महादेव से बड़े : ले. स्वामी आनन्द

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[ स्वामी आनन्द गुजराती गद्य – साहित्य के एक प्रबल हस्ताक्षर माने जाते हैं । वे महात्मा गाँधी और सरदार पटेल के निकट सहयोगी थे और गाँधीजी की पत्रिकाओं के उस दौर में प्रकाशक थे जब अँग्रेज हुकूमत का दमनचक्र चल रहा था । उनकी सशक्त और अनूठी शैली में लिखा ‘ महादेव थी मोटेरा ‘ नामक संस्मरण का  नचिकेता देसाई द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद यहाँ देते हुए मुझे खुशी हो रही है । – अफ़लातून ]

 

    अखबारवाले – यानि अखबार निकालने वाले और अखबार पढ़नेवाले दोनों की ही
नजरों से ताउम्र ओझल रहने का सौभाग्य जिसे नसीब हुआ,  गुजरात का एक ऐसा
आज़ाद लडाकू , करतार के घर चित्रगुप्त की बही की जांच करने निकल पडा ।
     श्री नरहरिभाई के लिखे ‘महादेवभाई का  पूर्वचरित्र’ ( नवजीवन प्रकाशन,अहमदाबाद ) में तथा बरसों पहले बारडोली आश्रम में टाइफ़ोइड के ज्वर से पीडित एक मित्र की
पुत्री के मन बहलाने के लिए मैंने लिखी और पढ  कर सुनाई कथा  , जिसे श्री
उमाशंकर जोशी ने मुझ से मांग कर ‘संस्कृति’ में एक छोटे लेख के रूप में
प्रकाशित किया, मुझे लगता है कि इस के अलावा कोई भी अखबारनवीस शायद ही तीन दशक की उनकी जनसेवा के दौरान उनके नाम से परिचित हो पाया हो।
    संसार की तमाम सुखसुविधाओं से परे रह कर उन्होंने लगभग सत्तर बरस आजाद
जीवन बिताया; फिर भी गुजरात के अगली पंक्ति के निष्टावान समाजसेवियों तथा
आजादी के सैनिकों में उनका नाम सहज ही गिनाया जा सके ऐसा उनका  सेवामय
जीवन था।
१.
    स्व. छोटुभाई बापुभाई देसाई स्व. महादेव भाई देसाई के ताउजी के पुत्र थे,
यानि उनके चचेरे भाई।  महादेवभाई से तीन चार वर्ष बड़े। दोनों साथ पले,
साथ पढ़ाई की ।    बावजूद इसके दोनों की शिक्षा, स्वभाव एवं व्यक्तित्व बहुत भिन्न-भिन्न थे। एक मुगल गार्डन का गुलाब; दुसरा उनई के जंगल का बाँस। एक ताजमहल का शिल्प; दूसरा दक्षिण का गोमटेश्वर ; एक ढाका की शबनम ; दूसरा घाटी की घोंघटी (कम्बल) –
जो बिछाने तथा ओढने वाले  को चुभने वाली, फिर भी ठिठुरती ठंड, बरसात या आंधी में जब कीमती शाल नम हो बेकार हो जाया करती है , तब यही काली घोंघटी ही मीठी गर्मी देकर
न्युमोनिया से बचाती है।
    गुजरात की दो तुनक मिजाज जातियां हैं: लेउआ पटेल तथा अनाविल। दोनों
बादशाह के नाम से जाने जाते हैं। खेतों में बारैया, ढेडा और दुबला (जातियाँ) जैसे
मजदूरों का शोषण करना और बात – बात में अपने कुलीन होने की ऐंठ के लिए मर
मिटना । और गांव के सभी लोगों को नीची जाति का मानकर  संबोधित करना। आधी
सदी पहले अपने आप को   ऊँची जाति कहलाने वाले लोगों का ऐसा ही जीवन था।
छोटुभाई इसी जमाने की पैदाइश थे। उनके किशोरावस्था के पराक्रमों की उड़ती-उड़ती सी
झलक ‘पूर्वचरित’ में देखने को मिलती है। अपने गांव दीहण (ओलपाड़ तालुका,
सुरत जिला) की पाठशाला के अलावा घर-खेत के काम करना ; पगलाए बैल का सींग
पकड कर उसे खडा कर देना या फिर उसके साथ खेत से गांव की सीमा तक घसिटाते
हुए आना मगर सींग न छोडना; बैल हाथ न आए तो उसकी जगह खुद हल में जुत
जाना; अंग्रजी पाठशाला के मास्टर मणिकाका की धारदार छ्डी सौ से अधिक फटके(सोटे) लगा कर टूट जाती और काका हार कर दुगुने गुस्से से छोटुभाई का सिर दोनों
हाथोंसे पकड कर दिवाल से भडाभड पटकते, फिर भी बिना रोए, बिना आह-उह किए
केवल ओठ चबा कर खडे रहना ; गांव के बीमार के लिए दवा-वैद्य लाने का
बहाना बना कर गांव के मुखिया की घोडी ले कर दीहण से सुरत सैर पर निकल
जाना; बैलगाडी चला कर जब सुरत जाना पड़े तब शहर की ट्राफिक पुलिस या
चुंगीवालों से पंगा लेना; ऐसे तो थे उनके ‘पूर्वचरित’ के कारनामे ।

२.
    दीहण के देसाई यानि कुलीन घराना तिस पर सुरखाब के पंख। हालांकि घर के अति
दरिद्र थे। मणिकाका की पाठशाला में अंग्रेजी की तीसरी जमात पढ़ने के बाद
तीनों चचेरे भाई जुनागढ, अडाजण आदि गांवों में पढे़ ।
    ‘माधेव की एक ही पुस्तक से हम सब पढ़ते। दूसरी पुस्तक खरीद ने का सवाल ही नहीं था।’
    पढ़ाई के साथ-साथ अडाजण गांव में रु. ४ के मासिक वेतन पर डाक बांटने का
काम भी किया. एक घंटे में काम निबटा लेते। ज्यादातर चिठ्ठियां स्कूल
आते- जाते ही बांट देते और दूर की डाक बांटने में यदि एक- आध दिन की देरी
हो तो उस दिन की मोहर लगाने का ध्यान रखते! चीन के एक सौदागर पारसी
बावाजी के घर उसकी लडकी को पढ़ाने का भी काम कुछ दिन के लिए किया । लेकिन
पढ़ाने का काम पूरा कर बावाजी की बैठकी पर उन्हें बिना सलाम बजाए चले जाने
के कारण उन्हें टोका गया:
“कल से पढ़ाने नहीं आउंगा।”
लेकिन वे इतना अच्छा पढ़ाते थे कि बावाजी ने उन्हें मनाने के लिए काफ़ी
खुशामत की। उन्हें लेने घोडा भेजा। अपनी चीन की गद्दी पर नौकरी देने का
लालच दिया। लेकिन नहीं माने। अन्त में बावाजी ने उनकी बुद्धि तथा
तेजस्विता से खुश हो कर मेहनताना के अलावा रु. १०० बक्षीश के तौर पर
आग्रहपूर्वक दिए।
    मैट्रिक तक पहुँचे और पास हुए । सुरत टूटा और बम्बई बस रहा था । देश भर में
रेलवे लाइन बिछ गईं, उस जमाने की यह बात है। अनाविल भले कैसे भी हों
आखिर संस्कार तो उनके ब्राह्मण के होते थे। लिखने-पढ़ने की आदत पूरी तरह से छूटी
नहीं थी। इसलिए, अंग्रेजी की तीन-चार कक्षाएं पास कर, सच्ची-झूठी जन्म
तारीख, परीक्षा और सर्टिफिकेट के आधार पर बी.बी. एन्ड सी. आई. रेल्वे में
टिकट मास्टर के तौर पर भरती होने लगे। देखते ही देखते मुम्बई से सुरत,
वड़ोदरा और ताप्ती लाइन में शायद ही कोई ऐसा स्टेशन हो जहां तार-टिकट या
स्टेशन मास्टर अनाविल न हों । दशकों तक यह सिलसिला चला ।
    छोटुभाई इसी रास्ते चल पड़े ।  तार – मास्टर की भर्ती परीक्षा में ६५ आवेदकों
में प्रथम स्थान पा कर पास हुए। लेकिन अपनी १४ या १८ साल की रेल की नौकरी
में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह हो जिस में उन्होंने छोटे-बडे झगडे पैदा न किए हों।
दिमाग ऐसा कि बड़े से बड़े रेल अफसरों को पानी पिला कर बौना ठहरा दिया ।
भूलाभाई तथा मुन्शी (भूलाभाई देसाई व कन्हैयालाल मा. मुन्शी) जैसे दिग्गजों को भी दस मिनट की बात-चीत में उलझा दें ।
    लेकिन इस अपार बुद्धिशक्ति का उपयोग कभी किसी भी मौके पर अपने निजी
स्वार्थ के लिए या किसी दुष्ट इरादे से किसी को परेशान करने में उन्होंने कभी नहीं किया इस बात का गवाह मैं वे जब तक जिन्दा रहे तब तक रहा हूँ ।
   छ्त्तीस बरस की हमारी पहचान। तिस पर बीस बरस तो हमने साथ काम किया। एक
चटाई पर सोया, एक थाली में खाया । लेकिन उनके जैसा लड़ाका मैं ने दूसरा कोई न देखा। जहां भी किसी पर छोटा-बड़ा अन्याय होते देखा कि उसका झगडा  कूद कर अपने सिर पर ले लेते। इस में अपने स्वभाव की निरी अक्खडता या दूसरों के श्राद्ध उधार ले कर उतारने के किस्से भी उतने ही होंगे ।

३.
    रेल – जीवन के सभी वर्ष ऐसे ही झगड़ों में बिताए। चोर व्यापारी, जालिम
ठेकेदारों, घूसखोर अधिकारियों तथा बड़े से बड़े गोरे साहिबों के रूआब को
उन्होंने उतार दिया । किस्से तो बारंबार पैदा करते थे। जानबूझकर छोटे बड़े
अधिकारियों के साथ टकराहट खड़ी करें और सर्वोच्च अधिकारियों तक के दांतों
लोहे के चने चबवाएं।
    रेल नौकरी के दौरान घटित ऐसे अनेक किस्सों को नारायण (देसाई) तथा मोहन
(परीख) जैसे आश्रम के किशोर ‘रेलवे – पुराण’ कहते और जब भी छोटुकाका पकड
में आ जाएँ तब जिद कर उनसे ये किस्से सुनते । वे सुनाते भी अपनी ठेठ
सुरती देहाती भाषा में, ऐसे अनोखे अंदाज से कि सुनने वाले सभी हंसते – हंसते
दोहरे हो जाएँ और उनके पेट दुखने लगें। ऐसे तो अनेक किस्से हैं जिनका
हिसाब रखना मुश्किल है। नमूने के तौर पर यहां एक दो किस्से पेश कर रहा
हूं।
    ताप्ती लाइन पर चींचपाड़ा स्टेशन के वे स्टेशन मास्टर थे| यहां पारडी का
रहने वाला सरकारी ठेकेदार रेल अधिकारियों की मिलीभगत से जम कर चोरी करता
था। आस-पास के भील आदिवासियों से जोर जबरदस्ती बेगारी में बैलगाडी उठा
लेता । काम ले कर भाड़े की पर्ची लिख दे और जब वे बेचारे पैसा लेने जाएं तो
उनसे पर्ची छीन कर फाड़ दें , गाली दे कर मार पीट कर उन्हें भगा दे। भिलाड,
संजाण  से अपना काम करवाने के लिए सौ-सौ मजदूर बिना टिकट के रेल में ले कर
सप्ताह- पंद्रह दिन में ले कर आता। गार्ड को मिला लिया था। छोटुभाई ने एक
झटके में १२० लोगों को बिना टिकट पकड लिया:

‘क्यों लाए? तुम्हारी शिकायत करूंगा,’ बोल कर गार्ड को धमकाया और संजाण
से चींचपाडा तक का १२० जन का रेल भाडा दंड सहित उगलवाया।
ठेकेदार गुस्से से आगबबूला हो गया:
“मास्टर!  कहां के  हो? मुझे पहचानते हो? कितने दिन नौकरी करनी है?”
“जिस गांव की बेरी उसी गांव का बबूल! आगे की पहचान तो याद नहीं आ रही।
लेकिन आज पहचान हो गयी। और देखो न, नौकरी कितने दिन करनी है यह तो अपने
मुंबई के अधिकारियों से पूछ कर बताउंगा।”
कुछ ही दिनों के बाद उसका टीन के पत्तर का वैगन आया। ठेकेदार लेने आया।
स्टेशन मास्टर मिला हुआ था। छोटुभाइ से कहा,
“इन्हें डिलीवरी दे दो।”
छोटुभाई ने उससे रेलवे रसीद मांगी।
ठेकेदार बोला, “अभी आई नहीं है। कल की डाक से आते ही भिजवा दूंगा।
डिलीवरी दे दो, मेरा काम बिगड रहा है।”
छोटुभाई बोले, “ठीक है, भाड़े का रुपया और बैलगाड़ी के साथ अपने मुनीम को भेज दो।”
मुनीम बैलगाडी ले कर आया और पत्तर लाद कर ले गया। छोटुभाई ने न तो पैसे
लिए और न ही डिलिवरी रजिस्टर में दस्तखत करवाए।
“कल जब रसीद आए तो पैसे भर कर दस्तखत कर देना। एक-आध दिन देर-सबेर हुआ तो
खामख्वाह डेमरेज भरना पडेगा।”
दूसरे दिन स्टेशन मास्टर के नाम ऊपरी अधिकारी का तार आया:
“पत्तर के वैगन की डेलिवरी न करें। माल भेजने वाले ने मना किया है।”
भेजने वाले ने रेलवे की रसीद वी.पी.पी. से भेजी थी जो ठेकेदार ने पैसे न
भरने की वजह से लौट आयी थी।
लेकिन डेलिवरी तो वह ले चुका था।
स्टेशन मास्टर को पसीना आ गया। छोटुभाई ने ढाढस दिया:
“आप बिलकुल न डरें। मैं तो आदमी को उसके पैर देख कर पहचान लेता हूं।
मैंने डिलिवरी जरूर दी है, मगर न तो उससे पैसा लिया है न ही रजिस्टर में
एन्ट्री की और न तो उस से दस्तखत कराई। आप बैठ कर तमाशा देखिए। अब बच्चू
को बुला कर सीधा करता हूं।”
झंडीवाले पोइन्टमैन को भेज कर ठेकेदार को बुलवाया:
“आइए चीन के सौदागर। यह तार पढें।”
(थोडा रुक कर) “अभी तुरंत अगर माल भेजने वाले को पैसा भेज कर शाम के पांच
बजे से पहले रेलवे विभाग का डिलिवरी की मंजूरी देता तार नहीं मंगवाया तो
गोडाउन में से पत्तर चोरी करने के जुर्म में सीधा पुलिस के हवाले कर
दूंगा। यह तार का टुकडा मेरे हाथ में ही है, देख रहे हो ना?”
“वैसे इस प्रकार का धंधा करने के आदी लगते हो इसलिए कभी तो हाथ में जंजीर
जरूर पहनी होगी।”

  पैसे भरे गए. डेलिवरी देने का तार भी शाम पांच बजे से पहले आ गया। स्टेशन
मास्टर छोटुभाई के पैर पकड कर रोया।

[ जारी ]

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8 टिप्पणियाँ

Filed under memoires, swami anand

8 responses to “महादेव से बड़े : ले. स्वामी आनन्द

  1. अनुभव ने बचा लिया वरना ये पेमेंट उनको ही करना पड़ता. अच्छा संस्मरण है

  2. बेहद सुंदर। चीचपाड़ा स्‍टेशन पर छोटूभाई ने वाकई जबरदस्‍त धूम मचाई होगी। दो किस्‍सों से ही पता चला कि बेहद ईमानदार और निष्‍ठावान रहे वे। अब ऐसे सरकारी कर्मचारी कम ही हैं।

  3. shashankshekhar55

    आपने बहुत सुन्दर व दिलचस्प लेख पढ़वाया है हमें । नचिकेता देसाई जी को हमारा धन्यवाद ।
    शशांक शेखर

  4. मजेदार संस्मरण।
    सुरत में बरसों रहा हूँ, और अनाविल के अलावा घांची, गोला, खत्री, दूबळां और ढेडा आदि जातियॊं के लोगों से अच्छा खासा परिचय भी रहा है। उनके बारे में जानना और भी अच्छा लग रहा है।
    अगली कड़ी का इंतजार है।

  5. अच्छा संस्मरण है। नचिकेता जी का धन्यवाद। उनसे शिकायत भी है कि वे लिखना बन्द क्यों कर दिये। अफ़लातून जी को क्या कहें !शुक्रिया ? :)

  6. ये जो देसी ठाठ और ठसक से भरपूर किंवदंती जैसा जीवन जीने वाले हमारे सच्चे-दमदार लोग हैं इनके ईमानदारी और रोचकता से रंजित जीवनप्रसंग तो सामने आने ही चाहिए . ये ही तो हमारे — इस देश के — असली व्यक्ति हैं,बाकी तो हमारे जैसे अनुव्यक्ति है — अनूदित व्यक्ति .

    भाई नचिकेता और आपके प्रति अशेष आभार .

  7. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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