आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये : भवानी प्रसाद मिश्र

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गुलाब का फूल है

हमारा पढ़ा – लिखा

मैंने उसे काफी

उलट-पुलट कर देखा है

मुझे तो वह ऐसा ही दिखा

 

सबसे बड़ा सबूत

उसके गुलाब होने का यह है

कि वह गाँव में जाकर

बसने के लिए

तैयार नहीं है

 

गाँव में उसकी

प्रदर्शनी कौन कराएगा

वहाँ वह अपनी शोभा की

प्रशंसा किससे कराएगा

 

वह फूलने के बाद

किसी फसल में थोड़े ही

बदल जाता है

मूरख किसान को फूलने के बाद

फसल देने वाला ही तो भाता है

 

गाँव में इसलिए ठीक है

अलसी और सरसों और

तिली के फूल

जा नहीं सकते वहाँ कदापि

गुलाब और लिली के फूल

 

बुरा नहीं मानना चाहिए

इस गुलाब – वृत्ति का

गाँव वालों को

क्योंकि वहाँ रहना चाहिए सिर्फ ऐसे हाथ – पाँव वालों को

 

जो बो सकते हैं

और काट सकते हैं

कुएँ खोद सकते हैं

खाई पाट सकते हैं

और फिर भी चुपचाप

समाजवाद पर भाषण सुनकर

वोट दे सकते हैं

गुलाब के फूल को

और फिर अपना सकते हैं

पूरे जोश के साथ अपनी उसी भूल को

 

याने जुट जा सकते हैं जो

उगाने में अलसी और

सरसों  और तिली के फूल

गुलाब और लिली के फूल

तो भाई यहीं शांतिवन में रहेंगे

 

बुरा मानने की इसमें

कोई बात नहीं है

बीच – बीच में यह प्रस्ताव कि गुलाब वहाँ जा कर

चिकित्सा करे या पढ़ाये

पेश करते रहने में हर्ज नहीं है

मगर साफ समझ लेना चाहिए

गुलाब का यह फर्ज नहीं है

कि गाँवों में जाकर खिले

अलसी और सरसों वगैरा से हिले-मिले

और खोये अपना आपा

ढँक जाये वहाँ की धूल से

सरापा

 

और वक्तन बवक्तन

अपनी प्रदर्शनी न कराये

आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये

 

– भवानी प्रसाद मिश्र

( तरुणमन , वर्ष ३ , अंक ९ , १९७३ )

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16 टिप्पणियाँ

Filed under hindi poems

16 responses to “आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये : भवानी प्रसाद मिश्र

  1. क्या बात है ! अपने समाज की सच्चाई की कितनी पैनी पकड़ ,ग्रामीण जन के साथ कितनी सच्ची सहानुभूति और शहरी नेताओं के गुलाबी वादों और गुलाबवाद पर कैसा जबर्दस्त व्यंग्य . भवानी भाई आधुनिक हिंदी कविता के ‘सिन्टेक्स’ को बदलने वाले उस्ताद कवि थे .

  2. बहुत अच्छी कविता । किन्तु आज तो जो किसान गुलाब की खेती कर सकता है और बाजार को समझ सकता है वह गुलाब ही उगाता है । यह भी सही है कि आप गुलाब को अलसी और सरसों के बीच जबर्दस्ती तो नहीं रख सकते । यह गुलाब के साथ भी अन्याय होगा और सरसों अलसी के साथ भी ।
    घुघूती बासूती

  3. गुलाब का यह फर्ज नहीं है

    कि गाँवों में जाकर खिले

    अलसी और सरसों वगैरा से हिले-मिले

    और खोये अपना आपा

    ढँक जाये वहाँ की धूल से

    सरापा

    और वक्तन बवक्तन

    अपनी प्रदर्शनी न कराये

    आमीन , गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये

    क्या बात है! कैसा करारा व्यंग्य है गुलो गुलाबी संस्कृति पर। बहुत बहुत शुक्रिया इसे पढ़वाने का ।

  4. गजब का व्यंग्य किया है। और बड़ी ही सरल भाषा का प्रयोग किया है।

  5. बहुत अच्छी कविता है, धन्यवाद।

  6. i most like my sawan season because here is morething for me with my chandajey. sweet chanda as like gulab kali. bye………………

  7. पिंगबैक: गाँव में डॉक्टर ? ना , भई ना ! « यही है वह जगह

  8. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टॉप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

  9. पिंगबैक: 2010 in review | शैशव

  10. lafza nahiN haiN, is behisi per ki gaoN se nikalaa Doctor bhee gaoN ko achhoot manane lagata hai.,afsos hume nahin ma’aloom ke kahaN ja rahe haiN.

  11. मीरा सिंघ

    बहुत सुन्दर और सटीक

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