विदेशी माध्यम का अभिशाप : गांधीजी

[ हैदराबाद में लोक-शिक्षा निदेशक नवाब मसूद जंग बहादुर ने कर्वे महाविद्यालय में देशी भाषाओं की शिक्षा का माध्यम बनाने की बहुत जोरदार दलील दी थी । ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ‘ ने इसका उत्तर दिया था जिसमें एक अंश था ,

‘ राजा राममोहन राय से महात्मा गांधी तक जिस भारतीय ने भी किसी क्षेत्र में कहने लायक कुछ उपलब्ध करके दिखाया है वह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति की देन था या है ।’

           ( सम्पूर्ण गांधी वांग्मय , खण्ड ६७ , पृष्ट १८० )  ]

महात्मा गांधी ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपे लेख का जवाब इन शब्दों में दिया :

विदेशी माध्यम का अभिशाप

  अब जरा प्रश्न पर समग्र रूप से विचार कीजिए । यदि चैतन्य , नानक , कबीर , तुलसीदास और हमारे देश में जो अन्य बहुत से संत – सुधारक हो गये हैं , वे बचपन से ही किसी अत्यंत सुसंचालित अंग्रेजी स्कूल से सम्बद्ध होते तो क्या उन्होंने जितना अच्छा काम किया है उससे अच्छा काम कर पाते ? यदि दयानन्द ने किसी भारतीय विश्वविद्यालय से एम.ए. की उपाधि प्राप्त कर ली होती तो क्या वे और भी बड़े काम कर दिखाते ? चैन और ऐशोइशरत की जिन्दगी जीनेवाले उन अंग्रेजी-भाषी राजाओं-महाराजाओं के बीच , जिनका लालन-पालन शैशव काल से ही पाश्चात्य संस्कृति के वातावरण में हुआ है , क्या कोई ऐसा है जिसका नाम शिवाजी के साथ लिया जा सकता हो – तमाम मुसीबतों को बहादुरी से झेलने और अपने दिलेर और हट्टे – कट्टे सैनिकों की तरह सादा जीवन जीने वाले शिवाजी के साथ ? क्या वे साहसी शूर प्रताप से अधिक अच्छे शासक हैं ? क्या यही लोग पाश्चात्य संस्कृति के अच्छे नमूने हैं – ये नीरो लोग , जो खुद तो लंदन और पेरिस में बैठ कर चैन की बंसी बजा रहे हैं और इधर उनके रोम में आग लगी हुई है , उनके राज्य दुख-दर्द में डूबे हुए हैं ? उनकी संस्कृति में उनके लिए गर्व करने की कोई बात नहीं है । उस संस्कृति ने उन्हें अपने ही देश में अजनबी बना दिया है , उसने उन्हें यह सिखाया है कि जिन लोगों पर शासन करने का भार उनको एक उच्चतर सत्ता द्वारा सौंपा गया है उन लोगों के सुख-दु:ख के सहभागी बनने के बजाय अपनी प्रजा की गाढ़े पसीने की कमाई और अपनी आत्मा को यूरोप में जा कर गँवा आओ ।

    लेकिन यहाँ विचारणीय प्रश्न यूरोपीय संस्कृति नहीं है । प्रश्न तो शिक्षा के विदेशी माध्यम का है । यदि हम इस तथ्य को एक ओर रख दें कि एकमात्र उच्चतर शिक्षा , जिसे कहा जा सकता है , हमने अंग्रेजी माध्यम से पाई है तो फिर इस स्वयंसिद्ध बात को सिद्ध करने की कोई जरूरत ही नहीं रह जायेगी कि यदि किसी राष्ट्र के नौजवानों को सचमुच एक राष्ट के रूप में रहना है तो उन्हें सारी शिक्षा , उच्चतम शिक्षा भी , अपनी देशी भाषाओं के माध्यम से प्राप्त करनी चाहिए । निश्चित ही इस बात को समझाने और साबित करने की कोई जरूरत नहीं है कि किसी भी राष्ट्र के नौजवान तब तक जनसाधारण से अपना सम्पर्क बनाये नहीं रख सकते जब तक कि वे उसी भाषा में ज्ञान प्राप्त न करें जिस भाषा को जनता समझती है । यहाँ के हजारों नौजवानों को अपनी मातृभाषा और अपने साहित्य की उपेक्षा करके एक ऐसी भाषा और उसके मुहावरों पर अधिकार प्राप्त करने के लिए , जिस भाषा का दैनिक जीवन में कोई उपयोग नहीं है, जो वर्षों का समय बरबाद करना पड़ता है , उससे राष्त्र की कितनी अपार क्षति होगी , इसका अनुमान कौन लगा सकता है ? अमुक भाषा विकास सक्षम या जटिल अथवा वैज्ञानिक विचारों को व्यक्त करने के योग्य नहीं है- इससे बड़े अन्धविश्वास के बारे में तो कभी भी सुना ही नहीं । कोई भाषा उसे बोलने वालों के चित्र का प्रतिबिम्ब होती है ।

     देश के नौजवानों पर एक विदेशी माध्यम थोप देने से उनकी प्रतिभा कुण्ठित हो रही है और इतिहास में इसे विदेशी शासन की बुराइयों में सबसे बुरा माना जाएगा । इसने राष्ट्र की शक्ति में घुन लगा दिया है , सिक्षार्थियों के लिए विद्योपार्जन के लिए पर्याप्त समय नहीं छोड़ा है ,उन्हें सर्वसाधारण से काट कर अलग कर दिया गया है ,शिक्षा को अनावश्यक रूप से व्यय-साध्य बना दिया गया है । यदि प्रक्रिया आगे भी जारी रही तो ऐसे आसार दिखाई दे रहे हैं कि यह राष्ट्र की आत्मा का हनन कर देगी । इसलिए शिक्षित भारतीय अपने-आपको विदेशी माध्यम के इस मोह से जितनी जल्दी मुक्त कर लेंगे , स्वयं उनके और देश की जनता के लिए उतना अच्छा होगा । यंग इण्डिया,दि.५-७-‘२८

~~~~~~~~~~~~~~~~~

     अब रही शिक्षा के माध्यम की बात । इस विदेशी भाषा के माध्यम ने विद्यार्थियों के दिमाग को शिथिल कर दिया है और उनकी दिमागी शक्तियों पर अनावश्यक बोझ डाला है । उन्हें रट्टू और नकलची बना दिया है । मौलिक विचारों और कार्यों के लिए अयोग्य कर दिया है और अपनी शिक्षा का सार अपने परिवार वालों और जनता तक पहुँचाने में असमर्थ बना दिया है । इस विदेशी माध्यम ने हमारे बच्चों को  अपने ही देश में विदेशी बना दिया है । वर्तमान शिक्षा प्रणाली का यह सबसे दुखद दृश्य है । अंग्रेजी भाषा के माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं के विकास को रोक दिया है । यदि मेरे हाथ में मनमानी करने की सत्ता होती , तो मैं आज से ही विदेशी भाषा के द्वारा अपने देश के लड़के-लड़कियों की पढ़ाई बन्द करवा देता और सारे शिक्षकों और अध्यापकों से यह माध्यम तुरन्त बदलवाता या उन्हें बरखास्त करा देता । मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इन्तजार न करता । वे तो परिवर्तन के पीछे पीछे चली आयेंगी । यह खराबी तो ऐसी है जिसके लिए तात्कालिक इलाज की जरूरत है । ( सम्पूर्ण गांधी वांग्मय ,खण्ड२१ ,पृ. ३९ )

सम्बन्धित आलेख और चर्चा :

१. भाषा पर गांधी

२. भाषा पर गांधी एक बहस

३. भाषा पर गांधी और लोहिया भी

४. भाषा पर गांधी : एक बहस ,अब ‘परिचर्चा’ पर भी ( ४५६३ बार देखा गया )

 

   

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5 टिप्पणियाँ

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5 responses to “विदेशी माध्यम का अभिशाप : गांधीजी

  1. एक अत्यन्त ही सटीक ,समसामयिक ,वैचारिक प्रस्तुतीकरण के लिए बहुत बहुत आभार. काश लोग इसे समझ पते और अपना पाते.

  2. Shastri JC Philip

    “देश के नौजवानों पर एक विदेशी माध्यम थोप देने से उनकी प्रतिभा कुण्ठित हो रही है और इतिहास में इसे विदेशी शासन की बुराइयों में सबसे बुरा माना जाएगा ।”

    मजे की बात है कि तकनीकी में सर्वविकसित सारे देश (जर्मनी, फ्रांस, जापान, इस्रायेल, रशिया) बडे आराम से वैज्ञानिक अतिमानवों का निर्माण अपनी मातृभाषा में कर रहे हैं, लेकिन हिन्दुस्तान जैसा एक अतिकाय देश अभी भी विदेशी भाषा के प्रयोग द्वारा अपनी वैजानिक प्रतिभाओं को कुंठित कर रहा है.

    — शास्त्री जे सी फिलिप

    — समय पर प्रोत्साहन मिले तो मिट्टी का घरोंदा भी आसमान छू सकता है. कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर उनको प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

  3. आज गांधी जी के ये विचार और भी प्रासंगिक हैं।

    किन्तु हमे इससे एक कदम आगे बढ़ना होगा। हमे हमेशा एक व्यावहारिक समाधान पर विचार करना चाहिये। कोई समाधान पर भी तो अपनी राय व्यक्त करें। इस समस्या को समय के सिर पर छोड़ देने से समस्या और विकराल होती चली जायेगी।

  4. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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