर इतनी बड़ी और शानदार शोभा यात्रा निकलती हो इसकी जानकारी मुझे नहीं है ।

बहरहाल , उस दिन लोगों के दिलों में सन्त कवि की जन्म तिथि को जमाने के लिए जुलूस में शामिल लोग एक नारा भी लगाते हैं –आज क्या है ? – माघी पूर्णिमा है । आज क्या है ?- रविदास जयन्ती है ।

वैसे हीआज मैं पूछना चाह रहा हूँ- आज क्या है ?

ई-पत्राचार में हमें आज की तारीख टाइप नहीं करनी पड़ती इसलिए मेरे द्वारा पूछे गये सवाल के खूबसूरत उत्तर का उत्तर लोगों के ध्यान में जल्दी नहीं आयेगा ।

आज 5 / 2 / 10  है । इस साल 2 / 5 / 10 भी आयेगी ।

एक आत्मीय ने अपने नाम के साथ इस ओर ध्यान खींचा हुआ है ।

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