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सरकारी पदाधिकारियों से निवेदन किया अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढाएं, इलाज सरकारी अस्पतालों में कराएँ

इटारसी, 27 जनवरी 2014.
होशंगाबाद जिले के नागरिकों ने एक अनूठी मांग करते हुए आज इटारसी में एक नया अभियान शुरू किया. उन्होंने एक जुलुस निकाला, तहसील दफ्तर गए और सरकार में बैठे तमाम पदाधिकारियों को संबोधित एक निवेदन सौंपा. इसमें अनुरोध किया गया कि आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजें और अपने परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल में कराएँ. क्योंकि इनकी हालत सुधारने का और कोई तरीका नहीं है. जबसे बड़े और प्रभावशाली लोगों के परिवारों ने सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में जाना बंद कर दिया है तब से इनकी हालत बिगड़ती गई है. इससे साधारण जनता अच्छी शिक्षा और इलाज से वंचित हो गई है. यदि सत्ता में बैठे लोग इनका उपयोग करेंगे तो उन्हें इनकी दुर्दशा का अहसास होगा और इनकी हालत सुधारने का दबाव बनेगा. जब उनके बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी और उनके परिवारों का इलाज ठीक से नहीं होगा व उन्हें सरकारी अस्पतालों की बुरी हालत का शिकार होना पड़ेगा तब उन्हें समझ में आयेगा.

यह निवेदन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, तमाम बड़े अफसरों, जिला कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदारों सबको संबोधित था. इस मौके पर एक परचा भी बांटा गया जिसमे शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के तमाम क्षेत्रों में भेदभाव तथा गैरबराबरी का विरोध किया गया. इसमें पडोसी स्कूल पर आधारित साझा-समान स्कूल प्रणाली की मांग की गई जिसमे अमीर-गरीब सब बच्च्चे एक ही स्कूल में पढ़ें. शिक्षा और चिकित्सा के बाजारीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को रोकने की भी मांग की गई. इसी के साथ ‘भेदभाव विरोधी अभियान’ की शुरुआत हुई.

जुलुस में नारे लगाए जा रहे थे—‘राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’, ‘सबकी शिक्षा एक समान, मांग रहा है हिंदुस्तान’, ‘शिवराज अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढाओ’, ‘सरकारी डाक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस बंद करो’ आदि.

इस मौके पर अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष मंडल के सदस्य श्री सुनील ने कहा कि कल ही हमने देश का चौवनवा गणतंत्र दिवस मनाया. लेकिन संविधान में दर्ज समानता और जिन्दा रहने का अधिकार देश की जनता को आज तक नहीं मिल पाया. शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार के बिना लोग जिन्दा कैसे रहेंगे? उन्होंने खंडवा कलेक्टर को बधाई दी जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हैं. सेवानिवृत शिक्षिका दीपाली शर्मा, जिला पंचायत सदस्य श्री फागराम, अधिवक्ता श्री ओमप्रकाश रायकवार, शिक्षक श्री ब्रजमोहन सोलंकी, नारी जागृति मंच की पुष्पा ठाकुर, ममता सोनी, ममता मालवीय और प्रतिभा मिश्रा, ‘आप’ पार्टी के श्री गुप्ता आदि कई लोग बड़ी संख्या में इसमें शामिल हुए. उन्होंने इस ‘भेदभाव विरोधी अभियान’ को आगे बढाने का संकल्प लिया. सञ्चालन जिला शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष श्री राजेश व्यास ने किया.

इस कार्यक्रम का आयोजन जिला शिक्षा अधिकार मंच और नारी जागृति मंच ने मिलकर किया था.

राजेश व्यास,

अध्यक्ष, जिला शिक्षा अधिकार मंच

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सस्ती नैनो – मंहगा खेल

कुछ बरस पहले भारत के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने यह घोषणा करके धमाका -सा किया था कि वे भारत के निम्न मध्यम वर्ग के लिए एक लाख रु. वाली कार बनाएंगे। यह दुनिया की सबसे सस्ती कार होगी और सबसे कम ईंधन-खर्च वाली कार होगी। इसे ‘नैनो’ नाम दिया गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है सूक्ष्म या अति सूक्ष्म। अभी तक इसका उपयोग एक तरह की नवीनतम तकनालॉजी – ‘नैनो टेक्नोलॉजी’- को बताने के लिए किया जाता रहा है।
इस लखटकिया कार को पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के चमत्कार के रुप में पेश किया गया। किस तरह से इनके फायदे धीरे-धीरे नीचे तक पहुंचेंगे, इसकी मिसाल के रुप में भी इसे पेश किया गया। किन्तु पश्चिम बंगाल में इस नैनो कार के कारखाने के लिए कोलकाता से 45 कि.मी. दूर सिंगूर नामक स्थान पर जब किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाने लगा, तो जबरदस्त विरोध खड़ा हो गया। टाटा की नैनो कार परियोजना विवादों में फंस गई। जहां पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार इसे वहां के औद्योगीकरण का एक महत्वपूर्ण सोपान मान रही थी, वहीं कई लोगों ने औद्योगीकरण के इस समूचे मॉडल पर ही सवाल खड़े किए। सिंगूर और नन्दीग्राम आधुनिक भारत में विकास और औद्योगीकरण से जुड़े द्वन्द्व तथा संघर्षों का प्रतीक बन गए।
आखिरकार टाटा को सिंगूर से इस कारखाने को हटाने और गुजरात ले जाने का फैसला करना पड़ा। बाद में धीरे-धीरे यह तथ्य सामने आने लगा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने इस परियोजना के लिए कितने बड़े पैमाने पर अनुदान, करों में छूट और मदद देने का समझौता किया था। इस गजब की सस्ती कार के ‘सस्तेपन’ के रहस्य की परतें अब धीरे- धीरे खुल रही हैं।
टाटा के इस नैनो कारखाने को अपने राज्य में लगवाने के लिए राज्य सरकारों में होड़ लगी थी। सबसे पहले टाटा ने इस कारखाने को उत्तराखंड राज्य में पंतनगर में लगाने का फैसला किया था। दरअसल केन्द्र सरकार ने उत्तर-पूर्व के पिछड़े राज्यों में उद्योगों को  प्रोत्साहन देने के लिए 1999 में करों में छूट की एक विशेष योजना शुरु की थी। बाद में, 2003 में इसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के लिए भी लागू कर दिया गया। इसके तहत दो तरह की छूट दी जाती है – (1) व्यवसायिक उत्पादन शुरु होने के बाद दस वर्षों तक उत्पाद शुल्क में 100 प्रतिशत छूट और (2) पहले पांच वर्षों में कंपनी की आय पर आयकर की पूरी माफी और अगले पांच वर्षों तक 30 प्रतिशत माफी।
इस विशाल छूट का फायदा लेने के लिए उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कई कंपनियां आईं, खास तौर पर मोटर गाड़ियां और दवाईयां बनाने वाली। टाटा मोटर्स कंपनी ने 60,000 मिनी-ट्रक प्रतिवर्ष बनाने वाला एक कारखाना 1,000 एकड़ में डाला। अशोक लीलैण्ड कंपनी ने प्रतिवर्ष 50,000 वाहन वाले और बजाज ऑटो कंपनी ने प्रतिवर्ष दस लाख दुपहिया गाड़ियां बनाने वाले कारखाने लगाए। यदि टाटा कंपनी ने पंतनगर में नैनो कार वाला कारखाना लगाया होता, जिसमे ढाई लाख कार प्रतिवर्ष बनती और जिसमें टाटा को 1500 करोड़ रु. की पूंजी लगानी होती, तो इन दोनों करों में छूट की बदौलत ही उसे दस वर्ष में 3341 करोड़ रु. की बचत होती। यानी कुल पूंजी के दुगुने से ज्यादा टाटा इन दस सालों में बचा लेते। किन्तु भविष्य का एक रु. आज के एक रु. के बराबर नहीं होता। इसलिए भावी वर्षों की बचत को ब्याज की 6 प्रतिशत की वार्षिक दर से काटा जाए (डिस्काउन्ट किया जाए) तो भी कर-बचत की राशि 2627 करोड़ रु. बनती है। यानी टाटा फिर भी 1127 करोड़ रु. की बचत में रहता।
किन्तु इसी बीच पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने टाटा के इस कारखाने को आकर्षित करने के लिए इससे भी ज्यादा मदद व छूट देने का प्रस्ताव किया। यद्यपि पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय करों की छूट की सुविधा नहीं थी, बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने प्रांतीय करों में छूट, सस्ती जमीन, सस्ती बिजली, अनुदान और सस्ते कर्ज के अनेक उपहारों का ढेर लगा दिया। बंगाल सरकार ने इनको काफी समय तक छुपाने की कोशिश की, किन्तु आखिरकार सरकार व कंपनी के बीच हुए करारनामे की जो जानकारी सामने आई, उसके मुताबिक ये उपहार इस प्रकार थे –

1.    सस्ती एवं अतिरिक्त जमीन:
पश्चिम बंगाल सरकार अपने खर्च पर जमीन अधिग्रहित करके कंपनी को देगी। मुख्य कारखाने के लिए 645 एकड़ जमीन 90 वर्ष की लीज पर दी जाएगी। इसके लिए टाटा कंपनी शुरु में कोई राशि नहीं देगी। इस भूमि का वार्षिक किराया पहले पांच वर्षों के लिए 1 करोड़ रु. होगा, इसके बाद 30 वें वर्ष तक हर पांच वर्ष में 25 प्रतिशत बढ़ेगा, फिर 60 वें वर्ष तक हर दस वर्ष में 30 प्रतिशत बढ़ेगा और फिर 90वें वर्ष तक 20 करोड़ रु.प्रतिवर्ष रहेगा। इसके अतिरिक्त, सहायक उद्योग (पुर्जे आदि) लगाने के लिए 290 एकड़ भूमि टाटा को 8000रु. प्रति एकड़ की दर से दी जाएगी। सिंगूर कोलकाता से मात्र 45 कि.मी. दूर होने से वहां की जमीन बहुत महंगी है और टाटा को बहुत कम दरों पर मिल रही थी।
नैनो कारखाने के लिए इतनी मात्रा में जमीन की क्या जरुरत है, यह सवाल भी कई लोगों ने उठाया है। अन्य मोटरगाड़ियों के कारखानों से तुलना करके इसे देखा जा सकता है। प्रतिवर्ष साढ़े सात लाख कारें बनाने वाला मारुति उद्योग 300 एकड़ भूमि में है। स्वयं टाटा मोटर कंपनी के पास पूना में मात्र 178 एकड़ भूमि है जहां वह 2 लाख कारें बनाती है तथा जमशेदपुर इकाई के सहयोग से 3 लाख 40 हजार व्यवसायिक गाड़ियां बनाती हैं। अपने कर्मचारियों के आवास और कारखाना दोनों मिलाकर टाटा को 300 एकड़ से ज्यादा जमीन की जरुरत नहीं होनी चाहिए। अंदाज यह है कि आगे चलकर टाटा इस जमीन का व्यवसायिक इस्तेमाल करके कमाई करता।

2.    शुल्क-वापसी:
कारों की बिक्री पर वेट और केन्द्रीय बिक्री कर की जो भी राशि होगी, पश्चिम बंगाल सरकार उसे कंपनी को कर्ज के रुप में वापस कर देगी, जिस पर 0.01 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज लिया जाएगा। यानी एक तरह से यह ब्याज मुक्त कर्ज होगा। इस कर्ज की वापसी तीस वर्ष बाद शुरु होगी।

3.    नाममात्र के ब्याज पर कर्ज:
इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम 200 करोड़ रु. का कर्ज और देगा, जिस पर मात्र 1 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज लिया जाएगा। इस कर्ज की वापसी भी 20 साल बाद करना होगा। इन दोनों तरीकों से ब्याज अनुदान ही टाटा को काफी बड़ी मात्रा में मिलने वाला था।

4.    सस्ती बिजली:
टाटा कंपनी के साथ हुए समझौते के मुताबिक उसे 3 रु. प्रति यूनिट की दर से बिजली दी जाएगी। यदि इस दर में पांच वर्षों में 25 पैसे प्रति यूनिट से ज्यादा वृद्धि होती है, तो सरकार कंपनी को उसकी भरपाई कर देगी। चूंकि अभी राज्य में बिजली की औसत दर 4 रु.15 पैसे है, अंदाज है कि इसी एक तरीके से टाटा कंपनी को प्रतिवर्ष 20 करोड़ रु. का अनुदान मिलता। बिजली की दरें ज्यादा बढ़ने पर आने वाले सालों में यह अनुदान और बढ़ेगा।

अर्थशास्त्री निर्मल कुमार चंद्र ने हिसाब लगाया है कि प्रथम तीन तरीकों से टाटा कंपनी को 2000 करोड़ रु. से ज्यादा का फायदा होता। इसमें बिजली शुल्क की बचत भी जोड़ लें तो यह राशि 2500 करोड़ रु. से ऊपर पहुंचेगी। जबकि इस परियोजना में टाटा की पूंजी मात्र 1500 करोड़ रु. लगेगी। यानी टाटा की मौज ही मौज है।
जन-विरोध के कारण बाद में टाटा का यह नैनो कार का कारखाना गुजरात चला गया। अंदाज है कि गुजरात की मोदी सरकार ने भी कंपनी को करीब-करीब इसी तरह की कर रियायतें, अनुदान, सस्ते कर्ज व अन्य फायदें प्रदान किये होंगे। तो यह है टाटा की सस्ती लखटकिया कार का राज ! इसमें टाटा की उद्यमिता, व्यावसायिक बुद्धि या इंजीनियरिंग का कम और तिकड़म व मिलीभगत से सरकारी खजाने की लूट का ज्यादा कमाल है।
यह भी सच है कि वाहन उद्योगों और अन्य उद्योगों को सरकारों द्वारा इस तरह जबरदस्त अनुदान देने का विशिष्ट उदाहरण होते हुए भी यह अकेला मामला नहीं है। कंपनियों को इस तरह की विशाल कर-रियायतें और मदद देने का करीब-करीब नियम-सा बन गया है। तमिलनाडु की अल्ट्रा-मेगा वाहन परियोजनाओं में भी विशाल रियायतें व मदद दी गई है। आन्ध्र प्रदेश ने भी 2008 में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा में इससे मिलते जुलते प्रावधान किए हैं। उधर इन राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए और अपना आकर्षण बनाए रखने के लिए, उत्तराखंड ने अप्रैल 2008 में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा की, जिसमें बिजली शुल्क में 100 प्रतिशत तक की छूट (यानी बिजली मुफ्त) तथा वैट में 90 प्रतिशत तक की छूट के नए प्रावधान उद्योगों के लिए किये गये। इस तरह, अर्थशास्त्री निर्मल कुमार चंद्र के शब्दों में ‘‘राज्यों में एक ‘प्रोत्साहन युद्ध’ छिड़ गया, जिसमें सारे राज्य बड़ी पूंजी के आगे गिड़गिड़ाते भिखारियों में बदल गए।’’
यह भी गौरतलब है कि भारत की सरकारें जिस बाजारवाद के रास्ते पर चल रही हैं, उसमें भी सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त बाजार नाम की कोई चीज नहीं है। बाजार मंत्र का जाप करने वाले भी बाजार के तर्कों व नियमों पर नहीं चलते हैं। फरक इतना ही है कि गरीब जनता के हित में हस्तक्षेप उन्हें मंजूर नहीं हैं, जबकि कंपनियों के हित में भारी मदद, छूटें और उपहार देने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। नैनो कार की परियोजना इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है।
अस्तु, नैनो कार के कारण भारत की सड़कों पर जाम, प्रदूषण, ज्यादा दुर्घटनाओं की बात फिलहाल छोड़ दें (यह कहा जा सकता है कि भारत के अमीरों को ही कार रखने का हक क्यों हो और निम्न मध्यम वर्ग को क्यों नहीं ?) तथा सिंगूर में किसानों के विस्थापन को भी भूल जाएं, तो भी टाटा के इस प्रोजेक्ट के साथ सरकारी खजाने की इस जबरदस्त लूट का सवाल जुड़ा है जिसके बगैर नैनो कार संभव ही नहीं है। नैनो कार नए भारत की नयी उद्यमिता या नवाचार का द्योतक नहीं है, बल्कि गलत विकास नीति, गलत प्राथमिकताओं, भारत की सरकारों (जिसमें वाममोर्चा भी शामिल है) के वैचारिक दिवालियेपन तथा कंपनियों द्वारा भारत राष्ट्र की लूट का एक प्रतीक बन गई है।
– सुनील , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद
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कविता / खबरदार ! वे आ रहे हैं / राजेन्द्र राजन

[ पिछले दिनों घुघूतीबासूती ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारतीय मूल के इंग्लैण्ड के एक नागरिक द्वारा खरीदे जाने पर एक पोस्ट लिखी । उसे पढ़कर मुझे १९९२-९३ में कवि-मित्र राजेन्द्र राजन द्वारा लिखी यह कविता याद आई ।

श्यामलाल ’पागल’और विपुल द्वारा बनाये गये पोस्टर चित्रों के साथ इस कविता की चित्र प्रदर्शनी को कई राज्यों में दिखाया था ]

स्वागत करो

सजाओ वन्दनवार

वे आ रहे हैं

दुनिया के बड़े-बड़े महाजन

सेठ – साहूकार

तुम्हारी नीलामी में

बोलियाँ बोलने

वे आ रहे हैं

तुम्हारे खेतों की

तुम्हारी फसलों की

तुम्हारे बीजों की

तुम्हारे फलों की

तुम्हारे बैलों की

तुम्हारे हलों की

नीलामी में बोलियाँ बोलने

वे आ रहे हैं

स्वागत करो

पहनाओ गले में हार

उन आगन्तुकों में नहीं हैं वे

जो आए थे पुराने जमानों में

नालन्दा और तक्षशिला

ज्ञान की प्यास लिए

वे आ रहे हैं

मुनाफ़े की आस लिए

जैसे आई थी ईस्ट इंडिया कंपनी

बढ़ने लगी दिन दूनी रात चौगुनी

बनाने लगी किले

फिर जिले

और फिर सारा देश

हो गया उसका उपनिवेश

वे आ रहे हैं

ईस्ट इंडिया कंपनी के

नए बही-खाते लिए

गले में कारीगरों के कटे अंगूठों की मालाएं पहने

भोपाल की जहरीली गैस छोड़ते

वे आ रहे हैं .

खबरदार !

कोई उन्हें रोके नहीं

कोई उन्हें टोके नहीं

उनके इशारों पर नाचती है सरकार

वे हैं हमारे शाही मेहमान

महाप्रभु दयावान

उन्हें बुला रहे हैं देश के तमाम

अमीर – उमरा हाकिम – हुक्काम

उनके लिए ला रहे हैं वे

अन्त: पुर के नए साज – सामान

स्वागत करो

खड़े हो जाओ बांधकर कतार

वे आरहे हैं

विकास के महान ठेकेदार

जो बाँटते हैं उधार

मुद्राकोष के विटामिन

और विश्व बैंक की प्रोटीन

और भी कई तरह की बोतलें रंगीन

जो हैं कमजोर और बीमार

वे कर लें अपनी सेहत में सुधार

आज जिनकी है सेहत ठीक

कल उसे देंगे वे बिगाड़

ताकि चलता रहे इलाज का उनका व्यापार

वे आ रहे हैं

नई गुलामी के सूत्रधार

लेकर डॉलर के हथियार

वे खरीदेंगे पूरे संसार को

बेचेंगे जादुई प्रचार

उन्हें आते हैं कई चमत्कार

वे बदल देंगे तुम्हारा दिमाग

तुम्हारी आँखें

तुम्हारा दिल

तुम्हारी चाल

तुम्हारी भाषा

तुम्हारे संस्कार

तुम्हारी अकल होगी बस नकल

तुम्हारी कला बन जाएगी चकला

संस्कृति होगी तुम्हारी

हिप-हिप हुला-हुला

हिप-हिप हुला-हुला

वे करेंगे तुम्हारा पूरा कायाकल्प

होंगे तुम गुलाम

नहीं लोग आजादी का नाम

भूल जाओगे लड़ने का विचार

नहीं उठेगा कोई भी उजला संकल्प

जो सूत्र वे बोलेंगे एक बार

तुम उसे दोहराओगे बारम्बार

वे खायेंगे तुम टपकाओगे लार

वे फटकारेंगे

तुम करोगे उनकी जय जयकार

तुम नाचोगे जब पड़ेगी तुम पर मार

इसे तुम कहते रहो सुधार

तुम्हार महिमा अपरम्पार

उनकी माया है विकराल

हर मुल्क हर शर में हैं

उनके पिट्ठू

उनके दलाल

जो कहते हैं उन्हें

दुनिया के खेवनहार

समझाते हैं हमें

भरोसा मत रखो

अपनी मेहनत पर

अपनी बु्द्धि पर

अपनी ताकत पर

अपनी हिम्मत पर

वे आयेंगे करेंगे तुम्हारा बेड़ापार

मत थामो खुद अपनी पतवार

वे आ रहे हैं

करने तुम्हारे मुल्क का उद्धार

उन्हें मिल गये हैं भारी मददगार

तुम्हारे ही कर्णधार

जो डरने को तैयार

जो झुकने को तैयार

जो बिकने को तैयार

कहें वे जो सब करने को तैयार

उन्हें सौंप रहे हैं वे

तुम्हारे घर के सब अधिकार

वे बना देंगे

तुम्हारे ही घर में तुम्हें किराएदार

जो चाहते हैं इसे करना इनकार

आज उठें वे करें ये ललकार

सत्ताधीशों का स्वेच्छाचार नहीं है हमारा देश

न पिशाचों का बाजार नहीं है हमारा देश

गिरवी सौदा फंदा व्यापार नहीं है हमारा देश

दासानुदास बंधुआ लाचार नहीं है हमारा देश

मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश

जो गूँजता है जमीन से आसमान तक

सारे बंधन तोड़

उठेगी जब भी यह ललकार

उन्हें बुलाने वाले तब कहीं नहीं होगंगे

उनके चरण चूमने वाले तब कहीं नीं होंगे

अपने अन्त:पुर से वे फेंक दिए जायेंगे

इतिहास की काल-कोठरी में

उन्हें खाएगा उनका अंधकार

हमारे ही कंधों पर यह भार

जो मिट जायेंगे मगर

करेंगे हर गुलामी का प्रतिकार

हमारे ही कंधों पर यह भार

इतिहास जिनसे करता है हिसाब

भविष्य को जो देते हैं जवाब

हमारे ही कंधों पर यह भार

जो चाहते हैं आज

कि दुनिया बने एक समाज

न पागल सत्ता की अंधी चाल

न पूंजी का व्यभिचार

हमारे ही कंधों पर यह भार

जो सुन सकते हैं वक्त की पुकार

हमारे ही कंधों पर यह भार ।

– राजेन्द्र राजन





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दो कम्पनी विरोधी बाँके सिपाही या बहुरुपिए

दानवाकार कम्पनियाँ हमेशा सही काम करना चाहती हों ऐसा नहीं है । शायद वे सही काम कर ही नहीं सकतीं । मुमकिन है कि वे सही काम करना न चाहती हों । शायद वे भले काम करना चाहती हों लेकिन उनके शेयर धारकों को यह पसन्द न हो ।

सरकारें यदि अच्छे काम करना चाहतीं हैं तब क्या होता है ? क्या सिर्फ़ शेयर धारकों की जगह मतदाता रख देने से मामला स्पष्ट हो जाता है ?

१९९९ की शुरुआत में विश्व व्यापार संगठन की सिएटल में हुई बैठक के विरुद्ध जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए थे। उसी दौरान इन दो महानुभावों ने इस दौर के कुछ  असाध्य और बड़े मुद्दों को छेड़ा । वे सिएटल के विरोध प्रदर्शनों में शरीक न हो सके थे । उन्होंने सोचा कि हम भी कैसेअपनी हिस्सेदारी  सुनिश्चित करें ?  उन्होंने एक फर्जी वेबसाईट बनाई | मौसम परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर निहित स्वार्थों से जुड़े लॉबींग करने वालों की कथित वस्तुपरकता की पोल खोलने के लिए ।

थोड़े से झूठ का सहारा लेकर इन दोनों बांके सिपाहियों ने दुनिया की कई दानवाकार और कुख्यात कम्पनियों की करतूतों का पर्दाफाश किया है – अक्सर उनके शेयरधारकों के समक्ष ।  भोपाल गैस काण्ड के लिए जिम्मेदार यूनियन कारबाईड को खरीद लेने वाली डाऊ केमिकल , भूगर्भ-जल का दोहन करने वाली तथा नुकसानदेह पेय पिलाना वाली कोका कोला कम्पनी तथा नाईजीरिया की खेती को बरबाद करने वाली तथा विद्रोही रंगकर्मी केन सारो वीवा की फाँसी की जिम्मेदार शेल जैसी राक्षसी कम्पनियों से जुड़कर इन्हीं कम्पनियों के पूर्व प्रमुख ,पूर्व राष्ट्राध्यक्ष ,राजनेता , नौकरशाह मौसम परिवर्तन सम्बन्धी कानूनों को रोकने के लिए लॉबिस्ट बन जाते हैं । इन नामों की बानगी देखिए – पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन ,किल्न्टन,बुश,पूर्व ब्रिटिश प्रधान मन्त्री थैचर , सिनेमा स्टार और राजनेता स्वार्ज़निगर तथा अर्थशास्त्री मिल्टन फ़्रीडमेन । इन नामों को देख कर आप अन्दाज लगा सकते हैं कि कैसे लोग इस काम में लगते हैं ।  विश्व बैंक से जुड़े रहे मनमोहन सिंह ,अरुण शौरी जैसों के अलावा मोन्टेक सिंह अहलूवालिया तो एक ऐसे समूह से जुड़ा था जिसका घोषित उद्देश्य कॉर्पोरेट जगत से नीति निर्माताओं के बीच पुल बनाना था। कपिल सिब्बल , अरुण जेटली और सुबोध सहाय जैसे लोग शीतल पेयों और कचरा खाद्य कम्पनियों की रक्षा में प्रमुख हैं ।

अब इन दोनों बाँकुरों के काम के नमूने पर गौर कीजिए :

भोपाल स्थित यूनियन कारबाईड से रिसी गैस से हजारों लोग मारे गये थे तथा लाखों लोग आजीवान कष्ट और बीमारियां झेलने के लिए अभिशप्त हैं । कम्पनी की ओर से भयंकर भूलें और लापरवाहियाँ हुई थी । बड़े बड़े वकील रखकर एक छो्टे-से क्लिनिक के द्वारा गैस पीडितों की ’देखभाल” की जाती है ।  ऐसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत के लिए सन्देश होता है – यह सब तो होता रहता है , बिना जोखिम के जीवन कैसा ? फिर डाऊ केमिकल ने यूनियन कारबाईड को खरीद लिया । उस वक्त यूनियन कारबाईड की कीमत १२ अरब डॉलर आँकी गयी थी । डाऊ द्वारा अधिग्रहण के तुरन्त बाद जूड फिनिस्टेरा  नामक डाऊ का कथित नुमाईन्दा बीबीसी न्यूज़- पेरिस के माध्यम से ३० करोड दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत हुआ । उसने घोषणा की कि डाऊ केमिकल भोपाल गैस काण्ड की पूरी जिम्मेदारी लेती है तथा यूनियन कारबाईड को भंग करके गैसे पीडितों को १२ अरब डॉलर दिए जाएंगे ।  ये अप्रत्याशित घोषणा तत्काल इन्टरनेट की समाचार साईटों , और दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियों बनी । भोपाल की जनता मारे खुशी के सड़कों पर निकल आई । डाऊ के शेयरों से  २३ मिनट में दो अरब डॉलर का नुकसान हुआ ।

यह पूरी घोषणा झूठी थी । डाऊ की ऐसी कोई योजना नहीं थी । उसके कथित प्रतिनिधि या प्रवक्ता का कम्पनी से कोई सम्बन्ध नहीं था ।

वह व्यक्ति था एन्डी बिकलबॉम जो द यस मेन नामक एक समूह का राजनैतिक कार्यकर्ता था । बिकलबॉम और उसके साथी माईकेल बोनानो ने मिलकर डाऊ केमिकल के लिए डाऊ एथिक्स (नैतिकता) नामक एक फर्जी वेबसाईट बनाई थी । गैस काण्ड में कम्पनी की आपराधिक जिम्मेदारी का बरसों से अध्ययन करने वाले बीबीसी के पत्रकार इनके झाँसे में आ गये तथा इनकी वेबसाईट को डाऊ की असली वेबसाईट माना  । बीबीसी ने बाकायदे लाईव प्रसारण के लिए उन्हें अपने स्टूडियो में आमंत्रित किया । इस मौके के लिए एन्डी बिकलबॉम ने नया सूट खरीदा , बाल छँटवाये , क्या बोलना है इसकी तैयारी की और तब पेश हुआ ।

 एन्डी और माईक

एन्डी और माईक

कुछ ही घण्टों में इस शरारत से परदा उठा । खण्डन , स्पष्टीकरण की बौछार होती रही । ये येस मेन इन प्रतिष्ठित कम्पनियों की ’अस्मिता सुधारने’ (identity correction) की अपनी मुहिम में अगले अवसर की तलाश में आगे बढ़ लिए ।

यह किस्सा तथा ऐसे ही अन्य कई किस्से  परसों अमेरिका के केबल टेवि नेटवर्क में एचबीओ पर दिखाई गई इसी जोड़ी की बनाई गई फिल द येस मेन रूल द वर्ल्ड का हिस्सा थे । इनके समूह की वेबसाईट पर अवश्य जाँए । नीचे उक्त फिल्म का अधिकृत ट्रेलर है । फिल्म अक्टूबर में अमेरिकी सिनेमा हॉलों में आएगी । डी.वी.डी. अभी नहीं मिल रही है । जुगाड़ में हूँ ।

इन दोनों महानुभावों की कारगुजारियों में झकलेटी पत्रकारिता का पुट भल ही ही , भले ही ये ’साधन-शुद्धि’ की शर्तों का पालन न करते हों लेकिन इन दानवाकार कम्पनियों की चूल्हें हिलाने और उनकी गन्दी हरकतों को बेपरदा करने में वे काफ़ी हद तक कारगर हैं ।
[ इनसे जुड़ी खबरें – यहाँ हैं । ]

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