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‘भारतीय जनता की मां को श्रद्धांजलि / सुभाषचन्द्र बोस’

पिछले साल किसी ने भारत सरकार से पूछा ,’भारत का कोई राष्ट्रपिता भी है ?’ अधिकारिक तौर पर जवाब मिला कि सरकार ने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया। सरकार के जवाब से उत्साहित होकर कुछ लोगों ने इसका खूब प्रचार किया । सरकार अगर प्रश्नकर्ता को सही जवाब देना चाहती तो उसे राष्ट्रीय आन्दोलन की दो विभूतियों को तरजीह देनी पड़ती। पहले व्यक्ति वे जिन्होंने किसी को राष्ट्रपिता कहा और दूसरे वे जिन्हें यह संबोधन दिया गया।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने बर्मा से राष्ट्र के नाम रेडियो-प्रसारण में ‘चलो दिल्ली’ का आवाहन किया और वैसे ही एक प्रसारण में गांधीजी को राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया। यहां नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का २२ फरवरी का बयान पुनर्प्रकाशित कर रहा हूं। इस बयान में उन्होंने कस्तूरबा को ‘भारतीय जनता की मां’ कहा है।
(२२ फरवरी , १९४४ को श्रीमती कस्तूरबा गांधी के निधन पर दिया गया वक्तव्य)

    श्रीमती कस्तूरबा गांधी नहीं रहीं । ७४ वर्ष की आयु में पूना में अंग्रेजों के कारागार में उनकी मृत्यु हुई । कस्तूरबा की की मृत्यु पर देश के अड़तीस करोड़ अस्सी लाख और विदेशों में रहने वाले मेरे देशवासियों के गहरे शोक में मैं उनके साथ शामिल हूं । उनकी मृत्यु दुखद परिस्थितियों में हुई लेकिन एक गुलाम देश के वासी के लिए कोई भी मौत इतनी सम्मानजनक और इतनी गौरवशाली नहीं हो सकती । हिन्दुस्तान को एक निजी क्षति हुई है । डेढ़ साल पहले जब महात्मा गांधी पूना में बंदी बनाए गए तो उसके बाद से उनके साथ की वह दूसरी कैदी हैं , जिनकी मृत्यु उनकी आंखों के सामने हुई । पहले कैदी महादेव देसाई थे , जो उनके आजीवन सहकर्मी और निजी सचिव थे। यह दूसरी व्यक्तिगत क्षति है जो महात्मा गांधी ने अपने इस कारावास के दौरान झेला है ।
    इस महान महिला को जो हिन्दुस्तानियों के लिए मां की तरह थी , मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और इस शोक की घड़ी में मैं गांधीजी के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं । मेरा यह सौभाग्य था कि मैं अनेक बार श्रीमती कस्तूरबा के संपर्क में आया और इन कुछ शब्दों से मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगा । वे भारतीय स्त्रीत्व का आदर्श थीं , शक्तिशाली, धैर्यवान , शांत और आत्मनिर्भर। कस्तूरबा हिन्दुस्तान की उन लाखों बेटियों के लिए एक प्रेरणास्रोत थीं जिनके साथ वे रहती थीं और जिनसे वे अपनी मातृभूमि के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मिली थीं । दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के बाद से ही वे अपने महान पति के साथ परीक्षाओं और कष्टों में शामिल थीम और यह सामिप्य तीस साल तक चला । अनेक बार जेल जाने के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ लेकिन अपने चौहत्तरवे वर्ष में भी उन्हें जेल जाने से जरा भी डर न लगा । महात्मा गांधी ने जब भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया,उस संघर्ष में कस्तूरबा पहली पंक्ति में उनके साथ खड़ी थीं हिन्दुस्तान की बेटियों के लिए एक चमकते हुए उदाहरण के रूप में और हिन्दुस्तान के बेटों के लिए एक चुनौती के रूप में कि वे भी हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में अपनी बहनों से पीछे नहीं रहें ।
    कस्तूरबा गांधी

    कस्तूरबा गांधी


    कस्तूरबा एक शहीद की मौत मरी हैं । चार महीने से अधिक समय से वे हृदयरोग से पीड़ित थीं । लेकिन हिन्दुस्तानी राष्ट्र की इस अपील को कि मानवता के नाते कस्तूरबा को खराब स्वास्थ्य के आधार पर जेल से छोड़ दिया जाए , हृदयहीन अंग्रेज सरकार ने अनसुना कर दिया । शायद अंग्रेज यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि महात्मा गांधी को मानसिक पीड़ा पहुंचा कर वे उनके शरीर और आत्मा को तोड़ सकते थे और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर सकते थे । इन पशुओं के लिए मैं केवल अपनी घृणा व्यक्त कर सकता हूं जो दावा तो आजादी , न्याय और नैतिकता का करते हैं लेकिन असल में ऐसी निर्मम हत्या के दोषी हैं । वे हिन्दुस्तानियों को समझ नहीं पाए हैं । महात्मा गांधी या हिन्दुस्तानी राष्ट्र को अंग्रेज चाहे कितनी भी मानसिक पीड़ा या शारीरिक कष्ट दें , या देने की क्षमता रखें, वे कभी भी गांधीजी को अपने अडिग निर्णय से एक इंच भी पीछे नहीं हटा पाएंगे । महात्मा गांधी ने अंग्रेजों हिन्दुस्तान छोड़ने को कहा और एक आधुनिक युद्ध की विभीषिकाओं से इस देश को बचाने के लिए कहा । अंग्रेजों ने इसका ढिठाई और बदतमीजी से जवाब दिया और गांधीजी को एक सामान्य अपराधी की तरह जेल में ठूस दिया । वे और उनकी महान पत्नी जेल में मर जाने को तैयार थे लेकिन एक परतंत्र देश में जेल से बाहर आने को तैयार नहीं थे । अंग्रेजों ने यह तय कर लिया था कि कस्तूरबा जेल में अपने पति की आंखों के सामने हृदयरोग से दम तोड़ें । उनकी यह अपराधियों जैसी इच्छा पूरी हुई है , यह मौत हत्या से कम नहीं है । लेकिन देश और विदेशों में रहने वाले हम हिन्दुस्तानियों के लिए श्रीमती कस्तूरबा की दुखद मृत्यु एक भयानक चेतावनी है कि अंग्रेज एक-एक करके हमारे नेताओं को मारने का ह्रुदयहीन निश्चय कर चुके हैं। जब तक अंग्रेज हिन्दुस्तान में हैं , हमारे देश के प्रति उनके अत्याचार होते रहेंगे। केवल एक ही तरीका है जिससे हिन्दुस्तान के बेटे और बेटियां श्रीमती कस्तूरबा गांधी की मौत का बदला ले सकते हैं, और वह यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य को हिन्दुस्तान से पूरी तरह नष्ट कर दें। पूर्वी एशिया में रहने वाले हिन्दुस्तानियों के कंधों पर यह एक विशेष उत्तरदायित्व है , जिन्होंने हिन्दुस्तान के अंग्रेज शासकों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया है। यहां रहने वाले सभी बहनों का भी उस उत्तरदायित्व में भाग है । दुख की इस घड़ी में हम एक बार फिर उस पवित्र शपथ को दोहराते हैं कि हम अपना सशस्त्र संघर्ष तब तक जारी रखेंगे , जब तक अंतिम अंग्रेज को भारत से भगा नहीं दिया जाता ।
    (नेताजी संपूर्ण वांग्मय,पृ.१७७,१७८,टेस्टामेंट ऑफ सुभाष बोस, पृ. ६९-७० )

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भारत को इंगलैण्ड-अमरीका जैसा बनाने का मतलब/ गांधी

गांधी की कलम सेः

  1. “…..भारत को इंगलैण्ड और अमरीका के जैसा बनाने का मतलब है ऐसे नए देशों की तलाश करना जिनका शोषण किया जा सके । अभी तक तो लगता है कि पश्चिमी राष्ट्रों ने योरोप के बाहर के देशों का , शोषण के लिए , आपस में बंटवारा कर लिया है और तलाश किए जाने के लिए कोई देश नहीं बचे हैं । भारत द्वारा पश्चिम की अंधी नकल करने के प्रयास का क्या हश्र हो सकता है ? निश्चय ही पश्चिम में औद्योगीकरण और शोषण का बाहुल्य रहा है । जब जो लोग इस रोग से ग्रसित हैं वही इसका निदान नहीं कर सके हैं तो हम जैसे अनाड़ी इनसे बच सकने की आशा कैसे कर सकते हैं ?”….. यंग इण्डिया, 7-10-1927, पृष्ट (348) (अंग्रेजी से)
  2. ” ईश्वर न करे कि भारत में भी कभी पश्चिम जैसा औद्योगीकरण हो । एक छोटे टापू – देश ( इंगलैण्ड ) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने ही सारे विश्व को बेड़ियों में जकड़ दिया है । अगर तीस करोड़ की जनसंख्या वाला पूरा राष्ट्र इस प्रकार के आर्थिक शोषण की राह पर चले तो वह सारे विश्व को चूस कर सुखा देगा । ” यंग इण्डिया , 20-122-1928, पृष्ट 422.
  3. ” पंडित नेहरू चाहते हैं कि औद्योगीकरण हो क्योंकि वह समझते हैं कि अगर इसका सामाजीकरण कर दिया जाए तो यह पूंजीवादी विकारों से मुक्त हो सकता है । मेरा अपना ख्याल है कि ये विकार औद्योगीकरण का ही हिस्सा हैं और किसी भी सीमा तक किया हुआ सामाजीकरण इनको समाप्त नहीं कर सकता । हरिजन , 29-9-1940,पृष्ट 299.

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कोंकण-केरलम-आसमान / स्लाईड्स

‘ मातृभूमि ’ केरल का एक प्रमुख दैनिक है । केरल के नौ शहरों के अलावा यह मुम्बई , चेन्नै , बंगलूरू और दिल्ली से भी छपता है । ७५ वर्ष पूर्व महात्मा गांधी अपने केरल प्रवास के दौरान इस अखबार के दफ़्तर में आये थे । इस स्मृति को अखबार वर्ष पर्यन्त भिन्न भिन्न शहरों में मना रहा है । हर महीने की १३ तारीख को इसका आयोजन होता है । उस इलाके के स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान होता है और सभा होती है । १३ जनवरी ,२०१० इतिहासकार-लेखक श्री राजमोहन गांधी ने इस वर्ष पर्यन्त आयोजन का उद्घाटन किया ।
१३ फरवरी को कण्णूर में आयोजित जलसे में ’मातृभूमि’ ने मुझे बुलाया था । इस न्यौते को कबूलते हुए मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा था। कण्णूर के टाउन हॉल में १९२४ से अब तक की ’मातृभूमि’ की यात्रा की एक प्रदर्शनी आयोजित थी । यह प्रदर्शनी एक अखबार के सफ़र के साथ साथ राष्ट्रीय आन्दोलन का जीवन्त दस्तावेज बन गई है ।
मातृभूमि के वर्तमान प्रबन्ध निदेशक श्री एम.पी. वीरेन्द्रकुमार कोज़िकोड़ के पूर्व सांसद हैं और एक समाजवादी नेता हैं । प्लाचीमाड़ा में कोका – कोला विरोधी संघर्ष के दौरान मेरा उनसे सम्पर्क हुआ था ।
मातृभूमि के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के अलावा समाजवादी जनपरिषद की केरल इकाई के साथियों ने कण्णूर और कोझिकोड जिले में मेरे कई कार्यक्रम आयोजित किए ।
सभी कार्यक्रमों की बाबत अलग – अलग पोस्ट लिखूंगा । यह चित्र प्रदर्शनी ’शैशव’ के लिए विशेष । कोंकण और केरल का सौन्दर्य तथा हवाई जहाज से देश – दर्शन करते वक्त मुझे लगा कि भूगोल की स्कूली पढ़ाई के कितने तथ्य इन दृश्यों से सगुण रूप से जज़्ब होते हैं । मालाबार तट और कोंकण की खूबसूरती , केरल का सौन्दर्य और राजनैतिक जागरूकता , अरब सागर – नदियों-मेघ और अरावली पर्वतमाला से बना वृष्टि-छाया प्रदेश ।

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भणसाळीकाका : ले. नारायण देसाई

एक बार काका ने सेवाग्राम – आश्रम का वर्णन ‘ गांधीजी का प्राणि – संग्रहालय’ ( गांधीजीज मिनाझरी)   इस शब्दों में किया था। बापू के आसपास हमेशा अजीब तरह के लोग जमा हो जाते थे । कभी – कभी सरदार कुछ पर चिढ़ भी जाते थे । काका हँसकर कहते थे , ‘ बापू तो डॊक्टर हैं,डॊक्टर के आसपास मरीज तो रहेंगे ही न ? ‘

    सारे आश्रमवासियों की सभी विचित्रताओं का वर्णन करने का मेरा इरादा नहीं है , और उतना सामर्थ्य भी नही है । साबरमती-आश्रम में एक सज्जन तो ऐसे थे कि गिनकर ५५ रोटियाँ खा जाते । भूल से ५४ रखी गयी हों तो जोर से चिल्लाकर कहते , ‘ तुम कैसे कंजूस हो ! हमें भूखा मारना है ?’ और गलती से ५६ रोटियाँ परोसी जाँय तो तपाक से कहते , ‘ वाह तुमने क्या हमको राक्षस समझ रखा है ?’ इस तरह इनकी हालत भूखे मरनेवाले आदमी और राक्षस के बीच की पतली दीवार जैसी थी ।

    दूसरे एक सज्जन सेवाग्राम-आश्रम में ऐसे थे , जिनके साथ मेरा निम्न संवाद हुआ –

    ‘ क्योंजी , आजकल क्या प्रयोग चल रहा है ? ‘

    ‘ प्रयोग तो हमारा कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है । आजकल पानी का प्रयोग चल रहा है ।’

    ‘ क्या पानी उबालकर पीते हैं ‘ या जल-चिकित्सा चल रही है ? ‘

    ‘ नहीं भैया , खाने-पीने के प्रयोग के सम्बन्ध में चर्चा नहीं कर रहा । इस बार तो शौच के पानी का प्रयोग है । ‘

    ‘ यानी ? ‘

    ‘ यानी शौच के लिए जो पानी व्यवहार करते हैं , वह कैसे कम हो इसका प्रयोग कर रहा हूँ । ‘

    ‘ अच्छा ! ‘

    ‘ हाँ , घटाते – घटाते पाँच तोले तक पहुँचा हूँ । अपने देश के अनेक भागों में पानी की बड़ी कमी रहती है । इसमें अगर हम पानी बचा सकें तो …’

    मैंने अपनी बालसुलभ उद्दंडता का लाभ लेकर उस भाई की बात बीच में ही काटकर कहा , ‘ हाँ , बैलों को तो पानी की जरूरत ही नहीं पड़ती । ‘

    सेवाग्राम के आश्रमवासियों की ऐसी सारी विचित्रताओं के बावजूद एक बात उन सबमें समान थी, बापू के प्रति भक्ति । इसी एक तत्त्व के कारण वे आश्रम में टिक सके । इसी तत्त्व के परिणामस्वरूप सब आश्रमवासियों में एक परिवार-भावना का उदय हुआ और वह भावना वृद्धिंगत होती गयी । आज भी एक-दूसरे से बहुत दूर गए हुए दो आश्रमवासी दीर्घ अवधि के बाद जब भी मिलते हैं , तब अलग पड़े हुए स्वजन बहुत दिनों के बाद मिलने पर जिस आत्मीयता का और प्रेम का अनुभव करते हैं , वैसा ही अनुभव ये आश्रमवासी करते हैं ।

    विचित्रताओं के साथ – साथ हरएक आश्रमवासी की विशेषता भी कम नहीं थीं । इनमें से कुछ लोगों के साथ रहने का मौका मिलना एक अपूर्व सौभाग्य ही था । ये आश्रमवासी स्वतन्त्रता की लड़ाई में बापू की वानर-सेना के सिपाही थे और शिवजी की बारात जैसे थे ।

    यहाँ एक ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में लिखूँगा , जो विचित्रता के साथ – साथ विशेषताओं से भी परिपूर्ण थे । वैसे वे खुद छिपकर रहनेवालों में से थे लेकिन इतिहास में कम-से-कम एक बार तो उन्होंने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया था । वे व्यक्ति हैं आचार्य भणसाळी । हम सबके लाड़ले भण्साळीकाका ।

     एक दृश्य । किला सोनगढ़ गाँव का एक सुनसान मकान । उसमें आधा पागल और आधा साधु जैसा दीखनेवाला एक आदमी पड़ा था । एक समाजसेवक वहाँ पहुँचा ।

    ‘ ओहो ! भणसाळीभाई ! आपकी यह हालत ? ‘ जवाब में भणसाळीकाका ने सप्त स्वर में अट्टहास किया । लेकिन मुँह से एक शब्द भी नहीं बोले । समाज-सेवक ने उनके दोनों पाँवों के तलवों से बीस-बीस,पचीस -पचीस काँटे निकाले । उनके जख्मों को धोकर ,पीप निकालकर साफ कर दिया । ‘ यहाँ कुछ दिन आराम करो । ‘ समाज-सेवक ने विनती की । लेकिन साधु तो चलता ही भला । फिर पाँवों में से काँटे भी तो निकल चुके थे ।

    ‘ लेकिन आप बोलते क्यों नहीं ? ‘ कागज – पेन्सिल लेकर भणसाळीकाका ने लिख दिया , ‘ बारह साल का मौन लिया है । ‘

    ‘ बारह साल ! ‘

    भणसाळीकाका के पास छोटा आँकड़ा कभी था ही नहीं । प्रथम बार अनशन किया ४० दिनों का । दूसरी बार किया ५५ दिनों का और तीसरी बार किया आष्टी-चिमूर के अत्याचारों के निषेध में ६३ दिनों का देशविख्यात उपवास ।

    थोर की बाड पर से कूदने के प्रयोग के कारण उनके शरीर में फोड़े हो गये थे । भणसाळीकाका साबरमती-आश्रम से वर्धा के लिए निकले थे । ५५ दिनों के  अनशन  में मानसिक अस्थिरता आ गयी । फिर हिमालय तक पैदल सफर और और बारह वर्ष का मौन । देश की सही परिस्थिति का दर्शन उनको इस यात्रा में हुआ ।

    हिमालय से वापस आते समय राजस्थान के एक देहात में बैल जहाँ बाँधते हैं , ऐसे बाड़े में उनको ठहरने कि जगह मिली । रात में जानवर का पाँव लगा । भणसाळीकाका के मुँह से अचानक शब्द निकला ‘ कौन ? ‘ तुरंत उनके ध्यान में आ गया कि मौन टूटा। 

 फिर सोचने लगे कि कई ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि रात में नींद में भी मौन न टूटे । तरकीब तो सूझी, लेकिन उसको अमल में लाने वाला तरीका  उनको मिला ध्रांगध्रा में । एक सुनार ने ताँबे का तार गरम करके लाल किया और भणसाळी्काका के दोनों होठों को सिल कर तार मोड़ दिया । भणसाळीकाका ने उस सुनार के उपकार माने। इसी सुनार ने प्रवाही पदार्थ मुँह में डालने के लिए एक फनेल भी बना दी । उन दिनों वे कच्चा आटा और कड़वे नीम के पत्ते खाते थे । आटा पानी में घोलकर चूस लेते थे । नीम की पत्तों को मुँह के कोने से अन्दर घुसा देते थे । साबरमती में आश्रम में बापू के साथ भेंट हुई , तब होठों के तार कटवा दिये । यह दूसरा दृश्य । ( अगली प्रविष्टी में जारी ) 

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बापू की गोद में : कुछ चित्र

परचुरे शास्त्री की सेवा परपीड़ा

गांधीजी और महादेवठ??ई महादेवभाई और गांधीजी

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बापू की गोद में : प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी

    श्री नारायण देसाई कि ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ मूल गुजराती में पढ़ी । एक अनूठी कलाकृति है । उसमें आत्मकथा की सजीवता और प्रतीति है , फिर भी अहन्ता का दर्प नहीं है । जिन घटनाओं और परिस्थियों का वर्णन इस छोटी-सी पुस्तक में है , उनके साथ लेखक का घनिष्ठ और प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहा है । वह केवल एक तटस्थ प्रेक्षक नहीं रहा है । कई प्रसंगों में उसकी अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण है । परन्तु अन्य व्यक्तियों की भूमिका का चित्रण करने में उसने अपने को गौण स्थान ही दिया है । लेखक की सदभिरुचि का यह द्योतक है ।

     ‘मोहन और महादेव’ इस सुन्दर पुस्तक की दो विभूतियाँ हैं । ‘हरि-हर’ की तरह उनका विभूतिमत्त्व अविभाज्य है । अनेक घटनाओं और प्रसंगों के चित्रण में नारायणभाई ने उस विभूतिमत्त्व की जो झाँकियाँ दिखाई हैं , वे नितान्त मनोज्ञ हैं । ‘साबरमती’ और ‘सेवाग्राम’ आधुनिक भारत के विश्व-तीर्थ माने जाते हैं। वहाँ के आन्तरिक जीवन के जो दर्शन इस पुस्तक में कराये गये हैं , वे हृदयस्पर्शी हैं । नारायणभाई की भाषा में एक अन्लंकृत लावण्य है ।

    पृष्ठ २३ पर लेखक के मानस पर जो छाप पड़ी , उसकी उपमा उसने कृष्णपक्ष के नभोमण्डल से दी है । पुस्तक में करुण , उदात्त आदि रसों के साथ-साथ ऋजु और सौजन्ययुक्त विनोद की छटाएँ भी हैं , जो उसे अधिक चित्ताकर्षक बनाती हैं
लेखक की सहृदयता की छाप तो पृष्ट-पृष्ट पर है ।

    इस पुस्तक का हिन्दी-भाषान्तर हमारे मित्र श्री दत्तोबा दास्ताने ने किया है । दत्तोबा का ‘उपनयन’ पवनार के सन्त ने किया है । उनके जीवन में जो संस्कारिता और प्रगल्भता है , वह विनोबा के साथ दीर्घ-सहवास का परिपाक है। नारायणभाई को भाषान्तरकार भी समानशील मिले । पाठक की दृष्टि से यह बड़ा शुभ संयोग है। गांधी की विभूति की विविधता की झाँकी जो देखना चाहते हों , उनके लिए यह पुस्तक निस्सन्देह उपादेय है ।

शिवकुटी , माउण्टआबू

२० – १ – ‘६९                                                                  – दादा धर्माधिकारी

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बापू की गोद में : प्रकाशकीय

वर्षों पूर्व ‘जन्मभूमि’ गुजराती – पत्र में प्रतिसप्ताह ‘स्वातंत्र्य संग्रामनी गाथा’ स्तम्भ में श्री नारायणभाई ने बापू के सम्बन्ध में धारावाहिक रूप में संस्मरण लिखे थे , जो बाद में ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशित हो गये । सौभाग्य से आज वे हिन्दी में रूपान्तरित होकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हैं । २२ प्रकरणों की यह छोटी-सी पोथी गांधीजी के अनेक अनजाने अलौकिक गुणों पर प्रकाश डालती है । प्रस्तुत संस्मरणों की विशेषता श्री दादा धर्माधिकारी ने प्राक्कथन में लिपिबद्ध कर दी है । संस्मरण तो अनूठे हैं ही , लेखक की साहित्यिक प्रतिभा ने उन्हें रसाप्लुत भी बना दिया है ।

    गांधी – शताब्दी के शुभ -अवसर पर हमें इस पुस्तक के प्रकाशन का सुअवसर मिला था । अब हम इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्र्काशित कर यह आशा करते हैं कि पाठकों को प्रथम संस्करण की भाँति निश्चय ही यह रोचक और उद्बोधक सिद्ध होगा। गुजराती-भाषी जनता ने जिस प्रकार इस श्रेष्ठ रचना का आदर किया है , हम समझते हैं कि कि हिन्दी-भाषी जनता भी इसमें पीछे नहीं रहेगी । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता का हिन्दी-रूपान्तर करने में श्री भवानीप्रसाद मिश्र ने सहयोग दिया, अत: हम उनके आभारी हैं ।

         – सर्व सेवा संघ प्रकाशन , राजघाट , वाराणसी-२२१००१.

(जून १९९६)

    

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