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सरकारी पदाधिकारियों से निवेदन किया अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढाएं, इलाज सरकारी अस्पतालों में कराएँ

इटारसी, 27 जनवरी 2014.
होशंगाबाद जिले के नागरिकों ने एक अनूठी मांग करते हुए आज इटारसी में एक नया अभियान शुरू किया. उन्होंने एक जुलुस निकाला, तहसील दफ्तर गए और सरकार में बैठे तमाम पदाधिकारियों को संबोधित एक निवेदन सौंपा. इसमें अनुरोध किया गया कि आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजें और अपने परिवार का इलाज सरकारी अस्पताल में कराएँ. क्योंकि इनकी हालत सुधारने का और कोई तरीका नहीं है. जबसे बड़े और प्रभावशाली लोगों के परिवारों ने सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में जाना बंद कर दिया है तब से इनकी हालत बिगड़ती गई है. इससे साधारण जनता अच्छी शिक्षा और इलाज से वंचित हो गई है. यदि सत्ता में बैठे लोग इनका उपयोग करेंगे तो उन्हें इनकी दुर्दशा का अहसास होगा और इनकी हालत सुधारने का दबाव बनेगा. जब उनके बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी और उनके परिवारों का इलाज ठीक से नहीं होगा व उन्हें सरकारी अस्पतालों की बुरी हालत का शिकार होना पड़ेगा तब उन्हें समझ में आयेगा.

यह निवेदन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, तमाम बड़े अफसरों, जिला कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदारों सबको संबोधित था. इस मौके पर एक परचा भी बांटा गया जिसमे शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के तमाम क्षेत्रों में भेदभाव तथा गैरबराबरी का विरोध किया गया. इसमें पडोसी स्कूल पर आधारित साझा-समान स्कूल प्रणाली की मांग की गई जिसमे अमीर-गरीब सब बच्च्चे एक ही स्कूल में पढ़ें. शिक्षा और चिकित्सा के बाजारीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को रोकने की भी मांग की गई. इसी के साथ ‘भेदभाव विरोधी अभियान’ की शुरुआत हुई.

जुलुस में नारे लगाए जा रहे थे—‘राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’, ‘सबकी शिक्षा एक समान, मांग रहा है हिंदुस्तान’, ‘शिवराज अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढाओ’, ‘सरकारी डाक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस बंद करो’ आदि.

इस मौके पर अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष मंडल के सदस्य श्री सुनील ने कहा कि कल ही हमने देश का चौवनवा गणतंत्र दिवस मनाया. लेकिन संविधान में दर्ज समानता और जिन्दा रहने का अधिकार देश की जनता को आज तक नहीं मिल पाया. शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार के बिना लोग जिन्दा कैसे रहेंगे? उन्होंने खंडवा कलेक्टर को बधाई दी जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हैं. सेवानिवृत शिक्षिका दीपाली शर्मा, जिला पंचायत सदस्य श्री फागराम, अधिवक्ता श्री ओमप्रकाश रायकवार, शिक्षक श्री ब्रजमोहन सोलंकी, नारी जागृति मंच की पुष्पा ठाकुर, ममता सोनी, ममता मालवीय और प्रतिभा मिश्रा, ‘आप’ पार्टी के श्री गुप्ता आदि कई लोग बड़ी संख्या में इसमें शामिल हुए. उन्होंने इस ‘भेदभाव विरोधी अभियान’ को आगे बढाने का संकल्प लिया. सञ्चालन जिला शिक्षा अधिकार मंच के अध्यक्ष श्री राजेश व्यास ने किया.

इस कार्यक्रम का आयोजन जिला शिक्षा अधिकार मंच और नारी जागृति मंच ने मिलकर किया था.

राजेश व्यास,

अध्यक्ष, जिला शिक्षा अधिकार मंच

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इधर मैकाले उधर गांधी – गीजूभाई / सुनील

पिछले दिनों मुझे केरल में त्रिशूर के पास एक स्कूल में जाने का मौका मिला। देश में चल रहे स्कूलों से यह काफी अलग था। करीब पांच एकड़ जमीन में जंगल है, बगीचा है, खेत है और स्कूल भी है। कक्षाओं के लिए खुला शेड है जिस पर खपरैल या नारियल के पत्तों की छत है। बच्चे कक्षा में पढ़ने के अतिरिक्त खेत और बगीचे में भी काम करते हैं। मेरा स्वागत एक नारियल के पानी से किया गया और बाद में वहीं लगे केले मैंने खाए। स्कूल के बच्चों के साथ मेरी सभा का संचालन एक वरिष्ठ छात्रा ने किया। सबसे पहले छात्राओं के एक समूह ने एक गीत से स्वागत किया जो कई भारतीय भाषाओं में था। मैंने उनसे पूछा कि मैं हिन्दी में बोलूं या अंग्रेजी में, तो ज्यादा बच्चों ने हिन्दी के पक्ष में हाथ खड़े किए। इस स्कूल में चार भाषाएं पढ़ाई जाती हैं – मलयालम, हिन्दी, अंग्रेजी और अरबी। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। क्यों, मैंने पूछा तो स्कूल संचालक ने बताया कि वे केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं और उसमें मलयालम माध्यम का प्रावधान नहीं है। फिर भी वे तीसरी कक्षा तक मलयालम में पढ़ाते हैं। एक कारण शायद यह भी होगा कि पालक भी अंग्रे्जी माध्यम में शिक्षा चाहते हैं। फिर भी हिन्दी पर उनका बहुत आग्रह है । संचालक ने मुझसे कहा कि अच्छे हिन्दी शिक्षक खोजने में मैं कुछ मदद करुं। इस स्कूल का संचालन एक मुस्लिम दंपत्ति कर रहे हैं। किन्तु बच्चे सभी धर्मों के हैं और सभी धर्मों के प्रति आदर के भाव पर आग्रह है।

बच्चों की जागरुकता के स्तर से मैं काफी प्रभावित हुआ। मैंने उनसे पूछा कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो जबाव मिला कि अच्छे नागरिक और अच्छा इंसान। मुझे शंका हुई कि कहीं यह सिखाया हुआ जवाब तो नहीं है। किन्तु जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि ऐसा नहीं है। मेरे वक्तव्य के बाद उनके सवाल पूछने की बारी थी, तो एक ने पूछा, राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर अच्छी होने पर भी देश की हालत खराब क्यों है ? बाद में दो छात्राओं ने मुझसे देर तक बात की। वे इरोम शर्मिला के बारे में जानती थी। किन्तु क्या उत्तर-पूर्व से सशस्त्र बल विशेष शक्ति कानून हटाना उचित होगा, एक ने मुझसे पूछा। उत्तर-पूर्व, कश्मीर, माओवाद आदि पर फिर विस्तार से बात हुई।

इस स्कूल के बच्चों से मेरी पहली मुलाकात नर्मदा घाटी में नर्मदा बचाओ आंदोलन के 25 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में हुई। वे बच्चे खूब जोश से नारे लगा रहे थे, गीत गा रहे थे, लोगों से जाकर हिन्दी में बात कर रहे थे। सुबह झाडू से सफाई करते मैंने उन्होंने देखा। मैंने उनसे पूछा कि तुम्हें यहां घूमने में मजा आ रहा है, तो एक लड़की ने कहा कि हम घूमने नहीं, सीखने आए हैं। इसके पहले वे अयोध्या के मुद्दे पर उत्तर भारत में आयोजित एक सद्भाव यात्रा में भी शरीक हुए थे। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में उनका पांच दिन का शिविर केरल की एक नदी किनारे लगने वाला है, जो औद्योगिक प्रदूषण से प्रभावित हो रही है। केरल में ही प्लाचीमाड़ा में कोका-कोला के संयंत्र के खिलाफ संघर्ष से भी ये बच्चे अच्छी तरह परिचित है। उन्होंने बताया कि वे कोका-कोला, पेप्सी आदि शीतल पेय नहीं पीते हैं। इस स्कूल का नाम ‘सल-सबील ग्रीन स्कूल’ है और केरल में बह रही पर्यावरण चेतना की बयार का यह एक हिस्सा है। सल-सबील अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है – ‘‘स्वर्ग का झरना’’। इस स्कूल के नए बन रहे भवन का शिलान्यास मेधा पाटकर ने किया था। स्कूल के संचालक श्री हुसैन ‘जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय’ के केरल प्रांत के संयोजक है। वे बच्चों की शिक्षा को जन संघर्षों, पर्यावरण चेतना, सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और धार्मिक सद्भाव से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

इस स्कूल में 10वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है। साधनों के अभाव के कारण कोई छात्रावास नहीं है। बच्चे आसपास के इलाके से प्रतिदिन स्कूल बस से आते हैं। फीस तीन-चार सौ रु. महीने है, जो उस इलाके के साधारण परिवारों की हैसियत के अंदर है। इस मामले में यह स्कूल अन्य वैकल्पिक स्कूलों से अलग है। ‘ऋषिवैली’ जैसे स्कूलों ने भी वैकल्पिक शिक्षा के अच्छे प्रयोग किए हैं, किन्तु वे काफी महंगे हैं। कृष्णमूर्ति फाउन्डेशन, अरोबिन्दो आश्रम आदि द्वारा संचालित अच्छे स्कूल अधिकतर संपन्न उच्च वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित हो गए हैं। दयानन्द एंग्लों वैदिक सोसायटी के डीएवी स्कूल व कॉलेज भी आम ढर्रे में ढल गए हैं और व्यवसायीकरण की गिरफ्त में आ रहे हैं। संघ परिवार द्वारा संचालित सरस्वती विद्यालयों में साम्प्रदायिकता और संकीर्णता की सोच का खतरा तो है ही, व्यवसायिकता का प्रवेश वहां भी हो गया है।

शिक्षा के मामले में आज यही सवाल सबसे बड़ा सवाल है। देश का हर स्कूल सल-सबील स्कूल कैसे बने ? अच्छी शिक्षा त्रिशूर जिले के उस इलाके के तीन-चार सौ बच्चों तक सीमित न रहकर देश के सारे 30 करोड़ बच्चों को कैसे मिले ? अच्छी शिक्षा से आशय अच्छे नंबर लाने और आईआईटियन या आईएएस तैयार करने से नहीं है। अच्छी शिक्षा से मतलब आनंददायक, रुचिकर, बहुमुखी, बहुआयामी शिक्षा से है जो महज नौकरशाह या सायबर-कुली तैयार करने के बजाय बच्चे की विविध प्रतिभाओं का विकास करते हुए जिम्मेदार नागरिक और अच्छे इंसान तैयार करे।

आज हमारे स्कूलों में ठीक उल्टा होता है। पढ़ाई का मतलब सिर्फ रटना है और रटना कभी भी आनंददायक नहीं हो सकता है। इंग्लिश मीडियम की होड़ में यह कष्ट और बढ़ता जा रहा है,क्योंकि एक विदेशी भाषा में रटना ज्यादा मुश्किल ह। बस्ते का बोझ बढ़ता जा रहा है। ऊपर से बच्चों को स्कूल के अलावा ट्यूशन व कोचिंग में और जाना पड़ता है। मां-बाप द्वारा प्रतिस्पर्धा की मशीन में बच्चों को छोटी उमर से ही धकेल दिया जाता है और उनका बचपन छीन लिया जाता है।

स्कूल की छुट्टी होने पर बच्चे इतने प्रफुल्लित होते हैं और घर की तरफ इस तरह दौड़ लगाते हैं मानो जेल से छूटे हों। शिक्षा खेल-खेल में क्यों न हो, गीत-नाच-कहानी-नाटक के साथ क्यों न हो, सैर-सपाटे के साथ क्यों न हो, इस पर कभी सोचा ही नहीं गया। आखिर भूगोल की पढ़ाई नदियों व पहाड़ों की सैर करते हुए, अर्थशास्त्र की पढ़ाई खेतो-बाजारों में घूमते हुए तथा विज्ञान की पढ़ाई कुदरत तथा आसपास के वातावरण में प्रयोग करते हुए ही सबसे अच्छी हो सकती है। किन्तु हमने पूरी पढ़ाई को परिवेश व समाज से पूरी तरह काटकर बंद कमरों में किताबी ज्ञान को रटने तक सीमित कर दिया है। ‘तारे जमीं पर’ फिल्म के नन्हें नायक की तरह यदि बच्चा उबाऊ कक्षा के ब्लेक बोर्ड की तरफ न देखकर खिड़की के बाहर चिड़िया या तितली को देखने लगता है, तो वह डांट और मार खाता है, जबकि दोष तो इस शिक्षा व्यवस्था का होता है।

एक बच्चे के अंदर कई तरह की प्रतिभाएं हो सकती हैं। वह एक अच्छा खिलाड़ी, कलाकार, नेता, किसान, मछुआरा, कारीगर या मिस्त्री हो सकता या सकती है। समाज में इन सबकी जरुरत है। किन्तु हमारी शिक्षा व्यवस्था इन सारी प्रतिभाओं व कौशलों को नजरअंदाज करके महज किताबी ज्ञान को रटने और उसे परीक्षा भवन में ढाई-तीन घंटे में उगल देने की प्रतिभा व क्षमता को ही पहचानती है और पुरुस्कृत करती है। अच्छी पढ़ाई के नाम पर भी महज ज्यादा से ज्यादा जानकारी को बच्चे के दिमाग में ठूंस देने की कोशिश होती है। इस चक्कर में देश के करोड़ों बच्चों की ज्यादा उपयोगी विविध प्रतिभाओं का तिरस्कार व उपेक्षा होती जाती है। यह उनके साथ अन्याय है और देश की प्रगति में भी बड़ी बाधा है।

इस तरह की शिक्षा का सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और देश की जरुरतों से अलगाव व कटाव भी स्वाभाविक है। अच्छे अंक लेकर ऊंची कमाई वाली नौकरी पाना इसका एकमात्र लक्ष्य और सफलता की कसौटी बन गया है। ऐसी शिक्षा के सफल उत्पाद स्व-केन्द्रित, स्वार्थी और भ्रष्ट बनेंगे ही। पिछले कुछ समय से शिक्षा में व्यवसायीकरण तथा बाजारीकरण की जो आंधी चली है, उसने इन विकृतियों को और बढ़ाया है। सरकार ने भी शिक्षा मंत्रालय का नाम बदलकर ‘मानव संसाधन मंत्रालय’ कर दिया है। तब से घोषित रुप से शिक्षा अच्छे नागरिक व अच्छे इंसान तैयार करने और लोकतांत्रिक आजाद भारत के नवनिर्माण का लक्ष्य छोड़कर महज वैश्विक पूंजीवादी बाजार के लिए संसाधन तैयार करने का माध्यम बन गई है। अफसोस की बात है कि इसके बावजूद देश के कई मूर्धन्य शिक्षाशास्त्री इसी की सेवा में जुटे हैं।

भारतीय शिक्षा की यह दयनीय हालत कई अन्य मामलों की तरह औपनिवेशिक विरासत के कारण है। इसकी नींव लॉर्ड मैकाले ने अंगरेज साम्राज्य की जरुरत के हिसाब से डाली थी। उन्हें महज बाबू और हुक्म का पालन करने वाले कारिन्दों की जरुरत थी। इसलिए रचनात्मकता, मौलिकता, जिज्ञासा, विविधता आदि से रहित इस षिक्षा में सिर्फ अक्षरज्ञान, कागजीज्ञान और अनुकरण पर जोर दिया गया था। आजादी के आंदोलन में इसे आमूल-चूल बदलने की बात बराबर होती थी। महात्मा गांधी ने ‘नई तालीम’ के कई प्रयोग किए थे। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांति निकेतन की स्थापना की थी। गिजुभाई ने नई तरह की शिक्षा और बाल मनोविज्ञान पर अद्भुत पुस्तकें लिखी थी। उनकी लघु उपन्यासनुमा पुस्तक ‘‘दिवास्वप्न’’ ने तो कई लोगों को नए ढंग की शिक्षा का सपना देखने के लिए प्रेरित किया है। किन्तु ये पुस्तकें गुजराती में थी, अंगरेजी में नहीं, इसलिए आज भी भारत के शिक्षा- के साथ बाजारु भी बनती जा रही है।

मैकाले एक तरफ है, गांधी-गिजुभाई दूसरी तरफ है। देश किधर जाएगा, इसका फैसला आने वाले समय में होगा। इस चयन में सल-सबील जैसे स्कूल हमें मददगार होंगे। खतरा यही है कि पूरी व्यवस्था में बदलाव के बजाय वे एक टापू और अपवाद बनकर न रह जाएं।

( ईमेल -sjpsunil@gmail.com )

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लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।

– सुनील, ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)

पिन कोड: 461 111

मोबाईल 09425040452

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कविता / होमवर्क / श्यामबहादुर ‘नम्र’

होमवर्क

एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है।
वह लकड़ियाँ बटोरकर घर लाती है,
फिर माँ के साथ भात पकाती है।

एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है,
शाम को थकी मांदी घर आती है।
वह स्कूल से मिला होमवर्क, माँ-बाप से करवाती है।

बोझ किताब का हो या लकड़ी का दोनों बच्चियाँ ढोती हैं,
लेकिन लकड़ी से चूल्हा जलेगा, तब पेट भरेगा,
लकड़ी लाने वाली बच्ची, यह जानती है।
वह लकड़ी की उपयोगिता पहचानती है।
किताब की बातें, कब, किस काम आती हैं?
स्कूल जाने वाली बच्ची बिना समझे रट जाती है।

लकड़ी बटोरना, बकरी चराना और माँ के साथ भात पकाना,
जो सचमुच गृह कार्य हैं, होमवर्क नहीं कहे जाते हैं।
लेकिन स्कूल से मिले पाठों के अभ्यास,
भले ही घरेलू काम न हों, होमवर्क कहलाते हैं।

ऐसा कब होगा,
जब किताबें सचमुच के ‘होमवर्क’ (गृहकार्य) से जुड़ेंगी,
और लकड़ी बटोरने वाली बच्चियाँ भी ऐसी किताबें पढ़ेंगी?

– श्यामबहादुर ‘नम्र’

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लछमिनिया : एक बहादुर नारी को प्रणाम

मुश्किल से छ: बरस का नत्थू  अपना पट्टी-खड़िया भरा बस्ता छोड़कर पाठशाला से निकल पड़ा । अपने बाप के गाँव से करीब २०-२२ किलोमीटर दूर ननिहाल के लिए,पैदल,निपट अकेले । कुछ दिनों पहले उसके नाना बहुत चिरौरी-मिन्नत के बाद उसे और उसकी माँ को नत्थू के मामा चुन्नू के ब्याह में शामिल करने के लिए विदा करा पाये थे । सौभाग्य से उसके ननिहाल की एक महिला की शादी रास्ते के एक गाँव में हुई थी । उसने अकेले नत्थू को ’वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो’ की तर्ज पर आते देखा तो अपने घर ले आई । रात अपने घर रक्खा । अगले दिन अपने पति के साथ नत्थू को उसके ननिहाल भेजा। करीब बयालिस साल बाद आज नत्थू सोच कर बता रहा था ,’ यदि वे मौसी ननिहाल की जगह मुझे बाप के गाँव वापिस भेज देती तो मेरी कहानी बिलकुल अलग होती ।’

पति द्वारा मार-पीट और  उत्पीड़न से तंग आ कर नत्थू की माँ लछमिनिया पहले भी एक बार मायके आ गई थी। भाइयों ने अपने बहनोई से बातचीत करके तब उन्हें वापिस भेजा था । नत्थू का छोटा भाई लाल बहादुर तब पैदा हुआ था। पति की दरिन्दगी जारी रही तो  लछमिनिया लाल बहादुर को ले कर अंतिम तौर पर निकल आई। नत्थू से मिलने जातीं अकेले । उस वक्त उत्पीड़न होता तो एक बार उन्होंने पुलिस को शिकायत कर दी । पुलिस ने नत्थू के बाप को हिदायत कि लछमिनिया  नत्थू से मिलने जब भी आये तब यदि उसने बदतमीजी की तो उसे पीटा जाएगा।

बहरहाल , नत्थू बाप के घर से जो ननिहाल आया तो अंतिम तौर पर आया । लछमिनिया खेत में मजूरी करने के बाद,खेत में पड़े अनाज के दाने इकट्ठा करती,खेत में बचे आलू-प्याज इकट्ठा कर लेती। मुट्ठी भर अनाज  भी इकट्ठा होते ही उसे जन्ते पर पीस कर बच्चों को लिट्टी बना कर देती । बैल-गाय के गोबर से निकले अन्न को भी लछमिनिया एकत्र करती।

लछमिनिया की गोद में खेले उसके छोटे भाई चुन्नू ने बड़ी बहन का पूरा साथ दिया । चुन्नू टेलर मास्टर हैं । चुन्नू ने भान्जों को सिलाई सिखाई । जूनियर हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद नत्थू ने कहा कि वह माँ की मेहनत और तपस्या को और नहीं देख पायेगा इसलिए पढ़ाई छोड़कर पूरा वक्त सिलाई में लग जायेगा। चुन्नू और लछमिनिया ने उसे समझाया कि उसे पढ़ाई जारी रखनी चाहिए।

नत्थू ने सिलाई करते हुए दो एम.ए (अंग्रेजी व भाषा विज्ञान),बी.एड. तथा तेलुगु में डिप्लोमा किया। विश्वविद्यालय परिसर के निकट जगत बन्धु टेलर में जब वह काम माँगने गया तो टेलर मास्टर को उसने नहीं बताया कि वह विश्वविद्यालय में पढ़ता भी है । वहाँ उसे सिलाई का चालीस प्रतिशत बतौर मजदूरी मिलता। हिन्दी और अंग्रेजी के नत्थू के अक्षर मोतियों की तरह सुन्दर हैं ।

नत्थू बरसों मेरा रूम-पार्टनर रहा। उसकी प्रेरणा से न सिर्फ़ उसके छोटे भाई लाल बहादुर ने उच्च शिक्षा हासिल की अपितु गाँव के टुणटुणी और भैय्यालाल ने भी एम.ए और बी.एड किया। चारों सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं ।

टुणटुणी के साथ एक मजेदार प्रसंग घटित हुआ। टुणटुणी से गाँव के शिक्षक कमला सिंह स्कूल में अक्सर कहते,’ कुल चमार पढ़े लगिहं त हर के जोती? ’ संयोग था कि पड़ोस के जौनपुर जिले के राज कॉलेज में जहाँ टुणटुणी शिक्षक है कमला सिंह का पौत्र दाखिले के लिए गया और अपने गाँव के टुणटुणी से मिला । टुणटुणी ने उससे कहा ,’सब ठाकुर पढ़े लगिहें त हर के जोतवाई ?’ पोते ने अपने दादाजी को जाकर यह बताया। कमला सिंह ने टु्णटुणी से मिलकर लज्जित स्वर में कहा, ’अबहिं तक याद रखले हउव्वा !’

चार दिन पहले लछमिनिया गुजर गईं । नत्थू हिमाचल प्रदेश से केन्द्रीय विद्यालय से आ गया था। लाल बहादुर शहर के इन्टरमीडियट कॉलेज में अध्यापक है। दोनों बच्चों की नौकरी लगने के बाद लछमिनिया के आराम के दिन आये। टोले भर के बच्चे इस दादी को घेरे रहते । उन्हें लछमिनिया दादी कुछ न कुछ देतीं । गांव के कुत्ते भी उनसे स्नेह और भोजन पाते। उनके गुजरने की बात का अहसास मानो उन्हें भी हो गया था। गंगा घाट पर मिट्टी गई उसके पहलेचुन्नू के दरवाजे पर अहसानमन्दी के साथ यह गोल भी जुटी रही।

नत्थू का बचपन का मित्र और सहपाठी रामजनम हमारे संगठन से जुड़ा और अब पूर्णकालिक कार्यकर्ता है।

रामजनम शोक प्रकट करने नत्थू के मामा के घर पहुँचा तो दोनों मित्रों में प्रेमपूर्ण नोंक-झोंक हुई :

रामजनम – माई क तेरही करल कौन जरूरी हव ?

नत्थू –  तूं अपने बाउ क तेरही काहे कइल ? हिम्मत हो त अपने घर में बाबा साहब क चित्र टँगा के दिखावा !

आज चौथे दिन नत्थू ने पिण्डा पारने का कर्म काण्ड किया तब मैं मौजूद था । यह कर्म काण्ड पूरा कराया दो नाउओं ने । लाल बहादुर ने उन्हें उनके मन माफ़िक पैसे दिए। नाऊ जैसी जजमानी करने वाले हजामत के लिए ठाकुरों के दरवाजे पर रोज जाते हैं ,पिछड़ों के यहाँ हफ़्ते में एक दिन और दलित नाऊ के दरवाजे पर जाते हैं । बहरहाल इस कर्म काण्ड के लिए इनारे के किनारे बने सार्वजनिक मण्डप में नाऊ आए थे।

नत्थू के स्कूल में प्राचार्य के दफ़्तर में गांधी को रेल से नीचे धकिया कर गिराने की तसवीर लगी थी। वह तसवीर हटा दी गई। नत्थू ने लड़कर पाँच मिनट में वह चित्र वापस लगवाया ।

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हमें नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार / श्यामबहादुर ’ नम्र ’

हमे नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार,
जो गैर-जरूरी बातें जबरन सिखाये ।
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये,
हमें नहीं चाहिए ऐसा स्कूल
जहाँ जाकर जीवन के हुनर जाँए भूल।
हमें नहीं चाहिए ऐसी किताब
जिसमें न मिलें हमारे सवालों के जवाब
हम क्यों पढ़ें वह गणित,
जो न कर सके जिन्दगी का सही-सही हिसाब।
क्यों पढ़ें पर्यावरण के ऐसे पाठ
जो आँगन के सूखते वृक्ष का इलाज न बताये॥
गाँव में फैले मलेरिया को न रोक पायें
क्यों पढ़ें ऐसा विज्ञान,
जो शान्त न कर सके हमारी जिज्ञासा ।
जीवन  में जो समझ में न आये,
क्यों पढ़ें वह भाषा ।
हम क्यों पढे़ वह इतिहास जो धार्मिक उन्माद बढ़ाए
नफ़रत का बीज बोकर,
आपसी भाई-चारा घटाये।
हम क्यों पढ़ें ऐसी पढ़ाई जो कब कैसे काम आएगी,
न जाए बताई ।
परीक्षा के बाद, न रहे याद,
हुनर से काट कर जवानी कर दे बरबाद ।
हमे चाहिए शिक्षा का अधिकार,
हमे चाहिए सीखने के अवसर
हमे चाहिए किताबें ,
हमें चाहिए स्कूल।
लेकिन जो हमें चाहिए हमसे पूछ कर दीजिए।
उनसे पूछ कर नहीं जो हमें कच्चा माल समझते हैं ।
स्कूल की मशीन में ठोक-पीटकर
व्यवस्था के पुर्जे में बदलते हैं,
हमें नहीं चाहिए शिक्षा का ऐसा अधिकार जो
गैर जरूरी बातें जबरन सिखाये
हमारी जरूरतों के अनुसार सीखने पर पाबन्दी लगाये ।
-श्याम बहादुर ’ नम्र ’

कवि के स्वर में कविता का पाठ सुनें इस पर खटका मार कर ।

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