Category Archives: communalism

चिपलूणकर और सलीम ख़ान का मेरे ब्लॉग पर मेल

१९९२ के दौर में वाराणसी के तीन भिन्न – भिन्न विचारधाराओं से जुड़े़ तीन समूहों ने महसूस किया था कि साम्प्रदायिकता के बारे में एक समझदारी बना कर साथ – साथ लोगों के बीच जाना होगा । समझदारी बनाने के क्रम में हमने तीन लम्बे सत्रों में चर्चा की तथा साझा समझदारी के आधार पर एक परचा तैयार किया ।

पिछले दिनों ब्लॉग जगत में साम्प्रदायिक आधार पर परस्पर वैमनस्य फैलाने वाली पोस्टों की बाढ़ आई हुई है । मैंने १९९२ में प्रकाशित उपर्युक्त परचे को अपने ब्लॉग में दो हिस्सों में छापा । परचे की खूबी लाजमी तौर पर यह थी कि गैर साम्प्रदायिक बहुमत को वह पसन्द आता तथा फिरकापरस्ती पर जिन्दा लोगों को उससे परेशानी होती । ब्लॉग जगत में ऐसा ही हुआ। १३ लोगों की कुल १४  टिप्पणियाँ आईं । ७ टिप्पणीकर्ता परचे की बातों से पूरी तरह सहमत थे और ६ के गले में बातें उतरने में दिक्कत हो रही थी । अनिल पुसादकर की टिप्पणी ने मुझे भाव विह्वल कर दिया । रामकुमार अंकुश , दिनेश द्विवेदी ,रवि कुमार , वीरेन्द्र जैन ,लोकसंघर्ष और निर्मला कपिला ने इस विषय पर सहज सामान्य समझदारी से मानो देश की समझदारी की नुमाईन्दगी की ।

हमारी बात चिपलूणकर और सलीम खान जैसे  ६ पाठकों के  गले उतरने में दिक्कत हो रही थी शायद उन्हें  मरचा लग रहा था । उस परचे का मुकाबला करने में सलीम खान ने कहा,’सुरेश चिपलूणकर के पहले दो पैरा से सहमत.’ इस तरह की सहमती का जिक्र कहानियों और नाटकों में पढ़ते वक्त मुझे अतिरंजना लगती थी लेकिन ऐसा सोचना गलत था ।

राही मासूम रजा की एक कहानी में मस्जिद के आहाते में सूअर का गोश्त डालने वाले मुस्लिम अपराधी और मन्दिर में गोमांस डालने वाले हिन्दू अपराधी का भी जिक्र चौंकाता है लेकिन जिन्हें साम्प्रदायिकता की आग लगानी होती है वे यह सब भी कर सकते हैं । एक बार मेरी एक ही पोस्ट पर ’रमेश’ और ’पीटर ’ ने एक ही IP पते से टिप्पणियाँ की थीं ।

ओड़िया में एक कहावत है : माँ कहती है , ’ रसोई घर में कौन है ?’ बेटा जवाब देता है , ’ मैंने केला नहीं खाया’ ।

अब हम आते हैं कांग्रेस की साम्प्रदायिकता की बाबत । कांग्रेस द्वारा साम्प्रदायिक उन्माद के आधार पर सबसे बड़ी चुनावी सफलता इन्दिराजी की हत्या के बाद हुए चुनावों में हासिल की गई थी। राजीव गांधी ने भिण्डरावाले को पंजाब के किसान आन्दोलन और अकालियों के मुकाबले खड़ा करने के लिए ’सन्त’ का दरजा दिया  । भिण्डरावाले द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध तमाम विष वमन के बावजूद पंजाब में सिखों द्वारा हिन्दू विरोधी दंगे नहीं हुए । हरमन्दर साहब में फौज भेज कर इन्दिरा गांधी ने अटल बिहारी सरीखों की वाहवाही पाई वहीं सिखों के हृदय पर एक गहरा जख़्म लगाया । इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने पूरे सिख समुदाय को ’गद्दार’ कहते हुए चुनाव लड़ा । पूरे देश में निर्दोष सिखों की हत्याएं हुई और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान लूटे गये।पहली बार प्रचार में लाई गई विदेशी कम्पनी रीडिफ़्यूजन के पूरे पन्ने के विज्ञापनों में कहा जाता ,’क्या आप चाहते हैं कि देश की सीमायें आप के घर की चाहरदीवारी तक सिकुड़ जाएं?’ इस चुनाव में कांग्रेस के अब तक के सर्वाधिक बड़े बहुमत(करीब अस्सी फीसदी सीतें) से जीती । भारतीय जनता पार्टी(जिसमें जन संघ पृष्टभूमि के लोग शामिल थे) लोक सभा  में मात्र दो सीटें जीत पाई । पता चला कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उस चुनाव में लगा कि ’हिन्दू हित’ तो कांग्रेस देख रही है । पूरे देश में ’अपनेजी’ लोगों को ’आदेश-निर्देश’ दे दिए गए !  पहले आम चुनावों से जम्मू की जिन सीटों पर हमेशा जनसंघ जीतती आई थी वहाँ भी कांग्रेस जीती । यह है मौसेरे भाइयों का रिश्ता ।

१९६७ में डॉ. लोहिया ने कहा था कि भाकपा की एक पहाड़ गद्दारी से कांग्रेस की एक बूँद गद्दारी और जनसंघ की एक पहाड़ फिरकापरस्ती से कांग्रेस की एक बूँद फ़िरकापरस्ती ज्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है ।

कुछ लोग बहुसंख्यकों का मानो ठीका लिए हुए हैं और हमारे मित्र संजय बेंगाणी की तरह कहते हैं,’ जिम्मेदारी मात्र बहुसंख्यकों के सर डाली जा रही है.’(’ जब मार पड़ी शमशेरन की तो कहें, ’ महाराज मैं नाऊ’ की तरह कभी संजय जैन भी हो जाता है) दरअसल देश की गंगा जमुनी तहजीब में यक़ीन रखने वाले बहुसंख्यक समुदाय को इन बातों को समझने में दिक्कत नहीं होती है वे इसे आत्मसात किए हुए है। देश में फिरकापरस्तों का जो  अल्पमत है उसे जरूर दिक्कत आती है , चाहे वे खुद को हिन्दू कहने का दावा करते हों अथवा मुसलिम ।

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सांप्रदायिकता : हम क्या करें ? क्या न करें

  1. साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली किसी भी दुष्प्रवृत्ति के शिकार हम खुद न हों , और समाज में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली कोशिशों के खिलाफ़ खड़े हों , फिर चाहे ऐसी कोशिश हिन्दुओं के द्वारा हो या मुसलमानों के द्वारा हो या अन्य किसी भी धर्म को मानने वालों के द्वारा हो ।
  2. केन्द्र व राज्य सरकारों का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी धर्म विशेष के अनुष्ठान में राज्य एवं शासन के प्रतिनिधि के रूप में शामिल नहीं हो , न ऐसे अनुष्ठानों को राज्य द्वारा किसी प्रकार की विशेष सहायता मिले , और न ही राजकीय उद्घाटन , शिलान्यास आदि के आयोजन किसी धर्म-विशेष के अनुष्ठान से शुरु हों । धर्म-निरपेक्ष राज्य की संवैधानिक घोषणा का यह सर्वथा उल्लंघन है । हम ऐसे आयोजनों के खिलाफ जनमत का दबाव पैदा करें ।
  3. एक धर्म की उपासना विधियों , उत्सवों ,पर्वों , के आयोजनों से दूसरे धर्मों की उपासना विधियों,उत्सवों-पर्वों में बाधा पहुँचे , ऐसी व्यवस्था क्यों चलनी चाहिए ? क्या मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि धार्मिक केन्द्रों में लाउडस्पीकरों का उपयोग और उत्तेजनात्मक घोषणाओं का उग्र उद्घोष इसी तरह बराबर होते रहना चाहिए , जैसे आजकल हो रहा है ? नहीं । क्योंकि इससे हमारी भक्ति-भावना में वृद्धि नहीं होती , हमारी प्रतिक्रियात्मक , प्रतिशोधात्मक भावनाओं का इजहार होता है ।
  4. हम अपनी धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनायें दूसरे पर थोपने की कोशिश न करें । हमारे विचार-आचार में तेज होगा तो वह दूसरों को भी प्रेरित करेगा , यहीं तक अपनी भावनाओं को मर्यादित रखें ।
  5. हम यह न भूलें कि कोई एक गलती करता है तो उसके जवाब में हम दस गलती करके अपना ही नुकसान करते हैं । अत: हम न गलती करेंगे , न गलती होने देंगे , न जुल्म करेंगे , न जुल्म सहेंगे की नीति पर चलें ।
  6. हम उन अखबारों , प्रचार-माध्यमों,नेताओं,संगठनों का बहिष्कार एवं विरोध करें , जो साम्प्रदायिकता के जहर को फैलाते हैं । अखबारों में छपने वाले ऐसे लेखों-टिप्पणियों का विरोध हम लिखित रूप में लेख-टिप्पणियाँ-सम्पादक के नाम पत्र लिखकर करें –  जिनसे साम्प्रदायिकता का जहर समाज में फैलता हो ।इसके अलावा स्वतंत्र रूप से पर्चे छापकर करें तथा अन्य लोकशिक्षण के माध्यमों से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लोगों को जागृत-संगठित करें ।
  7. हम जो भी धर्म , जीवन-शैली ,उपासना पद्धति अपनाते हों ,अपनाएँ,लेकिन अपने से भिन्न दूसरे धर्मों , जीवन-शैलियों , उपासना – पद्धतियों के प्रति सहिष्णु एवं उदार रहें । हमारी इस वृत्ति से ही परस्पर संवाद-सम्बन्ध कायम रहेगा और संवादों-सम्बन्धों के आधार पर ही हम एक दूसरे की कमियों को , यदि होगी तो , दूर करने में सहायक होंगे ।
  8. आर्थिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक गैर-बराबरी समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी है। क्या हम इतिहास के इस तथ्य को नकार सकते हैं कि हमारी इसी सामाजिक कमजोरी के चलते भारतीय समाज और राष्ट्र कमजोर हुआ है , टूटा है,गुलाम हुआ है,हिंसा-प्रतिहिंसा का शिकार हुआ है ? यदि आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- गैरबराबरी बनी रही , बढ़ती रही तो कोई भी धर्म-सम्प्रदाय भारतीय समाज-राष्त्र को विघटित होने से नहीं रोक पायेगा । पेट भरने , तन ढकने , सर छुपाने के लिए समुचित आवास व्यवस्था एवं शिक्षा- स्वास्थ्य आदि की प्राथमिक मानवीय जरूरतें पूरी करने की अनिवार्य मांग को धार्मिक-उन्माद उभाड़कर लम्बे अर्से तक टाला नहीं जा सकता है । सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम तक विभिन्न रूपों में यह मांगें तीव्र और खतरनाक रूप ले चुकी हैं । इसलिए जरूरी है कि समाज की इस कमजोरी को दूर करने का , मानवीय बराबरी की व्यवस्था लाने का राष्ट्रव्यापी संघर्ष तज करने में हम अपनी सक्रिय भूमिका निभायें ।

निवेदक

गुरुदर्शन सिंह , विनोद कुमार ( साम्यवादी ,छुद्र एवं द्वंद्व )

जगनारायण , डॉ. स्वाति , डॉ. सोमनाथ त्रिपाठी , अफ़लातून (समता संगठन)

रामचन्द्र राही ,चन्द्रभूषण,भगवान बजाज,डॉ. मारकण्डे सिंह(सर्वोदय कार्यकर्ता)

श्री दिनेशराय द्विवेदी , वरिष्ट अधिवक्ता , राजस्थान .

1992 में प्रकाशित.

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साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ?

  1. साम्प्रदायिकता है – अपनी पूजा-पाठ-उपासना-विधियों , खान-पान,रहन-सहन के तौर-तरीकों , जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना , उनके प्रति नफरत , द्वेष-भाव पालना और फैलाना ।अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक, राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  2. अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  3. हमारा समाज , हमारा देश एक बार इस प्रकार की अलगाववादी-प्रवृत्ति का शिकार होकर विघ्हतन के अत्यन्त दुखान्त दौर से गुजर चुका है । क्या हम उसे फिर फिर दोहराया जाना देखना-भोगना चाहते हैं ? यदि नहीं तो फिर धर्म के आधार पर राज्य और राष्ट्र की बात जिस किसी भी धर्म वाले के द्वारा क्यों न कही जाती हो , हम उसका डटकर विरोध क्यों नहीं करते ? सोचिये , क्या धर्म के नाम पर राष्ट्र की बात कहने या उसका समर्थन करने से अन्तत: हम उस मान्यता के ही पक्षधर नहीं बनते , जिसमें धर्म को अलग राष्ट्र का आधार माना गया था और जिस मान्यता के कारण भारत विभाजित हुआ था ?
  4. जब धर्म के नाम पर राष्ट्र बनेगा , तो नस्ल , जाति ,भाषा आदि के आधार पर राष्ट्र बनने से कौन रोक सकेगा ? कैसे रोक सकेगा ? तो फिर , इतनी विविधता वाले वर्तमान भारतीय राष्ट्र की तस्वीर क्या होगी ? धर्म पर आधारित राज्य-राष्ट्र की बात करने वाले या उनका समर्थन करने वाले कभी इस पर गौर करेंगे ? धर्माधारित राज्य-राष्ट्र की मांग करना भारतीय समाज एवं राष्ट्र के विघटन का आवाहन है । और वास्तविकता तो यह है कि धर्माधारित राष्ट्र राज्य-राष्ट्र की माँग के पीछे अनेक आर्थिक , राजनीतिक निहित हित साधने के लक्ष्य छिपे होते हैं ।

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

  1. धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की हर कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है , चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति , समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो । थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं । इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं । इन दलों ने चुनाव में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए समझौते भी किए हैं , सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है । यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति नहीं की होती तो धर्म-सम्प्रदायाधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हर्गिज़ नहीं मिलता । जब धर्म-सम्प्रदाय की रजनीति होगी तो साफ़ है कि छद्म से अधिक खुली साम्प्रदायिकता ताकतवर बनेगी।
  2. पूँजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित – वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं , जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं । हमें याद रखना चाहिए कि धर्म सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहे वे हिन्दू हों , मुसलमान हों , सिख हों , इसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले , आम तौर पर वही लोग हैं , जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं – पूँजीपति , पुराने राजे – महाराजे , नवाबजादे , नौकरशाह और नये- नये सत्ताधीश , सत्ता के दलाल ! और समाज का प्रबुद्ध वर्ग , जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा , आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है ,अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है !
  3. और , हम-आप भी , जो इनमें से नहीं हैं , धार्मिक-उन्माद में पड़कर यह भूल जाते हैं कि भविष्य का निर्माण इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से नहीं होता । अगर इतिहास में हुए रक्तरंजित सत्ता , धर्म , जाति , नस्ल , भाषा आदि के संघर्षों का बदला लेने की हमारी प्रवृत्ति बढ़ी , तो एक के बाद एक इतिहास की पर्तें उखड़ेंगी और सैंकड़ों नहीं हजारों सालों के संघर्षों , जय-पराजयों का बदला लेनेवाला उन्माद उभड़ सकता है ।फिर तो , कौन सा धर्म-समूह है जो साबुत बचेगा ? क्या हिन्दू-समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होंगे ? क्या इस्लाम के मानने वाले एक पंथ के लोग दूसरे पंथ बदला नहीं लेंगे ? दुनिया के हर धर्म में पंथभेद हैं और उनमें संघर्ष हुए हैं । तो बदला लेने की प्रवृत्ति मानव-समाज को कहाँ ले जायेगी ? क्या इतिहास से हम सबक नहीं सीखेंगे ?  क्या क्षमा , दया , करुणा , प्यार-मुहब्बत , सहिष्णुता ,सहयोग आदि मानवीय गुणों का वर्द्धन करने के बदले प्रतिशोध , प्रतिहिंसा , क्रूरता , नफ़रत , असहिष्णुता , प्रतिद्वन्द्विता को बढ़ाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालना और बढ़ाना चाहते हैं ?
  4. वक्त आ गया है कि हम भारतीय समाज में बढ़ती विघटनकारी प्रवृत्तियों को गहराई से समझें और साम्प्रदायिकता के फैलते जहर को रोकें । [ जारी ]

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‘कई के नाम में राम है लेकिन् वास्ता दूर् तक नहीं’

पीलीभीत से भाजपा प्रत्याशी वरुण गांधी का औपचारिक नाम फिरोज वरुण गांधी होने की चर्चा मैंने कल ही की थी । इस पोस्ट को उम्मीद से ज्यादा ’टीपें’ मिल गयी ।

एक विचारधारा विशेष के विद्वान ने कहा है –

उदहारण के लिए कई के नाम में राम है लेकिन वास्ता दूर तक नहीं…!

नाम में जिनके राम है उनका राम मन्दिर से दूर का वास्ता नहीं रहा है – यह भारतीय समाज का कितना कटु यथार्थ है ! उत्तर भारत की शूद्र जातियों में नाम के पीछे राम लगाने की परम्परा रही है। जैसे जगजीवन राम , कांशी राम । अपने नाम के साथ राम को जोड़े रखने वाले इन तबकों को लम्बे समय तक मन्दिरों में प्रवेश की मनाही थी । इनके मन्दिरों के पुजारी या महन्त होने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है ।

बहरहाल , तुलसीदास ’अधम ते अधम , अधम अति नारी’– शबरी को राम द्वारा कैसे आश्वस्त किया गया यह इस संवाद द्वारा बताते हैं :

शबरी : केहि विधि अस्तुति करहु तुम्हारी,अधम जाति मैं जड़मति धारी ।

अधम ते अधम अधम अति नारी , तिन्हिमय मैं मति-मन्द अधारी ॥

राम :     कह रघुपति सुनु धामिनी बाता , मानहु एक भगति कर नाता ।

जाति – पाति कुल धर्म बड़ाई , धनबल परिजन गुन चतुराई ।

भगतिहीन नर सोहे कैसा , बिनु जल वारिधी देखी जैसा ॥

अपने नाम के साथ राम को लगा कर रखने वालों के भक्ति के नाते को नकारने वालों को इनका ’वास्ता दूर तक नहीं’ दिखाई देगा । गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों से ऐसे समूह को विशेष परेशानी रहती है :

परहित सरिस धरम नहि भाई , परपीड़ा सम नहि अधमाई ।

अधम -दर्शन पालन करने वाले इन लोगों के बारे में इसलिए कहना पड़ता है :

लेते हैं ये राम का नाम ,करते हैं रावण का काम ।


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होली का मर्म

अपने आप को धर्म और भगवान से ऊँचा मानने वाला हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें । पर हिरण्यकश्यप के पुत्र ने उसे भगवान मानने से साफ इनकार कर दिया । बहुत यातना व अत्याचार के बाद भी वह वह स्वयंभू अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद से अपने को भगवान कहलाने में असफल रहा । हार कर अन्त में उसने प्रह्लाद को जान से मारने का तरीका सोचा ।

हिरण्यकश्यप की एक होलिका नाम की बहन थी ।होलिका के पास एक अग्निरोधक वरदान वाला शॉल था ।वरदान के अनुसार यदि वह शाल ओढ़ कर आग में बैठेगी तो आग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी । हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में ले कर चिता पर बैठ जाए । होलिका ने अपने भाई का कहना माना और प्रह्लाद को गोद में ले कर चिता पर बैठ गयी । लेकिन जब चिता जली तो लपटों में होलिका का शॉल उड़ गया । होलिका जल मरी,पर भक्त प्रह्लाद का बाल बाँका नहीं हुआ।

प्रतिवर्ष होली जला कर हम इसी घटना का स्मरण करते हैं । होलिका दहन कर हिरण्यकश्यप की कुटिल चाल को नाकाम करते हैं। भक्त प्रह्लाद को जिन्दा रखते हैं।

होली का मर्म

आज भगवान को अपनी छुद्र राजनीति का जरिया बना कर धर्म के तथाकथित संरक्षक बन बैठे एक नहीं अनेक हिरण्यकश्यप सारे देश में घूम-घूमकर खून की होली खेल रहे हैं ।

अपने विश्वास को संविधान , कानून , राष्ट्र और जनता से ऊपर समझने वाले ये हिरण्यकश्यप देश की , जनता की एकता , सद्भावना,परस्पर विश्वास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर कुठाराघात कर रहे हैं । अपनी बहन होलिका रूपी साम्प्रदायिकता के माध्यम से कई निर्दोष और मासूमों को अपना शिकार बना रहे हैं ।

जो व्यक्ति या संगठन इनके विचारों से असहमति रखते हैं उन्हें सबक सिखाना,डराना,धमकाना ,मार-पीट करना,सभा बिगाड़ना,पुतला जलाना और अन्त में दमन करना,हत्या करना इन हिरण्यकश्यपों की दृष्टि में पवित्र धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है ।

धर्म और भगवान के ठेकेदार बने स्वयंभू हिरण्यकश्यपों और साम्प्रदायिकता रूपी होलिका को ठिकाने लगाना ही होली का सच्चा मर्म है ।

लकड़ियों के बड़े ढेर में आग लगा कर तो हम खत्म हो रहे जंगलों के विनाश में भागीदार बनते हैं , पर्यावरण असंतुलन के गुनहगार बनते हैं । अत: होली का मर्म समझ कर कम-से-कम लकड़ेयाँ जला कर प्रतीकात्मक होलिका दहन करें ।

समता संगठन ,पिपरिया,होशंगाबाद,(म.प्र.)

(पु्नर्प्रकाशन )

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पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 से संवाद

‘ शैशव ‘ में सब निर्मल होता है । ‘लौंडपन’ में दिमागी मल की गुंजाइश । इसलिए घुटने में दिमाग लिए लोगों की चर्चा इस चिट्ठे पर सर्वथा अनुचित है । फिर भी, जिनके घरों में संडास नहीं होते उन्हें खुले मैदान मे जाने की छूट तो है ही – उन्हें निपटने का मौलिक अधिकार है । हमें सफाई से प्रेम है , गन्दगी से नहीं । अस्तु, यह संडास-सफाई का पुनीत कार्य ।

    बहरहाल , हमारे चिट्ठे समाजवादी जनपरिषद पर पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 की घिनौनी हरकत पर नाक बन्द कर गौर करें । राही मासूम रज़ा की एक बहुचर्चित कहानी है – ‘सबसे सस्ता गोश्त ‘ । मस्जिद में सूअर का गोश्त फेंकने वाले मुस्लिम और मन्दिर में गोमांस रखने वाले हिन्दुओं का जिक्र उस कहानी में है । लेकिन कथित राष्ट्रवादियों का राष्ट्रवाद उनकी फिरकापरस्ती के सामने दब-दुब जाता है, चूंकि फिरकापरस्ती उनका मूल गुण है । ये घिनौने लोग पीटर उर्फ रमेश एक साथ बनने में संजाल पर छोड़े जा रहे ‘अंगूठा-निशान’ (IP पता) की व्यवस्था करना नहीं सीख पाए हैं । सचमुच यदि वे पीटर और रमेश एक साथ बन पाते , तो क्या बात होती ! लेकिन दंगाई मानसिकता की नंगई छुपाये नहीं छुपती ।

    ‘पीटर’ पूछते हैं – ईसाई और दलित ? किसी असलम के मन में भी सवाल उठना चाहिए कि पसमान्दा जातियाँ क्यों ? कोई सिख जसवीर पूछ सकता है कि ज्ञानी जैल सिंह और बूटा सिंह की कौन सी जातियाँ थीं ?

   फर्जी पीटर भले ही न जानता हो अथवा उसने आंखों पर पट्टी बाँध ली हो असली पीटर यह जानते हैं कि उन्हें दलित ईसाइयों के बारे में कोई हल निकालना है । जैसे काशी के मणिकर्णिका घाट की ‘चरण-पादुका’ पर हर आम हिन्दू की लाश नहीं जल सकती वैसे ही भारत में ईसाई कब्रिस्तानों में दलित ईसाई की कब्र पीछे हुआ करती है । अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ में अंसारियों के बीच ‘गोरकऊ – डोमरऊ’ भेद का विवरण अच्छी तरह दिया हुआ है ।

    जन्म से लगायत मृत्यु के बाद तक की जाति की तंग गली हर भारतीय का पीछा नहीं छोड़ती । पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ 220.226.30.26 जैसों को बताना होगा कि उनके सपनों के हिन्दू राष्ट्र की समाज व्यवस्था वर्णाधारित होगी या नहीं ?

    ओडिशा की दलित पाण जाति कभी हिन्दू-समाज का पंचम वर्ण हुआ करते थे आज दक्षिण ओड़िशा के पचास फीसदी से अधिक पाण-भाई  दलित ईसाई हैं और संवैधानिक विशेष अवसर की माँग कर रहे हैं । आदिवासियों में , जो वर्णाश्रम से अलग रहे हैं सिर्फ़ २० फीसदी धर्मान्तरित हुए हैं (ओड़िशा के आँकड़े) । लाहौर के जाति तोड़ो सम्मेलन के लिए बाबा साहब ने जातिविहीन समाज का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जो साधन बताये थे उनमें ‘धर्म चिकित्सा’ और ‘धर्मान्तरण’ भी थे ।

    भारतीय जनता पार्टी ओडिशा में बीजू जनता दल के साथ सरकार में है और ऐसी लम्बी अवधियाँ भी रहीं जब केन्द्र और सूबे दोनों में भाजपा सत्ता में थी । उन अवधियों में ओड़िशा अथवा देश के किसी भी अन्य प्रान्त में जबरदस्ती अथवा धोखे से धर्मान्तरण के कितने मामले पंजीकृत हुए ? पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 बतायेंगे ?

      वैमन्स्यपूर्ण हिंसा का शिकार हजारों दलित युवा सरकारी शिबिरों से ‘माओवादियों’ के साथ शामिल होने के लिए सरकारी शरणार्थी – शिबिर छोड़ देते हैं इसकी चिन्ता पीटर उर्फ़ रमेश उर्फ़ 220.226.30.26 को कत्तई नहीं है । माओवादियों का एक नेता मीडिया कर्मियों को बुला कर घोषित करता है – ‘लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या हमारे समूह ने की है’ , फिर भी पीटरों उर्फ़ रमेशों उर्फ़ 220.226.30.26 को चूंकि धार्मिक विद्वेष की ही तालीम मिली है इसलिए इस राजनैतिक चुनौती को वे स्वीकार नहीं कर पाते ।  

   हर हत्या निंदनीय है इसलिए लक्ष्मणानन्द की हत्या भी पूर्णतया निन्दनीय है । पाण पुरुषों की जान लो और उनकी औरतों को ‘गन्दा करो’– इन महान उद्गारों को प्रकट करने वाला , दो व्यक्तियों की हत्याओं के मामले में बरसों जेल रहा- स्वामी । स्वामी , जिनको अशोक सिंघल और तोगड़िया साक्षात प्रणिपात किया करते थे , चूँकि उनका अपना गिरोह कमजोर है ! लक्ष्मणानन्द के यह उद्धरण उसी ईटीवी के पास हैं जो माओवादियों के नेता का बयान दिखा रहा है । 

    बहरहाल , भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने वाले , मातृभाषा में न बोल पाने वाले मुख्य मन्त्री नवीन पटनायक ने आज मांग की है कि बजरंग दल एक कट्टरपंथी संगठन है , केन्द्र उस पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाता ? हम इस बयान को निहायत बचकाना मानते हैं ।

    हमारा दल समाजवादी जनपरिषद साम्प्रदायिकता के विरुद्ध दक्षिण ओड़िशा में कल आयोजित हुए सफल बन्द के आयोजकों में एक था ।

   जो चाल चलेगा हिटलर की , हिटलर की तरह मिट जाएगा ।

 भाजपा की पकड़ी चोरी- मुँह में राम, बगल में छुरी ।

 लेते हैं ये राम का नाम , करते हैं रावण का काम ।

लड़े हैं तुमसे कदम-कदम पर , लड़ेंगे तुमसे कदम कदम पर ।

 

   

   

From Andolan

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सांप्रदायिकता : हम क्या करें ? क्या न करें

 

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भाग १ , भाग २

हम क्या करें ? क्या न करें ?

  1. साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली किसी भी दुष्प्रवृत्ति के शिकार हम खुद न हों , और समाज में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाली कोशिशों के खिलाफ़ खड़े हों , फिर चाहे ऐसी कोशिश हिन्दुओं के द्वारा हो या मुसलमानों के द्वारा हो या अन्य किसी भी धर्म को मानने वालों के द्वारा हो ।
  2. केन्द्र व राज्य सरकारों का कोई भी प्रतिनिधि किसी भी धर्म विशेष के अनुष्ठान में राज्य एवं शासन के प्रतिनिधि के रूप में शामिल नहीं हो , न ऐसे अनुष्ठानों को राज्य द्वारा किसी प्रकार की विशेष सहायता मिले , और न ही राजकीय उद्घाटन , शिलान्यास आदि के आयोजन किसी धर्म-विशेष के अनुष्ठान से शुरु हों । धर्म-निरपेक्ष राज्य की संवैधानिक घोषणा का यह सर्वथा उल्लंघन है । हम ऐसे आयोजनों के खिलाफ जनमत का दबाव पैदा करें ।
  3. एक धर्म की उपासना विधियों , उत्सवों ,पर्वों , के आयोजनों से दूसरे धर्मों की उपासना विधियों,उत्सवों-पर्वों में बाधा पहुँचे , ऐसी व्यवस्था क्यों चलनी चाहिए ? क्या मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि धार्मिक केन्द्रों में लाउडस्पीकरों का उपयोग और उत्तेजनात्मक घोषणाओं का उग्र उद्घोष इसी तरह बराबर होते रहना चाहिए , जैसे आजकल हो रहा है ? नहीं । क्योंकि इससे हमारी भक्ति-भावना में वृद्धि नहीं होती , हमारी प्रतिक्रियात्मक , प्रतिशोधात्मक भावनाओं का इजहार होता है ।
  4. हम अपनी धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनायें दूसरे पर थोपने की कोशिश न करें । हमारे विचार-आचार में तेज होगा तो वह दूसरों को भी प्रेरित करेगा , यहीं तक अपनी भावनाओं को मर्यादित रखें ।
  5. हम यह न भूलें कि कोई एक गलती करता है तो उसके जवाब में हम दस गलती करके अपना ही नुकसान करते हैं । अत: हम न गलती करेंगे , न गलती होने देंगे , न जुल्म करेंगे , न जुल्म सहेंगे की नीति पर चलें ।
  6. हम उन अखबारों , प्रचार-माध्यमों,नेताओं,संगठनों का बहिष्कार एवं विरोध करें , जो साम्प्रदायिकता के जहर को फैलाते हैं । अखबारों में छपने वाले ऐसे लेखों-टिप्पणियों का विरोध हम लिखित रूप में लेख-टिप्पणियाँ-सम्पादक के नाम पत्र लिखकर करें –  जिनसे साम्प्रदायिकता का जहर समाज में फैलता हो ।इसके अलावा स्वतंत्र रूप से पर्चे छापकर करें तथा अन्य लोकशिक्षण के माध्यमों से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लोगों को जागृत-संगठित करें ।
  7. हम जो भी धर्म , जीवन-शैली ,उपासना पद्धति अपनाते हों ,अपनाएँ,लेकिन अपने से भिन्न दूसरे धर्मों , जीवन-शैलियों , उपासना – पद्धतियों के प्रति सहिष्णु एवं उदार रहें । हमारी इस वृत्ति से ही परस्पर संवाद-सम्बन्ध कायम रहेगा और संवादों-सम्बन्धों के आधार पर ही हम एक दूसरे की कमियों को , यदि होगी तो , दूर करने में सहायक होंगे ।
  8. आर्थिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक गैर-बराबरी समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी है । क्या हम इतिहास के इस तथ्य को नकार सकते हैं कि हमारी इसी सामाजिक कमजोरी के चलते भारतीय समाज और राष्ट्र कमजोर हुआ है , टूटा है,गुलाम हुआ है,हिंसा-प्रतिहिंसा का शिकार हुआ है ? यदि आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- गैरबराबरी बनी रही , बढ़ती रही तो कोई भी धर्म-सम्प्रदाय भारतीय समाज-राष्त्र को विघटित होने से नहीं रोक पायेगा । पेट भरने , तन ढकने , सर छुपाने के लिए समुचित आवास व्यवस्था एवं शिक्षा- स्वास्थ्य आदि की प्राथमिक मानवीय जरूरतें पूरी करने की अनिवार्य मांग को धार्मिक-उन्माद उभाड़कर लम्बे अर्से तक टाला नहीं जा सकता है । सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम तक विभिन्न रूपों में यह मांगें तीव्र और खतरनाक रूप ले चुकी हैं । इसलिए जरूरी है कि समाज की इस कमजोरी को दूर करने का , मानवीय बराबरी की व्यवस्था लाने का राष्ट्रव्यापी संघर्ष तज करने में हम अपनी सक्रिय भूमिका निभायें ।

निवेदक

गुरुदर्शन सिंह , विनोद कुमार ( साम्यवादी ,छुद्र एवं द्वंद्व )

जगनारायण , डॉ. स्वाति , डॉ. सोमनाथ त्रिपाठी , अफ़लातून(समता संगठन)

रामचन्द्र राही ,चन्द्रभूषण,भगवान बजाज,डॉ. मारकण्डे सिंह(सर्वोदय कार्यकर्ता)

श्री दिनेशराय द्विवेदी , वरिष्ट अधिवक्ता , राजस्थान .

1992 में प्रकाशित.

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क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

साम्प्रदायिकता क्या है ? उसके खतरे क्या हैं ? ( पिछला भाग )

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ? कौन है इसके लिए जिम्मेदार ?

  1. धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की हर कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है , चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति , समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो । थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं । इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं । इन दलों ने चुनाव में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए समझौते भी किए हैं , सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है । यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति नहीं की होती तो धर्म-सम्प्रदायाधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हर्गिज़ नहीं मिलता । जब धर्म-सम्प्रदाय की रजनीति होगी तो साफ़ है कि छद्म से अधिक खुली साम्प्रदायिकता ताकतवर बनेगी।
  2. पूँजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित – वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं , जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं । हमें याद रखना चाहिए कि धर्म सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहे वे हिन्दू हों , मुसलमान हों , सिख हों , इसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले , आम तौर पर वही लोग हैं , जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं – पूँजीपति , पुराने राजे – महाराजे , नवाबजादे , नौकरशाह और नये- नये सत्ताधीश , सत्ता के दलाल ! और समाज का प्रबुद्ध वर्ग , जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा , आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है ,अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है !
  3.  और , हम-आप भी , जो इनमें से नहीं हैं , धार्मिक-उन्माद में पड़कर यह भूल जाते हैं कि भविष्य का निर्माण इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से नहीं होता । अगर इतिहास में हुए रक्तरंजित सत्ता , धर्म , जाति , नस्ल , भाषा आदि के संघर्षों का बदला लेने की हमारी प्रवृत्ति बढ़ी , तो एक के बाद एक इतिहास की पर्तें उखड़ेंगी और सैंकड़ों नहीं हजारों सालों के संघर्षों , जय-पराजयों का बदला लेनेवाला उन्माद उभड़ सकता है ।फिर तो , कौन सा धर्म-समूह है जो साबुत बचेगा ? क्या हिन्दू-समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होंगे ? क्या इस्लाम के मानने वाले एक पंथ के लोग दूसरे पंथ बदला नहीं लेंगे ? दुनिया के हर धर्म में पंथभेद हैं और उनमें संघर्ष हुए हैं । तो बदला लेने की प्रवृत्ति मानव-समाज को कहाँ ले जायेगी ? क्या इतिहास से हम सबक नहीं सीखेंगे ?  क्या क्षमा , दया , करुणा , प्यार-मुहब्बत , सहिष्णुता ,सहयोग आदि मानवीय गुणों का वर्द्धन करने के बदले प्रतिशोध , प्रतिहिंसा , क्रूरता , नफ़रत , असहिष्णुता , प्रतिद्वन्द्विता को बढ़ाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालना और बढ़ाना चाहते हैं ?
  4. वक्त आ गया है कि हम भारतीय समाज में बढ़ती विघटनकारी प्रवृत्तियों को गहराई से समझें और साम्प्रदायिकता के फैलते जहर को रोकें । [ जारी ]

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साम्प्रदायिकता क्या है? उसके खतरे क्या हैं ?

  1. साम्प्रदायिकता है – अपनी पूजा-पाठ-उपासना-विधियों , खान-पान,रहन-सहन के तौर-तरीकों , जाति-नस्ल आदि की भिन्नताओं को ही धर्म का आधार मानना तथा अपनी मान्यता वाले धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी मान्यता वाले धर्मों को निकृष्ट समझना , उनके प्रति नफरत , द्वेष-भाव पालना और फैलाना ।
  2.  अपने लिए श्रेष्ठता और दूसरों के प्रति निकृष्टता का यही भाव हमारे सामाजिक विघटन का मूल कारण है , क्योंकि इससे आपसी सामाजिक रिश्ते टूटते हैं । परस्पर शंका-अविश्वास के बढ़ने से सामाजिक विभाजन इतना अधिक हो जाता है कि अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की बस्तियाँ एक दूसरे से अलग-थलग होने लगती हैं । यह अलगाव कई आर्थिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक कारणों से जुड़कर देश के टूटन का कारण बनता है ।
  3. हमारा समाज , हमारा देश एक बार इस प्रकार की अलगाववादी-प्रवृत्ति का शिकार होकर विघ्हतन के अत्यन्त दुखान्त दौर से गुजर चुका है । क्या हम उसे फिर फिर दोहराया जाना देखना-भोगना चाहते हैं ? यदि नहीं तो फिर धर्म के आधार पर राज्य और राष्ट्र की बात जिस किसी भी धर्म वाले के द्वारा क्यों न कही जाती हो , हम उसका डटकर विरोध क्यों नहीं करते ? सोचिये , क्या धर्म के नाम पर राष्ट्र की बात कहने या उसका समर्थन करने से अन्तत: हम उस मान्यता के ही पक्षधर नहीं बनते , जिसमें धर्म को अलग राष्ट्र का आधार माना गया था और जिस मान्यता के कारण भारत विभाजित हुआ था ?
  4. जब धर्म के नाम पर राष्ट्र बनेगा , तो नस्ल , जाति ,भाषा आदि के आधार पर राष्ट्र बनने से कौन रोक सकेगा ? कैसे रोक सकेगा ? तो फिर , इतनी विविधता वाले वर्तमान भारतीय राष्ट्र की तस्वीर क्या होगी ? धर्म पर आधारित राज्य-राष्ट्र की बात करने वाले या उनका समर्थन करने वाले कभी इस पर गौर करेंगे ? धर्माधारित राज्य-राष्ट्र की मांग करना भारतीय समाज एवं राष्ट्र के विघटन का आवाहन है । और वास्तविकता तो यह है कि धर्माधारित राष्ट्र राज्य-राष्ट्र की माँग के पीछे अनेक आर्थिक , राजनीतिक निहित हित साधने के लक्ष्य छिपे होते हैं । [जारी]

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