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दो बैण्ड का ट्रांजिस्टर और दो पहिए की साइकिल

उत्तर प्रदेश में नगर पालिकाओं द्वारा साइकिल के प्रयोग पर कर लिया जाता था । वाराणसी नगर पालिका से – साईकिल – वर्ष – और लाईसेन्स संख्या वाली लोहे की पतली चादर से कटा टोकन हर साल लेना पड़ता था । हर साल टोकन का रंग बदल जाता था । मसलन यदि पिछले साल हरा था, तो इस साल नीला , अगले साल सलेटी – ताकि आसानी से पहचाना जा सके कि इस साल का टैक्स दिया है अथवा नहीं ।

बहन ने हाई स्कूल पास किया तब उसे एक साईकिल मिली थी – रोवर । बहन पढ़ने चली गई बनारस के बाहर – पहले अनुगुल (ओड़िशा ) फिर कोलकाता के सियालदाह स्थित नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज में । कोलकाता गई तब साईकिल बनारस रह गई । जैसा कि आम तौर पर होता है (जिनके पास छोटी साईकिल नहीं होती  ) वे पहले ’कैची ’ चलाना सीखते हैं । कैंची के बाद सीट पर चढ़ना बहन ने सिखाया था। सिर्फ नाटा होने के कारण ही कैंची चलानी पड़ती है । एक  हाथ हैन्डिल पर , दूसरे कांख के नीचे सीट । सीट पर चलाना कैंची से आसान होता है ।

मैंने शहर में साईकिल चलाना शुरु किया तब की बात है । लाइसेन्स वालों ने पकड़ा और डेढ़ रुपया लेकर कच्ची रसीद थमा दी । शहर में जितनी जगह लाइसेंस देखा जाता था सब जगह यह कच्ची रसीद मान्य थी । बा ने कच्ची रसीद देख कर कहा ,’रियायत नहीं दी है , रिश्वत ली है । चोरों का गिरोह है।’ अब मामला पैसे वापस लेने अथवा उचित शुल्क देकर टोकन हासिल करने का था । बा ने सलाह दी कि सम्पादक के नाम पत्र लिखो । ’जनवार्ता’ को पत्र लिखा । सम्पादक श्यामाप्रसाद ’प्रदीप’ से मिलकर पत्र दिया । वे जेपी आन्दोलन में सक्रिय हुए थे,आपातकाल पर्यन्त जेल रहे तथा जनता पार्टी की सरकार में विधान परिषद में भेजे गये । उन्होंने मेरे पत्र के साथ खुद का लिखा नोट भी छापा । पहली बार छपास सुख मिला । कई बरसों बाद राम इकबाल बरसी ने हमारे एक शिबिर में कहा ,’अखबार में छपने की लालसा लेकर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं कर सकते”। लोहिया रामइकबालजी को पीरो का गांधी कहते थे। इमरजंसी में महेन्द्र दूबे के गांव से गिरफ़्तारी हुई तब नीतीश भी थे। दरोगा जीप नहीं लाया था तो उसकी पीठ पर सवार हो गये थे।एक बार गांव के भूखे लोगों को लेकर थाने गये और थानाध्यक्ष से बोले,’जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है,इनकी जान बचाओ’।

खैर, उस बार जनवार्ता दफ़्तर में मेरे साथ मेरे इतिहास के शिक्षक ओमप्रकाश नारायण गये थे। पहली बार क्लास में आए तब परिचय दिया था,’मैं ओमप्डकाश,बिहाड़ के साडंग जिले का हूं,जहां के बाबू डाजेन्दड प्डसाद थे’।उनके उच्चारण पर भले ही तब खीसें निपोरी हों लेकिन जब उन्होंने एक परीक्षा में प्रश्न दिया,’राजा राममोहन राय से राममनोहर लोहिया तक के दस समाज सुधारकों के नाम लिखो’ तब आनन्द आ गया था। सवाल के काव्यात्मक गठन मात्र से नहीं । स्कूली पढ़ाई में लोहिया का जिक्र करने वाले शिक्षक को पाकर हम खुद को भाग्यवान समझते थे। स्कूल की मास्टरी छोड़कर ओमप्रकाशजी बिहार की प्रशासनिक सेवा में चले गये ।

अखबार में पत्र छपने के बाद कच्ची रसीद लौटा कर,शेष दो रुपये पचास पैसे दिए-टोकन और पक्की रसीद हासिल की। शहर में कच्ची रसीद की प्रथा कुछ समय रुक गई थी। कई वर्षों बाद हमारे युवा संगठन ने एक प्रस्ताव पारित किया -’यदि केन्द्र सरकार ने दो बैण्ड के ट्रांजिस्टर पर लाइसेन्स शुल्क लेना बन्द कर दिया है तो  दो चक्के की साइकिल पर शुल्क लेना राज्य सरकार बन्द करे। ” सूबे की सरकार ने साइकिल पर कर लेना उसी बजट से बन्द किया ।

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चिपलूणकर और सलीम ख़ान का मेरे ब्लॉग पर मेल

१९९२ के दौर में वाराणसी के तीन भिन्न – भिन्न विचारधाराओं से जुड़े़ तीन समूहों ने महसूस किया था कि साम्प्रदायिकता के बारे में एक समझदारी बना कर साथ – साथ लोगों के बीच जाना होगा । समझदारी बनाने के क्रम में हमने तीन लम्बे सत्रों में चर्चा की तथा साझा समझदारी के आधार पर एक परचा तैयार किया ।

पिछले दिनों ब्लॉग जगत में साम्प्रदायिक आधार पर परस्पर वैमनस्य फैलाने वाली पोस्टों की बाढ़ आई हुई है । मैंने १९९२ में प्रकाशित उपर्युक्त परचे को अपने ब्लॉग में दो हिस्सों में छापा । परचे की खूबी लाजमी तौर पर यह थी कि गैर साम्प्रदायिक बहुमत को वह पसन्द आता तथा फिरकापरस्ती पर जिन्दा लोगों को उससे परेशानी होती । ब्लॉग जगत में ऐसा ही हुआ। १३ लोगों की कुल १४  टिप्पणियाँ आईं । ७ टिप्पणीकर्ता परचे की बातों से पूरी तरह सहमत थे और ६ के गले में बातें उतरने में दिक्कत हो रही थी । अनिल पुसादकर की टिप्पणी ने मुझे भाव विह्वल कर दिया । रामकुमार अंकुश , दिनेश द्विवेदी ,रवि कुमार , वीरेन्द्र जैन ,लोकसंघर्ष और निर्मला कपिला ने इस विषय पर सहज सामान्य समझदारी से मानो देश की समझदारी की नुमाईन्दगी की ।

हमारी बात चिपलूणकर और सलीम खान जैसे  ६ पाठकों के  गले उतरने में दिक्कत हो रही थी शायद उन्हें  मरचा लग रहा था । उस परचे का मुकाबला करने में सलीम खान ने कहा,’सुरेश चिपलूणकर के पहले दो पैरा से सहमत.’ इस तरह की सहमती का जिक्र कहानियों और नाटकों में पढ़ते वक्त मुझे अतिरंजना लगती थी लेकिन ऐसा सोचना गलत था ।

राही मासूम रजा की एक कहानी में मस्जिद के आहाते में सूअर का गोश्त डालने वाले मुस्लिम अपराधी और मन्दिर में गोमांस डालने वाले हिन्दू अपराधी का भी जिक्र चौंकाता है लेकिन जिन्हें साम्प्रदायिकता की आग लगानी होती है वे यह सब भी कर सकते हैं । एक बार मेरी एक ही पोस्ट पर ’रमेश’ और ’पीटर ’ ने एक ही IP पते से टिप्पणियाँ की थीं ।

ओड़िया में एक कहावत है : माँ कहती है , ’ रसोई घर में कौन है ?’ बेटा जवाब देता है , ’ मैंने केला नहीं खाया’ ।

अब हम आते हैं कांग्रेस की साम्प्रदायिकता की बाबत । कांग्रेस द्वारा साम्प्रदायिक उन्माद के आधार पर सबसे बड़ी चुनावी सफलता इन्दिराजी की हत्या के बाद हुए चुनावों में हासिल की गई थी। राजीव गांधी ने भिण्डरावाले को पंजाब के किसान आन्दोलन और अकालियों के मुकाबले खड़ा करने के लिए ’सन्त’ का दरजा दिया  । भिण्डरावाले द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध तमाम विष वमन के बावजूद पंजाब में सिखों द्वारा हिन्दू विरोधी दंगे नहीं हुए । हरमन्दर साहब में फौज भेज कर इन्दिरा गांधी ने अटल बिहारी सरीखों की वाहवाही पाई वहीं सिखों के हृदय पर एक गहरा जख़्म लगाया । इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने पूरे सिख समुदाय को ’गद्दार’ कहते हुए चुनाव लड़ा । पूरे देश में निर्दोष सिखों की हत्याएं हुई और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान लूटे गये।पहली बार प्रचार में लाई गई विदेशी कम्पनी रीडिफ़्यूजन के पूरे पन्ने के विज्ञापनों में कहा जाता ,’क्या आप चाहते हैं कि देश की सीमायें आप के घर की चाहरदीवारी तक सिकुड़ जाएं?’ इस चुनाव में कांग्रेस के अब तक के सर्वाधिक बड़े बहुमत(करीब अस्सी फीसदी सीतें) से जीती । भारतीय जनता पार्टी(जिसमें जन संघ पृष्टभूमि के लोग शामिल थे) लोक सभा  में मात्र दो सीटें जीत पाई । पता चला कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उस चुनाव में लगा कि ’हिन्दू हित’ तो कांग्रेस देख रही है । पूरे देश में ’अपनेजी’ लोगों को ’आदेश-निर्देश’ दे दिए गए !  पहले आम चुनावों से जम्मू की जिन सीटों पर हमेशा जनसंघ जीतती आई थी वहाँ भी कांग्रेस जीती । यह है मौसेरे भाइयों का रिश्ता ।

१९६७ में डॉ. लोहिया ने कहा था कि भाकपा की एक पहाड़ गद्दारी से कांग्रेस की एक बूँद गद्दारी और जनसंघ की एक पहाड़ फिरकापरस्ती से कांग्रेस की एक बूँद फ़िरकापरस्ती ज्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है ।

कुछ लोग बहुसंख्यकों का मानो ठीका लिए हुए हैं और हमारे मित्र संजय बेंगाणी की तरह कहते हैं,’ जिम्मेदारी मात्र बहुसंख्यकों के सर डाली जा रही है.’(’ जब मार पड़ी शमशेरन की तो कहें, ’ महाराज मैं नाऊ’ की तरह कभी संजय जैन भी हो जाता है) दरअसल देश की गंगा जमुनी तहजीब में यक़ीन रखने वाले बहुसंख्यक समुदाय को इन बातों को समझने में दिक्कत नहीं होती है वे इसे आत्मसात किए हुए है। देश में फिरकापरस्तों का जो  अल्पमत है उसे जरूर दिक्कत आती है , चाहे वे खुद को हिन्दू कहने का दावा करते हों अथवा मुसलिम ।

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