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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (४) : एक पहाड़ और गिलहरी

[ राल्फ वाल्डो एमर्सन ( १८०३ – १८८२ ) द्वारा अंग्रेजीमें लिखी एक प्रसिद्ध कविता ( फ़ेबल ) का अल्लामा इक़बाल द्वारा किया गया यह तर्जुमा है । मुझे उम्मीद है कि हिन्दी जानने वाले बच्चे इसे सीखेंगे और याद कर लेंगे । ]

कोई पहाड़ यह कहता था एक गिलहरी से

तुझे हो शर्म तो पानी में जाके डूब मरे


ज़रा-सी चीज़ है , इसपर गुरूर* , क्या कहना

यह अक़्ल और यह समझ , यह शुऊर* , क्या कहना


ख़ुदा की शान है नाचीज़ चीज़ बन बैठी

जा बेशऊर हों , यूँ बातमीज़ बन बैठी


तेरी बिसात* है या मेरी शान के आगे

ज़मीं है पस्त मेरी आन-बान के आगे


जो बात मुझमें है , तुझको वह है नसीब कहाँ

भला पहाड़ कहाँ , जानवर ग़रीब कहाँ


कहा यह सुनके गिलहरी ने , मुँह सँभाल ज़रा

यह कच्ची बातें हैं , दिल से इन्हें निकाल ज़रा


जो मैं बड़ी नहीं तेरी तरह तो क्या परवाह

नहीं है तू भी तो आख़िर मेरी तरह छोटा


हर एक चीज़ से पैदा ख़ुदा की कुदरत है

कोई बड़ा , कोई छोटा यह उसकी हिकमत* है


बड़ा जहान में तुझको बना दिया उसने

मुझे दरख़्त पे चढ़ना सिखा दिया उसने


क़दम उठाने की ताकत नहीं ज़रा तुझमें

निरी बड़ाई है , ख़ूबी है और क्या तुझमें


जो तू बड़ा है तो मुझ-सा हुनर दिखा मुझको

यह छालिया ही ज़रा तोड़कर दिखा मुझको


नहीं है चीज़ निकम्मी कोई ज़माने में

कोई बुरा नहीं कुदरत के कारख़ाने में


– अल्लामा इक़बाल

[ गुरूर = घमंड , शुऊर = समझ – बूझ ( तमीज़ ) , बिसात = हैसियत , हिकमत = तत्वदर्शिता , मसलिहत ]

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रेलगाड़ी रेलगाड़ी ,छुक छुक छुक छुक

आओ बच्चों खेल दिखायें
छुक-छुक करती रेल चलायें
सीटी दे कर सीट पे बैठो
एक-दूजे की पीठ पे बैठो

आगे-पीछे पीछे-आगे
लाइन से लेकिन कोई न भागे
सारी सीधी लाइन में चलना
आँखें दोनों मीचे रखना

बन्द आँखों से देखा जाये
आँख खुले तो कुछ ना पाये
आओ बच्चों रेल चलायें

सुनो रे बच्चों टिकट कटाओ
तुम लोग नहीं आओगे
तो रेलगाड़ी छूट जायेगी

यक ठणणणणण
यक ठणणणणण
भप भप भप भप
भप भप भप भप
भप भप भप भप
भप भप भप भप
भप भप भप भप

आओ सब लाइन में खड़े हो जाओ
मुन्नी तुम हो  इंजन
डब्बू तुम हो कोयले का डब्बा
चुन्नू मुन्नू लीला शीला
सोहन मोहन जादो माधो
सब पैसेंजर

सब पैसेंजर

यक ठणणणणण
यक ठणणणणण

रेडी
एक दो

(भाँप की आवाज)

रेल गाड़ी रेल गाड़ी
(सीटी की आवाज)

रेल गाड़ी रेल गाड़ी
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
बीच वाले स्टेशन बोलें
रुक-रुक रुक-रुक रुक-रुक रुक-रुक
धड़क-भड़क लोहे की सड़क
धड़क-भड़क लोहे की सड़क
यहाँ से वहाँ वहाँ से यहाँ

यहाँ से वहाँ वहाँ से वहाँ
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक

फुलाये छाती पार कर जाती
बालू रेत आलू के खेत
बाजरा धान बुड्ढा किसान
हरा मैदाम मन्दिर मकान
चाय की दुकान

पुल पों (?) की डण्डी टीले पे झण्डी
पानी के कुण्ड पंछी  के झुण्ड
झोपड़ी झाड़ी खेती बाड़ी
बादल धुआँ मोठ कुँवाँ
कुँवें के पीछे बाग़ बगीचे
धोबी का घाट मंगल की हाट
गाँव में मेला भीड़ झमेला
टूटी दिवार टट्टू सवार

रेल गाड़ी रेल गाड़ी
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
बीच वाले स्टेशन

बोलें
रुक-रुक रुक-रुक रुक-रुक

के झुण्ड
झोपड़ी झाड़ी खेती बाड़ी
बादल धुआँ मोठ कुँवाँ
कुँवें के पीछे बाग़ बगीचे
धोबी का घाट मंगल की हाट
गाँव में मेला भीड़ झमेला
टूटी दिवार टट्टू सवार

रेल गाड़ी रेल गाड़ी
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
बीच वाले स्टेशन बोलें
रुक-रुक रुक-रुक रुक-रुक
रुक-रुक

(सीटी की आवाज)

धरमपुर भरमपुर भरमपुर धरमपुर
मैंगलोर बैंगलोर बैंगलोर मैंगलोर
माण्डवा खाण्डवा खाण्डवा माण्डवा
रायपुर जयपुर जयपुर रायपुर
तालेगाँव मालेगाँव मालेगाँव तालेगाँव
बेल्लुर वेल्लुर वेल्लुर बेल्लुर
शोलापुर कोल्हापुर कोल्हापुर शोलापुर
हुक्कल डिण्डीगल डिण्डीगल हुक्कल
अमर्‍^त (?)
ऊंगोल निथिगोल निथिगोल ऊंगोल
कोरेगाँव गोरेगाँव गोरेगाँव कोरेगाँव
ममदाबाद अमदाबाद अमदाबाद ममदाबाद
शोल्लुर कोन्नुर शोल्लुर कोन्नुर

छुक-छुक छुक
छुक-छुक छुक
बीच वाले स्टेशन बोलें
रुक-रुक रुक-रुक रुक-रुक रुक-रुक

हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का एक गैर फिल्मी गीत मैंने उनकी चर्चा के साथ पहले प्रकाशित किया था । आज जो गीत/रचना यहाँ पेश है वह अशोक कुमार की आवाज में है । मेरी उम्र नौ बरस की थी जब यह फिल्म – आशीर्वाद बनी थी और उसी समय इसे देखा था। उसकी छाप धुँधली नहीं हुई । ‘शैशव’ द्वारा बच्चों के लिए पेश है । इसी फिल्म में ‘नानी की नाँव चली’ नामक रचना भी है । इन दोनों रचनाओं के बारे में विद्वत्जन कहते हैं कि यह समय के पहले रचे गए ‘रैप’ हैं । दूसरी रचना का नेट पर अता-पता कोई बता देता !

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नल की हड़ताल

आज सुबह से नल था मौन ,
पता नहीं कारण था कौन ?
मैंने पूछा तनिक पास से ,
भैय्या दिखते क्यों उदास से ?
बोला , ‘क्या बतलाऊं यार ,
रोज सहन करता हूं मार .
कान ऐंठता जो भी आता ,
टांग बाल्टी मुझे सताता .
लड़ते मेरे पास खड़े हो ,
बच्चे हों या मर्द बड़े हों .
नहीं किसी को दूंगा पानी !
इसीलिए हडताल मनानी !

पास रखी तब बोली गागर ,
‘ हम हैं रीते,तुम हो सागर ,
जल्दी प्यास बुझाओ मेरी ,
सोच रहे, क्या ? कैसी देरी ?

नल को दया घडे पर आई,
पानी की झट धार बहाई ..
(कवि- अज्ञात,किसी को पता हो तो जरूर बताए )

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जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल –

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

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यह मुरझाया हुआ फूल है

यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत ।
स्वयं बिखरने वाली इसकी,
पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥
गुजरो अगर पास से इसके,
इसे चोट पहुँचाना मत ।
जीवन की अन्तिम घड़ियों में,
देखो,इसे रुलाना मत ॥
अगर हो सके तो,
दो ठंडी बूँदें टपका देना,प्यारे ।
जल न जाए संतप्त हृदय,
शीतलता ला देना प्यारे ॥
सुभद्रा कुमारी चौहान

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तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र

[ ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक ‘समकालीन सृजन’ , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता – ७००००७ से साभार ]

तार के खंभे

एक सीध में दूर-दूर तक गड़े हुए ये खंभे

किसी झाड़ से थोड़े नीचे , किसी झाड़ से लम्बे ।

कल ऐसे चुपचाप खड़े थे जैसे बोल न जानें

किन्तु सबेरे आज बताया मुझको मेरी माँ ने –

इन्हें बोलने की तमीज है , सो भी इतना ज्यादा

नहीं मानती इनकी बोली पास-दूर की बाधा !

अभी शाम को इन्हीं तार के खंभों ने बतलाया

कल मामीजी की गोदी में नन्हा मुन्ना आया ।

और रात को उठा , हुआ तब मुझको बड़ा अचंभा –

सिर्फ बोलता नहीं , गीत भी गाता है यह खंभा !

– भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९५९ ]

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‘चार कौए उर्फ़ चार हौए’ : [ चिट्ठालोक के बहाने ]

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[ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने आपात काल के खिलाफ़ कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प लिया था । प्रति दिन तीन कविताओं द्वारा तानाशाही का विरोध प्रकट करते थे । फिर यह पुस्तक के रूप में ‘त्रिकाल सन्ध्या’ नाम से छपी । आपात काल के दौरान सेन्सरशिप की अवहेलना करने वाली पत्रिका बुनियादी यकीन तथा भूमिपुत्र (गुजराती ) में यह कविताएँ छपा करती थीं, रणभेरी जैसी साइक्लोस्टाइल्ड भूमिगत बुलेटिनों के अलावा । पत्रिकाओं को  छापने वाले प्रेस को तालाबन्दी जैसी कार्रवाई झेलनी पड़ती थी । दोनों पत्रिकाएँ तब गुजरात से छपती थीं जहाँ स्व. बाबूभाई पटेल की गैर काँग्रेसी सरकार आपात काल के शुरुआती दिनों में रही ।

चिट्ठालोक के मौजूदा माहौल को देखते हुए मुझे त्रिकाल सन्ध्या से यह बाल-कविता देना उचित लगा । ]

चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं सिर्फ चार कौए थे काले ,

उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें , रुकें , खायें और गायें,

वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें

 

कभी – कभी जादू हो जाता है दुनिया में

दुनिया – भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में

ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए

इनके नौकर चील , गरुड़ और बाज हो गए

 

हंस , मोर , चातक , गौरैयें किस गिनती में

हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में

हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगाए

पिऊ – पिऊ को छोड़ें कौए – कौए गायें

 

बीस तरह की काम दे दिए गौरैयों को

खान – पीना मौज उड़ाना छुट भैयों को

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में

बड़े बड़े मनसूबे आए उनके जी में

उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले

उड़ने वाले सिर्फ रह गए बैठे ठाले

 

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है

यह दिन कवि का नहीं चार कौवों का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना

लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना

– भवानीप्रसाद मिश्र .

[ विद्याचरण शुक्ल , बन्सीलाल , सन्जय गाँधी तथा एक अन्य काँग्रेसी(कौन?कोई बताए) -‘चार कौए’ तथा ‘बीस तरह के काम’ से मतलब इन्दिरा गाँधी का बीस सूत्री कार्यक्रम । इसी बीस सूत्री कार्यक्रम का संघ के सरसंघचालक द्वारा समर्थन करने के बाद के बाद संघ के कार्यकर्ता छूटने लगे थे ।]

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