रेलवे पुराण – 3 , स्वामी आनन्द

 पिछले भाग ; एक तथा दो


    इसी इज्जत-आदर के कारण और बरसों की उनकी लगन से हार कर अन्ततः रेलवे के सत्ताधीशों ने उनके लिए कोई स्वतंत्र काम खड़ा करने का सोचा जहां रोज चल कर ऊपरी अधिकारियों को उनसे टकराना न पड़े और फिर भी रेल विभाग को उनकी बुद्धिमत्ता का पूरा लाभ भी  मिल सके | इस प्रकार तार-टिकट मास्टरों में नए रंगरूटों को मुंबई शहर की बुराइयों से बचाने के लिए, और उन्हें ठोक पीट कर तैयार करने के लिए, बोर्डिंग-लोजिंग की सुविधावाली एक रेलवे इन्स्टीट्यूट बेलासिस रोड, भायखला के पास शुरु कर छोटुभाई को उसका जिम्मा
सौंप दिया |

    वहां भी उन्होंने अधिकारियों को परेशान करना हांलांकि चालू ही रखा फिर भी काम इतना बेहतरीन किया कि सत्ताधीशों ने उनकी मुक्त कंठ से प्रसंशा की| नए भर्ती हुए टिकट मास्टरों को इस प्रकार शिक्षित और तैयार किया कि समूची लाइन में वे ‘छोटुभाई महात्मा’ के रूप में पहचाने जाने लगे| अगले कई दशक तक मुंबई से विरमगाम, वढवाण और ताप्ती लाइन पर बड़ी – बड़ी मूंछों वाले जवां मर्दों को अचानक छोटुभाई के झुक कर पैर छूते हुए देखा जा सकता था| वे कहते: “इन्होंने ही हमें बनाया| इन्हीं के थप्पड खा कर हमने कुछ सीखा, इसी लिए आज आदमियों की जमात में रह कर मेहनत की कमाई खा रहे हैं | वर्ना हम बरबाद हो गए होते|”

    वे हरदम कहते: “झूठे, अनैतिक, या फिर वो जिसे घूस लेना है, वे दूसरे से दब कर रहते हैं| उतना ध्यान रखें तो फिर एक परमेश्वर को छोड़ कर किसी सी से भी डर ने या दब कर रहने की जरूरत नहीं है| धर्मराज ने सिर्फ एक बार ही सत्य में तनिक मात्र झूठ की मिलावट की थी| लेकिन उतने से ही उनका रथ, जो धरती से एक बित्ता ऊंचा चलता था, वह जमीन पर आ गया था| इसी प्रकार मनुष्य को भी खिसियाना पड सकता है|”

    लेकिन विदेशी हुकूमत में छोटुभाई जैसे स्वाभिमानी स्वतंत्र व्यक्ति का सदा के लिए टिक पाना असंभव था| अंत में सत्ताधिकारियों ने उन से हार कर उन्हें ‘घमंडी, तुनक मिजाजी, उद्धत हैं’ जैसे अनेक कारण दिखा कर रेलवे की नौकरी से निकाला|

    बरख्वास्तगी का हुक्म मिलने के दूसरे ही दिन से छोटुभाई ने तत्कालीन गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष स्व. वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में स्थापित स्व. मणिलाल कोठारी द्वारा स्थापित बी.बी.सी.आई. रेलवे कर्मचारी यूनियन में उनके सह सचिव के रूप में काम करना शुरू कर दिया और कासगंज, मथुरा, आगरा, जयपुर, रेवाडी तक की लाइन पर इन्जन ड्राइवरों को संगठित करने का काम हाथ में ले लिया|

    इस प्रकार बी.बी. रेल्वे के ऊपरी अधिकारियों के मत्थे छोटुभाई शनिच्चर की तरह मंडराते रहे| बरख्वास्तगी के खिलाफ भी उन्होंने लिखा-पढ़ी द्वारा लडाई जारी रखी| करीब डेढ़ साल की लड़ाई के अंत में उन्होंने सत्ताधीशों द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों को खारिज करवाया, बरख्वास्तगी के हुक्म रद्द करवाए और ससम्मान नौकरी पर उसी पद पर पुन:स्थापित करने के हुक्म तामील करवाए|

लेकिन नौकरी पर हाजिर न होते हुए उन्होंने लिखा:

“मैं तो आपने जो मुझ पर अन्याय किया था उसकी मुख़ालफ़त की खातिर ही लड रहा था| मुझे तो अब सार्वजनिक कार्य ही करना है|”

    यह कह कर उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया तथा यूनियन के काम में लगे रहे|

‘बंदर कितना ही बूढा़ क्यों न हो जाए वह उछलना नहीं भूलता’ इस कथनी को सच साबित करते हुए उन्होंने काफी समय तक रेल अधिकारियों की काली करतूतों के खिलाफ अपनी मुहीम जारी रखी| एक किस्से में तो उन्होंने बी.बी. रेल्वे के एक हजारों रुपए की तन्ख्वाह पाने वाले बहुत बड़े अधिकारी का नाम घूस लेने के आरोप के साथ सार्वजनिक पत्रिका में छाप कर उसे मानहानी का मुकदमा
चलाने के लिए ललकारा| मुंबई पुलिस के पास उसे गिरफ़्तार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न बचा| आखिर में मुंबई के गोरे पुलिस कमिश्नर ने उसे सुबह से विहार-पवई की ओर शिकार करने भेज कर, शाम को विकरोली से ट्रोम्बे, और वहां से नाव पर बैठा कर समुद्र में खड़े जहाज पर चढ़ा कर विलायत के लिए रवाना कर दिया|

    गांधीजी की रहनुमाई में सत्याग्रह की राजनैतिक लड़ाई तो एक दशक से ऊपर से चली आ रही थी| इसलिए कुछ साल बाद रेलवे यूनियन का काम धीरे धीरे ढीला होता गया| १९३०-३१-३३ तक उन्होंने इन आंदोलनों में कमोबेश हिस्सा लिया जुड़े और जब प्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़े तो सत्याग्रहियों तथा उनके परिवार जनों की भरपूर मदद की| इन सत्याग्रह आंदोलनों के बाद १९३४ के प्रारंभ से ठाणा जिला के जंगल में बसे आदिवासियों की सेवा का काम मेरे साथ रह कर शुरू
किया | बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि उनके उत्साह, मार्गदर्शन तथा हिम्मत की ताकत के कारण मैंने उनके साथ काम किया|

    १९३४ के प्रारंभ से वे दीन, दु:खी आदिवासियों की सेवा में तन, मन और वाणी से निष्ठापूर्वक, बिना किसी प्रशंसा या मान्यता की कामना लिए सिर्फ स्वप्रेरित मिशनरी भावना व लगन से जो लगे तो अंत तक लगे ही रहे| ठाणा – आश्रम में उनके कार्यकाल के साल भी उतने ही उज्ज्वल, रमणीय एवं मनोहारी थे |

 

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5 टिप्पणियाँ

Filed under memoires, swami anand

5 responses to “रेलवे पुराण – 3 , स्वामी आनन्द

  1. धन्य है छॊटू भाई देसाई को, अगर इस तरह के थोड़े अधिकारी अब भी होते तो भ्रष्टाचार इतना ना होता।
    बहुत बहुत धन्यवाद यह सीरीज प्रस्तुत करने के लिये।

  2. anamdasblogger

    एक साँस में पढ़ गया, हमेशा की तरह. नचिकेता भाई को मेरा आभार पहुँचा दें और यह अनुरोध भी बाँटने में कंजूसी न करें.

  3. यदि संसार के १ प्रतिशत लोग भी उन जैसे होते तो संसार कुछ और ही होता । इतने गंभीर विषय को बहुत मनोरंजक बनाकर लिखा गया है ।
    घुघूती बासूती

  4. मेरा भी आभार पहुचादे नचिकेता जी को,बस एक कमी रह गई उन महापुरुष का फ़ोटो भी होता तो ..

  5. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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