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सरकारी पदाधिकारियों से निवेदन किया अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढाएं, इलाज सरकारी अस्पतालों में कराएँ

इटारसी, 27 जनवरी 2014.
होशंगाबाद जिले के नागरिकों ने एक अनूठी मांग करते हुए आज इटारसी में एक नया अभियान शुरू किया. उन्होंने एक जुलुस निकाला, तहसील दफ्तर गए और सरकार में बैठे तमाम पदाधिकारियों को संबोधित एक निवेदन सौंपा. इसमें अनुरोध किया गया कि आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजें और अपने परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल में कराएँ. क्योंकि इनकी हालत सुधारने का और कोई तरीका नहीं है. जबसे बड़े और प्रभावशाली लोगों के परिवारों ने सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में जाना बंद कर दिया है तब से इनकी हालत बिगड़ती गई है. इससे साधारण जनता अच्छी शिक्षा और इलाज से वंचित हो गई है. यदि सत्ता में बैठे लोग इनका उपयोग करेंगे तो उन्हें इनकी दुर्दशा का अहसास होगा और इनकी हालत सुधारने का दबाव बनेगा. जब उनके बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी और उनके परिवारों का इलाज ठीक से नहीं होगा व उन्हें सरकारी अस्पतालों की बुरी हालत का शिकार होना पड़ेगा तब उन्हें समझ में आयेगा.

यह निवेदन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, तमाम बड़े अफसरों, जिला कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदारों सबको संबोधित था. इस मौके पर एक परचा भी बांटा गया जिसमे शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के तमाम क्षेत्रों में भेदभाव तथा गैरबराबरी का विरोध किया गया. इसमें पडोसी स्कूल पर आधारित साझा-समान स्कूल प्रणाली की मांग की गई जिसमे अमीर-गरीब सब बच्च्चे एक ही स्कूल में पढ़ें. शिक्षा और चिकित्सा के बाजारीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को रोकने की भी मांग की गई. इसी के साथ ‘भेदभाव विरोधी अभियान’ की शुरुआत हुई.

जुलुस में नारे लगाए जा रहे थे—‘राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’, ‘सबकी शिक्षा एक समान, मांग रहा है हिंदुस्तान’, ‘शिवराज अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढाओ’, ‘सरकारी डाक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस बंद करो’ आदि.

इस मौके पर अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष मंडल के सदस्य श्री सुनील ने कहा कि कल ही हमने देश का चौवनवा गणतंत्र दिवस मनाया. लेकिन संविधान में दर्ज समानता और जिन्दा रहने का अधिकार देश की जनता को आज तक नहीं मिल पाया. शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार के बिना लोग जिन्दा कैसे रहेंगे? उन्होंने खंडवा कलेक्टर को बधाई दी जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हैं. सेवानिवृत शिक्षिका दीपाली शर्मा, जिला पंचायत सदस्य श्री फागराम, अधिवक्ता श्री ओमप्रकाश रायकवार, शिक्षक श्री ब्रजमोहन सोलंकी, नारी जागृति मंच की पुष्पा ठाकुर, ममता सोनी, ममता मालवीय और प्रतिभा मिश्रा, ‘आप’ पार्टी के श्री गुप्ता आदि कई लोग बड़ी संख्या में इसमें शामिल हुए. उन्होंने इस ‘भेदभाव विरोधी अभियान’ को आगे बढाने का संकल्प लिया. सञ्चालन जिला शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष श्री राजेश व्यास ने किया.

इस कार्यक्रम का आयोजन जिला शिक्षा अधिकार मंच और नारी जागृति मंच ने मिलकर किया था.

राजेश व्यास,

अध्यक्ष, जिला शिक्षा अधिकार मंच

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ज्ञानजी की पोस्ट के सकारात्मक परिणाम भी हैं

ज्ञानदत्त जी की पोस्ट का जिसे नकारात्मक फल माना जाएगा उसके भी सकारात्मक पहलू हैं । जातिवाद जैसी भोंड़ी-विचारहीन गिरोहबन्दियाँ नंगा नाच करने लगीं । इसके अलावा इन नकारात्मक परिणामों के मुकाबले हिन्दी ब्लॉगाजगत की प्रतिभा भी प्रकट हुई – तार्किक आलोचना और सकारात्मक सोच के साथ।

मैं सुधी पाठकों का ध्यान दो टिप्पणियों तथा एक पोस्ट की ओर खींच रहा हूँ :

  1. डॉ. अनुराग की टिप्पणी
  2. चौपटस्वामी द्वारा अपने चिट्ठे समकाल पर लिखी लम्बी पोस्ट
  3. मसिजीवी की टिप्पणी (हांलाकि उनसे विस्तृत आलोचना की उम्मीद अभी भी है )

सुधी पाठक इन तीनों गंभीर टिप्पणियों को जरूर पढ़ें ।

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’लोकसंघर्ष’ के सुमन से ’nice’ से अलग टीप हासिल करने का श्रेय

’ लोकसंघर्ष ’ के सुमन द्वारा ’nice’ की टिप्पणी दिया जाना हिन्दी चिट्ठेकारी की एक वृहत चर्चित परिघटना है । मुझे अच्छी तरह याद है जब सुमन की विस्तृत टीपें हासिल हुआ करती थी । इसके बाद जो कुछ भी हुआ हो सुमन का ’nice’ – सत्याग्रह शुरु हुआ जो उन्होंने पूर्ण निष्ठा से चलाया ।

बहरहाल , आज लोकसंघर्ष के सुमन से स्वयंसेवी संस्थाओं पर मेरे साथी सुनील की लिखी पोस्ट पर ’नाइसेतर’ टीप पाकर मुझे गौरव सा महसूस हुआ । मुझे विनोबा के मौन की याद आई , जिसे उन्होंने एक बार तोड़ा था।

नाइसेतर टीप पर आप क्या सोचते हैं ?

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क्या नर्मदा तालाबों और गटर में बदल जाएगी ? नर्मदा घाटी की 20,000 साल पुरानी सभ्यता, संस्कृति को मिटाने पर कौन तुला है ?

‘‘हे नर्मदा मैया! जिस जमीन को तू हर साल अपने आंचल में समेट कर नया उर्वर जीवन देती रही है, बिजलीघर लग जाने के बाद, तेरी यही नियामत राख के पहाड़ो से बांझ हो जाएगी। तेरे भक्तों को बीमार करके जीते-जी मार डालेगी। तेरी कोख में लगने वाले इस दानवी बिजलीघर की राख और गंदगी से मैया! तेरी जीवनदायनी, निर्मल जलधारा भी जहरीली होने से नहीं बच पाएगी। हे मैया! अब तू ही तारणहार है।…………..माँ इन्हें सद्बुद्धि दे।’’

नर्मदा मैया के नाम यह पाती नर्मदा-दूधी संगम पर स्थित नरसिंहपुर जिले की गाडरवारा तहसील के छः गांवो के किसानों ने भेजी है। मध्यप्रदेश सरकार ने उनकी जमीन एन.टी.पी.सी. को 2640 मेगावाट का सुपर कोयला बिजलीघर बनाने के लिए देने का फैसला किया है। ऐसे दर्जन भर विशाल बिजली कारखाने नर्मदा की घाटी में लगाने की योजनाएं बन चुकी है। मध्यप्रदेश सरकार ने बार-बार ‘इन्वेस्टर्स मीट’ (कंपनियों व पूंजीपतियों के जलसे) बुलाकर उन्हें दावत दी है, उसका यह नतीजा है।

नर्मदा घाटी में कई बड़े बांध बनने से यह नदी पहले ही तालाबों और नाले में बदल गई है। ये बिजली कारखाने और वर्धमान-अभिषेक जैसे कारखाने लगने से क्या अब वह गटर में नहीं बदल जाएगी ? क्या उसकी गत भी यमुना और गंगा जैसी नहीं होगी ? क्या नर्मदा का पानी आचमन करने लायक, नहाने लायक और मवेशियों के पीने लायक भी रह जाएगा ? लाखों किसान व गांववासी तो सीधे उजड़ेंगे ही, इस नदी पर आश्रित करोड़ों लोगों की जिंदगी व रोजी-रोटी भी क्या बदबाद नहीं हो जाएगी ? यह कैसा विकास है ?

नर्मदा-तवा संगम पर बांद्राभान में 21से 23 मार्च 2010 तक दूसरा अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव हो रहा है। भाजपा नेता, राज्यसभा सांसद श्री अनिल माधव दवे के एन.जी.ओ. ‘नर्मदा समग्र’ द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का केन्द्रीय विषय ‘नदी और प्रदूषण’ है। क्या इसमें इस विनाश लीला को रोकने की कोई रणनीति बनेगी ? श्री अनिल दवे नर्मदा घाटी के इन भोले-भाले देहातियों की पुकार सुनकर क्या मध्यप्रदेश सरकार को कुछ सद्बुद्धि देंगे ?
ज्वलंत सवाल –

दो साल पहले भी बांद्राभान पर यह महोत्सव हुआ था। तब नर्मदा घाटी के कुछ लोगों ने आयोजकों से कुछ सवाल पूछे थे। इनमें प्रमुख थे –

ऽ      इस महोत्सव में नर्मदा पर बन रहे बड़े बांधों की विनाशलीला और विस्थापितों की दुर्दशा को क्यों एजेण्डा में शामिल नहीं किया गया ? क्या यह नदियों की मौत का उत्सव है ?

ऽ      नर्मदा के दोनों तरफ कई परियोजनाओं में आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है। क्या वे नर्मदा-पुत्र नहीं है ? उनकी जिंदगी पर आ रही मुसीबत पर आप मौन क्यों ?

ऽ      बरगी बांध बनने से नर्मदा में तरबूज-खरबूज की बाड़ियों का धंधा चौपट हो गया। अब बिजलीघरों की राखड़ और कारखानों के प्रदूषण से मछली खतम हो जाएगी। कहार-केवट समुदाय की इस बरबादी से आपका कोई सरोकार क्यों नहीं ?

ऽ      नदियों का निजीकरण, पानी का बाजारीकरण, बोतलबंद पानी के कारखानों वाली अमरीकी कंपनियों को करों में छूट,आदि पर आपने सवाल क्यों नहीं उठाए ?

ऽ      मध्यप्रदेश सरकार कंपनियों को क्यों बुला रही है ? इनसे नदियां, जमीन, जंगल, जैव विविधता बचेगी क्या ? विकास का यह जन-विरोधी मॉडल ही चलेगा क्या ?

ऽ      आप रामसेतु और रामजन्मभूमि को बचाने के नाम पर तो पूरी ताकत लगा देते हैं, किन्तु नर्मदा के बांधों में शूल्पणेश्वर, हापेश्वर, सिंगाजी, धाराजी, ओंकारेश्वर के डूबने पर चुप क्यों रहते हैं ?

ऽ      इस महोत्सव में शामिल होने के लिए हजारों रुपए का पंजीयन शुल्क क्यों रखा गया है ? नर्मदा घाटी में रहने वाले किसानों, मजदूरों, मछुआरों, आदिवासियों, विद्यार्थियों को चर्चा से बाहर क्यों रखा गया है ?

ऽ      इस महंगे आयोजन पर खर्च का हिसाब देंगे ? यह पैसा कहां से आया ?

जब देश के तीन-चौथाई से ज्यादा लोग 20रु. रोज से नीचे गुजारा कर रहे हैं, तो आपकी यह शान शौकत व फिजूलखर्च जायज है क्या ?

हमें जबाब चाहिए –

अफसोस है कि आयोजन श्री अनिल माधव दवे या नर्मदा समग्र ने इन सवालों का जबाब देने की जरुरत नहीं समझी। इन दो सालों में ये सवाल और ज्यादा गंभीर हो गए हैं। हम इनका जबाब चाहते हैं – नदी महोत्सव के आयोजकों से भी और मध्यप्रदेश सरकार व भारत सरकार से भी।

हम आयोजकों और प्रदेश सरकार से यह भी जानना चाहते हैं कि पिछले दो सालों में नर्मदा व अन्य नदियों को, उनके जनजीवन को और उनकी संस्कृति को बचाने के लिए कौन से ठोस कदम उठाए गए ? या सिर्फ दो साल में एक बार नदी महोत्सव की नौटंकी करके आप असलियत को ढकना चाहते हैं ? इस कार्यक्रम के महंगे रंगीन चिकने निमंत्रण पत्र में जो तीन सवाल छापे गए हैं वे हम पलटकर आपसे भी पूछना चाहते हैं –

1.              क्या आप नदियों को कचराघर बना नहीं रहे हैं ?

2.              क्या आप (बांध बनाकर) नदियों को सुखा नहीं रहे हैं ?

3.              क्या आप नदियों पर बात ज्यादा, और काम कम (या उल्टा काम) नहीं कर रहे हैं?

श्रीगोपाल गांगूडा, प्रदेष महामंत्री, समाजवादी जनपरिषद

किशन बल्दुआ, नगराध्यक्ष, समाजवादी जनपरिषद, पिपरिया

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कोंकण-केरलम-आसमान / स्लाईड्स

‘ मातृभूमि ’ केरल का एक प्रमुख दैनिक है । केरल के नौ शहरों के अलावा यह मुम्बई , चेन्नै , बंगलूरू और दिल्ली से भी छपता है । ७५ वर्ष पूर्व महात्मा गांधी अपने केरल प्रवास के दौरान इस अखबार के दफ़्तर में आये थे । इस स्मृति को अखबार वर्ष पर्यन्त भिन्न भिन्न शहरों में मना रहा है । हर महीने की १३ तारीख को इसका आयोजन होता है । उस इलाके के स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान होता है और सभा होती है । १३ जनवरी ,२०१० इतिहासकार-लेखक श्री राजमोहन गांधी ने इस वर्ष पर्यन्त आयोजन का उद्घाटन किया ।
१३ फरवरी को कण्णूर में आयोजित जलसे में ’मातृभूमि’ ने मुझे बुलाया था । इस न्यौते को कबूलते हुए मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा था। कण्णूर के टाउन हॉल में १९२४ से अब तक की ’मातृभूमि’ की यात्रा की एक प्रदर्शनी आयोजित थी । यह प्रदर्शनी एक अखबार के सफ़र के साथ साथ राष्ट्रीय आन्दोलन का जीवन्त दस्तावेज बन गई है ।
मातृभूमि के वर्तमान प्रबन्ध निदेशक श्री एम.पी. वीरेन्द्रकुमार कोज़िकोड़ के पूर्व सांसद हैं और एक समाजवादी नेता हैं । प्लाचीमाड़ा में कोका – कोला विरोधी संघर्ष के दौरान मेरा उनसे सम्पर्क हुआ था ।
मातृभूमि के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के अलावा समाजवादी जनपरिषद की केरल इकाई के साथियों ने कण्णूर और कोझिकोड जिले में मेरे कई कार्यक्रम आयोजित किए ।
सभी कार्यक्रमों की बाबत अलग – अलग पोस्ट लिखूंगा । यह चित्र प्रदर्शनी ’शैशव’ के लिए विशेष । कोंकण और केरल का सौन्दर्य तथा हवाई जहाज से देश – दर्शन करते वक्त मुझे लगा कि भूगोल की स्कूली पढ़ाई के कितने तथ्य इन दृश्यों से सगुण रूप से जज़्ब होते हैं । मालाबार तट और कोंकण की खूबसूरती , केरल का सौन्दर्य और राजनैतिक जागरूकता , अरब सागर – नदियों-मेघ और अरावली पर्वतमाला से बना वृष्टि-छाया प्रदेश ।

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दो कम्पनी विरोधी बाँके सिपाही या बहुरुपिए

दानवाकार कम्पनियाँ हमेशा सही काम करना चाहती हों ऐसा नहीं है । शायद वे सही काम कर ही नहीं सकतीं । मुमकिन है कि वे सही काम करना न चाहती हों । शायद वे भले काम करना चाहती हों लेकिन उनके शेयर धारकों को यह पसन्द न हो ।

सरकारें यदि अच्छे काम करना चाहतीं हैं तब क्या होता है ? क्या सिर्फ़ शेयर धारकों की जगह मतदाता रख देने से मामला स्पष्ट हो जाता है ?

१९९९ की शुरुआत में विश्व व्यापार संगठन की सिएटल में हुई बैठक के विरुद्ध जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए थे। उसी दौरान इन दो महानुभावों ने इस दौर के कुछ  असाध्य और बड़े मुद्दों को छेड़ा । वे सिएटल के विरोध प्रदर्शनों में शरीक न हो सके थे । उन्होंने सोचा कि हम भी कैसेअपनी हिस्सेदारी  सुनिश्चित करें ?  उन्होंने एक फर्जी वेबसाईट बनाई | मौसम परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर निहित स्वार्थों से जुड़े लॉबींग करने वालों की कथित वस्तुपरकता की पोल खोलने के लिए ।

थोड़े से झूठ का सहारा लेकर इन दोनों बांके सिपाहियों ने दुनिया की कई दानवाकार और कुख्यात कम्पनियों की करतूतों का पर्दाफाश किया है – अक्सर उनके शेयरधारकों के समक्ष ।  भोपाल गैस काण्ड के लिए जिम्मेदार यूनियन कारबाईड को खरीद लेने वाली डाऊ केमिकल , भूगर्भ-जल का दोहन करने वाली तथा नुकसानदेह पेय पिलाना वाली कोका कोला कम्पनी तथा नाईजीरिया की खेती को बरबाद करने वाली तथा विद्रोही रंगकर्मी केन सारो वीवा की फाँसी की जिम्मेदार शेल जैसी राक्षसी कम्पनियों से जुड़कर इन्हीं कम्पनियों के पूर्व प्रमुख ,पूर्व राष्ट्राध्यक्ष ,राजनेता , नौकरशाह मौसम परिवर्तन सम्बन्धी कानूनों को रोकने के लिए लॉबिस्ट बन जाते हैं । इन नामों की बानगी देखिए – पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन ,किल्न्टन,बुश,पूर्व ब्रिटिश प्रधान मन्त्री थैचर , सिनेमा स्टार और राजनेता स्वार्ज़निगर तथा अर्थशास्त्री मिल्टन फ़्रीडमेन । इन नामों को देख कर आप अन्दाज लगा सकते हैं कि कैसे लोग इस काम में लगते हैं ।  विश्व बैंक से जुड़े रहे मनमोहन सिंह ,अरुण शौरी जैसों के अलावा मोन्टेक सिंह अहलूवालिया तो एक ऐसे समूह से जुड़ा था जिसका घोषित उद्देश्य कॉर्पोरेट जगत से नीति निर्माताओं के बीच पुल बनाना था। कपिल सिब्बल , अरुण जेटली और सुबोध सहाय जैसे लोग शीतल पेयों और कचरा खाद्य कम्पनियों की रक्षा में प्रमुख हैं ।

अब इन दोनों बाँकुरों के काम के नमूने पर गौर कीजिए :

भोपाल स्थित यूनियन कारबाईड से रिसी गैस से हजारों लोग मारे गये थे तथा लाखों लोग आजीवान कष्ट और बीमारियां झेलने के लिए अभिशप्त हैं । कम्पनी की ओर से भयंकर भूलें और लापरवाहियाँ हुई थी । बड़े बड़े वकील रखकर एक छो्टे-से क्लिनिक के द्वारा गैस पीडितों की ’देखभाल” की जाती है ।  ऐसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत के लिए सन्देश होता है – यह सब तो होता रहता है , बिना जोखिम के जीवन कैसा ? फिर डाऊ केमिकल ने यूनियन कारबाईड को खरीद लिया । उस वक्त यूनियन कारबाईड की कीमत १२ अरब डॉलर आँकी गयी थी । डाऊ द्वारा अधिग्रहण के तुरन्त बाद जूड फिनिस्टेरा  नामक डाऊ का कथित नुमाईन्दा बीबीसी न्यूज़- पेरिस के माध्यम से ३० करोड दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत हुआ । उसने घोषणा की कि डाऊ केमिकल भोपाल गैस काण्ड की पूरी जिम्मेदारी लेती है तथा यूनियन कारबाईड को भंग करके गैसे पीडितों को १२ अरब डॉलर दिए जाएंगे ।  ये अप्रत्याशित घोषणा तत्काल इन्टरनेट की समाचार साईटों , और दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियों बनी । भोपाल की जनता मारे खुशी के सड़कों पर निकल आई । डाऊ के शेयरों से  २३ मिनट में दो अरब डॉलर का नुकसान हुआ ।

यह पूरी घोषणा झूठी थी । डाऊ की ऐसी कोई योजना नहीं थी । उसके कथित प्रतिनिधि या प्रवक्ता का कम्पनी से कोई सम्बन्ध नहीं था ।

वह व्यक्ति था एन्डी बिकलबॉम जो द यस मेन नामक एक समूह का राजनैतिक कार्यकर्ता था । बिकलबॉम और उसके साथी माईकेल बोनानो ने मिलकर डाऊ केमिकल के लिए डाऊ एथिक्स (नैतिकता) नामक एक फर्जी वेबसाईट बनाई थी । गैस काण्ड में कम्पनी की आपराधिक जिम्मेदारी का बरसों से अध्ययन करने वाले बीबीसी के पत्रकार इनके झाँसे में आ गये तथा इनकी वेबसाईट को डाऊ की असली वेबसाईट माना  । बीबीसी ने बाकायदे लाईव प्रसारण के लिए उन्हें अपने स्टूडियो में आमंत्रित किया । इस मौके के लिए एन्डी बिकलबॉम ने नया सूट खरीदा , बाल छँटवाये , क्या बोलना है इसकी तैयारी की और तब पेश हुआ ।

 एन्डी और माईक

एन्डी और माईक

कुछ ही घण्टों में इस शरारत से परदा उठा । खण्डन , स्पष्टीकरण की बौछार होती रही । ये येस मेन इन प्रतिष्ठित कम्पनियों की ’अस्मिता सुधारने’ (identity correction) की अपनी मुहिम में अगले अवसर की तलाश में आगे बढ़ लिए ।

यह किस्सा तथा ऐसे ही अन्य कई किस्से  परसों अमेरिका के केबल टेवि नेटवर्क में एचबीओ पर दिखाई गई इसी जोड़ी की बनाई गई फिल द येस मेन रूल द वर्ल्ड का हिस्सा थे । इनके समूह की वेबसाईट पर अवश्य जाँए । नीचे उक्त फिल्म का अधिकृत ट्रेलर है । फिल्म अक्टूबर में अमेरिकी सिनेमा हॉलों में आएगी । डी.वी.डी. अभी नहीं मिल रही है । जुगाड़ में हूँ ।

इन दोनों महानुभावों की कारगुजारियों में झकलेटी पत्रकारिता का पुट भल ही ही , भले ही ये ’साधन-शुद्धि’ की शर्तों का पालन न करते हों लेकिन इन दानवाकार कम्पनियों की चूल्हें हिलाने और उनकी गन्दी हरकतों को बेपरदा करने में वे काफ़ी हद तक कारगर हैं ।
[ इनसे जुड़ी खबरें – यहाँ हैं । ]

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