’लोकसंघर्ष’ के सुमन से ’nice’ से अलग टीप हासिल करने का श्रेय

’ लोकसंघर्ष ’ के सुमन द्वारा ’nice’ की टिप्पणी दिया जाना हिन्दी चिट्ठेकारी की एक वृहत चर्चित परिघटना है । मुझे अच्छी तरह याद है जब सुमन की विस्तृत टीपें हासिल हुआ करती थी । इसके बाद जो कुछ भी हुआ हो सुमन का ’nice’ – सत्याग्रह शुरु हुआ जो उन्होंने पूर्ण निष्ठा से चलाया ।

बहरहाल , आज लोकसंघर्ष के सुमन से स्वयंसेवी संस्थाओं पर मेरे साथी सुनील की लिखी पोस्ट पर ’नाइसेतर’ टीप पाकर मुझे गौरव सा महसूस हुआ । मुझे विनोबा के मौन की याद आई , जिसे उन्होंने एक बार तोड़ा था।

नाइसेतर टीप पर आप क्या सोचते हैं ?

11 टिप्पणियाँ

Filed under activism आन्दोलन, blogging, ngo

11 responses to “’लोकसंघर्ष’ के सुमन से ’nice’ से अलग टीप हासिल करने का श्रेय

  1. सुमन जी … की टिप्पणी देख कर मुझे बहुत ख़ुशी हुई…. संभवतः…. मैं ही वो शख्स हूँ…. जो उनकी नाईस टिप्पणी का राज़ जानता है….उनकी लम्बी…और सारगर्भित टिप्पणी देख कर बहुत ख़ुशी हुई… सुमन जी…. बहुत ही अच्छे व्यक्तित्व और… नौलेजैबल इंसान हैं….. उम्मीद है…. कि सुमन जी… और भी ब्लोग्स पर अपनी सारगर्भित टिप्पणी देंगे…. उनके विचारों का समाज को बहुत ज़रूरत है…. उनसे जो भी मिलेगा…. उनका कायल हो जायेगा….

  2. आपको तो वो टिप्पणी सहेज कर रखनी चाहिए :-)

  3. कहने का अर्थ है, पढ़ लिया है, आप लिखते रहिये ।

  4. सुमन जी घुटे हुए घाघ बुद्धिजीवी हैं, बिलकुल हावर्ड फास्ट के उपन्यास ‘स्पार्टकस’ के उन रोमनों की तरह जो गुलामों को अपने मनोरंजन के लिए लड़ाया करते थे. अकेले सुमन जी ही क्यों, बहुत से वामपंथी बुद्धिजीवी आजकल इसी तरह की बानगी प्रस्तुत कर रहे हैं. अपने आपको मार्क्सवाद के पैरोकार कहलाने वाले इन लेखकों को पता होना चाहिए कि मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और माओ ने मार्क्सवाद को बुलंदियों पर पहुँचाने के लिए अपने समकालीन कामरेडों से निर्मम वैचारिक संघर्ष चलाया था. इस प्रक्रिया से जो साहित्य पैदा हुआ और क्रांतिकारी संगठन बने, सर्वहारा वर्ग की इस कीमती धरोहर और विरासत को ही हमारे ‘कर्मों का मार्गदर्शक’ मार्क्सवाद के नाम से जाना जाता है.

    अगर इन्टरनेट पर सब कुछ ‘नाईस’ है तो ‘अगली’ क्या है ? क्या हम यहाँ पर एक-दूसरे को ‘कम्पलीमेंट’ करने के लिए एकत्रित हुए हैं ? क्या बुद्धिजीवी वर्ग की उस वर्ग (सर्वहारा) प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं जिनके दम से उनका कंप्यूटर और दिमाग रोशन है ?

  5. अपने फोटू के साथ हर जगह टिप्पीयाने से नर्गिस ग्रथि को जो सकूं मिलता है उसका अहसास Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar को भला क्या होगा ! वे तो यही कहेंगे कि लोगों की नज़रों में हर वक्त बने रहने की यह प्रवृति कम्युनिस्ट आचरण के बिलकुल उल्ट, बुर्जुआ मनोरोग है ।

  6. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s