Monthly Archives: फ़रवरी 2008

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !- महेश्वर

आज मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

उदास होने दीजिए मुझे

बदलने के लिए दर्द का जायका

घुटन का अहसास

ताकि कहीं-न-कहीं तो टूट सके

एकरसता का लम्बा सिलसिला

मुझे उदास होने दीजिए

ताप को चुनौती देते

अमलतास और गुलमुहर के बाग़ी फूलों से

अँकवार भरकर भेंटने के वास्ते

हो सकता है जब तक मैं उन तक पहुँचूँ

बेगाने मुसाफ़िर-सा गुज़र जाये गुस्ताख़ मौसम

उदास होने दीजिए मुझे

उद्दाम आवेग से नाचती किसी पहाड़ी नदी की तरह

उन्मत्त जवानी के उन पुर-असरार नग़मों के लिए

जिन्हें गाते-गाते बीच ही में

बेदम हो गयी थी मेरी आवाज़

मुझे उदास होने दीजिए

सहयोद्धाओं के संग बनायी गयी

जंग की उन विराट योजनाओं के वास्ते

जिन्हें अमल में उतारने के लिए

एड़ लगाते ही टूट गयी मेरे घोड़े की बाग

उदास होने दीजिए मुझे

समन्दर के ज्वार

और बर्फ़ीली चोटियों की दुर्गम चढ़ाइयों

और घने जंगलों को मथते बवण्डर के वास्ते

जिनसे टक्कर लिये बिना ही

निष्पन्द हो गया मेरा शरीर

दरअसल

मुझे उदास होने दीजिए

आपकी सच्ची खुशी के लिए

ताकि मेरे लिए ग़मग़ीन

आपके चेहरे पर दमक उठे

आदमी की यातनाओं के इतिहास को मेटने के लिए

आदमी की निश्छल कोशिश –

ताकि मेरे लिए उदास आपके चेहरे से खिल उठे

मौत के ख़िलाफ़

जीवन की जद्दोजहद का मासूम संकल्प

इसी से तो धधकती है

अन्तत: बेरोक परिवर्तन की आग

जिसमें संचित है हम सबके लिए

अनन्त प्रेम और राहत की सुखद धूप

हाँ , इसी धूप के जश्न में आज

मुझे थोड़ा उदास होने दीजिए , साथियों !

– महेश्वर

१८-३-८६ : पटना अस्पताल.

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तार के खंभे : भवानी प्रसाद मिश्र

[ ‘भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम’ , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक ‘समकालीन सृजन’ , २० बलमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता – ७००००७ से साभार ]

तार के खंभे

एक सीध में दूर-दूर तक गड़े हुए ये खंभे

किसी झाड़ से थोड़े नीचे , किसी झाड़ से लम्बे ।

कल ऐसे चुपचाप खड़े थे जैसे बोल न जानें

किन्तु सबेरे आज बताया मुझको मेरी माँ ने –

इन्हें बोलने की तमीज है , सो भी इतना ज्यादा

नहीं मानती इनकी बोली पास-दूर की बाधा !

अभी शाम को इन्हीं तार के खंभों ने बतलाया

कल मामीजी की गोदी में नन्हा मुन्ना आया ।

और रात को उठा , हुआ तब मुझको बड़ा अचंभा –

सिर्फ बोलता नहीं , गीत भी गाता है यह खंभा !

– भवानी प्रसाद मिश्र

[ १९५९ ]

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डेढ़ रुपए के अनूठे सिक्के का राज

    इस सिक्के ने लाजमीतौर पर पाठकों का ध्यान खींचा । हमारे देश में साक्षरता की कमी और अल्प-साक्षरता के कारण जिनके हाथ यह सिक्का लगा उनमें से कइयों ने इसे डेढ़ रुपए का सिक्का माना ।

    लावण्या जी, यह सिक्का नकली नहीं है और न ही तृटिपूर्ण है , फिर भी अनूठा तो है ही ।तृटिपूर्ण होने पर इसका संग्रह-मूल्य अत्यधिक हो जाता। चिट्ठे पढ़ने वाले किसी अन्य पाठक ने ऐसा सिक्का पा कर इस पर ध्यान नहीं दिया । दो टिप्पणीकर्ता बन्धु जो सिक्कों के बारे में विशेष रुचि रखते हैं – रंजन और संजय बेंगाणी ने विशिष्ट ज्ञान प्रकट किया।दोनों ने काफ़ी सही कहा। बन्धु रंजन ,पहली भारतीय रेल मुम्बई से ठाणे चली थी और इसके डेढ़ सौ साल पूरे होने में अभी देर है । कितनी देर है ? 

    भारतीय डाक के 150 वर्ष सन 2004 में पूरे हुए , जिस उपलक्ष्य में यह सिक्का जारी हुआ था। सिक्के का दूसरा पहलू नीचे दे रहा हूँ ।

‘डेढ़ रुपए’ के सिक्के की असलियत

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डेढ़ रुपए का सिक्का

डेढ़ रुपए का सिक्का

आपने यह सिक्का देखा है ? इसके पृष्ट भाग पर 150 अंकित है और यह 2004 में टकसाल से निकला है । मेरे घर के कपड़े लोहा करने वाले मित्र मनोज को कल जब इस सिक्के को दिखाया तब उसने कहा,’डेढ रुपए के सिक्के के बारे में सुना जरूर था,पहली बार देख रहा हूँ।’

मैंने कल ही इसे प्राप्त किया है ‘केशव पान भण्डार’ में कार्यरत राजू यादव से । राजू ने इसे करीब दो वर्षों से सहेज कर रक्खा था।

क्या आप लोगों ने डेढ़ रुपए का सिक्का देखा है?जानकारी का स्वागत है। पाठकों में जानकारी का अभाव रहा तो ‘आलोकपात’ किया जाएगा।

करीब २७-२८ वर्ष पहले पचास की नोट पर बने संसद-भवन के चित्र पर तिरंगा नदारद था।मित्र सुशील त्रिपाठी ने उसका चित्र ‘दिनमान’ या ‘रविवार’ में छपवाया।संसद-भवन शोक से बाहर आ गया था और झण्डा फहराने लगा।

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तब कैसा मौसम ठंडा जी !

 

तब कैसा मौसम ठंडा जी

आया फिर जाड़े का मौसम

लगता सबको ठंडा जी

खुले बदन फिर भी बैठे हैं

नदी किनारे पण्डा जी

मास्टर जी के हाथ कोट में

कहां गए वो डंडा जी

कहता है हर साल यही

गणतंत्र दिवस का झण्डा जी

हो सबके पास गरम कपड़े

तब कैसा मौसम ठंडा जी !

राजेन्द्र राजन

मानव मानव एक समान

मानव मानव एक समान

निर्धन हों चाहे धनवान

मानव मानव एक समान

चाहे गोरे हों या काले

मानव मानव एक समान

बनाएंगे हम ऐसी दुनिया

ऐसा सुंदर एक समाज

जिसमें न हों ऊंच नीच के

भेदभाव के रस्म-रिवाज

हम चाहेंगे मानव के सब

गल जाएं झूठे अभियान

मानवता का अर्थ यही है

मानव मानव एक समान ।

राजेन्द्र राजन

[ रेखाचित्र कांजीलाल का बनाया है। सुधेन्दु पटेल द्वारा लिखी पुस्तक ‘एक कलाकार की दृष्टि में काशी में’ से लिया है। ]

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