मधु कोड़ा जैसों से भी क्यों हो महरूम मेरा स्कूल ?

[ परसों मैं अपने स्कूल के मित्र-मिलन में अपने स्कूल गया था । वहाँ से लौट कर जब न रहा गया तब यह लिखा । ]

“मेरा नाती बहुत तेज और हाजिर जवाब है । कुछ भी पूछो तो उसके पास तुरन्त एक जवाब रहता है । तब तुम्हारी याद आती है और मैं अपनी नाती से कहती हूँ ,’ तुम तो अफ़लातून जैसे हो !’ सोचिए, कक्षा एक की मेरी शिक्षिका से ४५ साल बाद यह सुनकर कैसा लगा होगा ? सुनकर मैं ठीक से अपनी गदगदाहट भी न प्रकट कर सका । किंकर्त्व्यविमूढ़-सा लगा ।
थोड़ी देर में उन्हें कुछ और याद आया और उन्होंने मुझसे पूछा, ’तुम बाँए हाथ से लिखते हो,न?’ मैंने ’हाँ’ में सिर हिलाया । फिर उन्होंने बताया कि कैसे कुछ शिक्षिकाएं जबरदस्ती मेरे बाँए हाथ से पेन्सिल लेकर दाहिने में थमा देतीं । लाजमी तौर पर इस वजह से मैंने लिखना देरी से शुरु किया । रिपोर्ट आती Grasp- Very Good,Comprehension- Excellent ,Reading -Excellent लेकिन आखिर में एक लाईन रहती – Aflatoon is poor in written work ! यह तो मुझे याद है कि इस हाल से बगावत के मूड में मैंने अपने घर में कह दिया था ,’लिखना नहीं सीखूँगा,टाइप करना सीख लूँगा।’ फिर मेरी माँ ने हमारी वरिष्ट शिक्षिका कृष्णा गुरुजी से बात की । माँ को गुजरात के गाँव में प्राथमिक शाला में आदिवासी बच्चों को पढ़ाने का तजुर्बा था । उन्होंने कृष्णा गुरुजी से कहा कि अफ़लू स्वाभाविक तौर पर बँयहत्था है उससे जबरदस्ती दाहिने हाथ से लिखवाने से समस्या उत्पन्न होगी । कृष्णा गुरुजी सहमत थीं और उन्होंने अन्य शिक्षिकाओं को कहा कि पेनसिल बाँए हाथ में रहने दी जाए !
कल सुबह हम एसेम्बली हॉल के पूरब दिशा में बने मैदान में जुटे थे । उस मैदान में पर्दा टाँग कर कभी- कभी फिल्म भी दिखाई जाती। एक तरफ़ संगीत कक्ष था । संगीत के सुरों के साथ पूज्य सामन्तजी का प्रेम बरसता था,यहाँ ।

एक पोस्टर

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इस भवन के बगल में एक अजगर के बच्चे को जिन्दा पकड़े जाने की बात याद आ गई । विज्ञान शिक्षक टण्डनजी के नेतृत्व में रसायन शास्त्र के सहायक देवराज इस जुगत में थे कि बिना मारे कैसे इस अजगर को कैद किया जाएगा । लाठी के छोर पर कपड़ा लपेट कर क्लोरोफॉर्म से उसे भिगाया गया। जानवरों के अधिकारों का जमाना तब नहीं आया था फिर भी उस निरीह जन्तु के जीवन की परवाह की गई थी। शहर से भी बच्चे उसे देखने आए थे और लाइन लगा कर देखते। फिर शायद वन विभाग वाले उसे ले गये ।
शिक्षा की अपनी एक दुनिया है और व्यापक दुनिया का भी वह एक हिस्सा है । मेरे स्कूल की दुनिया में व्यापक समाज का प्रतिबिम्ब , आईने में लिखावट के अक्स के जैसा था – उलटा । आर्थिक रूप से मजबूत पृष्टभूमि के बच्चे ज्यादा थे और केन्द्र सरकार द्वारा आवासीय विद्यालयों में पढ़ने के लिए मेधावी छात्रों को परीक्षा के बाद दिए गए वजीफे पाने वाले थे, मुष्टिमेय । स्कूल की परीक्षा में भी प्रथम श्रेणी बरकरार रखना भी इन मित्रों पर शर्त रहती थी । शायद सरकार ने ही यह योजना समेट ली है ।
इस स्कूल से पढ़ कर निकले बच्चों पर कौन सी छाप लगती है ? उस छाप पर चर्चा फिर कभी । कल हुए जमावड़े को देख कर लगा कि मधु कोड़ा सरीखे भी इस स्कूल से पढ़कर नहीं निकलेंगे इस बात की गारन्टी कत्तई नहीं है । एक पूर्व छात्र द्वारा एक भारी राशि स्कूल को दान में दिए जाने की चर्चा सुनी ।
अभिजात्यवादी स्कूलों की गोलबन्दियों कितनी तगड़ी होती हैं इस पर भी एक मित्र से चर्चा हुई । यह मित्र उच्च सरकारी अधिकारी है और अन्य ऐसे स्कूलों की गोलबन्दियों की उसे प्रत्यक्ष जानकारी है । खनन आदि के बारे में फैसले लेते वक्त देश का सौदा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से करने में भी कई बार इस प्रकार की गोलबन्दियाँ सक्रिय रहती हैं । एक निर्दलीय (मधु कोड़ा) के मुख्यमन्त्री बनने की घटना ऐतिहासिक थी। और उसके बाद खनन मन्त्री बनने तथा हजारों करोड़ की लूट भी खनन से ही जुड़ी है और पहली बार उभर कर आई है । भ्रष्ट मन्त्री जब करोड़ों रुपये लूटते हैं तो उनके सचिव आदि भी जूठन के हकदार हो जाते हैं ।

* पोस्ट के शीर्षक में सुधार आर के शर्माजी की टिप्पणी के बाद किया गया है ।

3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “मधु कोड़ा जैसों से भी क्यों हो महरूम मेरा स्कूल ?

  1. aarkay

    आप के इस अत्युत्तम लेख के लिए बधाई . क्या मरहूम के स्थान पर महरूम शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना था . जबकि मरहूम का अर्थ ‘दिवंगत ‘होता है तथा महरूम का ‘वंचित.’

  2. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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