Category Archives: भवानी प्रसाद मिश्र

देश की माटी ,देश का जल/रवीन्द्रनाथ ठाकुर/अनु. भवानीप्रसाद मिश्र

देश की माटी देश का जल

हवा देश की देश के फल

सरस बनें प्रभु सरस बने

देश के घर और देश के घाट

देश के वन और देश के बाट

सरल बनें प्रभु सरल प्रभु

देश के तन और देश के मन

देश के घर के भाई -बहन

विमल बनें प्रभु विमल बनें

– रवीन्द्रनाथ ठाकुर /अनुवाद- भवानीप्रसाद मिश्र

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पुष्पा भारतीजी कहानी का एक पहलू यह भी है

आपातकाल की औपचारिक घोषणा के पहले भी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा पत्र-पत्रिकाओं पर नकेल कसना शुरु हो चुका था । सेन्सरशिप न होने के बावजूद सरकारी विज्ञापन और अखबारी कागज के कोटे आदि के द्वारा यह अंकुश रखा जाता । इसी दौर का एक प्रसंग बता रहा हूँ । धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध कविता मुनादी ,एक छोटी साहित्यिक पत्रिका कल्पना में प्रकाशित हुई । मैंने उन्हें लिखा कि व्यापक पाठक समूह तक पहुँचाने के लिए मुनादी को धर्मयुग में छापा जाए । भारतीजी के उत्तर का चित्र पाठक देख सकते हैं । कुछ ही समय बाद आपातकाल लागू हुआ । भारती जी और सचेत हो गए । भवानीप्रसाद मिश्र ने आपातकाल के खिलाफ़ प्रतिदिन तीन कविताएं लिख कर त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प पूरा किया । १९७७ में जनता पार्टी के जीतते ही धर्मयुग ने आपातकाल पर विशेषांक निकाला जिसके बीच के पृष्ट पर एक तरफ़ जेपी द्वारा चण्डीगढ़ जेल में लिखी कविता ( जीवन विफलताओं से भरा है , सफलता जब कभी आईं निकट,दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से।…..) और दूसरी तरफ़ मुनादी छापी गयी । ‘ आत्म प्रचार ‘ तब आवश्यक हो गया था । संकट के दौर में ही बड़े बड़ों की औकात का पता चल पाता है ।

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

धर्मवीर भारती का पोस्ट कार्ड

’ शब्दों का सफ़र’ में मेरी यह टिप्पणी ४ मई २००८ को छपी थी ।

आज पुष्पा भारती जी ने मन्नू भण्डारी की आत्मकथा की बाबत ’हिन्दुस्तान ’ में एक लेख लिखा है । धर्मवीर भारती की ’मुनादी’ के हम भी कायल थे । शायद जेपी आन्दोलन का हर छोटा – बड़ा सिपाही था । भारतीजी अपातकाल लगने के पहले ही चिंगुर चुके थे । आपातकाल के दौरान भवानी बाबू की कविताओं ( बाद में ’त्रिकाल सन्ध्या’ में प्रकाशित ) को न छाप पाने की मजबूरी जताते हुए धर्मवीर भारती रोए भी थे ।  भाकपा खेमे के बुद्धिजीवियों से वे नहीं जुड़ गये यह गनीमत थी । काशी विश्वविद्यालय के कुछ संघी अध्यापक भी भाकपा खेमे के अध्यापक संगठन के सदस्य बन गये थे उस ’दु:शासन पर्व’ में ।

मन्नूजी को जितना पुष्पाजी ने उद्धृत किया है उसमें सच का अंश भी है । इसलिए पुष्पाजी द्वारा हल्की भाषा में लिखे गए इस प्रतिवाद के बावजूद मन्नूजी का लिखा टिका भी रहेगा। जिस दौर में अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की कोशिश की गयी हो उस दौर में साहित्यकारों की भूमिका की बिबाक विवेचना जरूरी है ।

भवानीबाबू ने न सिर्फ़ आपातकाल में कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या की अपितु जब जनता पार्टी वाले आपस में लड़ने लगे तब भी एक कविता में लिखा –

’जब आकाश घिरा था , काले बादल छाये थे, तब हम सब साथ थे

काले बादल छँट गये तो क्या हम भी छँट लें ? ’

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दोनों मूरख , दोनों अक्खड़ / भवानीप्रसाद मिश्र

चलो भाई चारे को बोओ

अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
हाट से लौटे,
ठाट से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे .

बात बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं.
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची.
अब वह जीता,अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे –
सबके खिले हुए थे चेहरे !

मगर एक कोई था फक्कड,
मन का राजा कर्रा – कक्कड;
बढा भीड को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड कर.

अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
गर्जन गूंजी,रुकना पडा,
सही बात पर झुकना पडा !

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लडने में मत खोऒ
चलो भाई चारे को बोऒ!

खाली सब मैदान पडा है,
आफ़त का शैतान खडा है,
ताकत ऐसे ही मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ.
-भवानी प्रसाद मिश्र

 कुछ अन्य बाल कविताएं :

चार कौए उर्फ चार हौए

सूरज का गोला

तब कैसा मौसम ठंडा जी – राजेन्द्र राजन

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

नल की हडताल

  साभार : अनहदनाद


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तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र

[ ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक ‘समकालीन सृजन’ , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता – ७००००७ से साभार ]

तार के खंभे

एक सीध में दूर-दूर तक गड़े हुए ये खंभे

किसी झाड़ से थोड़े नीचे , किसी झाड़ से लम्बे ।

कल ऐसे चुपचाप खड़े थे जैसे बोल न जानें

किन्तु सबेरे आज बताया मुझको मेरी माँ ने –

इन्हें बोलने की तमीज है , सो भी इतना ज्यादा

नहीं मानती इनकी बोली पास-दूर की बाधा !

अभी शाम को इन्हीं तार के खंभों ने बतलाया

कल मामीजी की गोदी में नन्हा मुन्ना आया ।

और रात को उठा , हुआ तब मुझको बड़ा अचंभा –

सिर्फ बोलता नहीं , गीत भी गाता है यह खंभा !

– भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९५९ ]

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