दो कम्पनी विरोधी बाँके सिपाही या बहुरुपिए

दानवाकार कम्पनियाँ हमेशा सही काम करना चाहती हों ऐसा नहीं है । शायद वे सही काम कर ही नहीं सकतीं । मुमकिन है कि वे सही काम करना न चाहती हों । शायद वे भले काम करना चाहती हों लेकिन उनके शेयर धारकों को यह पसन्द न हो ।

सरकारें यदि अच्छे काम करना चाहतीं हैं तब क्या होता है ? क्या सिर्फ़ शेयर धारकों की जगह मतदाता रख देने से मामला स्पष्ट हो जाता है ?

१९९९ की शुरुआत में विश्व व्यापार संगठन की सिएटल में हुई बैठक के विरुद्ध जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए थे। उसी दौरान इन दो महानुभावों ने इस दौर के कुछ  असाध्य और बड़े मुद्दों को छेड़ा । वे सिएटल के विरोध प्रदर्शनों में शरीक न हो सके थे । उन्होंने सोचा कि हम भी कैसेअपनी हिस्सेदारी  सुनिश्चित करें ?  उन्होंने एक फर्जी वेबसाईट बनाई | मौसम परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर निहित स्वार्थों से जुड़े लॉबींग करने वालों की कथित वस्तुपरकता की पोल खोलने के लिए ।

थोड़े से झूठ का सहारा लेकर इन दोनों बांके सिपाहियों ने दुनिया की कई दानवाकार और कुख्यात कम्पनियों की करतूतों का पर्दाफाश किया है – अक्सर उनके शेयरधारकों के समक्ष ।  भोपाल गैस काण्ड के लिए जिम्मेदार यूनियन कारबाईड को खरीद लेने वाली डाऊ केमिकल , भूगर्भ-जल का दोहन करने वाली तथा नुकसानदेह पेय पिलाना वाली कोका कोला कम्पनी तथा नाईजीरिया की खेती को बरबाद करने वाली तथा विद्रोही रंगकर्मी केन सारो वीवा की फाँसी की जिम्मेदार शेल जैसी राक्षसी कम्पनियों से जुड़कर इन्हीं कम्पनियों के पूर्व प्रमुख ,पूर्व राष्ट्राध्यक्ष ,राजनेता , नौकरशाह मौसम परिवर्तन सम्बन्धी कानूनों को रोकने के लिए लॉबिस्ट बन जाते हैं । इन नामों की बानगी देखिए – पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन ,किल्न्टन,बुश,पूर्व ब्रिटिश प्रधान मन्त्री थैचर , सिनेमा स्टार और राजनेता स्वार्ज़निगर तथा अर्थशास्त्री मिल्टन फ़्रीडमेन । इन नामों को देख कर आप अन्दाज लगा सकते हैं कि कैसे लोग इस काम में लगते हैं ।  विश्व बैंक से जुड़े रहे मनमोहन सिंह ,अरुण शौरी जैसों के अलावा मोन्टेक सिंह अहलूवालिया तो एक ऐसे समूह से जुड़ा था जिसका घोषित उद्देश्य कॉर्पोरेट जगत से नीति निर्माताओं के बीच पुल बनाना था। कपिल सिब्बल , अरुण जेटली और सुबोध सहाय जैसे लोग शीतल पेयों और कचरा खाद्य कम्पनियों की रक्षा में प्रमुख हैं ।

अब इन दोनों बाँकुरों के काम के नमूने पर गौर कीजिए :

भोपाल स्थित यूनियन कारबाईड से रिसी गैस से हजारों लोग मारे गये थे तथा लाखों लोग आजीवान कष्ट और बीमारियां झेलने के लिए अभिशप्त हैं । कम्पनी की ओर से भयंकर भूलें और लापरवाहियाँ हुई थी । बड़े बड़े वकील रखकर एक छो्टे-से क्लिनिक के द्वारा गैस पीडितों की ’देखभाल” की जाती है ।  ऐसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत के लिए सन्देश होता है – यह सब तो होता रहता है , बिना जोखिम के जीवन कैसा ? फिर डाऊ केमिकल ने यूनियन कारबाईड को खरीद लिया । उस वक्त यूनियन कारबाईड की कीमत १२ अरब डॉलर आँकी गयी थी । डाऊ द्वारा अधिग्रहण के तुरन्त बाद जूड फिनिस्टेरा  नामक डाऊ का कथित नुमाईन्दा बीबीसी न्यूज़- पेरिस के माध्यम से ३० करोड दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत हुआ । उसने घोषणा की कि डाऊ केमिकल भोपाल गैस काण्ड की पूरी जिम्मेदारी लेती है तथा यूनियन कारबाईड को भंग करके गैसे पीडितों को १२ अरब डॉलर दिए जाएंगे ।  ये अप्रत्याशित घोषणा तत्काल इन्टरनेट की समाचार साईटों , और दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियों बनी । भोपाल की जनता मारे खुशी के सड़कों पर निकल आई । डाऊ के शेयरों से  २३ मिनट में दो अरब डॉलर का नुकसान हुआ ।

यह पूरी घोषणा झूठी थी । डाऊ की ऐसी कोई योजना नहीं थी । उसके कथित प्रतिनिधि या प्रवक्ता का कम्पनी से कोई सम्बन्ध नहीं था ।

वह व्यक्ति था एन्डी बिकलबॉम जो द यस मेन नामक एक समूह का राजनैतिक कार्यकर्ता था । बिकलबॉम और उसके साथी माईकेल बोनानो ने मिलकर डाऊ केमिकल के लिए डाऊ एथिक्स (नैतिकता) नामक एक फर्जी वेबसाईट बनाई थी । गैस काण्ड में कम्पनी की आपराधिक जिम्मेदारी का बरसों से अध्ययन करने वाले बीबीसी के पत्रकार इनके झाँसे में आ गये तथा इनकी वेबसाईट को डाऊ की असली वेबसाईट माना  । बीबीसी ने बाकायदे लाईव प्रसारण के लिए उन्हें अपने स्टूडियो में आमंत्रित किया । इस मौके के लिए एन्डी बिकलबॉम ने नया सूट खरीदा , बाल छँटवाये , क्या बोलना है इसकी तैयारी की और तब पेश हुआ ।

 एन्डी और माईक

एन्डी और माईक

कुछ ही घण्टों में इस शरारत से परदा उठा । खण्डन , स्पष्टीकरण की बौछार होती रही । ये येस मेन इन प्रतिष्ठित कम्पनियों की ’अस्मिता सुधारने’ (identity correction) की अपनी मुहिम में अगले अवसर की तलाश में आगे बढ़ लिए ।

यह किस्सा तथा ऐसे ही अन्य कई किस्से  परसों अमेरिका के केबल टेवि नेटवर्क में एचबीओ पर दिखाई गई इसी जोड़ी की बनाई गई फिल द येस मेन रूल द वर्ल्ड का हिस्सा थे । इनके समूह की वेबसाईट पर अवश्य जाँए । नीचे उक्त फिल्म का अधिकृत ट्रेलर है । फिल्म अक्टूबर में अमेरिकी सिनेमा हॉलों में आएगी । डी.वी.डी. अभी नहीं मिल रही है । जुगाड़ में हूँ ।

इन दोनों महानुभावों की कारगुजारियों में झकलेटी पत्रकारिता का पुट भल ही ही , भले ही ये ’साधन-शुद्धि’ की शर्तों का पालन न करते हों लेकिन इन दानवाकार कम्पनियों की चूल्हें हिलाने और उनकी गन्दी हरकतों को बेपरदा करने में वे काफ़ी हद तक कारगर हैं ।
[ इनसे जुड़ी खबरें – यहाँ हैं । ]

7 टिप्पणियाँ

Filed under activism आन्दोलन, corporatisation

7 responses to “दो कम्पनी विरोधी बाँके सिपाही या बहुरुपिए

  1. फ़ि‍ल्‍म मैं देखता हूं नेट पर कहीं लहती है तो. दिखेगी तो आपको सूचित करता हूं.
    खबर के लिए शुक्रिया.

  2. Atal Behari Sharma

    saduhvad !! mitr for sharing the information.
    Let us see how we can reach ignorant middle class Indians to make them aware through this movie.
    Please excuse me for using English!!! I am still learning how to use Indian languages some time it did not work for me. Any suggestions !!!!
    Regards
    Atal

  3. चोर के घर मोर . अच्छा लगा पढकर . इन दोनों बांकों/झकलेटों की झक्क और उनका आवरणहटाऊ झांसा भी अगर हमें दानवाकार अमानवीय कम्पनियों के बड़े झांसे से आगाह नहीं कर सका तब बड़ी मुश्किल होगी .

  4. Fr.Anand IMS

    अफ़लातून जी,
    लेख और फ़िल्म केलिये बहुत धन्यवाद और बधाइयां.
    इस तरह की खबरें भेजते रहें.

    आनन्द आई.एम.एस.

  5. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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