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सुधेन्दु पटेल की कविता : मुझे माफ़ न करना

[ जयपुर के नगीना उद्योग के बाल – श्रमिकों से … वरिष्ट पत्रकार सुधेन्धु पटेल ]

मेरे बच्चों

मुझे माफ़ न करना !

 

कि किलकारियों को भूख की नोक पर

उछाल – उछालकर

सिसकारियों में बदला है मैंने ही ।

 

कि नाजुक उंगलियों के पोरों पर

आखरों के फूल नहीं ,

उगाये हैं तेजाबी फफोले मैंने ही ।

 

कि कोपल – से उगते सपनों पर

चिंदी – चिंदी आग

स्पर्श की जगह छितराये मैंने ही ।

 

ना बच्चों

माफ़ नकरना हमें

जब तक तुम्हा्री

पारदर्शी आंखों के सामने

प्रायश्चित न कर लूँ मैं ।

– सुधेन्दु पटेल

ई-पता patelsudhendu@gmail.com

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एक लघु कहानी / अफ़लातून

हालात ने उसे पेशेवर भिखारी बना दिया होगा । उमर करीब पाँच- छ: साल। पेशे को अपनाने में दु:ख या संकोच होने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी उसकी कच्ची उमर ने । माँगने के कष्ट की शायद कल्पना ही न रही हो उसे और माँग कर न पाना भी उसके लिए उतना ही सामान्य था जितना माँग कर पाना ।
उस दिन सरदारजी की जलेबी की दुकान के करीब वह पहुँचा । सरदारजी पुण्य पाने की प्रेरणा से किसी माँगने वाले को अक्सर खाली नहीं जाने देते थे । उसे कपड़े न पहनने का कष्ट नहीं था परन्तु खुद के नंगे होने का आभास अवश्य ही था क्योंकि उसकी खड़ी झण्डी ग्राहकों की मुसकान का कारण बनी हुई थी । ’सिर्फ़ आकार के कारण ही आ-कार हटा कर ’झण्डी’ कहा जा रहा है । वरना पुरुष दर्प तो हमेशा एक साम्राज्यवादी तेवर के साथ सोचता है , ’ विजयी विश्व तिरंगा प्यारा , झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ ! बहरहाल , सरदारजी ने गल्ले से सिक्का निकाला। उनकी नजर उठी परन्तु लड़के की ’झण्डी” पर जा टिकी। उनके चेहरे पर गुस्से की शिकन खिंच गयी । उसने एक बार सरदारजी के गुस्से को देखा , फिर ग्राहकों की मुस्कान को और फिर खुद को – जितना आईने के बगैर देखा जा सकता है। और वह भी मुस्कुरा दिया । इस पर उसे कुछ और जोर से डाँट पड़ी और उसकी झण्डी लटक गई । ग्राहक अब हँस पड़े और लड़का भी हँस कर आगे बढ़ चला।
भीख देने से सरदारजी खुद को इज्जतदार समझते थे मगर उस दिन मानो उनकी तौहीन हो रही थी । लड़का अभी भी हँस रहा था और मेरा दोस्त भी । दोस्त ने मेरे हाथ से दोना ले लिया जिसमें दो जलेबियाँ बची थी और उसे दे दिया। सरदारजी से उस दिन भीख न पाने में भी उसे मजा आया ।

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शेरों को बसाने के लिए उजड़ते गाँव की कहानी : बाबा मायाराम

जिंदगी की उथल-पुथल में पिछड़ जाते हैं बच्चे

आमतौर पर विस्थापन का समाधान पुनर्वास से निकाल लिया जाता है। लेकिन विस्थापन एक उलझी हुई प्रक्रिया है। यह उतनी सीधी और आसान नहीं है जितनी ऊपर से दिखती है। पुनर्वास का अर्थ सिर्फ मकान और मुआवजा भर नहीं है, जीवन की और भी जरूरतें हैं। पानी, ईंधन, चारा, खेती, रोजगार सब कुछ चाहिए, जो नई जगह पर प्राय: नहीं मिलती।

अगर हम बोरी अभयारण्य से विस्थापित गांव धांई का उदाहरण लें तो हम पाएंगे कि नई धांई जहां विस्थापितों को बसाया गया है, उनका जीवन और मुश्किल हो गया है। उनका पूरी तरह से पुनर्वास नहीं हुआ है। साथ ही पड़ोसी गांव डोबझिरना का जीवन भी प्रभावित हो रहा है जिसके पास इस गांव को बसाया गया है। ऐसे जीवन संघर्ष में बच्चों की पोषण और परवरिश प्रभावित होना स्वाभाविक है। जी्वन संघर्ष में अक्सर बच्चे पिछड़ जाते हैं।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बोरी अभयारण्य भारत का पहला आरक्षित वन है। अब बोरी अभयारण्य, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान और पचमढ़ी अभयारण्य को मिलाकर सतपुड़ा टाईगर रिजर्व बनाया गया है। इसमे सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के 8 गांव, बोरी अभयारण्य के 17 गांव, पचमढ़ी अभयारण्य के 50 गांव शामिल हैं। कुल मिलाकर, आदिवासियों के लगभग 75 गांव हैं और इतने ही गांव बाहर सीमा से लगे हुए हैं। इनमें से अंदर के लगभग 50 गांवों को हटाने की योजना है। ये सभी गांव पूरी तरह जंगल, भूमि ओर पानी (तवा जलाशय) पर आश्रित है। वर्ष 2005 में धाईं को विस्थापित कर बाबई तहसील के सेमरी हरचंद के पास बसाया गया था। यह सतपुड़ा टाईगर रिजर्व का पहला विस्थापित गांव है। धाईं कोरकू आदिवासियों का गांव है।

नदी के बदले सूखा हैण्ड पम्प

नदी के बदले सूखा हैण्ड पम्प

आज नई धांई में नदी के बदले हैंडपंप है। बोरी अभयारण्य के अंदर पुरानी धांई में नदी थी। वहां पानी इफरात था, आज वे बूंद -बूंद के लिए मोहताज है। खेतों में सिंचाई का साधन तो नहीं ही है, साथ में पीने के पानी का भी गहरा संकट है। यहां के पनकू का कहना है कि यहां 97 मकानों के बीच 6 हैंडपंप हैं जिसमें से एक खराब है और दो में कम पानी आता है। सिर्फ एक ही हैंडपंप चल रहा है जिससे पीने के पानी की बड़ी समस्या है। इस गर्मी भर भीषण जल संकट रहा। इसी प्रकार तीन कुए खोदे गए हैं जो सूखे पड़े हैं। ट्यूबवेल हैं जिनसे फसल के समय पानी मिलता है, जिसमें बिजली कटौती एक समस्या है।

विस्थापितों को जो 5-5 एकड़ जमीन दी गई है, उसे खेती लायक तैयार नहीं किया गया है। ग्रामीणों के मुताबिक जो जमीन उन्हें दी गई है वहां पेड़ थे। खेतों से पेड़ों के पूरे ठूंठ नहीं निकाले गए है। इस कारण पूरे खेत में फसल नहीं लगा पा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि विस्थापितों को बसाने के लिए नई धांई के आसपास करीब 40 हजार पेड़ काटे गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वनविभाग ने जो वायदे किए थे वे निभाए नहीं हैं। तवा नहर की शाखा से सिंचाई का वायदा किया था, वह भी पूरा नहीं हुआ है।

यहां पानी और चारे की व्यवस्था नहीं होने के कारण मवेशी मर गए और जो बचे उन्हें चारे-पानी के अभाव में बेच दिया। अब खेती करने के लिए बैल भी नहीं बचे हैं। लिहाजा, खेती को कौली (किराए पर) देना पड़ता है। यहां ऐसे भी खेत के मालिक है जो उनके खेत पर रखवाली का काम कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपना खेत किसी को कौली पर दे दिया। जिस किसान को कौली पर खेत दिया उसने खेत मालिक को ही रखवाली पर रख लिया। ऐसी विडंबना शायद ही कहीं और देखने को मिले। किसान अपने ही खेत में मजदूर बन गया। पनकू का कहना है कि खेतों में ज्यादा ठूंठ होने के कारण अब कौली पर कोई खेत नहीं लेते।

बोरी अभयारण्य के अंदर पुराने गांव में कोरकू आदिवासियों का जीवन जंगल पर आधारित था। वे जंगल से अपना जीवकोपार्जन करते थे। वहां वे तेंदू, अचार, गोंद, फल-फूल, भमोड़ी ( मशरूम), कंद-मूल ननमाटी, जंगली रताड़ू, बेचांदी, कडुमाटी, भमोड़ी (कुकरमुत्ता) आदि बहुतायत में मिलते थे। वहां पाए जानेवाले जिन कंदों में कडुवापन होता है उन्हें विशेष पद्धति से दूर कर लेते थे । बेल को उबालकर खाते थे। अगर एक दो दिन भोजन न मिले तो जंगल से ही गुजारा चल जाता है। यह सब उनके भूख के दिनों के साथी हैं। लेकिन यहां जलाऊ लकड़ी के अलावा जंगल से बहुत ही कम चीजें मिल पाती हैं।

जीने का कोई और सहारा नहीं होने के कारण महिलाओं को सिरगट्ठा ( जलाऊ लकड़ी) बेचने का काम करना पड़ता है। इसके पहले उन्होंने कभी यह काम नहीं किया है। वे जलाऊ लकड़ी का गट्ठा बांधना और उतना वजन लेकर चलना सीख रही हैं। वे अपने गांव से उसे 5-6 किलोमीटर दूर सेमरी हरचंद में ले जाकर बेचती हैं। यह उनके लिए नया और कड़ी मेहनत वाला काम है। इसमें पूरे दो दिन लग जाते हैं। एक दिन वे जंगल जाकर लकड़ी एकत्र करती हैं और दूसरे दिन उसे बेचने ले जाना। बदले में जो 40-50 रू मिलते हैं उससे राशन और रोजाना इस्तेमाल होनेवाली चीजें खरीदते हैं।

नई धांई के पुनर्वास से इसके पड़ोसी गांव डोबझिरना के लोगों की समस्या बढ़ गई है। क्योंकि धांई वालों को डोबझिरना के लोगों की जमीन दे दी। यह कहा जा सकता है कि उनके पास जमीन के पट्टे नहीं थे लेकिन वे 20-25 सालों से उस जमीन को जोत-बो रहे थे। अब इन दोनों गांवों में तनाव हो गया है।

यहां के जंगल पर दबाव बढ़ता जा रहा है। अब यहां बोरी अभयारण्य का एक और गांव बोरी आ गया है। यानी जंगल पर दबाव बढता ही जाएगा। चारा, ईंधन, वनोपज आदि के लिए छीनाझपटी बढ़ जाएगी।

ऐसी स्थिति में विस्थापितों के बच्चों को अपने परिवार के साथ नई परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है। यहां के निवासी अधार सिंह के घर में यहां आने के बाद तीन मौतें (पत्नी, पुत्र और नाती) हो गई हैं। अधार सिंह का कहना है कि खाने को नहीं है तो इलाज कहां से करवाए? इस मुसीबत के कारण उनकी छोटी बेटी रजनी ने स्कूल छोड़ दिया। अधारसिंह अपने एक नाती की पढ़ाई को लेकर भी चिंतित है।

्प्रभावित शैशव

्प्रभावित शैशव

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है ऐसे बड़े निर्णय करते समय जिससे लोगों की जिंदगी में भारी उथल-पुथल आती है, गहरे विचार-विमर्श की जरूरत होती है। सामाजिक-आर्थिक अध्ययन की जरूरत होती है। कई बार यह होता है जिन्हें हटाया जा रहा है उन्हें  पता ही नही होता उन्हें क्यों और किस उद्देश्य से हटाया जा रहा है। शेरों के संरक्षण के लिए जिन आदिवासियों को हटाया गया है या हटाया जा रहा है। कई जानकार लोगों की मान्यता है कि वन्य जीवों का संरक्षण आदिवासियों के साथ भी हो सकता है, उन्हें हटाने की जरूरत नहीं है।

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होली का मर्म

अपने आप को धर्म और भगवान से ऊँचा मानने वाला हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें । पर हिरण्यकश्यप के पुत्र ने उसे भगवान मानने से साफ इनकार कर दिया । बहुत यातना व अत्याचार के बाद भी वह वह स्वयंभू अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद से अपने को भगवान कहलाने में असफल रहा । हार कर अन्त में उसने प्रह्लाद को जान से मारने का तरीका सोचा ।

हिरण्यकश्यप की एक होलिका नाम की बहन थी ।होलिका के पास एक अग्निरोधक वरदान वाला शॉल था ।वरदान के अनुसार यदि वह शाल ओढ़ कर आग में बैठेगी तो आग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी । हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में ले कर चिता पर बैठ जाए । होलिका ने अपने भाई का कहना माना और प्रह्लाद को गोद में ले कर चिता पर बैठ गयी । लेकिन जब चिता जली तो लपटों में होलिका का शॉल उड़ गया । होलिका जल मरी,पर भक्त प्रह्लाद का बाल बाँका नहीं हुआ।

प्रतिवर्ष होली जला कर हम इसी घटना का स्मरण करते हैं । होलिका दहन कर हिरण्यकश्यप की कुटिल चाल को नाकाम करते हैं। भक्त प्रह्लाद को जिन्दा रखते हैं।

होली का मर्म

आज भगवान को अपनी छुद्र राजनीति का जरिया बना कर धर्म के तथाकथित संरक्षक बन बैठे एक नहीं अनेक हिरण्यकश्यप सारे देश में घूम-घूमकर खून की होली खेल रहे हैं ।

अपने विश्वास को संविधान , कानून , राष्ट्र और जनता से ऊपर समझने वाले ये हिरण्यकश्यप देश की , जनता की एकता , सद्भावना,परस्पर विश्वास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर कुठाराघात कर रहे हैं । अपनी बहन होलिका रूपी साम्प्रदायिकता के माध्यम से कई निर्दोष और मासूमों को अपना शिकार बना रहे हैं ।

जो व्यक्ति या संगठन इनके विचारों से असहमति रखते हैं उन्हें सबक सिखाना,डराना,धमकाना ,मार-पीट करना,सभा बिगाड़ना,पुतला जलाना और अन्त में दमन करना,हत्या करना इन हिरण्यकश्यपों की दृष्टि में पवित्र धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है ।

धर्म और भगवान के ठेकेदार बने स्वयंभू हिरण्यकश्यपों और साम्प्रदायिकता रूपी होलिका को ठिकाने लगाना ही होली का सच्चा मर्म है ।

लकड़ियों के बड़े ढेर में आग लगा कर तो हम खत्म हो रहे जंगलों के विनाश में भागीदार बनते हैं , पर्यावरण असंतुलन के गुनहगार बनते हैं । अत: होली का मर्म समझ कर कम-से-कम लकड़ेयाँ जला कर प्रतीकात्मक होलिका दहन करें ।

समता संगठन ,पिपरिया,होशंगाबाद,(म.प्र.)

(पु्नर्प्रकाशन )

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भणसाळीकाका (२) : ले. नारायण देसाई

तीसरा दृश्य मगनवाड़ी का । बारह वर्षों का मौन चल रहा था । लेकिन बापू ने बहस करके भगवान का नामोच्चारण करने की छूट उनसे मंजूर करायी । उनकी दोनों बगलों में काख – बिलाई के फोड़े एक के बाद एक हो रहे थे । देखनेवाला सहम जाता था । लेकिन भणसाळीकाका का चरखा चालू ही रहता था । तार खींचते समय काख से खून या पीप की पिचकारी छूटती थी । पिचकारी देखकर वे खिलखिलाकर हँसने लगते । हँसने से दुबारा खून की पिचकारी छूटती । एक बार इलाज के लिए बापू ने उनको सरकारी अस्पताल में भेजा । काख में से पीप निकालने के लिए सिविल सर्जन ने एक सलाइ खोंस दी । भणसाळीकाका ने उस समय भी जोर का ठहाका लगाया । सिविलसर्जन काका से कहने लगे , ‘ ऐसा मरीज जिन्दगी में मैंने नहीं देखा , और किसीने देखा हो तो मैं नहीं जानता।’

    बापू और भणसाळीकाका के बीच चर्चा चलती । बापू बोलते जाते थे और भणसाळीकाका लिखते जाते थे । कुछ दिन बाद चर्चा के समय मौन छोड़ने का कबूल करवाया । कुछ दिनों के बाद हम लोगों के पढ़ानेभर के लिए मौन छोड़ने की बात भी कबूल करवायी ।

    मगनवाड़ी में कभी-कभी आधी रात में या भरी दोपहरी में भणसाळीकाका जोर से चिल्लाते , ‘ प्रभु,प्रभु,प्रभु,नारायण,नारायण । ‘ बादलों की गड़गड़ाहट के समान उनकी ध्वनि गम्भीर लगती थी । इन शब्दों के उच्चारण के समय उनको रोमांचित तथा गदगद होते हुए हमने देखा है । मेरे काका मानते थे कि भणसाळीकाका को भगवत्दर्शन हुए हैं । भणसाळीकाका ने इससे इनकार नहीं किया था ।

    चौथा दृश्य सेवाग्राम । भणसाळीकाका मुझे पढ़ाने बैठे हैं । चरखा चल रहा है । बगल में गाजर से भरी टोकरी रखी है । दिनभर में गाजर से भरी पूरी टोकरी खा जाते हैं । कभी-कभी शिष्य को भी गुरु का प्रसाद मिल जाता है । गाजर के बदले कभी अमरूद होते हैं या दोनों न हों तो सेपरेट किये हुए दूध की एक बाल्टी भरी रहती है ।खाने की चीज कुछ भी हो भणसाळीकाका के भोजन की मात्रा में इससे कोई खास फरक नहीं पड़ता था । बीच में कुछ दिन खजूर चला । लेकिन खजूर खाने से भूत दिखाइ देते हैं , ऐसी उनकी शिकायत थी। इसलिए खजूर बन्द कर दिया ।फिर लहसुन शुरु हुआ । लहसुन की एक-दो कलियाँ नहीं,बल्कि अच्छी-खासी दो-तीन सौ कलियाँ रखी रहती थीं और मुट्ठीभर एक साथ मुँह में डालकर खाते । इस प्रयोग से ऐसे बीमार पड़े कि मरते-मरते बचे । उन दिनों सरदार सेवाग्राम आये हुए थे । पूछा,’क्यों भणसाळी,क्या जाने की तैयारी कर रहे थे ?’ जवाब मिला, ‘उसकी कला अकल है ।’ सरदार ने हँसकर कहा ,’कभी उसके (भगवान के) साथ बातचीत करने का मौका आ जाय , तो हमारा राम-राम पहुँचा देना । ‘

    इस दृश्य की अब दूसरी बाजू । एक टाँके में छाती तक के पानी में भणसाळीकाका बैठे हैं। सिर पर तीस सेर वजन का पत्थर रखा हुआ है ।

    ‘ यह कौन-सा प्रयोग है ?’

    ‘कुछ नहीं। ध्यान की दृष्टि से ठंडक की आवश्यकता महसूस हुई।सोचा था कि पाँव में रस्सी बाँधकर कुएँ में उलटे सिर लटका जाय । चिमनलालजी ( आश्रम-व्यवस्थापक ) ने कहा कि बापू की इजाजत लो । बापू को चिट्ठी लिखी।उन्होंने इजाजत नहीं दी।मैंने फिर से लिखा कि कम-से-कम टाँके में बैठने की तो छूट दे दो।वह उन्होंने दी ।’

    ‘ लेकिन यह सिर पर पत्थर किसलिए ?’

    ‘पहले दिन टाँके में बैठा था तो जानवर पानी पीने आये।उनकी सींग शरीर में लगने के भय से कहीं गलती से शरीर उछल न जाय , इसलिए सिर पर वजन रखा है।’

    एबटाबाद से आने पर बापू ने उनका यह प्रयोग तुरंत बन्द करवा दिया । मन में चाहे जितनी जिद हो,फिर भी बापू ने मना कर दिया तो भणसाळीकाका उनके साथ बहस नहीं करते थे ।

    एक बार आश्रम में हममें से कइयों को पागल लोमड़ी ने काट लिया । भणसाळीकाका को उसने तीन बार काटा । लेकिन उन्होंने किसीसे से जिक्र नहीं किया। वह तो तब पता चला, जब उनके हाथों पर घाव दिखाई दिये ।सूई लगाने से इनकार करते थे । लेकिन बापू की आज्ञा हुई तो मान गये।फिर वर्धा तक मोटर में जाने से इनकार करने लगे।फिर से बापू की आज्ञा हुई तो चुपचाप चले गये।

    लेकिन बापू के साथ भी एक बार उनका मतभेद होने की घटना मैंने देखी है । आश्रम की किसी बहन की एक छोटी-सी भूल के कारण बापू ने उसे आश्रम छोड़कर जाने को कहा था । वह बहन विधवा थी। उसने भणसाळीकाका को बताया । भणसाळीकाका को लगा कि इसमें बापू के हाथ से अन्याय हो रहा है ।उन्होंने बापू से कहा , ‘तो मैं भी आश्रम छोड़कर चला।’ अन्त में बापू मान गये ।

    समाज के दुर्बल और पीड़ित वर्ग के प्रति भणसाळीकाका का हृदय बहुत संवेदनशील था । गरीबों के साथ अन्याय होता देखकर कई बार वे क्षुब्ध हो जाते थे । स्वराज्य के बाद तेलंगाना में कम्युनिस्ट लोगों ने आतंक फैलाया था। उसके कारण सरकार ने बड़े पैमाने पर कम्युनिस्टों की धरपकड़ की थी । उस समय भणसाळीकाका ने सरकार को पत्र लिखा कि ‘मुझे भी पकड़ लो। मैं अहिंसा में विश्वास रखनेवाला एक साम्यवादी हूँ ।

    आष्टी-चिमूर में स्त्रियों पर पुलिस ने अत्याचार किया था। उसकी करुण कहानी सुनकर भणसाळीकाका का पुण्यप्रकोप हुआ और उसके विरोध में उन्होंने अनशन किया ।भारत के इतिहास में इस अनशन की एक अमर कहानी बन गई है । इस अनशन के दरमियान भणसाळीकाका ने शुरु के पन्द्रह दिन पदयात्रा की थी और पानी पीना भी छोड़ दिया था।आखिर के ४८ दिन वे बिस्तर पे थे । अनशन का एक-एक दिन बढ़ रहा था ।सन १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में सरकार ने जनता को बेरहमी से कुचलकर मूर्छित-सा कर दिया था,लेकिन इस अनशन ने उस जनता में एक चेतना पैदा की ।रेल की पटरी उखाड़ने,तार काटने,डाक के डिब्बे जलाने के कार्यक्रमों का जवाब सरकार के पास था। लेकिन एक विशुद्ध नैतिक प्रश्न को लेकर एक सन्त ने अनशन का जो अमोघ अस्त्र उठाया था,उसका जवाब निष्ठुर सरकार के पास कुछ भी नहीं था । अन्त में सरकार ने इस अत्याचार की जाँच करना स्वीकार किया । इस तरह भारत के नारीत्व की मर्यादा का रक्षण हुआ ।

    आज भणसाळीकाका का शरीर गलितगात्र हो गया है । लेकिन वे नागपुर के नजदीक टाकली गाँव में रहकर ग्रामसेवा का अखण्ड व्रत का पालन कर रहे हैं। सेवाग्राम – आश्रम को यदि प्राणि-संग्रह कहा जाय तो भणसाळीकाका उसमें अनिर्बन्ध संचार करनेवाले सिंह-जैसे थे।.

[ यह संस्मरण नारायण देसाई की पुस्तक ‘बापू की गोद में’ से लिया गया है । सम्पूर्ण पुस्तक एक पुस्तक-चिट्ठे के रूप में संजाल पर उपलब्ध है । ]

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सुकरात की सगाई

    सुकरात मेरा प्यारा भतीजा है । ४ अगस्त १९७५ को बनारस के महिला अस्पताल में पैदा हुआ तब रणभेरी , चिन्गारी आदि नामों से साइक्लोस्टाइल्ड भूमिगत बुलेटिन निकालने वालों में प्रमुख उसका पिता- नचिकेता , खुद भी भूमिगत था । ‘ गिन रही ,सुन रही, हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को ‘ बाबा नागार्जुन ने इन शब्दों में जिन इन्दूजी का वर्णन किया था, उनकी थोपी सेन्सरशिप का मुकम्मल जवाब थीं – रणभेरी जैसी बुलेटिनें । नचिकेता के पत्रकारीय जीवन की ठोस बुनियाद । रणभेरी लुटा कर ‘ लोकनायक जयप्रकाश -जिन्दाबाद’ सिर्फ एक बार लगाना डी.आई.आर. के अन्तर्गत जेल जाने के लिए पर्याप्त होता था।

    बनारसीपने में सुकरात का घर का नाम मैंने दिया – बमबम । बमबम की बुआ -संघमित्रा की शादी के वक्त आशीर्वाद देते वक्त हुए प्रख्यात गाँधीजन दादा धर्माधिकारी ने हम तीनों भाई बहन के लिए कहा था :” ये गुजबंगोड़िया हैं । गुजराती पिता , बंगाली नानी और ओड़िया नाना होने के कारण ।” जीजाजी मराठी हैं इसलिए उनकी बच्ची – महागुजबंगोड़िया – यह दादा कह गए ! सुकरात ने इस प्रक्रिया को जारी रखा , व्यापक बनाया ।

    सुकरात की सगाई कल सम्पन्न हुई । सगाई के लिए गंगटोक से पूर्णतय: स्त्री सदस्यों का दल तीन दिन की यात्रा कर अहमदाबाद पहुँचा था । सुकरात अहमदाबाद टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में कॉपी एडिटर है और उसकी मंगेतर पूजा कम्प्यूटर साइन्स की प्रवक्ता है , गंगटोक में । कल हुए आयोजन में नचिकेता ने आभासी नाते के प्रत्यक्ष सम्बन्ध बन जाने पर खुशी व्यक्त की । सुकरात ने पूजा को अँगूठी पहनाई उसके पहले उसे नेपाली टोपी पहनाई गई , एक खुकरी दी गयी तथा पूजा की माँ और चाची ने घोषणा की : ” गोरखा समाज सुकरात को दामाद के रूप में कबूलेगा । ” नेपाली टोपी मेरे भाई और मेरे जीजाजी को भी पहनाई गई । असम के लाल किनार वाले अँगोछे की तरह इस टोपी के महत्व का अहसास हुआ । हमें कोई टोपी न पहना सका लेकिन काशी में बैठे-बैठे हमने बमबम और पूजा को आशीर्वाद दिया ।

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[ चित्र : १. सुकरात और पूजा , २.  सिलीगुड़ी का दल , ३. नेपाली टोपी ]

 

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आइए ‘आत्मदर्शी’ का खैरम – कदम करें

मेरे एक कथाकार मित्र ने ‘आत्मदर्शी’ नाम से चिट्ठा शुरु किया है।साहित्यिक जगत में वे एक अन्य नाम से कहानी-कविता लिखते रहे हैं ।ओड़ीसा के ढेंकानाल में शिक्षक हैं । आप सभी साथियों से निवेदन है कि उनके चिट्ठे को देखें,पढ़ें और स्वागत करें।

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