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रेल महकमे की शिकायतें की हैं , आपने ?

तब बनारस से तटीय ओडिशा जाने के दो रास्ते थे । यह रेल आरक्षण के कम्प्यूटर युग से बहुत पहले की बात है । बनारस से पुरी के लिए एक डिब्बा आसानसोल तक जाता था । वहाँ से कट कर खडगपुर,फिर हावडा पुरी एक्सप्रेस में लग कर पुरी । इस डिब्बे में आप बनारस से सीधे कटक – पुरी का आरक्षण करा सकते थे। दूसरा रास्ता हावडा हो कर जाने का था ।आप दिन में कोलकाता के रिश्तेदारों से मिलकर शाम को पुरी की गाड़ी पकड़ सकते थे । गाड़ियां समय पर रहीं और कोलकाता न रुकना हुआ तो सुबह ही हैदराबाद एक्सप्रेस मिलती थी,जिसे बाद में ईस्ट कोस्ट एक्सप्रेस कहा जाने लगा । हावडा से कटक रात भर की यात्रा के लिए बनारस से हावडा तार (टेलिग्राम )भेजा जाता था। तार भेजने की एक सन्दर्भ संख्या आपको दे दी जाती।उस संख्या को बता कर हावडा स्टेशन पर आगे के आरक्षण का पता करना होता ।

    एक बार बा और दादुल (मेरे नाना ) के साथ मैं हावडा होकर कटक जा रहा था । हावडा स्टेशन पर तार के अनुसार आरक्षण की बाबत कोई खबर नहीं मिली । हम कोलकाता शहर गये और शाम को गाड़ी पकड़ने लौटे। टीटी लोगों की खल-नियत से हमें दादुल के साथ दो बार पूरे प्लेटफॉर्म का चक्कर लगाना पड़ा था । मुझे याद नहीं कि आरक्षण मिला था अथवा नहीं लेकिन कटक स्टेशन पर उतरकर बा ने शिकायत पुस्तिका में विधिवत शिकायत की थी और उसकी एक नकल भी हासिल की थी । घर पहुंच कर एक रेल मन्त्री को भी एक शिकायती पत्र लिख दिया था। शायद गुलजारीलाल नन्दा रेल मन्त्री थे ।

  इस घटना को शायद मैं भूल जाता यदि कुछ महीने बाद रेल महकमे का एक खत बा को न मिला होता । पत्र में लिखा था , ’अनेक प्रया्सों के बावजूद हम आप लोगों की परेशानी के लिए जिम्मेदार कर्मचारी को चिह्नित नहीं कर सके हैं ।  हावडा स्टेशन पर किसके कारण आपको प्लैटफॉर्म के चक्कर लगाने पड़े यह जानने के लिए उस दिन ड्यूटी पर रहे समस्त टीटियों की परेड कराई जाएगी । आप से सविनय निवेदन है कि उनमें से दोषी व्यक्ति को पहचानने के लिए उपस्थित हों ।’ बहरहाल माताराम ने ऐसा न करने का निश्चय किया ।

    रेलवे में काफ़ी बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार होते हैं तथा बड़े बजट के कारण इस विभाग का मन्त्री बनने के लिए तगड़ी स्पर्धा होती है । रेलवे के बड़े ठेके हासिल करने के लिए कम्पनियां और माफिया प्रयत्नशील रहते हैं और वे ही ये ठेके पाते हैं । इसके बावजूद  यदि आपने शिकायत पुस्तिका हासिल कर ली, बाजाफ़्ता यात्री या संभावित यात्री होने के प्रमाण (टिकट संख्या )का उल्लेख कर दिया  तब अक्सर कार्रवाई होती है ।  हर २४ घण्टे में शिकायत एक एक प्रति विभागीय अधिकारी के पास चली जाती है । स्टेशन मास्टर शिकायत – पुस्तिका देने में अक्सर ना-नुकुर करते हैं लेकिन यह अंदाज लगने के बाद कि शिकायत पुस्तिका न देने की भी शिकायत हो सकती है , वे शिकायत पुस्तिका दे देते हैं । इन शिकायतों के बारे में की गई कार्रवाइयों की बाबत मेरा तजुर्बा सकारात्मक रहा है । दिक्कत यह है कि बहुत कम लोगों को शिकायत लखने की आदत है।शायद उन्हें कार्रवाई का भरोसा ही नहीं होता।

    टीटी परेड के इस प्रकरण का मुझ पर काफ़ी प्रभाव पड़ा था । रेल महकमे के दुराचार की शिकायतें दर्ज कराने में मुझे एक प्रकार की प्रोत्साहनकारी उर्जा मिली थी । यह उर्जा संकोचरोधी है ।

    मैंने खुद पहली शिकायत रेल आरक्षण के गैर-कम्प्यूटर युग में कराई थी । विभिन्न रेल-मार्गों के लिए अलग-अलग खिड़कियां हुआ करती थीं । एक बार मुझे एक ही खिड़की से दो आरक्षण करवाने थे । दोनों पूर्व दिशा के । भाभी की माएके(मुजफ़्फ़रपुर) के लिए उनका तथा ननिहाल (ओड़िशा)जाने के लिए मां के साथ अपना । मैंने जब एक टिकट कराने के बाद दूसरा फार्म दिया तो उस किरानी ने बहुत उर्रठई से कहा , ’क्या करते हो ? दलाल हो क्या ? ’ मैंने विश्वविद्यालय का परिचय पत्र खिडकी से घुसेड कर उसके मुँह पर दिखाया । फिर प्लेटफार्म पर जाकर लिखित शिकायत की। लौट कर आया। पुन: लाईन में लग कर दूसरा टिकट कराया । उस बाबू का नाम मुझे नहीं पता था इसलिए समय और खिड़की संख्या शिकायत में दर्ज करा दिया था ।

    कई महीने बाद एक बार मैंने जब आरक्षण फार्म खिड़की पर दिया तब उसे पढ़कर बुकिंग क्लर्क ने अत्यन्त विनम्र स्वर में पूछा ,’ क्या आप ही अफ़लातून हैं ? क्या आप राजघाट रहा करते थे ? आप तक पहुँचने के लिए मैंने वकार भाई को पकड़ा था । मु्झे आरोप-पत्र दिया गया था और दो-दो जांच समितियों का सामना करना पड़ा। ” मैंने भी कहा ,’ काशी विश्वविद्यालय के छात्र को दलाल समझेंगे तो इतना तो झेलना ही होगा ।” वकार भाई मेरे मोहल्ले के थे और वह भी बुकिंग क्लर्क थे।

  रेल आरक्षण के कम्प्यूटर युग में एक बार मुझे टेलिस्कोपिक एडवान्टेज नहीं मिला ।  मुझे बनारस से नागपुर जाना है । यदि मुझे दो टुकड़ों में – बनारस – इटारसी तथा इटारसी नागपुर का टिकट दिया जाएगा तो वह एक सीधे टिकट बनारस-नागपुर से काफ़ी मंहगा होगा(इसे अंग्रेजी में टेलिस्कोपिक एडवान्टेज कहते हैं)।  मुझे यह अन्दाज था कि मेरी मांग के अनुरूप कम्प्यूटर सीधा टिकट दे सकता है तथा यह लड़का कुछ टेढ़े कम्प्यूटर-निर्देशों को भूल गया है या देने से बच रहा है । मैंने इस असुविधा और नुकसान की शिकायत की । कुछ महीने बाद यह बुकिंग क्लर्क मेरे परिचितों के साथ माफ़ी मांगने घर पहुंच गये ।

तिरुअनंतपुरम – राजधानी एक्सप्रेस की खि्ड़कियों पर लगाये गये विज्ञापनों की बाबत मैंने गाड़ी में ही शिकायत की थी। इस पर अलग पोस्ट लिखी थी । इस पर भी कार्रवाई का पत्र आ गया है और कार्रवाई भी हुई है।

    मुझे मधु दण्दवते के जमाने में रेल महकमे द्वारा अपनाये गये गो नारों ने बहुत आकर्षित किया था – Delay breeds corruption तथा Be Indian ,Buy Indian . दूसरा वाला लगाने की हिम्मत तो अब किसी सरकार की न होगी। समय से आरक्षण न कराने (Delay)  के कारण जब भी बिना कन्फ़र्म टिकट के यात्रा की है तब-तन टीटियों को घूस न देने के संकल्प की रक्षा कर सका हूं । दरअसल इसमें मेरी बहादुरी नहीं रही । लोकनायक जयप्रकाश के समक्ष कसम खाई थी कि घूस नहीं देंगे-यह बता देने के बाद आज तक किसी ने अतिरिक्त पैसा नहीं लिया । फिर भी डिब्बे के अन्य यात्रियों से घूस लेना बन्द नहीं होता। आज भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में माहौल बना है और जागृति आई है तब घूस न देने का संकल्प भी लिया जाना चाहिए। यह संकल्प यदि नहीं जुड़ा तब इस जागृति की धार भोथरी हो जाएगी ।

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दो बैण्ड का ट्रांजिस्टर और दो पहिए की साइकिल

उत्तर प्रदेश में नगर पालिकाओं द्वारा साइकिल के प्रयोग पर कर लिया जाता था । वाराणसी नगर पालिका से – साईकिल – वर्ष – और लाईसेन्स संख्या वाली लोहे की पतली चादर से कटा टोकन हर साल लेना पड़ता था । हर साल टोकन का रंग बदल जाता था । मसलन यदि पिछले साल हरा था, तो इस साल नीला , अगले साल सलेटी – ताकि आसानी से पहचाना जा सके कि इस साल का टैक्स दिया है अथवा नहीं ।

बहन ने हाई स्कूल पास किया तब उसे एक साईकिल मिली थी – रोवर । बहन पढ़ने चली गई बनारस के बाहर – पहले अनुगुल (ओड़िशा ) फिर कोलकाता के सियालदाह स्थित नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज में । कोलकाता गई तब साईकिल बनारस रह गई । जैसा कि आम तौर पर होता है (जिनके पास छोटी साईकिल नहीं होती  ) वे पहले ’कैची ’ चलाना सीखते हैं । कैंची के बाद सीट पर चढ़ना बहन ने सिखाया था। सिर्फ नाटा होने के कारण ही कैंची चलानी पड़ती है । एक  हाथ हैन्डिल पर , दूसरे कांख के नीचे सीट । सीट पर चलाना कैंची से आसान होता है ।

मैंने शहर में साईकिल चलाना शुरु किया तब की बात है । लाइसेन्स वालों ने पकड़ा और डेढ़ रुपया लेकर कच्ची रसीद थमा दी । शहर में जितनी जगह लाइसेंस देखा जाता था सब जगह यह कच्ची रसीद मान्य थी । बा ने कच्ची रसीद देख कर कहा ,’रियायत नहीं दी है , रिश्वत ली है । चोरों का गिरोह है।’ अब मामला पैसे वापस लेने अथवा उचित शुल्क देकर टोकन हासिल करने का था । बा ने सलाह दी कि सम्पादक के नाम पत्र लिखो । ’जनवार्ता’ को पत्र लिखा । सम्पादक श्यामाप्रसाद ’प्रदीप’ से मिलकर पत्र दिया । वे जेपी आन्दोलन में सक्रिय हुए थे,आपातकाल पर्यन्त जेल रहे तथा जनता पार्टी की सरकार में विधान परिषद में भेजे गये । उन्होंने मेरे पत्र के साथ खुद का लिखा नोट भी छापा । पहली बार छपास सुख मिला । कई बरसों बाद राम इकबाल बरसी ने हमारे एक शिबिर में कहा ,’अखबार में छपने की लालसा लेकर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं कर सकते”। लोहिया रामइकबालजी को पीरो का गांधी कहते थे। इमरजंसी में महेन्द्र दूबे के गांव से गिरफ़्तारी हुई तब नीतीश भी थे। दरोगा जीप नहीं लाया था तो उसकी पीठ पर सवार हो गये थे।एक बार गांव के भूखे लोगों को लेकर थाने गये और थानाध्यक्ष से बोले,’जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है,इनकी जान बचाओ’।

खैर, उस बार जनवार्ता दफ़्तर में मेरे साथ मेरे इतिहास के शिक्षक ओमप्रकाश नारायण गये थे। पहली बार क्लास में आए तब परिचय दिया था,’मैं ओमप्डकाश,बिहाड़ के साडंग जिले का हूं,जहां के बाबू डाजेन्दड प्डसाद थे’।उनके उच्चारण पर भले ही तब खीसें निपोरी हों लेकिन जब उन्होंने एक परीक्षा में प्रश्न दिया,’राजा राममोहन राय से राममनोहर लोहिया तक के दस समाज सुधारकों के नाम लिखो’ तब आनन्द आ गया था। सवाल के काव्यात्मक गठन मात्र से नहीं । स्कूली पढ़ाई में लोहिया का जिक्र करने वाले शिक्षक को पाकर हम खुद को भाग्यवान समझते थे। स्कूल की मास्टरी छोड़कर ओमप्रकाशजी बिहार की प्रशासनिक सेवा में चले गये ।

अखबार में पत्र छपने के बाद कच्ची रसीद लौटा कर,शेष दो रुपये पचास पैसे दिए-टोकन और पक्की रसीद हासिल की। शहर में कच्ची रसीद की प्रथा कुछ समय रुक गई थी। कई वर्षों बाद हमारे युवा संगठन ने एक प्रस्ताव पारित किया -’यदि केन्द्र सरकार ने दो बैण्ड के ट्रांजिस्टर पर लाइसेन्स शुल्क लेना बन्द कर दिया है तो  दो चक्के की साइकिल पर शुल्क लेना राज्य सरकार बन्द करे। ” सूबे की सरकार ने साइकिल पर कर लेना उसी बजट से बन्द किया ।

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एक लघु कहानी / अफ़लातून

हालात ने उसे पेशेवर भिखारी बना दिया होगा । उमर करीब पाँच- छ: साल। पेशे को अपनाने में दु:ख या संकोच होने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी उसकी कच्ची उमर ने । माँगने के कष्ट की शायद कल्पना ही न रही हो उसे और माँग कर न पाना भी उसके लिए उतना ही सामान्य था जितना माँग कर पाना ।
उस दिन सरदारजी की जलेबी की दुकान के करीब वह पहुँचा । सरदारजी पुण्य पाने की प्रेरणा से किसी माँगने वाले को अक्सर खाली नहीं जाने देते थे । उसे कपड़े न पहनने का कष्ट नहीं था परन्तु खुद के नंगे होने का आभास अवश्य ही था क्योंकि उसकी खड़ी झण्डी ग्राहकों की मुसकान का कारण बनी हुई थी । ’सिर्फ़ आकार के कारण ही आ-कार हटा कर ’झण्डी’ कहा जा रहा है । वरना पुरुष दर्प तो हमेशा एक साम्राज्यवादी तेवर के साथ सोचता है , ’ विजयी विश्व तिरंगा प्यारा , झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ ! बहरहाल , सरदारजी ने गल्ले से सिक्का निकाला। उनकी नजर उठी परन्तु लड़के की ’झण्डी” पर जा टिकी। उनके चेहरे पर गुस्से की शिकन खिंच गयी । उसने एक बार सरदारजी के गुस्से को देखा , फिर ग्राहकों की मुस्कान को और फिर खुद को – जितना आईने के बगैर देखा जा सकता है। और वह भी मुस्कुरा दिया । इस पर उसे कुछ और जोर से डाँट पड़ी और उसकी झण्डी लटक गई । ग्राहक अब हँस पड़े और लड़का भी हँस कर आगे बढ़ चला।
भीख देने से सरदारजी खुद को इज्जतदार समझते थे मगर उस दिन मानो उनकी तौहीन हो रही थी । लड़का अभी भी हँस रहा था और मेरा दोस्त भी । दोस्त ने मेरे हाथ से दोना ले लिया जिसमें दो जलेबियाँ बची थी और उसे दे दिया। सरदारजी से उस दिन भीख न पाने में भी उसे मजा आया ।

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पुष्पा भारतीजी कहानी का एक पहलू यह भी है

आपातकाल की औपचारिक घोषणा के पहले भी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा पत्र-पत्रिकाओं पर नकेल कसना शुरु हो चुका था । सेन्सरशिप न होने के बावजूद सरकारी विज्ञापन और अखबारी कागज के कोटे आदि के द्वारा यह अंकुश रखा जाता । इसी दौर का एक प्रसंग बता रहा हूँ । धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध कविता मुनादी ,एक छोटी साहित्यिक पत्रिका कल्पना में प्रकाशित हुई । मैंने उन्हें लिखा कि व्यापक पाठक समूह तक पहुँचाने के लिए मुनादी को धर्मयुग में छापा जाए । भारतीजी के उत्तर का चित्र पाठक देख सकते हैं । कुछ ही समय बाद आपातकाल लागू हुआ । भारती जी और सचेत हो गए । भवानीप्रसाद मिश्र ने आपातकाल के खिलाफ़ प्रतिदिन तीन कविताएं लिख कर त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प पूरा किया । १९७७ में जनता पार्टी के जीतते ही धर्मयुग ने आपातकाल पर विशेषांक निकाला जिसके बीच के पृष्ट पर एक तरफ़ जेपी द्वारा चण्डीगढ़ जेल में लिखी कविता ( जीवन विफलताओं से भरा है , सफलता जब कभी आईं निकट,दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से।…..) और दूसरी तरफ़ मुनादी छापी गयी । ‘ आत्म प्रचार ‘ तब आवश्यक हो गया था । संकट के दौर में ही बड़े बड़ों की औकात का पता चल पाता है ।

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

’ शब्दों का सफ़र’ में मेरी यह टिप्पणी ४ मई २००८ को छपी थी ।

आज पुष्पा भारती जी ने मन्नू भण्डारी की आत्मकथा की बाबत ’हिन्दुस्तान ’ में एक लेख लिखा है । धर्मवीर भारती की ’मुनादी’ के हम भी कायल थे । शायद जेपी आन्दोलन का हर छोटा – बड़ा सिपाही था । भारतीजी अपातकाल लगने के पहले ही चिंगुर चुके थे । आपातकाल के दौरान भवानी बाबू की कविताओं ( बाद में ’त्रिकाल सन्ध्या’ में प्रकाशित ) को न छाप पाने की मजबूरी जताते हुए धर्मवीर भारती रोए भी थे ।  भाकपा खेमे के बुद्धिजीवियों से वे नहीं जुड़ गये यह गनीमत थी । काशी विश्वविद्यालय के कुछ संघी अध्यापक भी भाकपा खेमे के अध्यापक संगठन के सदस्य बन गये थे उस ’दु:शासन पर्व’ में ।

मन्नूजी को जितना पुष्पाजी ने उद्धृत किया है उसमें सच का अंश भी है । इसलिए पुष्पाजी द्वारा हल्की भाषा में लिखे गए इस प्रतिवाद के बावजूद मन्नूजी का लिखा टिका भी रहेगा। जिस दौर में अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की कोशिश की गयी हो उस दौर में साहित्यकारों की भूमिका की बिबाक विवेचना जरूरी है ।

भवानीबाबू ने न सिर्फ़ आपातकाल में कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या की अपितु जब जनता पार्टी वाले आपस में लड़ने लगे तब भी एक कविता में लिखा –

’जब आकाश घिरा था , काले बादल छाये थे, तब हम सब साथ थे

काले बादल छँट गये तो क्या हम भी छँट लें ? ’

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भणसाळीकाका (२) : ले. नारायण देसाई

तीसरा दृश्य मगनवाड़ी का । बारह वर्षों का मौन चल रहा था । लेकिन बापू ने बहस करके भगवान का नामोच्चारण करने की छूट उनसे मंजूर करायी । उनकी दोनों बगलों में काख – बिलाई के फोड़े एक के बाद एक हो रहे थे । देखनेवाला सहम जाता था । लेकिन भणसाळीकाका का चरखा चालू ही रहता था । तार खींचते समय काख से खून या पीप की पिचकारी छूटती थी । पिचकारी देखकर वे खिलखिलाकर हँसने लगते । हँसने से दुबारा खून की पिचकारी छूटती । एक बार इलाज के लिए बापू ने उनको सरकारी अस्पताल में भेजा । काख में से पीप निकालने के लिए सिविल सर्जन ने एक सलाइ खोंस दी । भणसाळीकाका ने उस समय भी जोर का ठहाका लगाया । सिविलसर्जन काका से कहने लगे , ‘ ऐसा मरीज जिन्दगी में मैंने नहीं देखा , और किसीने देखा हो तो मैं नहीं जानता।’

    बापू और भणसाळीकाका के बीच चर्चा चलती । बापू बोलते जाते थे और भणसाळीकाका लिखते जाते थे । कुछ दिन बाद चर्चा के समय मौन छोड़ने का कबूल करवाया । कुछ दिनों के बाद हम लोगों के पढ़ानेभर के लिए मौन छोड़ने की बात भी कबूल करवायी ।

    मगनवाड़ी में कभी-कभी आधी रात में या भरी दोपहरी में भणसाळीकाका जोर से चिल्लाते , ‘ प्रभु,प्रभु,प्रभु,नारायण,नारायण । ‘ बादलों की गड़गड़ाहट के समान उनकी ध्वनि गम्भीर लगती थी । इन शब्दों के उच्चारण के समय उनको रोमांचित तथा गदगद होते हुए हमने देखा है । मेरे काका मानते थे कि भणसाळीकाका को भगवत्दर्शन हुए हैं । भणसाळीकाका ने इससे इनकार नहीं किया था ।

    चौथा दृश्य सेवाग्राम । भणसाळीकाका मुझे पढ़ाने बैठे हैं । चरखा चल रहा है । बगल में गाजर से भरी टोकरी रखी है । दिनभर में गाजर से भरी पूरी टोकरी खा जाते हैं । कभी-कभी शिष्य को भी गुरु का प्रसाद मिल जाता है । गाजर के बदले कभी अमरूद होते हैं या दोनों न हों तो सेपरेट किये हुए दूध की एक बाल्टी भरी रहती है ।खाने की चीज कुछ भी हो भणसाळीकाका के भोजन की मात्रा में इससे कोई खास फरक नहीं पड़ता था । बीच में कुछ दिन खजूर चला । लेकिन खजूर खाने से भूत दिखाइ देते हैं , ऐसी उनकी शिकायत थी। इसलिए खजूर बन्द कर दिया ।फिर लहसुन शुरु हुआ । लहसुन की एक-दो कलियाँ नहीं,बल्कि अच्छी-खासी दो-तीन सौ कलियाँ रखी रहती थीं और मुट्ठीभर एक साथ मुँह में डालकर खाते । इस प्रयोग से ऐसे बीमार पड़े कि मरते-मरते बचे । उन दिनों सरदार सेवाग्राम आये हुए थे । पूछा,’क्यों भणसाळी,क्या जाने की तैयारी कर रहे थे ?’ जवाब मिला, ‘उसकी कला अकल है ।’ सरदार ने हँसकर कहा ,’कभी उसके (भगवान के) साथ बातचीत करने का मौका आ जाय , तो हमारा राम-राम पहुँचा देना । ‘

    इस दृश्य की अब दूसरी बाजू । एक टाँके में छाती तक के पानी में भणसाळीकाका बैठे हैं। सिर पर तीस सेर वजन का पत्थर रखा हुआ है ।

    ‘ यह कौन-सा प्रयोग है ?’

    ‘कुछ नहीं। ध्यान की दृष्टि से ठंडक की आवश्यकता महसूस हुई।सोचा था कि पाँव में रस्सी बाँधकर कुएँ में उलटे सिर लटका जाय । चिमनलालजी ( आश्रम-व्यवस्थापक ) ने कहा कि बापू की इजाजत लो । बापू को चिट्ठी लिखी।उन्होंने इजाजत नहीं दी।मैंने फिर से लिखा कि कम-से-कम टाँके में बैठने की तो छूट दे दो।वह उन्होंने दी ।’

    ‘ लेकिन यह सिर पर पत्थर किसलिए ?’

    ‘पहले दिन टाँके में बैठा था तो जानवर पानी पीने आये।उनकी सींग शरीर में लगने के भय से कहीं गलती से शरीर उछल न जाय , इसलिए सिर पर वजन रखा है।’

    एबटाबाद से आने पर बापू ने उनका यह प्रयोग तुरंत बन्द करवा दिया । मन में चाहे जितनी जिद हो,फिर भी बापू ने मना कर दिया तो भणसाळीकाका उनके साथ बहस नहीं करते थे ।

    एक बार आश्रम में हममें से कइयों को पागल लोमड़ी ने काट लिया । भणसाळीकाका को उसने तीन बार काटा । लेकिन उन्होंने किसीसे से जिक्र नहीं किया। वह तो तब पता चला, जब उनके हाथों पर घाव दिखाई दिये ।सूई लगाने से इनकार करते थे । लेकिन बापू की आज्ञा हुई तो मान गये।फिर वर्धा तक मोटर में जाने से इनकार करने लगे।फिर से बापू की आज्ञा हुई तो चुपचाप चले गये।

    लेकिन बापू के साथ भी एक बार उनका मतभेद होने की घटना मैंने देखी है । आश्रम की किसी बहन की एक छोटी-सी भूल के कारण बापू ने उसे आश्रम छोड़कर जाने को कहा था । वह बहन विधवा थी। उसने भणसाळीकाका को बताया । भणसाळीकाका को लगा कि इसमें बापू के हाथ से अन्याय हो रहा है ।उन्होंने बापू से कहा , ‘तो मैं भी आश्रम छोड़कर चला।’ अन्त में बापू मान गये ।

    समाज के दुर्बल और पीड़ित वर्ग के प्रति भणसाळीकाका का हृदय बहुत संवेदनशील था । गरीबों के साथ अन्याय होता देखकर कई बार वे क्षुब्ध हो जाते थे । स्वराज्य के बाद तेलंगाना में कम्युनिस्ट लोगों ने आतंक फैलाया था। उसके कारण सरकार ने बड़े पैमाने पर कम्युनिस्टों की धरपकड़ की थी । उस समय भणसाळीकाका ने सरकार को पत्र लिखा कि ‘मुझे भी पकड़ लो। मैं अहिंसा में विश्वास रखनेवाला एक साम्यवादी हूँ ।

    आष्टी-चिमूर में स्त्रियों पर पुलिस ने अत्याचार किया था। उसकी करुण कहानी सुनकर भणसाळीकाका का पुण्यप्रकोप हुआ और उसके विरोध में उन्होंने अनशन किया ।भारत के इतिहास में इस अनशन की एक अमर कहानी बन गई है । इस अनशन के दरमियान भणसाळीकाका ने शुरु के पन्द्रह दिन पदयात्रा की थी और पानी पीना भी छोड़ दिया था।आखिर के ४८ दिन वे बिस्तर पे थे । अनशन का एक-एक दिन बढ़ रहा था ।सन १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में सरकार ने जनता को बेरहमी से कुचलकर मूर्छित-सा कर दिया था,लेकिन इस अनशन ने उस जनता में एक चेतना पैदा की ।रेल की पटरी उखाड़ने,तार काटने,डाक के डिब्बे जलाने के कार्यक्रमों का जवाब सरकार के पास था। लेकिन एक विशुद्ध नैतिक प्रश्न को लेकर एक सन्त ने अनशन का जो अमोघ अस्त्र उठाया था,उसका जवाब निष्ठुर सरकार के पास कुछ भी नहीं था । अन्त में सरकार ने इस अत्याचार की जाँच करना स्वीकार किया । इस तरह भारत के नारीत्व की मर्यादा का रक्षण हुआ ।

    आज भणसाळीकाका का शरीर गलितगात्र हो गया है । लेकिन वे नागपुर के नजदीक टाकली गाँव में रहकर ग्रामसेवा का अखण्ड व्रत का पालन कर रहे हैं। सेवाग्राम – आश्रम को यदि प्राणि-संग्रह कहा जाय तो भणसाळीकाका उसमें अनिर्बन्ध संचार करनेवाले सिंह-जैसे थे।.

[ यह संस्मरण नारायण देसाई की पुस्तक ‘बापू की गोद में’ से लिया गया है । सम्पूर्ण पुस्तक एक पुस्तक-चिट्ठे के रूप में संजाल पर उपलब्ध है । ]

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भणसाळीकाका : ले. नारायण देसाई

एक बार काका ने सेवाग्राम – आश्रम का वर्णन ‘ गांधीजी का प्राणि – संग्रहालय’ ( गांधीजीज मिनाझरी)   इस शब्दों में किया था। बापू के आसपास हमेशा अजीब तरह के लोग जमा हो जाते थे । कभी – कभी सरदार कुछ पर चिढ़ भी जाते थे । काका हँसकर कहते थे , ‘ बापू तो डॊक्टर हैं,डॊक्टर के आसपास मरीज तो रहेंगे ही न ? ‘

    सारे आश्रमवासियों की सभी विचित्रताओं का वर्णन करने का मेरा इरादा नहीं है , और उतना सामर्थ्य भी नही है । साबरमती-आश्रम में एक सज्जन तो ऐसे थे कि गिनकर ५५ रोटियाँ खा जाते । भूल से ५४ रखी गयी हों तो जोर से चिल्लाकर कहते , ‘ तुम कैसे कंजूस हो ! हमें भूखा मारना है ?’ और गलती से ५६ रोटियाँ परोसी जाँय तो तपाक से कहते , ‘ वाह तुमने क्या हमको राक्षस समझ रखा है ?’ इस तरह इनकी हालत भूखे मरनेवाले आदमी और राक्षस के बीच की पतली दीवार जैसी थी ।

    दूसरे एक सज्जन सेवाग्राम-आश्रम में ऐसे थे , जिनके साथ मेरा निम्न संवाद हुआ –

    ‘ क्योंजी , आजकल क्या प्रयोग चल रहा है ? ‘

    ‘ प्रयोग तो हमारा कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है । आजकल पानी का प्रयोग चल रहा है ।’

    ‘ क्या पानी उबालकर पीते हैं ‘ या जल-चिकित्सा चल रही है ? ‘

    ‘ नहीं भैया , खाने-पीने के प्रयोग के सम्बन्ध में चर्चा नहीं कर रहा । इस बार तो शौच के पानी का प्रयोग है । ‘

    ‘ यानी ? ‘

    ‘ यानी शौच के लिए जो पानी व्यवहार करते हैं , वह कैसे कम हो इसका प्रयोग कर रहा हूँ । ‘

    ‘ अच्छा ! ‘

    ‘ हाँ , घटाते – घटाते पाँच तोले तक पहुँचा हूँ । अपने देश के अनेक भागों में पानी की बड़ी कमी रहती है । इसमें अगर हम पानी बचा सकें तो …’

    मैंने अपनी बालसुलभ उद्दंडता का लाभ लेकर उस भाई की बात बीच में ही काटकर कहा , ‘ हाँ , बैलों को तो पानी की जरूरत ही नहीं पड़ती । ‘

    सेवाग्राम के आश्रमवासियों की ऐसी सारी विचित्रताओं के बावजूद एक बात उन सबमें समान थी, बापू के प्रति भक्ति । इसी एक तत्त्व के कारण वे आश्रम में टिक सके । इसी तत्त्व के परिणामस्वरूप सब आश्रमवासियों में एक परिवार-भावना का उदय हुआ और वह भावना वृद्धिंगत होती गयी । आज भी एक-दूसरे से बहुत दूर गए हुए दो आश्रमवासी दीर्घ अवधि के बाद जब भी मिलते हैं , तब अलग पड़े हुए स्वजन बहुत दिनों के बाद मिलने पर जिस आत्मीयता का और प्रेम का अनुभव करते हैं , वैसा ही अनुभव ये आश्रमवासी करते हैं ।

    विचित्रताओं के साथ – साथ हरएक आश्रमवासी की विशेषता भी कम नहीं थीं । इनमें से कुछ लोगों के साथ रहने का मौका मिलना एक अपूर्व सौभाग्य ही था । ये आश्रमवासी स्वतन्त्रता की लड़ाई में बापू की वानर-सेना के सिपाही थे और शिवजी की बारात जैसे थे ।

    यहाँ एक ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में लिखूँगा , जो विचित्रता के साथ – साथ विशेषताओं से भी परिपूर्ण थे । वैसे वे खुद छिपकर रहनेवालों में से थे लेकिन इतिहास में कम-से-कम एक बार तो उन्होंने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया था । वे व्यक्ति हैं आचार्य भणसाळी । हम सबके लाड़ले भण्साळीकाका ।

     एक दृश्य । किला सोनगढ़ गाँव का एक सुनसान मकान । उसमें आधा पागल और आधा साधु जैसा दीखनेवाला एक आदमी पड़ा था । एक समाजसेवक वहाँ पहुँचा ।

    ‘ ओहो ! भणसाळीभाई ! आपकी यह हालत ? ‘ जवाब में भणसाळीकाका ने सप्त स्वर में अट्टहास किया । लेकिन मुँह से एक शब्द भी नहीं बोले । समाज-सेवक ने उनके दोनों पाँवों के तलवों से बीस-बीस,पचीस -पचीस काँटे निकाले । उनके जख्मों को धोकर ,पीप निकालकर साफ कर दिया । ‘ यहाँ कुछ दिन आराम करो । ‘ समाज-सेवक ने विनती की । लेकिन साधु तो चलता ही भला । फिर पाँवों में से काँटे भी तो निकल चुके थे ।

    ‘ लेकिन आप बोलते क्यों नहीं ? ‘ कागज – पेन्सिल लेकर भणसाळीकाका ने लिख दिया , ‘ बारह साल का मौन लिया है । ‘

    ‘ बारह साल ! ‘

    भणसाळीकाका के पास छोटा आँकड़ा कभी था ही नहीं । प्रथम बार अनशन किया ४० दिनों का । दूसरी बार किया ५५ दिनों का और तीसरी बार किया आष्टी-चिमूर के अत्याचारों के निषेध में ६३ दिनों का देशविख्यात उपवास ।

    थोर की बाड पर से कूदने के प्रयोग के कारण उनके शरीर में फोड़े हो गये थे । भणसाळीकाका साबरमती-आश्रम से वर्धा के लिए निकले थे । ५५ दिनों के  अनशन  में मानसिक अस्थिरता आ गयी । फिर हिमालय तक पैदल सफर और और बारह वर्ष का मौन । देश की सही परिस्थिति का दर्शन उनको इस यात्रा में हुआ ।

    हिमालय से वापस आते समय राजस्थान के एक देहात में बैल जहाँ बाँधते हैं , ऐसे बाड़े में उनको ठहरने कि जगह मिली । रात में जानवर का पाँव लगा । भणसाळीकाका के मुँह से अचानक शब्द निकला ‘ कौन ? ‘ तुरंत उनके ध्यान में आ गया कि मौन टूटा। 

 फिर सोचने लगे कि कई ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि रात में नींद में भी मौन न टूटे । तरकीब तो सूझी, लेकिन उसको अमल में लाने वाला तरीका  उनको मिला ध्रांगध्रा में । एक सुनार ने ताँबे का तार गरम करके लाल किया और भणसाळी्काका के दोनों होठों को सिल कर तार मोड़ दिया । भणसाळीकाका ने उस सुनार के उपकार माने। इसी सुनार ने प्रवाही पदार्थ मुँह में डालने के लिए एक फनेल भी बना दी । उन दिनों वे कच्चा आटा और कड़वे नीम के पत्ते खाते थे । आटा पानी में घोलकर चूस लेते थे । नीम की पत्तों को मुँह के कोने से अन्दर घुसा देते थे । साबरमती में आश्रम में बापू के साथ भेंट हुई , तब होठों के तार कटवा दिये । यह दूसरा दृश्य । ( अगली प्रविष्टी में जारी ) 

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सुकरात की सगाई

    सुकरात मेरा प्यारा भतीजा है । ४ अगस्त १९७५ को बनारस के महिला अस्पताल में पैदा हुआ तब रणभेरी , चिन्गारी आदि नामों से साइक्लोस्टाइल्ड भूमिगत बुलेटिन निकालने वालों में प्रमुख उसका पिता- नचिकेता , खुद भी भूमिगत था । ‘ गिन रही ,सुन रही, हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को ‘ बाबा नागार्जुन ने इन शब्दों में जिन इन्दूजी का वर्णन किया था, उनकी थोपी सेन्सरशिप का मुकम्मल जवाब थीं – रणभेरी जैसी बुलेटिनें । नचिकेता के पत्रकारीय जीवन की ठोस बुनियाद । रणभेरी लुटा कर ‘ लोकनायक जयप्रकाश -जिन्दाबाद’ सिर्फ एक बार लगाना डी.आई.आर. के अन्तर्गत जेल जाने के लिए पर्याप्त होता था।

    बनारसीपने में सुकरात का घर का नाम मैंने दिया – बमबम । बमबम की बुआ -संघमित्रा की शादी के वक्त आशीर्वाद देते वक्त हुए प्रख्यात गाँधीजन दादा धर्माधिकारी ने हम तीनों भाई बहन के लिए कहा था :” ये गुजबंगोड़िया हैं । गुजराती पिता , बंगाली नानी और ओड़िया नाना होने के कारण ।” जीजाजी मराठी हैं इसलिए उनकी बच्ची – महागुजबंगोड़िया – यह दादा कह गए ! सुकरात ने इस प्रक्रिया को जारी रखा , व्यापक बनाया ।

    सुकरात की सगाई कल सम्पन्न हुई । सगाई के लिए गंगटोक से पूर्णतय: स्त्री सदस्यों का दल तीन दिन की यात्रा कर अहमदाबाद पहुँचा था । सुकरात अहमदाबाद टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में कॉपी एडिटर है और उसकी मंगेतर पूजा कम्प्यूटर साइन्स की प्रवक्ता है , गंगटोक में । कल हुए आयोजन में नचिकेता ने आभासी नाते के प्रत्यक्ष सम्बन्ध बन जाने पर खुशी व्यक्त की । सुकरात ने पूजा को अँगूठी पहनाई उसके पहले उसे नेपाली टोपी पहनाई गई , एक खुकरी दी गयी तथा पूजा की माँ और चाची ने घोषणा की : ” गोरखा समाज सुकरात को दामाद के रूप में कबूलेगा । ” नेपाली टोपी मेरे भाई और मेरे जीजाजी को भी पहनाई गई । असम के लाल किनार वाले अँगोछे की तरह इस टोपी के महत्व का अहसास हुआ । हमें कोई टोपी न पहना सका लेकिन काशी में बैठे-बैठे हमने बमबम और पूजा को आशीर्वाद दिया ।

  १

 

  २

 

  ३

[ चित्र : १. सुकरात और पूजा , २.  सिलीगुड़ी का दल , ३. नेपाली टोपी ]

 

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मवालियों से भिडन्त : स्वामी आनन्द

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    निडरता तो कोई उनसे सीखे| ठाणा से कल्याण जाते समय खाड़ी पार करते ही
पारसीक की पहाड़ियों में एक बड़ी सुरंग आती है। ‘थ्रू’ गाड़ी इस सूरंग से तथा
लोकल ट्रेन पुराने रास्ते से खाड़ी के किनारे से सट कर पहाड़ी का चक्कर लगा
कर जातीं । लोकल के पहाड़ पार करते ही पहा्ड़ियों से घिरा मुंबरा स्टेशन आता।
पुणे जाने वाली सड़क यहीं रेलवे लाइन से लग कर स्टेशन के पास से पनवेल की
ओर जाती। स्टेशन अलग- थलग, एकांत तथा बियाबान जगह है। दिन के उजाले में भी
अकेले चलने में डर लगता। एक ओर ७०० फीट उंची सीधी चट्टानों से बने पहाड़
की शृंखला तथा उसकी गोद में विशाल वृक्षों की घटाओं में छिपा वह स्टेशन।
बस्ती में सिर्फ दो-पांच चाय-नास्ते की ‘होटल’ और बीड़ी-पान-तमाकु की
दुकानें । और कुछ भी नहीं। मात्र मुंबई-पूना लाइन की जब्बर ट्राफिक वाला
मस्त बड़ा ट्रंक मोटर रोड ।
    मुंबई के तड़िपार मवाली और गुंडे बदमाशों ने यहां जुए का अड्डा जमा रखा
था। हर एक पैसेन्जर बस यहां रुकती। ड्राइवरों को जुआरियों ने मिला रखा
था। पैसेन्जर विरोध करें, हल्ला मचाएं, फिर भी बसों को यहीं रोक दिया
जाता।
    चाय, बीडी, पान तमाकु के लिए उतरने वाले पैसेन्जरों को मवाली खड़े-खड़े एक दो
दांव खेलने के लिए बुलाएं, ललचाएं, धमकाएं। जरूरत पड़ने पर छूरा दिखा कर
भी खेलने को मजबूर करें ।  कुछ लालच तो कुछ जोर जबरदस्ती कर के मिनटों में
जेब खाली करवा दें ।
    स्व. प्यारेअली शेठ मुंबई के चकला स्ट्रीट में फर्नीचर के व्यापारी थे ।
पुराने खानदानी रईस , खोजा गृहस्थ। गांधीजी के मित्र और परम भक्त। संपूर्ण
खादीधारी। गांधीजी के सत्संग लाभ के लिए कभी-कभी पति-पत्नी दोनों साबरमती
आश्रम आकर रहते। हम सब उन्हें भली भांति जानते थे । मुंबरा से दो मील आगे
पनवेल की दिशा में कौसा गांव में उनका बगीचा, बंगला और एस्टेट था ।
ठाणा आश्रम की स्थापना के समय से ही अपनी कौसा गांव की एस्टेट आते-जाते
प्यारेअली शेठ तथा उनकी बेगम नूरबानू बहन कई दफ़ा आश्रम में झांक कर हम सब
की कुशल मंगल अवश्य लेते। छोटुभाई के लिए तो कल्याण, पनवेल, कौसा, मुंबरा
गांव का इलाका तो उनके स्थाई कार्यक्षेत्र का इलाका था। आते-जाते स्वयं
कौसा एस्टेट पर कई बार रात गुजारा करते।
    आते-जाते उन्होंने मुंबरा स्टेशन पर इन तडिपार मवालियों के जुए के अड्डे
का तमाशा तथा पैसेन्जरों की दुर्दशा देखी। तुरंत ही ठाणा पुलिस
अधिकारियों से मिल कर जांच चालू कर दी। ऊपरी पुलिस अधिकारियों से भी मिले।
पता चला कि मुंबई का जुआ निरोधी कानून ठाणा की खाड़ी के उस पार लागू
नहीं होता । इसीलिए इन जुआरियों ने मुंबरा स्टेशन वाले एकांत निर्जन स्थान
को अपने धंधे के लिए अनुकूल समझ कर चुना था ।
    महिनों तक इस बुराई के पीछे लगे रहे। छह महिने तक कौसा एस्टेट को अपना
मुख्यालय बना कर रहे। न सोये न ही ठाणा की पुलिस को सोने दिया । पुलिस के
गोरे बड़े अधिकारी को आधी रात को नींद से जगा कर पुलिस दस्ते को अपने साथ
ले कर अचानक छापा डलवा कर पुलिस के सामने सबूत पेश किया करते । पुलिस के पास
किसी प्रकार का बहाना न रहे इस बात का ध्यान रखते। रात दिन उठा पटक कर
जुआ निरोधक कानून को ठाणा से आगे लागू करवाने के लिए पुलिस विभाग को
बाध्य किया ।
    मवालियों ने भी अनेक बार उन्हें मारने तथा उनकी हत्या करने की कोशिश की।
एक बार तो उनमें से एक ने ठाणा स्टेशन से दिन दहाड़े चलती ट्रेन के दरवाजे
के पटिया पर च्ढ़ कर उनका नाक काट लिया था । लेकिन नाक टूटा नहीं। सिर्फ
ट्रेन के झटके से वह नीचे गिर गया और प्लेटफार्म पर भागते हुए पकड़ा गया।
छोटुभाई अपने हाथ से काते हुए सूत की गठरी उस झमेले में खो कर घर लौटे।
नाक पर दांत के निशान लगे थे। मरहम पट्टी के बाद कुछ ही दिनों में सब मिट गया।
लेकिन छोटुभाई को यह ठीक न लगा। घटना के दिन आश्रम में आते ही मुझसे कहा
(और बाद में जब भी इस बारे में बात निकले तो कहते):
“स्वामी यह तो विक्टोरिया क्रोस पाने का मौका था। लेकिन किस्मत ने साथ न दिया।”
वह बदमाश प्लेटफार्म पर ही पकड़ा गया था। लेकिन छोटुभाई ने पुलिस में
शिकायत नहीं लिखवाई। वैसे पुलिस केस तो हुआ। उसे सजा भी हुई।
लेकिन वह तो शायद उसकी पच्चीसवीं सजा रही होगी।

( जारी )

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"बाम्मन को बैल की तरह जोतवाने का हुक्म ‘महात्मा’ से दिला दें": छोटुभाई (५) : स्वामी आनन्द

 

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पिछली कड़ियाँ : एक , दो , तीन , चार 

११. 

     छोटुभाई को पाठशाला चलाने, सहकारी सोसायटी खड़ा करने या आवेदन पत्र लिखने जैसे ‘रचनात्मक’ कामों में कोई ‘रुचि’ न थी। जुल्म और अन्याय को शिकारी कुत्ते की तरह ढूँढ़ निकाल कर उनके खिलाफ लड़ना और लोगों के मन का डर निकाल कर उन्हें लड़ना सिखाना, यही उनके जीवन का प्राण बन गया था। तहसील दफ़्तर में सच्चे-झूठे फौजदारी के  केस चलते हों, छोटे-बड़े अधिकारी झूठे सबूतों के आधार पर आदिवासियों को जेल की रोटी तोड़ने पर मजबूर करते हों, किसी की खेती की जमीन गलत सलत लिखा – पढ़ी करा के किसी सवर्ण या व्यापारी ठेकेदार ने हडप ली हो, अधिकारी जुल्म करने वालों का साथ देते हों – वे ऐसे लोगों के पीछे पड़ जाते। उनके तथा उनके शागिर्दों के किए कुकर्मों का इतिहास भूगोल जमीन-आसमान एक कर इकठ्ठा करते। संबंधित तथा अन्य अधिकारियों से मिलते। सबूतों का असला जेब में रख कर उससे बहुत विनम्रता के साथ बात करते। उसकी नीयत
भांप लेते। अगर वह सीधा न लगा तो आंखें दिखा कर जेब से एक या दो ‘कान
खजूरे’ निकाल कर दिखाते। और अगला पाहिमाम, त्राहिमाम पुकारने लगता। किए
कर्म के लिए पछतावा व्यक्त करवा कर या फिर जिसको अन्याय हुआ हो उसे
समुचित मुआवजा दिला कर ही छोड़ते। बल्कि बिना झूठ बोले बचने का रास्ता भी
दिखा देते।एक दफ़ा एक आदिवासी की हत्या के केस की जांच के सिलसिले में कल्याण के किसी पुलिस अधिकारी के पास एक महिला को भेजा। चिठ्ठी लिखी:
“इस महिला का बयान (अमुक) हत्या की जांच में महत्व की कड़ी साबित हो सकती
है । उसकी बात सुनें तथा आवश्यक जांच करें।”
    महिला को कल्याण जाने के लिए गाड़ी भाड़ा के आठ आना भी अपनी जेब से दिए।कुछ समय बाद ठाणा की सेशन कोर्ट में केस की सुनवाई हुई तो छोटुभाई को साक्षी के रूप में बुलाया गया।
    जज साहब ने स्वयं छोटुभाई से जिरह शुरू कर दी। कोर्ट में, लॉबी में और
आसपास की तमाम अदालतों में हल्ला हो गया।
फालतू बैठे वकील सुनने के लिए दौड़ पड़े।
“वह पागल जज कल्याण वाले काथोड़ी केस में छोटुभाई को क्रॉस कर रहा है।
चलो, चलो देखने। यहां क्यों बैठे हो? दोनों ही सिरफिरे हैं। जरा देखें तो
सही , कौन किसको मात देता है।”
गांव और बाजार से भी लोग दौड़े आए। कोर्टरूम ठसाठस भर गया।
छोटुभाई ने महिला को पैसे दे कर पोलिस थाने भेजा और तिस पर अधिकारी के
नाम चिठ्ठी भी लिखी इस पर जज साहब ने खिंचाई शुरू की:
“आपको केस की जांच में ऐसी क्या रुची है कि आपने अपनी जेब से उस औरत को
कल्याण भेजा?”
“अवश्य, मैंने उसे पैसे दे कर भेजा। वर्ना वह बेचारी कैसे जाती? उसकी
झोंपड़ी में मैं गया था तब उसने कांजी बनाई थी मगर वह  हंडिया टूटी होने की वजह
से जमीन पर बह गई थी। वह हंडिया का तलवा चाट रही थी और कुत्ता जमीन पर
पड़ी कांजी चाट रहा था। वह कल्याण कैसे जा पाती? मुझे तो उसे उस दिन की
मजदूरी, जो वह नहीं कर पाई, वह भी उसे देनी चाहिए थी। लेकिन मेरी जेब में
सिर्फ आठ आने थे। उतने दिए। टिकट के किराए भर के। शाम को थकी हारी घर आ
कर वह बेचारी भूखी सोई होगी। और दुसरे दिन शाम को दिनभर की मजदूरी करने
के बाद ही उसने कांजी खाई होगी।”
“लेकिन आप इस प्रकार जांच में रुचि कैसे ले सकते हैं? क्या इससे शंका
नहीं होती कि आपका इस जांच में कुछ निहित स्वार्थ था?”
“कोई निहित स्वार्थ नहीं, बड़ा ही खुला स्वार्थ था। एक दम सवेरे के उजाले
की तरह साफ़। कोर्ट के इस खंभे की तरह उजला – इन्साफ़ दिलाने का स्वार्थ।
क्या यह जुर्म है? ends of justice के लिए मदद करना एक नागरिक का फर्ज है
ऐसा कानून में नहीं है क्या?”
“लेकिन आपने तो पुलिस अधिकारी पर चिठ्ठी भी लिखी ! आप अपने आप को
हिन्दुस्तान के गवर्नर जनरल समझते हो क्या?”
“आप गलत समझ रहे हैं। यदि मैं अपने आप को ऐसा समझता तो सीधा हुक्म देता:
“Hang him.” लेकिन मैंने तो लिखा: “इसकी बात सुनियेगा और please
investigate.”
पौन घंटे तक बहस चली। डेवीस जज झक्की व्यक्ति माना जाता था। लेकिन उसका
पाला पड़ा छोटुभाई से। जब बड़े से बड़े अधिकारी उनको काबू मे नहीं कर सके
तो उस बेचारे सेशन जज की क्या बिसात? उससे मुंह में उंगली डलवाई। अंत में उसने
कहा:
Mr. Desai, I am gratified. I am more than satisfied. You are a
remarkable man. I wish there were more social workers of your type in
this country.
आश्रम में आ कर मुझसे कुछ नहीं कहा। अगले कई दिनों तक गांव में जहां जाओ
वहीं इसी की चर्चा। मैंने घर आकर पूछा तो बोले:
“मुझे कहने का मन तो था। लेकिन थोडा डर लगा। तुम contempt of court जैसे
मुद्दे निकाल कर ख्वामखाह मुझे नीरस बना देते। मैंने सोचा एक दो दिन के
बाद जब मामला थोडा ठंडा पड जाए तो धीरे से सारी बात कहूंगा। लेकिन तुम तो
गांव जा कर सारी बात जान आए। लोग बात करते होंगे।”
फिर सिलसिलेवार सारी बात बताई ।

१२
    बाबा मंगल की ढलान के जंगल में रहने वाला एक मेहनतकश काथोड़ी परिवार बरसों
से अंबरनाथ के पास घास-फूस की झोंपडी बना कर रहता था । पहाड़ी की ढलान पर
पाली बना कर खेती करता था। जमीन और झोंपड़ी उसके नाम थे । पड़ोस में एक
दक्कनी ब्राह्मण भैंस पाल कर दूध का व्यापार करता था। दोपहर और मध्य
रात्रि की लोकल से उसके दूध के कनस्तर मुम्बई भेजे जाते। उसकी सब भैंसें
आस-पास के पहाड़ी मैदानों में तथा ढलान पर दिन रात चरा करतीं। उसकी नजर भाऊ
काथोड़ी की झोंपडी वाले मैदान पर अटकी थी । उसने कल्याण के सवर्ण ब्राह्मण
से मिल कर भाऊ काथोड़ी पर झूठा मुकदमा दायर करवाया और झोंपड़ी वाली जमीन
उसकी नहीं है ऐसी रपट बनवा कर उसकी झोंपड़ी सरकार द्वारा उखड़वा दी ।
बेचारे के बाल-बच्चे पेड़ की शरण में आ गए ।
छोटुभाई कहीं मुंबरा कौसा पनवेल की तरफ़ दौरे पर थे। रास्ते में जंगल के
काम पर जाते वारली, काथोड़ी, मजदूर, जो मिल जाए उनसे हर दम बात करते । ऐसे
किसी व्यक्ति से बात सुनी कि अंबरनाथ के किसी काथोड़ी परिवार पर जुल्म हुआ है और
पुलिस ने उसकी झोंपडी उखाड़ फेंकी है ।
    सुनते ही वे रास्ते से लौट पड़े । कौसा में प्यारेअली सेठ के बगीचे से कोई वाहन ले कर ट्रेन पकड़ी और सीधे अंबरनाथ पहुंच गए । वहां केमिकल फैक्टरी वाले भाऊसाहब हम सब के जिगरी दोस्त थे। उनसे कुशल मंगल की बात कर तुरंत पहुंचे भाऊ काथोड़ी की दरवाजे पर। बेचारे की बिवी और बच्चे पेड़ के तले रो रहे थे । टूटी हूई झोंपडी का अवशेष एक ढेर के रूप में कुछ दूरी पर पड़ा हुआ इस आदिवासी परिवार पर बीते सितम की शिकायत कर रहा था। पुलिसवाले तो तोड़-फो्ड़ कर अगले दिन ही चले गए थे। भाऊ की शिकायत तथा भाऊसाहब का बयान लेकर  सीधे कल्याण पहुंचे और कागजी कार्यवाही पूरी कर ४८ घंटे के बाद
आश्रम पहुंचे।
    महिनों तक भाऊ काथोड़ी और कल्याण के चक्कर लगाए । एक कोठरी में बत्तीस
कोठरी की तरह कल्याण के कई छोटे बडे अधिकारियों की ‘कुंडलियां’ सूंघ-सूंघ
कर खोज निकालीं। कई लोगों को छोटुभाई जुलाब की गोली की तरह लगे। अंत में
भाऊ काथोड़ी की जमीन, उस पर सरकार के खजाने में जमा किया गया टैक्स, ब्राह्मण
अधिकारियों की उस दूध के ब्राह्मण व्यापारी के साथ मिली- भगत और उसकी
गैरकानूनी मदद, उन सब की मिलकर उस गरीब श्रमजीवी आदिवासी परिवार के हक की
जमीन छीन लेने की साजिश –एक-एक बात कागज में लिख कर जग जाहिर कर दी,
सबको नाकों चने चबवाए। भाऊ काथोड़ी को जमीन वापस दिलवाई । उसकी झोंपड़ी उस
व्यापारी के खर्च से बनवाई और ईमानदार तथा मेहनतकश काथोड़ी को किसान के
रूप में प्रोत्साहित करने के लिए कुछ सरकारी मदद भी दिलवाई ।
    यह भाऊ काथोड़ी तो बहुत जोरेदार आदमी निकला। सत्याग्रह आन्दोलनों के दौरान
जेल भी गया । एक बार उसके विशेष आग्रह पर तथा भाऊसाहब की इच्छा को देखते
हुए हमने अंबरनाथ में उसके पड़ोस में आदिवासियों का सम्मेलन भी रखा। उसमें
खेरसाहब, वांदरेकर, वर्तक और ठाणा जिला के कई राजनैतिक एवं रचनात्मक
कार्यकर्ताओं के सामने अपने आदिवासी लोगों को संबोधित कर उसने भाषण भी
किया:
“माझ्या भावांनो ! आ आपले बाळासाहेब खेर धरमराजे हाय। मा’त्मा गांधीना
चेला ने आपल्या सोटुभायना मुत्तुर हाय। तुरुंगात जावुन आले हाय। मी देखील
तुरुंगात जावुन आलो, हे तुमांस सांगतो। जेल-तुरुंगाला भिण्याचें कांय
नांय। राहायला मोठे राजवाडे – पक्या दगडाचे। सकाळ संध्याकाळ डागतर येवून
विचारपूस करी जाय:
“कसें काय? बरें हाय ना?”
“म्हनून मनतो, जेलमां बीवा जेवुं काय नांय। हे समधे मोठे लोक तुमांस
समजून द्यायला येथें आले हाय। पण तीमां समजून देयाचें काय हाय? तुरंगा
मंधी तो निवळ सायबी रावसायबी ज हाय। खायला प्यायला पूरेपूर अन काम अगदी
हळ्वुं फूल।
“आटलुं तमने समद्यांनां हमजावून आणि या सर्व मोठ्या लोकांनां रामराम करून
मी खाली बसतो।”

    [मेरे भाइयों ! ये अपने बाळासाहब खेर धर्मराज हैं। महात्मा गांधी के चेले
और अपने सोटुभाई के मित्र। जेल जा कर आए हैं। मैं भी जेल देख कर आया हूं,
यह तुम्हें बता रहा हूँ । मैं, तुम्हें जो खुद देखा वह बता रहा हूं। जेल-कारावास
से डरने की कोई बात नहीं है। रहने के लिए बड़ा महल – पक्की ईंटो का। सुबह
शाम डाक्टर आ कर हाल चाल पूछते हैं:
“कैसे हो? सब ठीक है न?”
“इसलिए कहता हूं, जेल से डरने जैसा कुछ नहीं है। ये सब बड़े लोग यहां
तुम्हें समझाने आए हैं। इसमें समझने जैसी कोई बात नहीं है। जेल में साहब, रायसाहब की तरह जीना है । खाना-पीना पूरा और काम एक दम फूल की तरह।
“यह बात आप सबको समझाने और यहां आए सभी बड़े लोगों को राम राम कर मैं अब बैठता हूं।” ]

१३
    उसका मामला निपटने के दो-तीन बाद वह ठाणा आश्रम आया था। “सोटुभाई हैं
क्या?” पूछता। मेरे सामने आ कर बैठा । मैंने पूछा, “मुझसे कुछ काम है
क्या?” वह चुप रहा। बैठा रहा । जब मैं बार-बार उसे पूछता तो कहता:
“सोटुभाई ने बताया नहीं?”
बात कुछ ऐसी थी कि छोटुभाई को मौका पा कर उसने एक-दो बार पूछा था:
“वो बाम्मन शाम को मुंबई से वापस आता है तो मेरे खेत की सीमा से हो कर
गुजरता है। उसे देखते ही मेरे सारे तन बदन में आग लग जाती है । कलेजे
में जैसे कोई काटने लगता है। और मेरे भीतर न जाने कुछ कुछ होने लगता है।
मैं आपसे क्या कहूं, लेकिन मुझे कुछ ऐसा मन करता है कि उसकी गर्दन पकड़ कर
उसे खेत में घसीट कर ले जाऊं और मेरी बैल की जो्ड़ी में से एक बैल को छोड़
कर उसकी जगह इसे हल में जोत दूं और खेत के पांच छह चक्कर लगवाऊंड। बस इतना
भर कर दूं तो पता नहीं क्यों मेरे कलेजे को शांति पहुंचे। सिर्फ़ दो, बस
दो ही चक्कर,  इस छोर से दूसरे छोर तक जोतूं। ज्यादा नहीं !”
छोटुभाई उसे बहुत धैर्यपूर्वक समझाते:
“पगले! हम ऐसा नहीं कर सकते। हम महात्मा गांधी के लोग कहे जाते हैं।
महात्मा गांधी का हुक्म है कि हम सिर काटने वाले को भी नहीं छू सकते।”
“लेकिन हमें कहां उसका सिर काटना है? यह तो इतना करने की आप ईजाजत दें तो
मेरे कलेजे को ठंडक पहुंचे । महात्मा गांधी का हुक्म एक दम सच्चा, सोने की
मुहर जैसा। इस बात का कोई इनकार नहीं। हम सब महात्मा गांधी के लोग हैं।
इसका भी मुझे कहां इनकार है? अब तो मैं आप में से एक हो गया, आप की हां
मेरी हां और आपकी ना मेरी ना। इसीलिए तो मैं रोज यहां आपसे पूछने आता हूं
– कि बस इतनी सी ईजाजत दे दो। आपके हुक्म के बगैर मैं पत्ते को भी नहीं
छूऊंगा। यह बात एक दम पक्की, इस में कोई छूटछाट नहीं।”
अंत में छोटुभाई उसे अपना फैसला सुनाते: “ठाणा आश्रम में आ कर उस स्वामी
दादा का हुक्म ले कर आओ। वे सब बड़े आदमी हैं। वे महात्मा गांधी को रोज
चिठ्ठी लिखते हैं और महात्मा गांधी उन्हें रोज चिठ्ठी लिखते हैं, हुक्म
भेजते हैं। वो स्वामी दादा अगर हुक्म दें तो मैं ना नहीं करूंगा। अब कोई
शिकायत? तो फिर आश्रम में आना जब समय मिले तब । ”
    इस लिए भाऊ काथोड़ी आश्रम आने-जाने लगा ।  मेरे घूटने को दोनों हाथ से छू कर
राम राम बोलता, सामने बैठे, मैं जहां काम करता उस ऑफ़िस वाले कमरे में मेरी
गद्दी के सामने घंटो बैठा रहता। मैं एक से ज्यादा बार उससे पूछता :
“किस काम से आए? छोटुभाई से काम है या मुझसे ?” कुछ न बोले। घंटो बीत जाँए।मैं उसे बार-बार घुमाफिरा कर पूछूं तो इतना ही कहे:
“सोटुभाई ने आपसे बात नहीं की?”
अंत में एक दिन मेरे बहुत आग्रह के बाद उसने मुझे बात बताई। छोटुभाई ने
बताई थी वही, लगभग उन्हीं शब्दों में।
अंत में बोला:
“महात्मा गांधी का रास्ता बिलकुल सच्चा। उन्हीं की कृपा से सोटुभाई और आप
जैसे बड़े लोग हमारी इतनी मदद कर रहे हो। और उन्हीं की कृपा से मेरी जमीन
और झोंपडी मुझे सही सलामत वापस मिली। उन्हीं के रास्ते सारी दुनिया को
चलना चाहिए। मुझे भी उस बाम्मन के साथ कोई बैर नहीं रहा कि मैं उसका सिर
काटने का विचार मेरे मन में लाऊं। और अब तो महात्मा गांधी का प्याला
छोटुभाई ने पिला दिया और मैंने पी भी लिया।
“इसलिए महात्मा गांधी का मार्ग तो कभी छोड़ना नहीं, नहीं सो नहीं ही।
लेकिन यह तो मेरे जलते हुए कलेजे को कुछ ठंडक पहुंचे इस लिए पूछ रहा हूं ।
उसका सिर काटने का विचार तो मेरे पेट के किसी कोने में भी नहीं है ऐसा
महात्मा गांधी को बेशक लिख दें। तो फिर इतना करने की ईजाजत मुझे जरूर दे
देंगे.।वे महात्मा पुरुष हैं, वे किसी की बुराई नहीं चाहते. इसलिए इतना
हुक्म मंगा लीजिए।”
“कैसा हुक्म?”
“उस बाम्मन को गले से पकड़ कर हल में जोत कर दो चक्कर खेत के लगवाने काड।
सिर्फ़ दो चक्कर, ज्यादा नहीं।”
“अरे पागल….”
“लेकिन आप जरा पूछ कर तो देखें। इसमें अपना क्या जाता है? नहीं देना हो
तो नहीं देंगे। उनके ऊपर – महात्मा पुरुष पर – अपना जोर थोड़े ही चलने
वाला है ? लेकिन यह तो मेरा मन कह रहा है कि आप अगर पूछ लें तो इतना हुक्म
तो वे जरूर दे देंगे। बस. मेरे कलेजे को फिर तो ठंड ही ठंड।”
उसे समझाने में छोटुभाई, मुझे और भाऊसाहब को कई दिन लगे.

( जारी )

 

 

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छोटुभाई : आदिवासी सेवा-९ : स्वामी आनन्द

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    ठाणा जिला यानि दमणगंगा से वसई की खाड़ी तक , दक्षिण गुजरात के घुटने
से ले कर पैर तक का अरब सागर और सह्याद्री की दीवार के बीच का इलाका।
पहाड़, समुद्र , खाड़ी और घने जंगल से भरा हुआ। चालीस प्रतिशत जनसंख्या वारली
काथोडी एवं अन्य आदिवासी जातियों की। इन आदिवासियों के बीच ठाणा के गांधी
आश्रम के लिए छोटुभाई ने काम शुरू किया।
    आश्रम की स्थापना छोटुभाई की हिम्मत की ताकत के बूते मैंने ही की थी। पहाड़ी इलाका।आदिवासी जंगल में से लकड़ियां तोड कर कोयला बनाते। ठेकेदारों के जुल्म और सितम की कोई सीमा नहीं थी। मुंबई शहर के २०-२५-३० मील की दूरी पर ऐसे लोग बसते थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी रेल गाड़ी से सफर नहीं किया था।  भीतरी  गांवों में तो ऐसे भी लोग थे जिन्होंने अपने जीवन में कभी रेलगाड़ी देखी तक नहीं थी ।

    इन आदिम जातियों में काथोडी जाति के लोगों की अवस्था सब से आदिम। १००-१५०
शब्दों से बनी भाषा। खेती करना नहीं जानते थे । एक जगह टिक कर न रहते। जंगलों
में शिकारी पशु की तरह भोजन की तलाश में घूमंतू जीवन गुजारने वाले। सांप, छछुंदर, तिलचट्टा, गिरगिट, कुछ भी दिखा तो शिकारी जानवर की भांति झपट कर पकड़ लेते।
    ऐसी काथोड़ी जाति के लोगों ने पिछले १०० बरसों में जंगल की लकड़ी से  कोयला
बनाना सीख लिया । इस कला में वे इतने माहिर हो गए कि कोई अन्य उनका
मुकाबला न कर सकता था । लेकिन यही हूनर अमरीका के हब्शियों की तरह उनके गले
का फंदा और पैरों की बेड़ियां बन गया। काथोडी जंगल के ठेकेदारों के गुलाम बन गए। ठेकेदार के मुलाजिम उन्हें उनकी बीवी-बच्चों के साथ, गाय-बकरी की तरह जंगल के एक छोर से दूसरे, जहां कहीं भी कोयला बनाने का काम चलता हो, हांक कर ले जाते। एक बोरी कोयला बनाने की दो आना मजदूरी दे्ते। बोरी भी ३६ इंच की जगह ५४ इंच की सिलते और नाप भी उसी की । ठेकेदार आपस में इन काथोड़ियों की  १०-१२ रुपए प्रति व्यक्ति खरीद फरोख्त भी करते। दो आना मजदूरी के बदले, चावल मिल से राई के आकार के चावल के टुकड़े, जिसमें प्रचुर मिट्टी और कंकड़ मिला होता, जिसे सिर्फ़ मुर्गी तथा बतख को दाने के रूप में खिलाया जाता है- दो आना पाव की दर से देते। इसी की राब बना कर काथोड़ी अपना पेट भरते। ठेकेदार ऐसा चूरा चावल ट्रकों में भर कर चावल मिलों से लाते और उसे जंगल के अपने गोदामों में रखते।
    कोयला बनाने के काम में न लगे काथोडी जंगल में लकडी काटने का काम करते।
वारली जाति के खेतिहर आदिवासियों के पास बैल गाड़ियां जिससे वे जलावन की
लकड़ी तथा कोयला स्टेशन या बंदरगाह पहुंचाते ।
    जब से अंग्रेजी हुकूमत के नीचे मुंबई फलने-फूलने लगा तब से ठाणा जिला के सवर्ण, कोंकणी-मुसलमान लोगों में से पढे-लिखे तथा अनपढ़ मगर व्यापार बुद्धि से तेज ऐसे लोग जंगल की लकड़ी, कोयला आदि के व्यापार में लग गए तथा जंगल में रहने वाले आदिवासियों को गुलाम बना कर उनका खून चूसकर तगड़े होते गए।
    एक ही उदाहरण देता हूं। लगभग पचास साल पहले, एक व्यक्ति जो एक आना दिहाड़ी
पर मजदूर, दो आना पर हरवाहा और पांच आना रोज पर बैलगाड़ी भाड़े पर चलाने
वाला ,वन प्रदेश में रहने वाला गंवार जब बड़ा धनपशु बन कर मरा तब वह अपने पीछे सैंकड़ों वर्ग मील के जंगल, ३,००० एकड़ धान की खेती, इमारत की लकड़ी तथा कोयला एवं नमक की खेती के धंधे में लगे तीन हजार वारली, काथोड़ी गुलाम और रोकडा मिला कर ५० लाख से भी ज्यादा कीमत की संपत्ति छोड कर गया । लखपति बन कर घूमने लगा तब तक तो वह हस्ताक्षर की जगह अंगूठे का निशान लगाया करता था।
     अब तो हालात बिलकुल बदल गए हैं। लेकिन चालीस साल पहले जंगल के भीतरी भाग
में रहने वाले काथोडियों के हालात ‘अंकल टॉम्स कैबिन’ में वर्णित अमरीका के हब्शियों के जैसे थे। पेड से बांध कर मरते दम तक कोड़े मारना और कोयले की भट्ठी में काथोड़ियों को जिंदा जला देने के किस्से भी हमने सुने थे।

 

१०
    यह काम छोटुभाई ने हाथ में लिया और मानो उन्हें पसंदीदा काम मिल गया। तीन महिने पैदल घूम घूम कर जंगल के एक-एक गांव के हाल जान लिए। आकर बोले:
“स्वामी, आज से हम बन गए मिशनरी।”
    यह मिशन उन्होंने पूरे १० साल चलाया। जब कभी किसी वारली काथोड़ी पर जुल्म
की बात सुनी कि जहां भी खड़े हों वहां से चल देते। जो सामने मिले उसे कहते ,”थोडा आश्रम में जा कर बोल देना या कहलवा देना कि छोटुभाई जंगल की ओर तफ़्तीश करने गए हैं।”
    फिर तो सुबह, शाम, रात, दिन, इक्का, बैलगाडी या पैदल कुछ भी हो, किसी बात
की परवाह न करना। न खाने का ठिकाना, न पीने का। नहाने-धोने, ओढ़ने- बिछाने
का साथ में लेने का तो सवाल ही नहीं खड़ा होता। ठाणा जिला में १२५ इंच से ज्यादा पानी बरसता और गर्मियों में तापमान ११० डिग्री। रात को भी पहाड़ गर्म हवा ऊगलते। ऐसे मौसम में वे दिन रात घूमते। जहां कहीं भी कुछ खाने-पीने को मिल जाता वहां रेगिस्तान के ऊंट की तरह तीन-चार दिन का खाना एक साथ पेट के थैले में भर लेते। नहीं मिला तो भूखे पेट ही रह जाते। भूखे-प्यासे घूमते रहते दो-दो तीन-तीन रोज, कभी कभी तो चार-चार दिनो के बाद बिना नहाए-धोए, बिना हजामत किए, धूल धक्कड से मैले कुचेले कपडों में पहचाने भी न जा सकें ऐसे लैला -मजनूं के भेस में घर लौटते। हम कहते:
“यह कैसे हाल बना कर आए हैं? जरा आईने के सामने खड़े हो कर देखिए तो
सही!” तो कहते:
“अधूरा छोड़ कर कैसे आता? आया हूं सब ठीक करकेड। अब भले ही वे चक्कर लगाते
रहें वकील, अधिकारी और मुंबई के सचिवालय तक का। छोटुभाई का खूंटा गाड़ कर
आया हूं। अब भले ही उसे हिलाते रहे बच्चू, छह-छह महिनों तक।”
एक-एक मामले की छोटी-छोटी बातों की जांच करते। लिफाफे से खत का मजमून
भांप लें। स्टेटमेन्ट लें, एफिडेविट करवाएं, कोई शहर का पढ़ा-लिखा पुलिस
अधिकारी, मेजिस्ट्रेट मिल गया तो उसका पीछा न  छोडें:
“चलो, मिस्टर, इतना स्टेटमेन्ट लेना है, एटेस्टेशन करना है, एफिडेविट करनी है।”
वे ना नुकुर करें तो आंख लाल कर कहें:
“बेटा चढा दूंगा। गलत फहमी मत पालना। यह है आदिवासियों का सोटूकाका। ठीक
से पहचान लो।”
वे थरथर कांपने लगते और गाय की तरह सीधे बन जाते।
बड़े से बड़े सरकारी अधिकारी उनसे डरते। उनके नाम मात्र से भयभीत रहते।
सारे वन इलाके में उनके नाम का डंका बजता।
    १९३७ के बाद राज्य सरकारों की स्थापना हुई। खेर साहब हमारे पुराने साथी
रह चुके थे। अनेक सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए तथा ठाणा आश्रम के भी वे एक ट्रस्टी थे। ठक्कर बापा के साथ मिल कर उन्होंने इस इलाके में ‘आदिवासी सेवा मंडल’ की स्थापना की इससे पहले छोटुभाई ही जंगलवासियों के एक मात्र त्राता थे। उन्होंने दो ही वर्षों में यहां के ठेकेदारों, जमीनदारों तथा उनके चमचे सरकारी अधिकारियों के छक्के छुडा दिए थे।
    दो-तीन साल बाद सरकार बद्ली तो काम थोडा आसान हो गया। मुख्य मंत्री खेर
साहब आदिवासियों के हमदर्द थे। उनके चारों और कार्यकर्ताओं की जमघट लग गई।
जंगल के जुल्म कम हुए। आदिवासियों को भी मजदूरी के रुपए मिलने लगे।
(जारी)

पिछले संस्मरण : एक , दो , तीन

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