गैर प्लास्टिक खिलौनों को न भूलें

हाथ के बने

दशहरे पर ’लंका’ के मेले में गया । बतौर शाम की सैर । गंगा के उस पार रामनगर है । चित्रकूट,पंचवटी आदि मोहल्ले रामनगर में हैं। तुलसीदास के समय से चल रही रामलीला के अलग-अलग दृश्य इन अलग अलग मोहल्ले में होते हैं।

मेला प्लास्टिक के खिलौनों और सामानों से अटा पड़ा था । ये ताड़ पत्र के सामानों की एक दुकान और चार-पाँच मिट्टी के गुल्लकों और खिलौनों के दुकानें । ताड़ पत्र का यह झुनझुना और टोकरी दो बहने और उनकी मां करीब १६ किलोमीटर पैदल चल कर मेले में बेचने लाई थीं । उनके पास कुल सामान २५०- ३०० से ज्यादा का न था । बनारस के प्रसिद्ध चटक रंगों के बने कागज के मुखौटे दिखे ही नहीं !

2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “गैर प्लास्टिक खिलौनों को न भूलें

  1. मिट्टी के खिलौनों से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुचता है तथा साथ ही जिस स्वरोजगार कि बाते हम सभी करते है उसको भी बल मिलता है ! आज भी आदिवासियों के गाँवों में आप पत्तो तथा घांस -फूस के बने समानो कि उपयोगिता उनके दैनिक जीवन में देख सकते है ! इन खिलोनो तथा अन्य वस्तुओ को खरीद कर हम उनके इस कला को भी जीवित रखने में सहयोग कर सकते है , साथ ही पर्यावरण कि सुरक्षा में अपना सहयोग दे सकते है !

  2. पहले दिवाली के समय मिट्टी के खिलौने और जिसे आपने चित्र में दिखाया है, उसे यानि मउनी के दर्शन होते थे। (ध्यान नहीं कि मउनी में उपर टंगना होता है।) अब तो बच्चों के पीठ पर बीस किलो का कागजी बोरा लादकर उससे बचपन छीन लिया जाता है। सब माँ-बाप भी खूब काबिल समझते हैं खुद को। चाहते हैं कि जनमते ही ठेलो स्कूल में। इन्तजार तो कर ही नहीं सकते 5-6 साल तक। खिलौना, वो भी मिट्टी का, नहीं, हाथ-कपड़े गंदे हो जाएंगे न! इसलिए अब क्रिकेट खेलो और वीडियो गेम भी अब आने के पहले जाने लगा है कम्यूटर के आने से।

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