जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल –

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

11 टिप्पणियाँ

Filed under hindi, hindi poems, nursery rhymes , kids' poetry, poem, rhyme

11 responses to “जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

  1. कमाल है भाई. अल्लामा इकबाल, और ये “जुगनू”. वाह ! बहुत बहुत शुक्रिया आप का.

  2. खूब – वैसे आजकल तो रात में भी जुगनू कहाँ दिखते हैं – बिजली की बत्तियां ही बत्तियां

  3. अल्लामा इक़बाल अपने गहन दर्शन और फ़ारसी ज़बान के ज़्यादा इस्तेमाल के चलते आसान शायर नहीं माने जाते. वैसे भी वह ग़ज़ल से ज़्यादा नज़्म के शायर माने जाते हैं… लेकिन उन्होने बाज कई ऐसी नज़्में कही हैं जो हर आम-ओ-ख़ास को आसानी से समझ में आ जाती हैं. फिर यह तो बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी गयी नज़्म है. इसमें बयान की रवानी देखते ही बनती है.

    बच्चे का जुगनू से यह कथन कि-
    ”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,
    कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

    मुझे पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर
    का एक शेर याद आ गया, जो इस नज़्म के सालों बाद उन्होने लिखा. आप भी देखें कि-

    ‘जुगनू को दिन के वक़्त परखने की जिद करें,
    बच्चे हमारी अहद के चालाक़ हो गए.’

    परवीन शाकिर अजीमुश्शान शायरा हैं. यह निर्विवाद है.

  4. अल्लामा इकबाल साहब ने बच्चों के लिए भी कविताएं लिखी हैं, यह जानकर प्रसन्नता हुई। पढवाने का शुक्रिया।

  5. पिंगबैक: अल्लामा इकबाल : बच्चो के लिए (2) : परिंदे की फ़रियाद « शैशव

  6. wasim akram

    sirf jugnu hi nahi allama iqbal ki shayri ka koi jawab nahi hai

  7. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

  8. पढाके ये कविता हमे यक़-ब-यक़ ,
    दिलाया वो याद ज़िंदगी का सबक़.
    कि सूरज औ’ जुगनू हैं एक ही ज़ुबान,
    है दिन मे किसी की, किसी -रात शान.
    तो लड्ना है क्या, मिल के रहना सभू,
    ज़िंदगी शाद करनाहै दिल में ये ठान.
    प्यारी सी कविता है प्यारे कवी,
    सभी मिलके करते हैं उनको सलाम.

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