"बाम्मन को बैल की तरह जोतवाने का हुक्म ‘महात्मा’ से दिला दें": छोटुभाई (५) : स्वामी आनन्द

 

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११. 

     छोटुभाई को पाठशाला चलाने, सहकारी सोसायटी खड़ा करने या आवेदन पत्र लिखने जैसे ‘रचनात्मक’ कामों में कोई ‘रुचि’ न थी। जुल्म और अन्याय को शिकारी कुत्ते की तरह ढूँढ़ निकाल कर उनके खिलाफ लड़ना और लोगों के मन का डर निकाल कर उन्हें लड़ना सिखाना, यही उनके जीवन का प्राण बन गया था। तहसील दफ़्तर में सच्चे-झूठे फौजदारी के  केस चलते हों, छोटे-बड़े अधिकारी झूठे सबूतों के आधार पर आदिवासियों को जेल की रोटी तोड़ने पर मजबूर करते हों, किसी की खेती की जमीन गलत सलत लिखा – पढ़ी करा के किसी सवर्ण या व्यापारी ठेकेदार ने हडप ली हो, अधिकारी जुल्म करने वालों का साथ देते हों – वे ऐसे लोगों के पीछे पड़ जाते। उनके तथा उनके शागिर्दों के किए कुकर्मों का इतिहास भूगोल जमीन-आसमान एक कर इकठ्ठा करते। संबंधित तथा अन्य अधिकारियों से मिलते। सबूतों का असला जेब में रख कर उससे बहुत विनम्रता के साथ बात करते। उसकी नीयत
भांप लेते। अगर वह सीधा न लगा तो आंखें दिखा कर जेब से एक या दो ‘कान
खजूरे’ निकाल कर दिखाते। और अगला पाहिमाम, त्राहिमाम पुकारने लगता। किए
कर्म के लिए पछतावा व्यक्त करवा कर या फिर जिसको अन्याय हुआ हो उसे
समुचित मुआवजा दिला कर ही छोड़ते। बल्कि बिना झूठ बोले बचने का रास्ता भी
दिखा देते।एक दफ़ा एक आदिवासी की हत्या के केस की जांच के सिलसिले में कल्याण के किसी पुलिस अधिकारी के पास एक महिला को भेजा। चिठ्ठी लिखी:
“इस महिला का बयान (अमुक) हत्या की जांच में महत्व की कड़ी साबित हो सकती
है । उसकी बात सुनें तथा आवश्यक जांच करें।”
    महिला को कल्याण जाने के लिए गाड़ी भाड़ा के आठ आना भी अपनी जेब से दिए।कुछ समय बाद ठाणा की सेशन कोर्ट में केस की सुनवाई हुई तो छोटुभाई को साक्षी के रूप में बुलाया गया।
    जज साहब ने स्वयं छोटुभाई से जिरह शुरू कर दी। कोर्ट में, लॉबी में और
आसपास की तमाम अदालतों में हल्ला हो गया।
फालतू बैठे वकील सुनने के लिए दौड़ पड़े।
“वह पागल जज कल्याण वाले काथोड़ी केस में छोटुभाई को क्रॉस कर रहा है।
चलो, चलो देखने। यहां क्यों बैठे हो? दोनों ही सिरफिरे हैं। जरा देखें तो
सही , कौन किसको मात देता है।”
गांव और बाजार से भी लोग दौड़े आए। कोर्टरूम ठसाठस भर गया।
छोटुभाई ने महिला को पैसे दे कर पोलिस थाने भेजा और तिस पर अधिकारी के
नाम चिठ्ठी भी लिखी इस पर जज साहब ने खिंचाई शुरू की:
“आपको केस की जांच में ऐसी क्या रुची है कि आपने अपनी जेब से उस औरत को
कल्याण भेजा?”
“अवश्य, मैंने उसे पैसे दे कर भेजा। वर्ना वह बेचारी कैसे जाती? उसकी
झोंपड़ी में मैं गया था तब उसने कांजी बनाई थी मगर वह  हंडिया टूटी होने की वजह
से जमीन पर बह गई थी। वह हंडिया का तलवा चाट रही थी और कुत्ता जमीन पर
पड़ी कांजी चाट रहा था। वह कल्याण कैसे जा पाती? मुझे तो उसे उस दिन की
मजदूरी, जो वह नहीं कर पाई, वह भी उसे देनी चाहिए थी। लेकिन मेरी जेब में
सिर्फ आठ आने थे। उतने दिए। टिकट के किराए भर के। शाम को थकी हारी घर आ
कर वह बेचारी भूखी सोई होगी। और दुसरे दिन शाम को दिनभर की मजदूरी करने
के बाद ही उसने कांजी खाई होगी।”
“लेकिन आप इस प्रकार जांच में रुचि कैसे ले सकते हैं? क्या इससे शंका
नहीं होती कि आपका इस जांच में कुछ निहित स्वार्थ था?”
“कोई निहित स्वार्थ नहीं, बड़ा ही खुला स्वार्थ था। एक दम सवेरे के उजाले
की तरह साफ़। कोर्ट के इस खंभे की तरह उजला – इन्साफ़ दिलाने का स्वार्थ।
क्या यह जुर्म है? ends of justice के लिए मदद करना एक नागरिक का फर्ज है
ऐसा कानून में नहीं है क्या?”
“लेकिन आपने तो पुलिस अधिकारी पर चिठ्ठी भी लिखी ! आप अपने आप को
हिन्दुस्तान के गवर्नर जनरल समझते हो क्या?”
“आप गलत समझ रहे हैं। यदि मैं अपने आप को ऐसा समझता तो सीधा हुक्म देता:
“Hang him.” लेकिन मैंने तो लिखा: “इसकी बात सुनियेगा और please
investigate.”
पौन घंटे तक बहस चली। डेवीस जज झक्की व्यक्ति माना जाता था। लेकिन उसका
पाला पड़ा छोटुभाई से। जब बड़े से बड़े अधिकारी उनको काबू मे नहीं कर सके
तो उस बेचारे सेशन जज की क्या बिसात? उससे मुंह में उंगली डलवाई। अंत में उसने
कहा:
Mr. Desai, I am gratified. I am more than satisfied. You are a
remarkable man. I wish there were more social workers of your type in
this country.
आश्रम में आ कर मुझसे कुछ नहीं कहा। अगले कई दिनों तक गांव में जहां जाओ
वहीं इसी की चर्चा। मैंने घर आकर पूछा तो बोले:
“मुझे कहने का मन तो था। लेकिन थोडा डर लगा। तुम contempt of court जैसे
मुद्दे निकाल कर ख्वामखाह मुझे नीरस बना देते। मैंने सोचा एक दो दिन के
बाद जब मामला थोडा ठंडा पड जाए तो धीरे से सारी बात कहूंगा। लेकिन तुम तो
गांव जा कर सारी बात जान आए। लोग बात करते होंगे।”
फिर सिलसिलेवार सारी बात बताई ।

१२
    बाबा मंगल की ढलान के जंगल में रहने वाला एक मेहनतकश काथोड़ी परिवार बरसों
से अंबरनाथ के पास घास-फूस की झोंपडी बना कर रहता था । पहाड़ी की ढलान पर
पाली बना कर खेती करता था। जमीन और झोंपड़ी उसके नाम थे । पड़ोस में एक
दक्कनी ब्राह्मण भैंस पाल कर दूध का व्यापार करता था। दोपहर और मध्य
रात्रि की लोकल से उसके दूध के कनस्तर मुम्बई भेजे जाते। उसकी सब भैंसें
आस-पास के पहाड़ी मैदानों में तथा ढलान पर दिन रात चरा करतीं। उसकी नजर भाऊ
काथोड़ी की झोंपडी वाले मैदान पर अटकी थी । उसने कल्याण के सवर्ण ब्राह्मण
से मिल कर भाऊ काथोड़ी पर झूठा मुकदमा दायर करवाया और झोंपड़ी वाली जमीन
उसकी नहीं है ऐसी रपट बनवा कर उसकी झोंपड़ी सरकार द्वारा उखड़वा दी ।
बेचारे के बाल-बच्चे पेड़ की शरण में आ गए ।
छोटुभाई कहीं मुंबरा कौसा पनवेल की तरफ़ दौरे पर थे। रास्ते में जंगल के
काम पर जाते वारली, काथोड़ी, मजदूर, जो मिल जाए उनसे हर दम बात करते । ऐसे
किसी व्यक्ति से बात सुनी कि अंबरनाथ के किसी काथोड़ी परिवार पर जुल्म हुआ है और
पुलिस ने उसकी झोंपडी उखाड़ फेंकी है ।
    सुनते ही वे रास्ते से लौट पड़े । कौसा में प्यारेअली सेठ के बगीचे से कोई वाहन ले कर ट्रेन पकड़ी और सीधे अंबरनाथ पहुंच गए । वहां केमिकल फैक्टरी वाले भाऊसाहब हम सब के जिगरी दोस्त थे। उनसे कुशल मंगल की बात कर तुरंत पहुंचे भाऊ काथोड़ी की दरवाजे पर। बेचारे की बिवी और बच्चे पेड़ के तले रो रहे थे । टूटी हूई झोंपडी का अवशेष एक ढेर के रूप में कुछ दूरी पर पड़ा हुआ इस आदिवासी परिवार पर बीते सितम की शिकायत कर रहा था। पुलिसवाले तो तोड़-फो्ड़ कर अगले दिन ही चले गए थे। भाऊ की शिकायत तथा भाऊसाहब का बयान लेकर  सीधे कल्याण पहुंचे और कागजी कार्यवाही पूरी कर ४८ घंटे के बाद
आश्रम पहुंचे।
    महिनों तक भाऊ काथोड़ी और कल्याण के चक्कर लगाए । एक कोठरी में बत्तीस
कोठरी की तरह कल्याण के कई छोटे बडे अधिकारियों की ‘कुंडलियां’ सूंघ-सूंघ
कर खोज निकालीं। कई लोगों को छोटुभाई जुलाब की गोली की तरह लगे। अंत में
भाऊ काथोड़ी की जमीन, उस पर सरकार के खजाने में जमा किया गया टैक्स, ब्राह्मण
अधिकारियों की उस दूध के ब्राह्मण व्यापारी के साथ मिली- भगत और उसकी
गैरकानूनी मदद, उन सब की मिलकर उस गरीब श्रमजीवी आदिवासी परिवार के हक की
जमीन छीन लेने की साजिश –एक-एक बात कागज में लिख कर जग जाहिर कर दी,
सबको नाकों चने चबवाए। भाऊ काथोड़ी को जमीन वापस दिलवाई । उसकी झोंपड़ी उस
व्यापारी के खर्च से बनवाई और ईमानदार तथा मेहनतकश काथोड़ी को किसान के
रूप में प्रोत्साहित करने के लिए कुछ सरकारी मदद भी दिलवाई ।
    यह भाऊ काथोड़ी तो बहुत जोरेदार आदमी निकला। सत्याग्रह आन्दोलनों के दौरान
जेल भी गया । एक बार उसके विशेष आग्रह पर तथा भाऊसाहब की इच्छा को देखते
हुए हमने अंबरनाथ में उसके पड़ोस में आदिवासियों का सम्मेलन भी रखा। उसमें
खेरसाहब, वांदरेकर, वर्तक और ठाणा जिला के कई राजनैतिक एवं रचनात्मक
कार्यकर्ताओं के सामने अपने आदिवासी लोगों को संबोधित कर उसने भाषण भी
किया:
“माझ्या भावांनो ! आ आपले बाळासाहेब खेर धरमराजे हाय। मा’त्मा गांधीना
चेला ने आपल्या सोटुभायना मुत्तुर हाय। तुरुंगात जावुन आले हाय। मी देखील
तुरुंगात जावुन आलो, हे तुमांस सांगतो। जेल-तुरुंगाला भिण्याचें कांय
नांय। राहायला मोठे राजवाडे – पक्या दगडाचे। सकाळ संध्याकाळ डागतर येवून
विचारपूस करी जाय:
“कसें काय? बरें हाय ना?”
“म्हनून मनतो, जेलमां बीवा जेवुं काय नांय। हे समधे मोठे लोक तुमांस
समजून द्यायला येथें आले हाय। पण तीमां समजून देयाचें काय हाय? तुरंगा
मंधी तो निवळ सायबी रावसायबी ज हाय। खायला प्यायला पूरेपूर अन काम अगदी
हळ्वुं फूल।
“आटलुं तमने समद्यांनां हमजावून आणि या सर्व मोठ्या लोकांनां रामराम करून
मी खाली बसतो।”

    [मेरे भाइयों ! ये अपने बाळासाहब खेर धर्मराज हैं। महात्मा गांधी के चेले
और अपने सोटुभाई के मित्र। जेल जा कर आए हैं। मैं भी जेल देख कर आया हूं,
यह तुम्हें बता रहा हूँ । मैं, तुम्हें जो खुद देखा वह बता रहा हूं। जेल-कारावास
से डरने की कोई बात नहीं है। रहने के लिए बड़ा महल – पक्की ईंटो का। सुबह
शाम डाक्टर आ कर हाल चाल पूछते हैं:
“कैसे हो? सब ठीक है न?”
“इसलिए कहता हूं, जेल से डरने जैसा कुछ नहीं है। ये सब बड़े लोग यहां
तुम्हें समझाने आए हैं। इसमें समझने जैसी कोई बात नहीं है। जेल में साहब, रायसाहब की तरह जीना है । खाना-पीना पूरा और काम एक दम फूल की तरह।
“यह बात आप सबको समझाने और यहां आए सभी बड़े लोगों को राम राम कर मैं अब बैठता हूं।” ]

१३
    उसका मामला निपटने के दो-तीन बाद वह ठाणा आश्रम आया था। “सोटुभाई हैं
क्या?” पूछता। मेरे सामने आ कर बैठा । मैंने पूछा, “मुझसे कुछ काम है
क्या?” वह चुप रहा। बैठा रहा । जब मैं बार-बार उसे पूछता तो कहता:
“सोटुभाई ने बताया नहीं?”
बात कुछ ऐसी थी कि छोटुभाई को मौका पा कर उसने एक-दो बार पूछा था:
“वो बाम्मन शाम को मुंबई से वापस आता है तो मेरे खेत की सीमा से हो कर
गुजरता है। उसे देखते ही मेरे सारे तन बदन में आग लग जाती है । कलेजे
में जैसे कोई काटने लगता है। और मेरे भीतर न जाने कुछ कुछ होने लगता है।
मैं आपसे क्या कहूं, लेकिन मुझे कुछ ऐसा मन करता है कि उसकी गर्दन पकड़ कर
उसे खेत में घसीट कर ले जाऊं और मेरी बैल की जो्ड़ी में से एक बैल को छोड़
कर उसकी जगह इसे हल में जोत दूं और खेत के पांच छह चक्कर लगवाऊंड। बस इतना
भर कर दूं तो पता नहीं क्यों मेरे कलेजे को शांति पहुंचे। सिर्फ़ दो, बस
दो ही चक्कर,  इस छोर से दूसरे छोर तक जोतूं। ज्यादा नहीं !”
छोटुभाई उसे बहुत धैर्यपूर्वक समझाते:
“पगले! हम ऐसा नहीं कर सकते। हम महात्मा गांधी के लोग कहे जाते हैं।
महात्मा गांधी का हुक्म है कि हम सिर काटने वाले को भी नहीं छू सकते।”
“लेकिन हमें कहां उसका सिर काटना है? यह तो इतना करने की आप ईजाजत दें तो
मेरे कलेजे को ठंडक पहुंचे । महात्मा गांधी का हुक्म एक दम सच्चा, सोने की
मुहर जैसा। इस बात का कोई इनकार नहीं। हम सब महात्मा गांधी के लोग हैं।
इसका भी मुझे कहां इनकार है? अब तो मैं आप में से एक हो गया, आप की हां
मेरी हां और आपकी ना मेरी ना। इसीलिए तो मैं रोज यहां आपसे पूछने आता हूं
– कि बस इतनी सी ईजाजत दे दो। आपके हुक्म के बगैर मैं पत्ते को भी नहीं
छूऊंगा। यह बात एक दम पक्की, इस में कोई छूटछाट नहीं।”
अंत में छोटुभाई उसे अपना फैसला सुनाते: “ठाणा आश्रम में आ कर उस स्वामी
दादा का हुक्म ले कर आओ। वे सब बड़े आदमी हैं। वे महात्मा गांधी को रोज
चिठ्ठी लिखते हैं और महात्मा गांधी उन्हें रोज चिठ्ठी लिखते हैं, हुक्म
भेजते हैं। वो स्वामी दादा अगर हुक्म दें तो मैं ना नहीं करूंगा। अब कोई
शिकायत? तो फिर आश्रम में आना जब समय मिले तब । ”
    इस लिए भाऊ काथोड़ी आश्रम आने-जाने लगा ।  मेरे घूटने को दोनों हाथ से छू कर
राम राम बोलता, सामने बैठे, मैं जहां काम करता उस ऑफ़िस वाले कमरे में मेरी
गद्दी के सामने घंटो बैठा रहता। मैं एक से ज्यादा बार उससे पूछता :
“किस काम से आए? छोटुभाई से काम है या मुझसे ?” कुछ न बोले। घंटो बीत जाँए।मैं उसे बार-बार घुमाफिरा कर पूछूं तो इतना ही कहे:
“सोटुभाई ने आपसे बात नहीं की?”
अंत में एक दिन मेरे बहुत आग्रह के बाद उसने मुझे बात बताई। छोटुभाई ने
बताई थी वही, लगभग उन्हीं शब्दों में।
अंत में बोला:
“महात्मा गांधी का रास्ता बिलकुल सच्चा। उन्हीं की कृपा से सोटुभाई और आप
जैसे बड़े लोग हमारी इतनी मदद कर रहे हो। और उन्हीं की कृपा से मेरी जमीन
और झोंपडी मुझे सही सलामत वापस मिली। उन्हीं के रास्ते सारी दुनिया को
चलना चाहिए। मुझे भी उस बाम्मन के साथ कोई बैर नहीं रहा कि मैं उसका सिर
काटने का विचार मेरे मन में लाऊं। और अब तो महात्मा गांधी का प्याला
छोटुभाई ने पिला दिया और मैंने पी भी लिया।
“इसलिए महात्मा गांधी का मार्ग तो कभी छोड़ना नहीं, नहीं सो नहीं ही।
लेकिन यह तो मेरे जलते हुए कलेजे को कुछ ठंडक पहुंचे इस लिए पूछ रहा हूं ।
उसका सिर काटने का विचार तो मेरे पेट के किसी कोने में भी नहीं है ऐसा
महात्मा गांधी को बेशक लिख दें। तो फिर इतना करने की ईजाजत मुझे जरूर दे
देंगे.।वे महात्मा पुरुष हैं, वे किसी की बुराई नहीं चाहते. इसलिए इतना
हुक्म मंगा लीजिए।”
“कैसा हुक्म?”
“उस बाम्मन को गले से पकड़ कर हल में जोत कर दो चक्कर खेत के लगवाने काड।
सिर्फ़ दो चक्कर, ज्यादा नहीं।”
“अरे पागल….”
“लेकिन आप जरा पूछ कर तो देखें। इसमें अपना क्या जाता है? नहीं देना हो
तो नहीं देंगे। उनके ऊपर – महात्मा पुरुष पर – अपना जोर थोड़े ही चलने
वाला है ? लेकिन यह तो मेरा मन कह रहा है कि आप अगर पूछ लें तो इतना हुक्म
तो वे जरूर दे देंगे। बस. मेरे कलेजे को फिर तो ठंड ही ठंड।”
उसे समझाने में छोटुभाई, मुझे और भाऊसाहब को कई दिन लगे.

( जारी )

 

 

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3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “"बाम्मन को बैल की तरह जोतवाने का हुक्म ‘महात्मा’ से दिला दें": छोटुभाई (५) : स्वामी आनन्द

  1. अब तो उत्सुकता बढ़ गई है कि क्या भाऊ ने सचमुच अपने ब्राह्नण दुश्मन को हल में जोड़ कर खेत जुतवाया?
    बहुत रोचक रही यह सीरीज :)

  2. धन्य हैं छोटू भाई और धन्य हैं भाऊ काथोड़ी और उनका सच्चा-निर्मल मन . धन्य है उनका क्रोध और धन्य है वाया छोटू भाई गांधी जी पर उनका विश्वास . उनका जेल का ‘डेस्क्रिप्शन’ बहुत पसंद आया . ऐसे बता रहे थे मानो जेल आमोद-प्रमोद का कोई स्थल हो .पर मन करुणा से भीग जाता है यह सोचकर कि उनका जीवन कितना कठिन और बीहड़ रहा होगा जिन्हें जेल भी आराम की अच्छी जगह लग सकी .

    पता नहीं गांधी जी ने भाऊ काथोड़ी की विनय पत्रिका पर क्या राय व्यक्त की ,पर बाम्मन को हल में जोत कर एक चक्कर लगवाने के पक्ष में तो मेरी भी राय है.

    प्रतिशोधात्मक दंड के लिए नहीं बल्कि सुधारात्मक व्यवस्था के तहत . आदिवासियों का दुख-दर्द जानने के लिए .

  3. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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