कविता : खून का रिश्ता : ज्ञानेन्द्रपति

वे बच्चे

मूँडी गोत कर

जिन्हें बारह घण्टे करना होता है काम

दरिद्रता के कोख-जाये बेटे

लक्ष्मी की अमरबेल

जिनकी खिच्ची उँगलियों से

लिपटती है

दो आँखों की चाबुक

उनकी झुकी पीठ पर

निगरानी रखती है

घुटनों पर ही नहीं , आत्मा पर घावों वाले

रिसते घावों वाले

वे बच्चे

रिश्तेदार बताये जाते हैं

नजदीकी रिश्तेदार

दूर गाँव के अपने-सगे

और देखते रह जाते हैं ठगे

प्रशासक और न्यायाधीश

नियम-अधिनियम के नट-बोल्टू

कसने का अभिनय करते

माथ झुकाये

और उस पल तुम सोचते हो

एक पल को सोचते हो

काश ! ये मानव बच्चे नहीं

टिड्डे होते

स्वच्छन्द नभछन्द

चाहे झींगुर ही होते मुक्तकण्ठ –

बँधुआ मजदूर बच्चों की जगह

अनन्त आकाश से घिरी धरती पर

इनके लिए जगह पद़्अती न कम

 

तुम कहना चाहते हो

हाँ , वे बच्चे और वे ‘बड़े’

रिश्तेदार तो हैं

पर वह रिश्ता कैसा है यह देखो

उन बच्चों की दुबली देह से

जो रक्तशोषी साइफन लगा है

वह उन बड़के गालों को लाल रखता है

रिश्ता खून का है , बेशक !

कि जिस रिश्ते का खून कर देने को छटपटाता है तुम्हारा जी !

ज्ञानेन्द्रपति

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9 टिप्पणियाँ

Filed under gyanendrapati, hindi, hindi poems, poem

9 responses to “कविता : खून का रिश्ता : ज्ञानेन्द्रपति

  1. बाल मजदूर की स्थिति पर बहुत ही सही शब्दों मे मार्मिक चित्रण किया है आपने ।

  2. @ ममता जी , कविता प्रसिद्ध समकालीन कवि ज्ञानेन्द्रपति द्वारा रचित है । पिछले साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें मिला था।काशी में रहते हैं ,आप सब की राय से उन्हें वाकिफ़ करा दूँगा। टिप्पणी के लिए शुक्रिया।

  3. गंगा तट ज्ञानेंद्रपति का चर्चित संग्रह है ।
    हम उनके शैदाई हैं अफलातून जी ।
    उन्‍हें ये बात भी पहुंचा‍इयेगा ।

  4. बहुत बेचैन कर देती है यह कविता, जितनी बार भी पढ़ी जाए. ज्ञानेंद्रपति हमारे समय के बहुत बड़े कवि हैं. उनका काव्‍य-आलाप बहुत व्‍यापक है. मुझे याद पड़ता है, एक कविता में वह नदी से पूछते हैं- नदी, तुम्‍हारे सिरहाने हिमालय खड़ा है, पर तुम एक साबुन की टिकिया से हार गई. और एक कविता है मानव बम. बहुत ही मार्मिक. उन तक हमारा सलाम भी पहुंचाइगा हुज़ूर.

  5. लगता है आज लज्जा दिवस ही मनाना है , कभी अपने AIIMS के अनुभवों पर,वहाँ प्रतीक्षारत बच्चों व उनके दुखी माता पिता की स्थिति पर,कभी अंबेडकर जी के बारे में पढ़कर – हमारे समाज द्वारा दलितों के शरीर पर दिये घावों से अधिक उनके मन के घावों पर, कभी बाल मजदूरी पर लिखी इस कविता को पढ़कर । इसी विय पर इला जी ने भी अपने ब्लॉग
    पर बहुत मार्मिक लेख लिखा है । यह हमारा कैसा समाज है ? जहाँ हम दुखी, कमजोर व बीमारों को और अधिक कष्ट देने से नहीं हिचकते ? कोई किसी बच्चे को कैसे कष्ट दे सकता है ? बच्चा तो गधे का भी मनमोहक लगता है । फिर यह मानव का बच्चा क्यों अभिशप्त है ?
    कवि ठीक ही कह रहे हैं कि काश ये बच्चे टिड्डे ही होते ! कभी किसी टिड्डे को बन्धित नहीं देखा ।
    घुघूती बासूती

  6. ये बच्चे दूकानों,होटलों,कारखानों,वह भी कई तरह के खतरनाक किस्म के कामों में लगे तो पाए ही जाते हैं,अधिकांश शहरी घरों में भी उन्हें काम करते देखा जा सकता है . उन लोगों के घरों में भी जो इन बच्चों पर लिखी कविता को पढ-सुन कर मुग्ध भाव से सिर हिलाते दिखते हैं . यह बेशर्मी से भरा असंवेदनशील समय है .

    पेटा-सेटा सब अपनी जगह ठीक हैं पर प्राथमिकता इन बच्चों का भविष्य होना चाहिए .

    मर्मस्पर्शी कविता .

  7. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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