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चलो दिल्ली ! – श्यामनारायण पाण्डेय

आज नेताजी की जन्म तिथि है। उन्होंने रंगून से ‘चलो दिल्ली’ का जब आवाहन किया था तब श्यामनारायण पांडे ने कविता लिखी थी। अंग्रेजों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था। मैंने ’74 के आसपास याद की थी।एक लाइन भूला हूँ,किसी को याद हो तो बता दें,आभारी रहूँगा।
रगों में खूँ उबलता है,
हमारा जोश कहता है।
जिगर में आग उठती है,
हमारा रोष कहता है।
उधर कौमी तिरंगे को,
संभाले बोस कहता है।
बढ़ो तूफ़ान से वीरों,
चलो दिल्ली ! चलो दिल्ली!
अभी आगे पहाड़ों के,
यहीं बंगाल आता है,
हमारा नवगुरुद्वारा,
यही पंजाब आता है।
जलाया जा रहा काबा,
लगी है आग काशी में,
युगों से देखती रानी,
हमारी राह झांसी में।
जवानी का तकाजा है,
रवानी का तकाजा है,
तिरंगे के शहीदों की
कहानी का तकाजा है।
बुलाती है हमें गंगा,
बुलाती घाघरा हमको।
हमारे लाडलो आओ,
बुलाता आगरा हमको।
…… ने पुकारा है,
हमारे देश के लोहिया,
उषा, जय ने पुकारा है।
गुलामी की कड़ी तोड़ो,
तड़ातड़ हथकड़ी तोड़ो।
लगा कर होड़ आंधी से,
जमीं से आसमां जोड़ो।
शिवा की आन पर गरजो,
कुँवर बलिदान पर गरजो,
बढ़ो जय हिन्द नारे से,
कलेजा थरथरा दें हम।
किले पर तीन रंगों का,
फरहरा फरफरा दें हम।
– श्यामनारायण पांडे।

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वाह ! गिलहरी क्या कहने

वाह! गिलहरी क्या कहने

वाह ! गिलहरी क्या कहने

वाह ! गिलहरी क्या कहने !
धारीदार कोट पहने ।
पूंछ बड़ी-सी झबरैली,
काली – पीली – मटमैली ।
डाली – डाली फिरती है ,
नहीं फिसल कर गिरती है ॥

[ चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट की ‘नन्हे-मुन्नों के गीत’ से साभार ]

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दीवाली पर एक प्रार्थना : अल्लामा इक़बाल

लब[1] पे आती है दुआ[2] बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शम्मा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी

दूर दुनिया का मेरे दम से अँधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये

हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत[3]
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या-रब
इल्म[4] की शम्मा से हो मुझको मोहब्बत या-रब

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत[5] करना
दर्द-मंदों से ज़इफ़ों[6] से मोहब्बत करना

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको.
– अल्लामा इक़बाल

शब्दार्थ:

1. ↑ अधर
2. ↑ प्रार्थना
3. ↑ शोभा
4. ↑ विद्या
5. ↑ सहायता
6. ↑ बूढ़ों

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कविता / जंगल गाथा /

एक नन्हा मेमना

और उसकी माँ बकरी,

जा रहे थे जंगल में

……राह थी संकरी।

अचानक सामने से आ गया एक शेर,

लेकिन अब तो

हो चुकी थी बहुत देर।

भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,

बकरी और मेमने की हालत खस्ता।

उधर शेर के कदम धरती नापें,

इधर ये दोनों थर-थर कापें।

अब तो शेर आ गया एकदम सामने,

बकरी लगी जैसे-जैसे

बच्चे को थामने।

छिटककर बोला बकरी का बच्चा-

शेर अंकल!

क्या तुम हमें खा जाओगे

एकदम कच्चा?

शेर मुस्कुराया,

उसने अपना भारी पंजा

मेमने के सिर पर फिराया।

बोला-

हे बकरी – कुल गौरव,

आयुष्मान भव!

दीर्घायु भव!

चिरायु भव!

कर कलरव!

हो उत्सव!

साबुत रहें तेरे सब अवयव।

आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर,

कि अब नहीं होगा कोई अंधेरा

उछलो, कूदो, नाचो

और जियो हँसते-हँसते

अच्छा बकरी मैया नमस्ते!

इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,

बकरी हैरान-

बेटा ताज्जुब है,

भला ये शेर किसी पर

रहम खानेवाला है,

लगता है जंगल में

चुनाव आनेवाला है।

-अशोक चक्रधर

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मेरा नया बचपन /सुभद्रा कुमारी चौहान / बाल – कविता

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी भी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा ‘यह क्या लायी?’ बोल उठी वह ‘माँ, काओ’।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा – ‘तुम्हीं खाओ’॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

– सुभद्रा कुमारी चौहान

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कविता / इल्म बड़ी दौलत है / इब्ने इंशा

[ इब्ने इंशा पाकिस्तान में उर्दू के जाने-माने कवी व लेखक थे । इनका जन्म १५ जून १९२७ को पंजाब , पाकिस्तान में हुआ था और ११ जनवरी १९७८ को इनका देहांत हुआ । इब्ने इंशा की ख़ास पहचान इनकी लेखनी की तीक्ष्ण व्यंग्यात्मकता रही है चाहे वह कविता हो , कहानी हो या फिर यात्रा संस्मरण । स्रोत – ‘तालीम की लड़ाई ‘ (अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच का त्रैमासिक प्रकाशन ) ,संपर्क – talim.ki.ladai@gmail.com ]

इल्म बड़ी दौलत है ।

तू भी स्कूल खोल ।

इल्म पढ़ा ।

फीस लगा ।

दौलत कमा ।

फीस ही फीस ।

पढ़ाई के बीस ।

बस के तीस ।

यूनिफार्म के चालीस ।

खेलों के अलग ।

वेरायटी प्रोग्राम के अलग ।

पिकनिक के अलग ।

लोगों के चीखने पर न जा ।

दौलत कमा ।

उससे और स्कूल खोल ।

उनसे और दौलत कमा ।

कमाए जा, कमाए जा ।

अभी तो तू जवान है ।

यह सिलसिला जारी है ।

जब तक गंगा – जमना है ।

पढ़ाई बड़ी अच्छी है ।

पढ़ ।

बहीखाता पढ़ ।

टेलीफोन डाइरेक्टरी पढ़ ।

बैंक – असिसमेंट पढ़ ।

जरूरते-रिश्ता के इश्तेहार पढ़ ।

और कुछ मत पढ़ ।

मीर और ग़ालिब मत पढ़ ।

इकबाल और फैज़ मत पढ़ ।

इब्ने इंशा को भी मत पढ़ ।

वरना तेरा बड़ा पार न होगा ।

और हममें से कोई नताएज* का जिम्मेदार न होगा ।

– इब्ने इंशा      

(नतीजा का बहुवचन नताएज )

 

 

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कविता / चन्द्रकान्त देवताले / प्रेम पिता का दिखाइ नहीं देता.

तुम्हारी निश्चल आंखें

तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

ईथर की तरह होता है

जरूर दिखाई देती होंगी नसीहतें

नुकीले पत्थरों-सी

दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में

पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वां नम्बर है मेरा

पर बच्चों के फूलोंवाले बगीचे की दुनिया में

तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए

मुझे माफ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था

मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी

अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो

मैं खुश हूं सोचकर

कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई।

– चन्द्रकान्त देवताले.

पिता का प्यार

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मुनादी / धर्मवीर भारती

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का

हुकुम शहर कोतवाल का

हर खासो-आम को आगह किया जाता है

कि खबरदार रहें

और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से

कुंडी चढा़कर बन्द कर लें

गिरा लें खिड़कियों के परदे

और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें

क्योंकि

एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में

सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है

कि पच्चीस साल से मुजिर है यह

कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए

कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए

कि मार खाते भले आदमी को

और असमत लुटती औरत को

और भूख से पेट दबाये ढाँचे को

और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को

बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो

उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?

आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !

बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले

अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने

एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ

भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं

और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर

तुम पर छाँह किये रहते हैं

और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी

मोटर वालों की ओर लपकती हैं

कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;

तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर

भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से

जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप

बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए

रात-रात जागते हैं;

और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए

मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक

छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…

तोड़ दिये जाएँगे पैर

और फोड़ दी जाएँगी आँखें

अगर तुमने अपने पाँव चल कर

महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर

अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी

जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे

काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?

वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ

गहराइयों में गाड़ दी है

कि आने वाली नस्लें उसे देखें और

हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो

इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?

हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं

और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें

ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में

इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते

फेंक दी है खड़िया और स्लेट

इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह

फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं

और जिसका बच्चा परसों मारा गया

वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई

सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है

पर जहाँ हो वहीं रहो

यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि

तुम फासले तय करो और

मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे

नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी

बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी

ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा

सब अपनी-अपनी जगह ठप

क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है

और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है

वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो

तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है

बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से

तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए

बाश्शा के खास हुक्म से

उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा

दर्शन करो !

वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी

बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी

ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा

नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा

और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा

लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में

और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो

ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से

बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

— धर्मवीर भारती.

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देश की माटी ,देश का जल/रवीन्द्रनाथ ठाकुर/अनु. भवानीप्रसाद मिश्र

देश की माटी देश का जल

हवा देश की देश के फल

सरस बनें प्रभु सरस बने

देश के घर और देश के घाट

देश के वन और देश के बाट

सरल बनें प्रभु सरल प्रभु

देश के तन और देश के मन

देश के घर के भाई -बहन

विमल बनें प्रभु विमल बनें

– रवीन्द्रनाथ ठाकुर /अनुवाद- भवानीप्रसाद मिश्र

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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (६) : एक मकड़ा और मक्खी

इक दिन किसी मक्खी से यह कहने लगा मकड़ा

इस राह से होता है गुजर रोज तुम्हारा

लेकिन मेरी कुटिया की न जगी कभी किस्मत

भूले से कभी तुमने यहां पाँव न रखा

गैरों से न मिली तो कोई बात नहीं है

अपनों से मगर चाहिए यूं खिंच  के न रहना

आओ जो मेरे घर में , तो इज्जत है यह मेरी

वह सामने सीढ़ी है , जो मंजूर हो आना

मक्खी ने सुनी बात मकड़े की तो बोली

हज़रत किसी नादां को दीजिएगा ये धोखा

इस जाल में मक्खी कभी आने की नहीं है

जो आपकी सीढ़ी पे चढ़ा , फिर नहीं उतरा

मकड़े ने कहा वाह ! फ़रेबी मुझे समझे

तुम-सा कोई नादान ज़माने में न होगा

मंजूर तुम्हारी मुझे खातिर थी वगरना

कुछ फायदा अपना तो मेरा इसमें नहीं था

उड़ती हुई आई हो खुदा जाने कहाँ से

ठहरो जो मेरे घर में तो है इसमें बुरा क्या ?

इस घर में कई तुमको दिखाने की हैं चीजें,

बाहर से नजर आती है छोटी-सी यह कुटिया

लटके हुए दरवाजों पे बारीक हैं परदे

दीवारों को आईनों से है मैंने सजाया

मेहमानों के आराम को हाज़िर हैं बिछौने

हर शख़्स को सामाँ यह मयस्सर नहीं होता

मक्खी ने कहा , खैर यह सब ठीक है लेकिन

मैं आपके घर आऊँ , यह उम्मीद न रखना

इन नर्म बिछौनों से ख़ुदा मुझको बचाये

सो जाए कोई इनपे तो फिर उठ नहीं सकता

मकड़े ने कहा दिल में , सुनी बात जो उसकी

फाँसूँ इसे किस तरह , यह कमबख़्त है दाना

सौ काम खुशामद से निकलते हैं जहाँ में

देखो जिसे दुनिया में , खुशामद का है बन्दा

यह सोच के मक्खी से कहा उसने बड़ी बी !

अल्लाह ने बख़्शा है बड़ा आपको रुतबा

होती है उसे आपकी सूरत से मुहब्बत

हो जिसने कभी एक नज़र आपको देखा

आँखें हैं कि हीरे की चमकती हुई कनियाँ

सर आपका अल्लाह ने कलग़ी से सजाया

ये हुस्न,ये पोशाक,ये खूबी , ये सफ़ाई

फिर इस पे कयामत है यह उड़ते हुए गाना

अल्लामा इक़बालफिर इसपे क़यामत है यह उड़ते हुए गाना

मक्खी ने सुनी जब ये खुशामद , तो पसीजी

बोली कि नहीं आपसे मुझको कोई खटका

इनकार की आदत को समझती हूँ बुरा मैं

सच यह है कि दिल तोड़ना अच्छा नहीं होता

यह बात कही और उड़ी अपनी जगह से

पास आई तो मकड़े ने उछलकर उसे पकड़ा

भूका था कई रोज़ से , अब हाथ जो आई

आराम से घर बैठ के , मक्खी को उड़ाया

– अल्लामा इक़बाल

[ वगरना = नहीं तो , सामाँ = सामान ,  दाना = समझदार , कनियाँ = टुकड़े ]

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