कविता / चन्द्रकान्त देवताले / प्रेम पिता का दिखाइ नहीं देता.

तुम्हारी निश्चल आंखें

तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

ईथर की तरह होता है

जरूर दिखाई देती होंगी नसीहतें

नुकीले पत्थरों-सी

दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में

पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वां नम्बर है मेरा

पर बच्चों के फूलोंवाले बगीचे की दुनिया में

तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए

मुझे माफ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था

मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी

अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो

मैं खुश हूं सोचकर

कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई।

– चन्द्रकान्त देवताले.

पिता का प्यार

2 टिप्पणियाँ

Filed under पिता का प्यार, poem

2 responses to “कविता / चन्द्रकान्त देवताले / प्रेम पिता का दिखाइ नहीं देता.

  1. subodh

    sach me maa ka prem to sabko dikhta hai pita ka prem dikhai nahi deta

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