क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

साम्प्रदायिकता क्या है ? उसके खतरे क्या हैं ? ( पिछला भाग )

क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ? कौन है इसके लिए जिम्मेदार ?

  1. धर्मों के उन्माद फैलाकर सत्ता हासिल करने की हर कोशिश साम्प्रदायिकता को बढ़ाती है , चाहे वह कोशिश किसी भी व्यक्ति , समूह या दल के द्वारा क्यों न होती हो । थोक के भाव वोट हासिल करने के लिए धर्म-गुरुओं और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल लगभग सभी दल कर रहे हैं । इसमें धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले राजनीतिक दल भी शामिल हैं । इन दलों ने चुनाव में साम्प्रदायिक दलों के साथ समझौते भी किए हैं और सत्ता हासिल करने के लिए समझौते भी किए हैं , सत्ता में इनके साथ साझीदारी की है । यदि धर्म निरपेक्षता की बात कहने वाले दलों ने मौकापरस्ती की यह राजनीति नहीं की होती तो धर्म-सम्प्रदायाधारित राजनीति करने वालों को इतना बढ़ावा हर्गिज़ नहीं मिलता । जब धर्म-सम्प्रदाय की रजनीति होगी तो साफ़ है कि छद्म से अधिक खुली साम्प्रदायिकता ताकतवर बनेगी।
  2. पूँजीवादी शोषणकारी वर्तमान व्यवस्था के पोषक और पोषित – वे सभी लोग साम्प्रदायिकता बढ़ाने में सक्रिय साझीदार हैं , जो व्यवस्था बदलने और समता एवं शोषणमुक्त समाज-रचना की लड़ाइयों को धार्मिक-साम्प्रदायिकता उन्माद उभाड़कर दबाना और पीछे धकेलना चाहते हैं । हमें याद रखना चाहिए कि धर्म सम्प्रदाय की राजनीति के अगुवा चाहे वे हिन्दू हों , मुसलमान हों , सिख हों , इसाई हों या अन्य किसी धर्म को मानने वाले , आम तौर पर वही लोग हैं , जो वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था से अपना निहित स्वार्थ साध रहे हैं – पूँजीपति , पुराने राजे – महाराजे , नवाबजादे , नौकरशाह और नये- नये सत्ताधीश , सत्ता के दलाल ! और समाज का प्रबुद्ध वर्ग , जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि साम्प्रदायिकता जैसी समाज को तोड़ने वाली दुष्प्रवृत्तियों का विरोध करेगा , आज की उपभोक्ता संस्कृति का शिकार होकर मूकदर्शक बना हुआ है ,अपने दायित्वों का निर्वाह करना भूल गया है !
  3.  और , हम-आप भी , जो इनमें से नहीं हैं , धार्मिक-उन्माद में पड़कर यह भूल जाते हैं कि भविष्य का निर्माण इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने से नहीं होता । अगर इतिहास में हुए रक्तरंजित सत्ता , धर्म , जाति , नस्ल , भाषा आदि के संघर्षों का बदला लेने की हमारी प्रवृत्ति बढ़ी , तो एक के बाद एक इतिहास की पर्तें उखड़ेंगी और सैंकड़ों नहीं हजारों सालों के संघर्षों , जय-पराजयों का बदला लेनेवाला उन्माद उभड़ सकता है ।फिर तो , कौन सा धर्म-समूह है जो साबुत बचेगा ? क्या हिन्दू-समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होंगे ? क्या इस्लाम के मानने वाले एक पंथ के लोग दूसरे पंथ बदला नहीं लेंगे ? दुनिया के हर धर्म में पंथभेद हैं और उनमें संघर्ष हुए हैं । तो बदला लेने की प्रवृत्ति मानव-समाज को कहाँ ले जायेगी ? क्या इतिहास से हम सबक नहीं सीखेंगे ?  क्या क्षमा , दया , करुणा , प्यार-मुहब्बत , सहिष्णुता ,सहयोग आदि मानवीय गुणों का वर्द्धन करने के बदले प्रतिशोध , प्रतिहिंसा , क्रूरता , नफ़रत , असहिष्णुता , प्रतिद्वन्द्विता को बढ़ाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालना और बढ़ाना चाहते हैं ?
  4. वक्त आ गया है कि हम भारतीय समाज में बढ़ती विघटनकारी प्रवृत्तियों को गहराई से समझें और साम्प्रदायिकता के फैलते जहर को रोकें । [ जारी ]

14 टिप्पणियाँ

Filed under communalism

14 responses to “क्यों बढ़ रही है यह साम्प्रदायिकता ?

  1. umeshawa

    भारतीय राष्ट्रवाद को मजबुत बनाना होगा। भारतीयता हीं हमारा धर्म है, ऐसा मानना होगा। धर्म के नाम पर काश्मीर मे चल रहे अलगाववाद को समाप्त करने के लिए अन्य प्रदेशो के मुसलमान भाईयो को आगे आना होगा। धर्म निर्पेक्षता के आड मे चल रही वोट की राजनिती को समाप्त करना होगा। अन्यथा ऐसे थोथे प्रवचनो से कोई लाभ नही होगा।

  2. आरोप प्रत्यारोप को छोड़कर . सभी को मिलकर इस लड़ाई को लड़ना होगा .

  3. साम्‍प्रदायि‍क उन्‍माद भड़काने में नेताओं का सत्‍ता मोह ही अब तक सबसे ज्‍यादा कुसूरवार रहा है। आपने सही कहा कि‍ समाज के प्रबुद्ध वर्ग को ही भौति‍क सुख त्‍यागकर इसके वि‍रोध की पहल करनी पड़ेगी। जबतक पहल नहीं होगी, तब तक छुटभैय्यै नेता भी अपनी रोटी सेकने में डर नहीं मानेंगे।

  4. अब तो राज बचाने को पूंजीवाद हर औजार अपनाने को तैयार है, धर्म ही क्या।

  5. बहुत सही कारण, नंबर ३ वास्तव में नंबर १ और २ की प्रतिक्रियायें हैं, क्रिया को रोक दो प्रतिक्रियायें अपने आप रूक जायेंगी यानि नंबर ४ में जो कहा है।

  6. पिंगबैक: सांप्रदायिकता : हम क्या करें ? क्या न करें « शैशव

  7. rahul srivastava

    साम्प्रदायिकता इस लिए बढ़ रही क्यों की हम सांप्रदायिक हैं , आग में घी डालने की देर होती हैं , जो समय समय पर कोई ना कोई कर देता हैं . इसलिए अपने आप को सुधारने की जरूरत है , अपने जो कारण बताये हैं वो सिर्फ घी का काम करते हैं .

  8. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टॉप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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