सस्ती नैनो – मंहगा खेल

कुछ बरस पहले भारत के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने यह घोषणा करके धमाका -सा किया था कि वे भारत के निम्न मध्यम वर्ग के लिए एक लाख रु. वाली कार बनाएंगे। यह दुनिया की सबसे सस्ती कार होगी और सबसे कम ईंधन-खर्च वाली कार होगी। इसे ‘नैनो’ नाम दिया गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है सूक्ष्म या अति सूक्ष्म। अभी तक इसका उपयोग एक तरह की नवीनतम तकनालॉजी – ‘नैनो टेक्नोलॉजी’- को बताने के लिए किया जाता रहा है।
इस लखटकिया कार को पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के चमत्कार के रुप में पेश किया गया। किस तरह से इनके फायदे धीरे-धीरे नीचे तक पहुंचेंगे, इसकी मिसाल के रुप में भी इसे पेश किया गया। किन्तु पश्चिम बंगाल में इस नैनो कार के कारखाने के लिए कोलकाता से 45 कि.मी. दूर सिंगूर नामक स्थान पर जब किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाने लगा, तो जबरदस्त विरोध खड़ा हो गया। टाटा की नैनो कार परियोजना विवादों में फंस गई। जहां पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार इसे वहां के औद्योगीकरण का एक महत्वपूर्ण सोपान मान रही थी, वहीं कई लोगों ने औद्योगीकरण के इस समूचे मॉडल पर ही सवाल खड़े किए। सिंगूर और नन्दीग्राम आधुनिक भारत में विकास और औद्योगीकरण से जुड़े द्वन्द्व तथा संघर्षों का प्रतीक बन गए।
आखिरकार टाटा को सिंगूर से इस कारखाने को हटाने और गुजरात ले जाने का फैसला करना पड़ा। बाद में धीरे-धीरे यह तथ्य सामने आने लगा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने इस परियोजना के लिए कितने बड़े पैमाने पर अनुदान, करों में छूट और मदद देने का समझौता किया था। इस गजब की सस्ती कार के ‘सस्तेपन’ के रहस्य की परतें अब धीरे- धीरे खुल रही हैं।
टाटा के इस नैनो कारखाने को अपने राज्य में लगवाने के लिए राज्य सरकारों में होड़ लगी थी। सबसे पहले टाटा ने इस कारखाने को उत्तराखंड राज्य में पंतनगर में लगाने का फैसला किया था। दरअसल केन्द्र सरकार ने उत्तर-पूर्व के पिछड़े राज्यों में उद्योगों को  प्रोत्साहन देने के लिए 1999 में करों में छूट की एक विशेष योजना शुरु की थी। बाद में, 2003 में इसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के लिए भी लागू कर दिया गया। इसके तहत दो तरह की छूट दी जाती है – (1) व्यवसायिक उत्पादन शुरु होने के बाद दस वर्षों तक उत्पाद शुल्क में 100 प्रतिशत छूट और (2) पहले पांच वर्षों में कंपनी की आय पर आयकर की पूरी माफी और अगले पांच वर्षों तक 30 प्रतिशत माफी।
इस विशाल छूट का फायदा लेने के लिए उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कई कंपनियां आईं, खास तौर पर मोटर गाड़ियां और दवाईयां बनाने वाली। टाटा मोटर्स कंपनी ने 60,000 मिनी-ट्रक प्रतिवर्ष बनाने वाला एक कारखाना 1,000 एकड़ में डाला। अशोक लीलैण्ड कंपनी ने प्रतिवर्ष 50,000 वाहन वाले और बजाज ऑटो कंपनी ने प्रतिवर्ष दस लाख दुपहिया गाड़ियां बनाने वाले कारखाने लगाए। यदि टाटा कंपनी ने पंतनगर में नैनो कार वाला कारखाना लगाया होता, जिसमे ढाई लाख कार प्रतिवर्ष बनती और जिसमें टाटा को 1500 करोड़ रु. की पूंजी लगानी होती, तो इन दोनों करों में छूट की बदौलत ही उसे दस वर्ष में 3341 करोड़ रु. की बचत होती। यानी कुल पूंजी के दुगुने से ज्यादा टाटा इन दस सालों में बचा लेते। किन्तु भविष्य का एक रु. आज के एक रु. के बराबर नहीं होता। इसलिए भावी वर्षों की बचत को ब्याज की 6 प्रतिशत की वार्षिक दर से काटा जाए (डिस्काउन्ट किया जाए) तो भी कर-बचत की राशि 2627 करोड़ रु. बनती है। यानी टाटा फिर भी 1127 करोड़ रु. की बचत में रहता।
किन्तु इसी बीच पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने टाटा के इस कारखाने को आकर्षित करने के लिए इससे भी ज्यादा मदद व छूट देने का प्रस्ताव किया। यद्यपि पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय करों की छूट की सुविधा नहीं थी, बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने प्रांतीय करों में छूट, सस्ती जमीन, सस्ती बिजली, अनुदान और सस्ते कर्ज के अनेक उपहारों का ढेर लगा दिया। बंगाल सरकार ने इनको काफी समय तक छुपाने की कोशिश की, किन्तु आखिरकार सरकार व कंपनी के बीच हुए करारनामे की जो जानकारी सामने आई, उसके मुताबिक ये उपहार इस प्रकार थे –

1.    सस्ती एवं अतिरिक्त जमीन:
पश्चिम बंगाल सरकार अपने खर्च पर जमीन अधिग्रहित करके कंपनी को देगी। मुख्य कारखाने के लिए 645 एकड़ जमीन 90 वर्ष की लीज पर दी जाएगी। इसके लिए टाटा कंपनी शुरु में कोई राशि नहीं देगी। इस भूमि का वार्षिक किराया पहले पांच वर्षों के लिए 1 करोड़ रु. होगा, इसके बाद 30 वें वर्ष तक हर पांच वर्ष में 25 प्रतिशत बढ़ेगा, फिर 60 वें वर्ष तक हर दस वर्ष में 30 प्रतिशत बढ़ेगा और फिर 90वें वर्ष तक 20 करोड़ रु.प्रतिवर्ष रहेगा। इसके अतिरिक्त, सहायक उद्योग (पुर्जे आदि) लगाने के लिए 290 एकड़ भूमि टाटा को 8000रु. प्रति एकड़ की दर से दी जाएगी। सिंगूर कोलकाता से मात्र 45 कि.मी. दूर होने से वहां की जमीन बहुत महंगी है और टाटा को बहुत कम दरों पर मिल रही थी।
नैनो कारखाने के लिए इतनी मात्रा में जमीन की क्या जरुरत है, यह सवाल भी कई लोगों ने उठाया है। अन्य मोटरगाड़ियों के कारखानों से तुलना करके इसे देखा जा सकता है। प्रतिवर्ष साढ़े सात लाख कारें बनाने वाला मारुति उद्योग 300 एकड़ भूमि में है। स्वयं टाटा मोटर कंपनी के पास पूना में मात्र 178 एकड़ भूमि है जहां वह 2 लाख कारें बनाती है तथा जमशेदपुर इकाई के सहयोग से 3 लाख 40 हजार व्यवसायिक गाड़ियां बनाती हैं। अपने कर्मचारियों के आवास और कारखाना दोनों मिलाकर टाटा को 300 एकड़ से ज्यादा जमीन की जरुरत नहीं होनी चाहिए। अंदाज यह है कि आगे चलकर टाटा इस जमीन का व्यवसायिक इस्तेमाल करके कमाई करता।

2.    शुल्क-वापसी:
कारों की बिक्री पर वेट और केन्द्रीय बिक्री कर की जो भी राशि होगी, पश्चिम बंगाल सरकार उसे कंपनी को कर्ज के रुप में वापस कर देगी, जिस पर 0.01 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज लिया जाएगा। यानी एक तरह से यह ब्याज मुक्त कर्ज होगा। इस कर्ज की वापसी तीस वर्ष बाद शुरु होगी।

3.    नाममात्र के ब्याज पर कर्ज:
इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम 200 करोड़ रु. का कर्ज और देगा, जिस पर मात्र 1 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज लिया जाएगा। इस कर्ज की वापसी भी 20 साल बाद करना होगा। इन दोनों तरीकों से ब्याज अनुदान ही टाटा को काफी बड़ी मात्रा में मिलने वाला था।

4.    सस्ती बिजली:
टाटा कंपनी के साथ हुए समझौते के मुताबिक उसे 3 रु. प्रति यूनिट की दर से बिजली दी जाएगी। यदि इस दर में पांच वर्षों में 25 पैसे प्रति यूनिट से ज्यादा वृद्धि होती है, तो सरकार कंपनी को उसकी भरपाई कर देगी। चूंकि अभी राज्य में बिजली की औसत दर 4 रु.15 पैसे है, अंदाज है कि इसी एक तरीके से टाटा कंपनी को प्रतिवर्ष 20 करोड़ रु. का अनुदान मिलता। बिजली की दरें ज्यादा बढ़ने पर आने वाले सालों में यह अनुदान और बढ़ेगा।

अर्थशास्त्री निर्मल कुमार चंद्र ने हिसाब लगाया है कि प्रथम तीन तरीकों से टाटा कंपनी को 2000 करोड़ रु. से ज्यादा का फायदा होता। इसमें बिजली शुल्क की बचत भी जोड़ लें तो यह राशि 2500 करोड़ रु. से ऊपर पहुंचेगी। जबकि इस परियोजना में टाटा की पूंजी मात्र 1500 करोड़ रु. लगेगी। यानी टाटा की मौज ही मौज है।
जन-विरोध के कारण बाद में टाटा का यह नैनो कार का कारखाना गुजरात चला गया। अंदाज है कि गुजरात की मोदी सरकार ने भी कंपनी को करीब-करीब इसी तरह की कर रियायतें, अनुदान, सस्ते कर्ज व अन्य फायदें प्रदान किये होंगे। तो यह है टाटा की सस्ती लखटकिया कार का राज ! इसमें टाटा की उद्यमिता, व्यावसायिक बुद्धि या इंजीनियरिंग का कम और तिकड़म व मिलीभगत से सरकारी खजाने की लूट का ज्यादा कमाल है।
यह भी सच है कि वाहन उद्योगों और अन्य उद्योगों को सरकारों द्वारा इस तरह जबरदस्त अनुदान देने का विशिष्ट उदाहरण होते हुए भी यह अकेला मामला नहीं है। कंपनियों को इस तरह की विशाल कर-रियायतें और मदद देने का करीब-करीब नियम-सा बन गया है। तमिलनाडु की अल्ट्रा-मेगा वाहन परियोजनाओं में भी विशाल रियायतें व मदद दी गई है। आन्ध्र प्रदेश ने भी 2008 में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा में इससे मिलते जुलते प्रावधान किए हैं। उधर इन राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए और अपना आकर्षण बनाए रखने के लिए, उत्तराखंड ने अप्रैल 2008 में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा की, जिसमें बिजली शुल्क में 100 प्रतिशत तक की छूट (यानी बिजली मुफ्त) तथा वैट में 90 प्रतिशत तक की छूट के नए प्रावधान उद्योगों के लिए किये गये। इस तरह, अर्थशास्त्री निर्मल कुमार चंद्र के शब्दों में ‘‘राज्यों में एक ‘प्रोत्साहन युद्ध’ छिड़ गया, जिसमें सारे राज्य बड़ी पूंजी के आगे गिड़गिड़ाते भिखारियों में बदल गए।’’
यह भी गौरतलब है कि भारत की सरकारें जिस बाजारवाद के रास्ते पर चल रही हैं, उसमें भी सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त बाजार नाम की कोई चीज नहीं है। बाजार मंत्र का जाप करने वाले भी बाजार के तर्कों व नियमों पर नहीं चलते हैं। फरक इतना ही है कि गरीब जनता के हित में हस्तक्षेप उन्हें मंजूर नहीं हैं, जबकि कंपनियों के हित में भारी मदद, छूटें और उपहार देने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। नैनो कार की परियोजना इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है।
अस्तु, नैनो कार के कारण भारत की सड़कों पर जाम, प्रदूषण, ज्यादा दुर्घटनाओं की बात फिलहाल छोड़ दें (यह कहा जा सकता है कि भारत के अमीरों को ही कार रखने का हक क्यों हो और निम्न मध्यम वर्ग को क्यों नहीं ?) तथा सिंगूर में किसानों के विस्थापन को भी भूल जाएं, तो भी टाटा के इस प्रोजेक्ट के साथ सरकारी खजाने की इस जबरदस्त लूट का सवाल जुड़ा है जिसके बगैर नैनो कार संभव ही नहीं है। नैनो कार नए भारत की नयी उद्यमिता या नवाचार का द्योतक नहीं है, बल्कि गलत विकास नीति, गलत प्राथमिकताओं, भारत की सरकारों (जिसमें वाममोर्चा भी शामिल है) के वैचारिक दिवालियेपन तथा कंपनियों द्वारा भारत राष्ट्र की लूट का एक प्रतीक बन गई है।
– सुनील , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद
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Filed under corporatisation, globalisation

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