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रेल महकमे की शिकायतें की हैं , आपने ?

तब बनारस से तटीय ओडिशा जाने के दो रास्ते थे । यह रेल आरक्षण के कम्प्यूटर युग से बहुत पहले की बात है । बनारस से पुरी के लिए एक डिब्बा आसानसोल तक जाता था । वहाँ से कट कर खडगपुर,फिर हावडा पुरी एक्सप्रेस में लग कर पुरी । इस डिब्बे में आप बनारस से सीधे कटक – पुरी का आरक्षण करा सकते थे। दूसरा रास्ता हावडा हो कर जाने का था ।आप दिन में कोलकाता के रिश्तेदारों से मिलकर शाम को पुरी की गाड़ी पकड़ सकते थे । गाड़ियां समय पर रहीं और कोलकाता न रुकना हुआ तो सुबह ही हैदराबाद एक्सप्रेस मिलती थी,जिसे बाद में ईस्ट कोस्ट एक्सप्रेस कहा जाने लगा । हावडा से कटक रात भर की यात्रा के लिए बनारस से हावडा तार (टेलिग्राम )भेजा जाता था। तार भेजने की एक सन्दर्भ संख्या आपको दे दी जाती।उस संख्या को बता कर हावडा स्टेशन पर आगे के आरक्षण का पता करना होता ।

    एक बार बा और दादुल (मेरे नाना ) के साथ मैं हावडा होकर कटक जा रहा था । हावडा स्टेशन पर तार के अनुसार आरक्षण की बाबत कोई खबर नहीं मिली । हम कोलकाता शहर गये और शाम को गाड़ी पकड़ने लौटे। टीटी लोगों की खल-नियत से हमें दादुल के साथ दो बार पूरे प्लेटफॉर्म का चक्कर लगाना पड़ा था । मुझे याद नहीं कि आरक्षण मिला था अथवा नहीं लेकिन कटक स्टेशन पर उतरकर बा ने शिकायत पुस्तिका में विधिवत शिकायत की थी और उसकी एक नकल भी हासिल की थी । घर पहुंच कर एक रेल मन्त्री को भी एक शिकायती पत्र लिख दिया था। शायद गुलजारीलाल नन्दा रेल मन्त्री थे ।

  इस घटना को शायद मैं भूल जाता यदि कुछ महीने बाद रेल महकमे का एक खत बा को न मिला होता । पत्र में लिखा था , ’अनेक प्रया्सों के बावजूद हम आप लोगों की परेशानी के लिए जिम्मेदार कर्मचारी को चिह्नित नहीं कर सके हैं ।  हावडा स्टेशन पर किसके कारण आपको प्लैटफॉर्म के चक्कर लगाने पड़े यह जानने के लिए उस दिन ड्यूटी पर रहे समस्त टीटियों की परेड कराई जाएगी । आप से सविनय निवेदन है कि उनमें से दोषी व्यक्ति को पहचानने के लिए उपस्थित हों ।’ बहरहाल माताराम ने ऐसा न करने का निश्चय किया ।

    रेलवे में काफ़ी बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार होते हैं तथा बड़े बजट के कारण इस विभाग का मन्त्री बनने के लिए तगड़ी स्पर्धा होती है । रेलवे के बड़े ठेके हासिल करने के लिए कम्पनियां और माफिया प्रयत्नशील रहते हैं और वे ही ये ठेके पाते हैं । इसके बावजूद  यदि आपने शिकायत पुस्तिका हासिल कर ली, बाजाफ़्ता यात्री या संभावित यात्री होने के प्रमाण (टिकट संख्या )का उल्लेख कर दिया  तब अक्सर कार्रवाई होती है ।  हर २४ घण्टे में शिकायत एक एक प्रति विभागीय अधिकारी के पास चली जाती है । स्टेशन मास्टर शिकायत – पुस्तिका देने में अक्सर ना-नुकुर करते हैं लेकिन यह अंदाज लगने के बाद कि शिकायत पुस्तिका न देने की भी शिकायत हो सकती है , वे शिकायत पुस्तिका दे देते हैं । इन शिकायतों के बारे में की गई कार्रवाइयों की बाबत मेरा तजुर्बा सकारात्मक रहा है । दिक्कत यह है कि बहुत कम लोगों को शिकायत लखने की आदत है।शायद उन्हें कार्रवाई का भरोसा ही नहीं होता।

    टीटी परेड के इस प्रकरण का मुझ पर काफ़ी प्रभाव पड़ा था । रेल महकमे के दुराचार की शिकायतें दर्ज कराने में मुझे एक प्रकार की प्रोत्साहनकारी उर्जा मिली थी । यह उर्जा संकोचरोधी है ।

    मैंने खुद पहली शिकायत रेल आरक्षण के गैर-कम्प्यूटर युग में कराई थी । विभिन्न रेल-मार्गों के लिए अलग-अलग खिड़कियां हुआ करती थीं । एक बार मुझे एक ही खिड़की से दो आरक्षण करवाने थे । दोनों पूर्व दिशा के । भाभी की माएके(मुजफ़्फ़रपुर) के लिए उनका तथा ननिहाल (ओड़िशा)जाने के लिए मां के साथ अपना । मैंने जब एक टिकट कराने के बाद दूसरा फार्म दिया तो उस किरानी ने बहुत उर्रठई से कहा , ’क्या करते हो ? दलाल हो क्या ? ’ मैंने विश्वविद्यालय का परिचय पत्र खिडकी से घुसेड कर उसके मुँह पर दिखाया । फिर प्लेटफार्म पर जाकर लिखित शिकायत की। लौट कर आया। पुन: लाईन में लग कर दूसरा टिकट कराया । उस बाबू का नाम मुझे नहीं पता था इसलिए समय और खिड़की संख्या शिकायत में दर्ज करा दिया था ।

    कई महीने बाद एक बार मैंने जब आरक्षण फार्म खिड़की पर दिया तब उसे पढ़कर बुकिंग क्लर्क ने अत्यन्त विनम्र स्वर में पूछा ,’ क्या आप ही अफ़लातून हैं ? क्या आप राजघाट रहा करते थे ? आप तक पहुँचने के लिए मैंने वकार भाई को पकड़ा था । मु्झे आरोप-पत्र दिया गया था और दो-दो जांच समितियों का सामना करना पड़ा। ” मैंने भी कहा ,’ काशी विश्वविद्यालय के छात्र को दलाल समझेंगे तो इतना तो झेलना ही होगा ।” वकार भाई मेरे मोहल्ले के थे और वह भी बुकिंग क्लर्क थे।

  रेल आरक्षण के कम्प्यूटर युग में एक बार मुझे टेलिस्कोपिक एडवान्टेज नहीं मिला ।  मुझे बनारस से नागपुर जाना है । यदि मुझे दो टुकड़ों में – बनारस – इटारसी तथा इटारसी नागपुर का टिकट दिया जाएगा तो वह एक सीधे टिकट बनारस-नागपुर से काफ़ी मंहगा होगा(इसे अंग्रेजी में टेलिस्कोपिक एडवान्टेज कहते हैं)।  मुझे यह अन्दाज था कि मेरी मांग के अनुरूप कम्प्यूटर सीधा टिकट दे सकता है तथा यह लड़का कुछ टेढ़े कम्प्यूटर-निर्देशों को भूल गया है या देने से बच रहा है । मैंने इस असुविधा और नुकसान की शिकायत की । कुछ महीने बाद यह बुकिंग क्लर्क मेरे परिचितों के साथ माफ़ी मांगने घर पहुंच गये ।

तिरुअनंतपुरम – राजधानी एक्सप्रेस की खि्ड़कियों पर लगाये गये विज्ञापनों की बाबत मैंने गाड़ी में ही शिकायत की थी। इस पर अलग पोस्ट लिखी थी । इस पर भी कार्रवाई का पत्र आ गया है और कार्रवाई भी हुई है।

    मुझे मधु दण्दवते के जमाने में रेल महकमे द्वारा अपनाये गये गो नारों ने बहुत आकर्षित किया था – Delay breeds corruption तथा Be Indian ,Buy Indian . दूसरा वाला लगाने की हिम्मत तो अब किसी सरकार की न होगी। समय से आरक्षण न कराने (Delay)  के कारण जब भी बिना कन्फ़र्म टिकट के यात्रा की है तब-तन टीटियों को घूस न देने के संकल्प की रक्षा कर सका हूं । दरअसल इसमें मेरी बहादुरी नहीं रही । लोकनायक जयप्रकाश के समक्ष कसम खाई थी कि घूस नहीं देंगे-यह बता देने के बाद आज तक किसी ने अतिरिक्त पैसा नहीं लिया । फिर भी डिब्बे के अन्य यात्रियों से घूस लेना बन्द नहीं होता। आज भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में माहौल बना है और जागृति आई है तब घूस न देने का संकल्प भी लिया जाना चाहिए। यह संकल्प यदि नहीं जुड़ा तब इस जागृति की धार भोथरी हो जाएगी ।

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कोंकण-केरलम-आसमान / स्लाईड्स

‘ मातृभूमि ’ केरल का एक प्रमुख दैनिक है । केरल के नौ शहरों के अलावा यह मुम्बई , चेन्नै , बंगलूरू और दिल्ली से भी छपता है । ७५ वर्ष पूर्व महात्मा गांधी अपने केरल प्रवास के दौरान इस अखबार के दफ़्तर में आये थे । इस स्मृति को अखबार वर्ष पर्यन्त भिन्न भिन्न शहरों में मना रहा है । हर महीने की १३ तारीख को इसका आयोजन होता है । उस इलाके के स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान होता है और सभा होती है । १३ जनवरी ,२०१० इतिहासकार-लेखक श्री राजमोहन गांधी ने इस वर्ष पर्यन्त आयोजन का उद्घाटन किया ।
१३ फरवरी को कण्णूर में आयोजित जलसे में ’मातृभूमि’ ने मुझे बुलाया था । इस न्यौते को कबूलते हुए मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा था। कण्णूर के टाउन हॉल में १९२४ से अब तक की ’मातृभूमि’ की यात्रा की एक प्रदर्शनी आयोजित थी । यह प्रदर्शनी एक अखबार के सफ़र के साथ साथ राष्ट्रीय आन्दोलन का जीवन्त दस्तावेज बन गई है ।
मातृभूमि के वर्तमान प्रबन्ध निदेशक श्री एम.पी. वीरेन्द्रकुमार कोज़िकोड़ के पूर्व सांसद हैं और एक समाजवादी नेता हैं । प्लाचीमाड़ा में कोका – कोला विरोधी संघर्ष के दौरान मेरा उनसे सम्पर्क हुआ था ।
मातृभूमि के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के अलावा समाजवादी जनपरिषद की केरल इकाई के साथियों ने कण्णूर और कोझिकोड जिले में मेरे कई कार्यक्रम आयोजित किए ।
सभी कार्यक्रमों की बाबत अलग – अलग पोस्ट लिखूंगा । यह चित्र प्रदर्शनी ’शैशव’ के लिए विशेष । कोंकण और केरल का सौन्दर्य तथा हवाई जहाज से देश – दर्शन करते वक्त मुझे लगा कि भूगोल की स्कूली पढ़ाई के कितने तथ्य इन दृश्यों से सगुण रूप से जज़्ब होते हैं । मालाबार तट और कोंकण की खूबसूरती , केरल का सौन्दर्य और राजनैतिक जागरूकता , अरब सागर – नदियों-मेघ और अरावली पर्वतमाला से बना वृष्टि-छाया प्रदेश ।

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सफरनामा ३ : हैदराबाद – पुणे

हैदराबाद – पुणे रेल मार्ग पर यह मेरा पहला सफ़र था , इसलिए लाजमी तौर पर मन में थोड़ा उत्साह भी था | गाड़ी रात की थी इसलिए  सुबह सिर्फ शोलापुर से पुणे का रेल मार्ग देख पाया | हैंडलूम की विशिष्ट बुनाई वाली खेसनुमा चादरों के लिए मशहूर – शोलापुर | महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे साहब का चुनाव क्षेत्र | पटरी के पास लिखे नारों में शिंदे साहब के कारण क्षेत्र के गौरव और महत्त्व को ही उभारा गया था| सुबह टहलने के समय पर ही गाड़ी में भी नींद खुल गयी थी | प्लैटफोर्म साफ़ – सुथरे थे |
संगमनेर पुणे और नासिक रोड के बीच सड़क मार्ग पर स्थित एक छोटा क़स्बा है |संगमनेर अहमदनगर जिले में शिवाजी के जन्मस्थान और साईं बाबा वाली शिरडी के करीब है|  हमें भी पुणे से ही बस पकड़नी थी | यहीं हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय समिति की तीन दिवसीय बैठक थी| चुनाव के बाद होने वाली पहली बैठक थी इसलिए चुनाव समीक्षा और राजनीतिक प्रस्ताव पर महत्वपूर्ण चर्चा होनी थी | बस पकड़ने के पहले हमें महाराष्ट्र के वरिष्ट समाजवादी भाई वैद्य से मिलना था| भाई हमारे दल के संस्थापक महासचिव थे | उत्साह भर देने वाले संगठनकर्ता – अस्सी वर्ष की अवस्था में भी अथक सक्रिय | पुणे के नगर प्रमुख और महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री रह चुके भाई गोआ – मुक्ति सत्याग्रह के सैनिक थे | मुख्यधारा की राजनीति के किसी भी दल में उन्हें योग्य स्थान मिल सकता था लेकिन उन्होंने देश भर में सक्रिय कई संगठनों के युवाओं और किशन पटनायक जैसे समतावादी चिन्तक के साथ नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इस नए दल को तरजीह देना उचित समझा | हम चार मेहमानों को अपने कांपते हाथों से परोस कर खिलाने का उनका प्रेमपूर्ण आग्रह था,जो पूरा किया गया | अपनी पुत्र – वधु के लिए वे ‘बहु -बेटी ‘ कह रहे थे – प्रेम से पगा संबोधन | वे हमारे लिए खाना बनवा कर इंजीनियरिन्ग महाविद्यालय में पढाने गयी हुई थीं | घुटने में तकलीफ के बावजूद भाई हमारे १७ साल पुराने दल के सबसे सक्रीय महामंत्री थे , फिर साने गुरूजी द्वारा स्थापित राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे | आज कल देश भर में ‘समाजवादी शिक्षक सभा’ के माध्यम से स्कूल स्तर तक समान और नि:शुल्क तालीम के लिए अभियान की रहनुमाई कर रहे हैं | माँ – बाप की पीढी के राजनैतिक कर्मियों से भी कितनी प्रेरणा मिलती है |

स्वाति भाई वैद्य के साथ दल के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम में थी इसलिए पुणे में भाई से मिले बगैर जाने का प्रश्न ही नहीं था | मुझे पुणे में आगा खान महल स्थित स्मारक जाने का मन होगा यह जानते हुए स्वाति ने मुझसे वहां जाने के बारे में पूछा | ‘अंग्रेजों भारत छोडो – करो या मरो ‘ के अगस्त क्रान्ति के आवाहन के बाद गांधीजी मुंबई से गिरफ्तार कर पुणे के आगा खान महल में नजरबंद रखे गए थे |उनके सचिव महादेव देसाई भी उनके साथ गिरफ्तार किए गए थे | गिरफ्तारी के ६ दिन बाद गांधीजी द्वारा अनशन की संभावना के तनाव में हृदयाघात से १५ अगस्त १९४२ को महादेव देसाई की एक कैदी के रूप में मौत हुई थी | गांधीजी ने उनकी अंतिम क्रिया की थी | करीब साल भर बाद कस्तूरबा की भी वहीं मृत्यु हुई | इन दोनों लोगों की समाधियों के अलावा अब उस ‘महल’ को राष्ट्रीय स्मारक का रूप दिया गया है | महादेव देसाई मेरे दादा भी थे | भाई वैद्य से बरसों बाद मिलकर मुझे कम संतुष्टि नहीं मिली | स्कूल पूरा करने के बाद एक बार मैं दादाजी की समाधि देखने गया था |

सफरनामा : एक , दो

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सफ़रनामा (२) : सागर नाहर

मैंने जब हिन्दी में ब्लॉगिंग शुरु की उस समय से इस समय की कुछ दशा ही और है ! वैचारिक मतभेद तब भी थे लेकिन गोलबन्दियों के खाँचे खिड़कियों की गुंजाईश लिए हुए थे । एक बार सागर नाहर ने चिट्ठेकारी बन्द करने की घोषणा की लेकिन अनूप शुकुल के समझाने पर मान भी गए थे।

सिकन्दराबाद में अपने बूते एक नया व्यवसाय शुरु करने और उसे अच्छी तरह जमाने में सागर ने जो काबीलियत लगायी वह काबिले तारीफ़ है । यानि राजस्थान और गुजरात में गुजारे बचपन और किशोरावस्था से अलग एक परिवेश में एक नई तकनीक से जुड़ा व्यवसाय चुनने का जोख़िम उठाया – अपना साइबर कैफ़े खोलकर । तरुणाई का एक अहम लक्षण जोख़िम उठाने का साहस भी तो है !

नौजवानी का एक अन्य लक्षण अपने से पहले वाली पीढ़ी के जीवन मूल्यों को आँखें मूँद कर स्वीकार न करने में भी प्रकट होता है । सन्त विनोबा , लोकनायक जयप्रकाश नारायण , गोकुलभाई भट्ट और सिद्धराजजी जैसे दिग्गज गाँधीजनों का सानिध्य पाए सागर नाहर के पिता आदरणीय श्री शांतिचन्द्रजी नाहर राजस्थान के राजसमद क्षेत्र के प्रमुख खादी कार्यकर्ता रहे हैं । सागर ने अपने कैफ़े से मेरी उनसे फोन पर बात करवाई । श्री शांतिचन्द्रजी ने बताया कि राजस्थान के दौरे पर एक बार जब जेपी आए हुए थे तब वे किसी शॉर्ट हैन्ड जानने वाले को खोज रहे थे । श्री शांतिचन्द्रजी ने कहा कि मैं शॉर्ट हैन्ड नहीं जानता लेकिन प्रयास करूंगा । सामग्री जब जेपी के समक्ष प्रस्तुत की गयी तब उन्होंने पीठ थपथपाई । सागर की लिखावट भी इतनी सुन्दर है कि टाइप किए हुए से सुन्दर लगती है । उसकी लिखावट देखकर स्कूल में अच्छी लिखावट के लिए पुरस्कार देने की शुरुआत की गई । पीढ़ियों के बीच जीवन मूल्यों के फरक का उल्लेख कर दूँ। पिछले साल श्री सुरेश चिपलूणकर जब हैदराबाद पधारे थे तब उभयजनों की रुचि-अनुरूप नाथूराम गोड़से के भाई गोपाल गोड़से की लिखी किताब ’गाँधी – वध क्यों ?’ सागर को भेंट कर गये थे ।

सागर को हिन्दी फिल्म संगीत सुनने और संग्रह करने में गहरी रुचि है । जब भी  हजारों गीतों का कोई संग्रह उनके हाथ लगता है तो सागर उसे ’खजाने’ की संज्ञा देते हैं । ऐसे कई खजानों के साथ सागर गीतों का सागर जुटा चुके हैं । फिर ऐसे खजाने और सागर जुटाने वाले कई लोगों से सागर की मैत्री भी गहरी है ।

सागर नाहर

सागर नाहर

सागर के खजाने में सिर्फ़ गीत नहीं हैं । गाँधी द्वारा दक्षिण भारत में राष्ट्रभाषा के प्रचार के उद्देश्य से बनाई समिति की हैदराबाद इकाई द्वारा किसी स्पर्धा में पारितोषिक के रूप में किसी महिला को तीसरे या चौथे दशक में कभी दी गयी मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों के संग्रह की एक जर्जर प्रति ! सागर ने एक रद्दी-पस्ती खरीदने वाली दुकान से उसे हासिल किया है । सागर मुझसे अच्छी गुजराती जानते हैं । ’बाराहा” अपने कम्प्यूटर पर चढ़ाने के बाद मैं कभी कभी सागर से गुजराती में चैटिया कर उससे गुजराती जानने की हूं-कारी भरवाता रहा हूँ । सागर का गुजराती-प्रेम भी गजब है । गुजरात से आये ’केसर आम’ यदि गुज्जू – अखबार में पैक हों तो उस पृष्ट को भी सागर संभाल कर रख लेते हैं पढ़ने के लिए ।

हैदराबाद से छपने वाले हिन्दी अखबार(शायद ’मिलाप”) में सागर लिखते रहते हैं । मैंने उन्हें बताया कि लोहिया के भाषण और किताबें भी यहीं छपती थी । स्व. बद्रीविशाल पित्ती द्वारा। हैदराबाद के हिन्दी अखबार में सागर ने पित्तीजी के बारे में पढ़ रखा था । उत्तराखण्ड की किसी वादी में लोहिया ने जब हुसैन को लैण्डस्केप बनाते देखा था तब उनसे कहा था कि इस मुल्क के मानस में राम-कृष्ण-शिव की कहानियाँ अंकित हैं , उन्हें अपना विषय बनाओ । हुसैन की महाभारत और रामायण की श्रृंखला की नुमाईश पहले पहल हैदराबाद की सड़कों और गलियों में साइकिल रिक्शों पर सजा कर दिखाई गयी थी ।

लोहिया की साँस्कृतिक और सियासी चेतना से लैस साहित्यिक पत्रिका ’कल्पना’ , दल के मुखपत्र जन और मैनकाईण्ड भी हैदराबाद से छपते थे तब सच्चिदानन्द सिन्हा ,किशन पटनायक,ओमप्रकाश दीपक,अशोक सेक्सरिया जैसे उनके साथी भी इसी शहर में रहते ।

हैदराबाद में मेरे परस्पर विलोमी विचार वाले दो मित्र – लाल्टू और सागर दोनों पिछले दिनों हुए चुनावों में आन्ध्र प्रदेश के एक नये दल से प्रभावित हुए थे । यह दल है नई राजनैतिक संस्कृति स्थापित करने के प्रमुख घोषित मकसद से बनी लोक सत्ता पार्टी । संस्थापक हैं पूर्व नौकरशाह जयप्रकाश नारायण । आन्ध्र विधान सभा की एक सीट यह दल जीता है । इस सीट पर  स्वयं जयप्रकाश नारायण जीते हैं । उनके कार्यकर्ता तेलुगु और अंग्रेजी में परचे ले कर जब सागर नाहर के कैफ़े में चुनाव के दरमियान आये थे तब उनसे हिन्दी में भी परचे छापने की माँग सागर ने की थी ।

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आरक्षित सफ़र और असुरक्षित संस्थान

दक्षिण में दोनों प्रकार के आरक्षण के प्रति चेतना अधिक है । नौकरियों में अधिक पहले से आरक्षण होने के कारण दोनों प्रकारों के आरक्षण के प्रति परिपक्वता भी लाजमी तौर पर वहाँ अधिक है । आरक्षण के दो प्रकारों से मेरा आशय नौकरियों तथा रेल के आरक्षण से है । उत्तर में आम तौर पर रेल के आरक्षण के पक्षधरों के गले नौकरियों में आरक्षण नहीं उतरता था । बनारस – पटना से चेन्नै – बंगलुरु – हैदराबाद जाने वाली गाड़ियों में  दो महीने पहले कराये गये आरक्षण में आप प्रतिक्षा सूची में पहले – दूसरे नम्बर पर ही क्यों न रहे हों , गाड़ी छूटने के वक्त तक यथास्थिति के बरकरार रहने की संभावना ही ज्यादा रहती है । इस परिस्थितिवश हैदराबाद से शुरु होने वाली यात्रा को दो दिन टालना पड़ा तथा भारतीय अभियांत्रिकी सेवा में फँसे एक प्रिय मित्र की मदद लेनी पड़ी ।

हैदराबाद स्थित इन्टर्नैशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ इनफ़ॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी में बायो इन्फ़ॉर्मैटिक्स में शोध के लिए मेरी पत्नी डॉ . स्वाति को पाँच महीने रहना है । कभी जिला मुख्यालय बनाने के लिए चुनी गयी इस जगह पर कुछ सरकारी भवन बन भी चुके थे परन्तु खुद को सूबे का मख्य मन्त्री के बजाए सूबे का सी.ई.ओ. कहलाना पसंद करने वाले चन्द्राबाबू नायड़ू ने इसे निजी क्षेत्र के इस उच्च शिक्षण शोध संस्थान को बनाने के लिए सौंप दिया था । इस संस्थान के परिसर के एक बड़े हिस्से में एक डीनॉसॉर-सी लम्बी – चौड़ी इमारत का कंकाल खड़ा था । सत्यम इन्फ़ो के मालिकान जब से जेल प्रवास में हैं तब से निर्माण कार्य बन्द है ! उनके चन्दे से इसे बनना था ।

बहरहाल , कानपुर आई.आई.टी. के ’मजदूर-किसान-नीति” से जुड़े जो युवा बाद में ’पीपल्स पैट्रियॉटिक साइंस  एण्ड टेक्नॉलॉजी’ तथा ’लोक-विद्या” से जुड़े , उनमें से एक प्रमुख वैज्ञानिक – प्रोफ़ेसर अभिजीत मित्रा और कवि-चिट्ठेकार प्रोफ़ेसर हरजिन्दर सिंह उर्फ़ लाल्टू इसी संस्थान में सेवारत-शोधरत हैं। विदेशों से पीएच.डी के बाद भारत लौटने की इच्छा रखने वाले कई युवा इस संस्थान में बतौर शिक्षक जुड़े हैं – संस्थान की यह एक सकारात्मक उपलब्धि है ।

हैदराबाद के संगीत प्रेमी चिट्ठेकार सागर नाहर से मुझे मिलना था । उस बाबत अपने गीतों वाले चिट्ठे ’आगाज़’ पर लिखना उचित रहेगा ।

चलते वक्त लाल्टू की कहानियों का संग्रह ’घुघनी’ और उनकी सुन्दर लिखावट में १४ कवितायें पाईं ।

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