Daily Archives: अक्टूबर 11, 2009

चिपलूणकर और सलीम ख़ान का मेरे ब्लॉग पर मेल

१९९२ के दौर में वाराणसी के तीन भिन्न – भिन्न विचारधाराओं से जुड़े़ तीन समूहों ने महसूस किया था कि साम्प्रदायिकता के बारे में एक समझदारी बना कर साथ – साथ लोगों के बीच जाना होगा । समझदारी बनाने के क्रम में हमने तीन लम्बे सत्रों में चर्चा की तथा साझा समझदारी के आधार पर एक परचा तैयार किया ।

पिछले दिनों ब्लॉग जगत में साम्प्रदायिक आधार पर परस्पर वैमनस्य फैलाने वाली पोस्टों की बाढ़ आई हुई है । मैंने १९९२ में प्रकाशित उपर्युक्त परचे को अपने ब्लॉग में दो हिस्सों में छापा । परचे की खूबी लाजमी तौर पर यह थी कि गैर साम्प्रदायिक बहुमत को वह पसन्द आता तथा फिरकापरस्ती पर जिन्दा लोगों को उससे परेशानी होती । ब्लॉग जगत में ऐसा ही हुआ। १३ लोगों की कुल १४  टिप्पणियाँ आईं । ७ टिप्पणीकर्ता परचे की बातों से पूरी तरह सहमत थे और ६ के गले में बातें उतरने में दिक्कत हो रही थी । अनिल पुसादकर की टिप्पणी ने मुझे भाव विह्वल कर दिया । रामकुमार अंकुश , दिनेश द्विवेदी ,रवि कुमार , वीरेन्द्र जैन ,लोकसंघर्ष और निर्मला कपिला ने इस विषय पर सहज सामान्य समझदारी से मानो देश की समझदारी की नुमाईन्दगी की ।

हमारी बात चिपलूणकर और सलीम खान जैसे  ६ पाठकों के  गले उतरने में दिक्कत हो रही थी शायद उन्हें  मरचा लग रहा था । उस परचे का मुकाबला करने में सलीम खान ने कहा,’सुरेश चिपलूणकर के पहले दो पैरा से सहमत.’ इस तरह की सहमती का जिक्र कहानियों और नाटकों में पढ़ते वक्त मुझे अतिरंजना लगती थी लेकिन ऐसा सोचना गलत था ।

राही मासूम रजा की एक कहानी में मस्जिद के आहाते में सूअर का गोश्त डालने वाले मुस्लिम अपराधी और मन्दिर में गोमांस डालने वाले हिन्दू अपराधी का भी जिक्र चौंकाता है लेकिन जिन्हें साम्प्रदायिकता की आग लगानी होती है वे यह सब भी कर सकते हैं । एक बार मेरी एक ही पोस्ट पर ’रमेश’ और ’पीटर ’ ने एक ही IP पते से टिप्पणियाँ की थीं ।

ओड़िया में एक कहावत है : माँ कहती है , ’ रसोई घर में कौन है ?’ बेटा जवाब देता है , ’ मैंने केला नहीं खाया’ ।

अब हम आते हैं कांग्रेस की साम्प्रदायिकता की बाबत । कांग्रेस द्वारा साम्प्रदायिक उन्माद के आधार पर सबसे बड़ी चुनावी सफलता इन्दिराजी की हत्या के बाद हुए चुनावों में हासिल की गई थी। राजीव गांधी ने भिण्डरावाले को पंजाब के किसान आन्दोलन और अकालियों के मुकाबले खड़ा करने के लिए ’सन्त’ का दरजा दिया  । भिण्डरावाले द्वारा हिन्दुओं के विरुद्ध तमाम विष वमन के बावजूद पंजाब में सिखों द्वारा हिन्दू विरोधी दंगे नहीं हुए । हरमन्दर साहब में फौज भेज कर इन्दिरा गांधी ने अटल बिहारी सरीखों की वाहवाही पाई वहीं सिखों के हृदय पर एक गहरा जख़्म लगाया । इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने पूरे सिख समुदाय को ’गद्दार’ कहते हुए चुनाव लड़ा । पूरे देश में निर्दोष सिखों की हत्याएं हुई और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान लूटे गये।पहली बार प्रचार में लाई गई विदेशी कम्पनी रीडिफ़्यूजन के पूरे पन्ने के विज्ञापनों में कहा जाता ,’क्या आप चाहते हैं कि देश की सीमायें आप के घर की चाहरदीवारी तक सिकुड़ जाएं?’ इस चुनाव में कांग्रेस के अब तक के सर्वाधिक बड़े बहुमत(करीब अस्सी फीसदी सीतें) से जीती । भारतीय जनता पार्टी(जिसमें जन संघ पृष्टभूमि के लोग शामिल थे) लोक सभा  में मात्र दो सीटें जीत पाई । पता चला कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उस चुनाव में लगा कि ’हिन्दू हित’ तो कांग्रेस देख रही है । पूरे देश में ’अपनेजी’ लोगों को ’आदेश-निर्देश’ दे दिए गए !  पहले आम चुनावों से जम्मू की जिन सीटों पर हमेशा जनसंघ जीतती आई थी वहाँ भी कांग्रेस जीती । यह है मौसेरे भाइयों का रिश्ता ।

१९६७ में डॉ. लोहिया ने कहा था कि भाकपा की एक पहाड़ गद्दारी से कांग्रेस की एक बूँद गद्दारी और जनसंघ की एक पहाड़ फिरकापरस्ती से कांग्रेस की एक बूँद फ़िरकापरस्ती ज्यादा ख़तरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है ।

कुछ लोग बहुसंख्यकों का मानो ठीका लिए हुए हैं और हमारे मित्र संजय बेंगाणी की तरह कहते हैं,’ जिम्मेदारी मात्र बहुसंख्यकों के सर डाली जा रही है.’(’ जब मार पड़ी शमशेरन की तो कहें, ’ महाराज मैं नाऊ’ की तरह कभी संजय जैन भी हो जाता है) दरअसल देश की गंगा जमुनी तहजीब में यक़ीन रखने वाले बहुसंख्यक समुदाय को इन बातों को समझने में दिक्कत नहीं होती है वे इसे आत्मसात किए हुए है। देश में फिरकापरस्तों का जो  अल्पमत है उसे जरूर दिक्कत आती है , चाहे वे खुद को हिन्दू कहने का दावा करते हों अथवा मुसलिम ।

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