बचपन की कुछ यादें

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    अभय तिवारी ने हाल ही में ‘ बीटल्स ‘ और उनके एक गीत का सुन्दर परिचय दिया है । शैशव की कुछ यादें ताज़ा हो गयीं ।

    एक सब्जी बेचने वाली मुझे ‘ पेट – पोछनू ‘ कहती थी । वह बाजार में पटरी पर सब्जी बेचने के अलावा घर – घर घूम कर भी बेचती थी इसलिए इस हक़ीकत से वाकिफ़ थी कि मैं पेट – पोछनू हूँ । पेट – पोछनू यानी माँ का पेट पोछ कर दुनिया में आने वाला । अन्तिम सन्तान ।

    बड़ी बहन संघमित्रा और बड़े भाई नचिकेता के साथ सिर्फ़ एक साल मैं स्कूल गया हूँ – १९६४ – ‘६५ में । बहन दसवीं पास कर अनुगुल ( ओड़ीसा ) पढ़ने चली गयी । एक साल वहाँ पढ़कर वह कोलकाता में डॉक्टरी की पढ़ाई करने लगी ।

    कोलकाता से जब छुट्टियों में बनारस आती तब हॉस्टल के खर्च से कर -कसर द्वारा बचाए पैसों से छोटी – मोटी चीजें लाती । कभी बा के लिए कोलकाता के ‘ न्यू मार्केट ‘ में बिकने वाला लाल – पन्नी में लिपटा देशी चीज़ , मेरे लिए किताबें अथवा सब के लिए छोटे वाले (ई.पी.) ग्रामोफोन – रेकॉर्ड । बनारस में इन रेकॉर्डों को तवा कहा जाता था , यह अनुवाद मुझे अत्यन्त सटीक लगता था । इसके पहले अख़बार और आकाशवाणी पर खेलों के रेकॉर्ड से ही मेरा तार्रुफ़ था , जिन्हें खिलाड़ी या टीमें तोड़ती थीं । संगीत के रेकॉर्ड जमीन पर पटकने पर टुकड़े – टुकड़े हो जाएँगे , इसका अन्दाज ठीक – ठीक था ।

    मेरे बचपन में बाईस्कोप वाले हाथ से चाभी देने वाले ग्रामोफोन पर ७८ आर.पी.एम. वाले बहुत तेज घूमने वाले रेकॉर्ड बजाते थे । आर.पी.एम यानी प्रति मिनट चक्कर ।७८ आर.पी.एम वाले तवे मझोले आकार के और कुछ मोटे होते थे लेकिन तेजी से चलने के कारण बहुत जल्द पूरे होते । बहन कोलकाता से छोटे वाले तवे लाती – ४५ आर.पी.एम या ई.पी. ( Extended play ) |

    कोलकाता से आने वाले छोटे तवों में बा और बाबूभाई ( पिता ) का पसन्दीदा रवीन्द्र -संगीत और नचिकेता के लिए पश्चिमी संगीत ।‘ वेन्चर्स ‘‘ का तेज वाद्य – संगीत और बीटल्स का ‘ लॉंग टॉल सैली ‘ मुझे याद हैं । नचिकेता इतना ज्यादा उन्हें सुनता कि एक बार बा ने उसे (उस तवे को ) पटक  कर तोड़ने की धमकी भी दी थी । १९७७ में जब मैं भारतीय सांख्यिकी संस्थान में पढ़ने गया तब हॉस्टल के सामूहिक रेकॉर्ड-प्लेयर पर सुनने के लिए इन तवों को ले गया था ।

    तीनों भाई – बहनों में संगीत का ज्ञान और हुनर सर्वाधिक नचिकेता में ही है । वह काफ़ी अच्छा माउथ – ऑर्गन बजा लेता है ।

 

फिर ममेरे बड़े भाई कबीर बनारस इन्जीनियरिंग पढ़ने आये । उन्होंने पहले गिटार फिर सरोद बजाना सीखा । नचिकेता के मित्र सुधीर चक्रवर्ती का ताल -ज्ञान अधिक था । वे दो प्लास्टिक की बाल्टियाँ उलट कर बोंगों बजाते थे । नचिकेता के माउथ ऑर्गन के साथ उनके ‘बोंगो’ का अभ्यास बाथरूम में हुआ करता था ताकि गूँज का आनन्द मिले । विविध – भारती, ऑल इण्डिया रेडियो का उर्दू प्रोग्राम या रेडियो सिलोन पर बजने वाले फिल्मी गीतों के ताल और विभिन्न वाद्यों के आधार पर संगीतकार को पहचानने का खेल नचिकेता मुझसे खेलता । ‘घोड़ा-गाड़ी’ की ताल वाले ओ.पी नैय्यर अथवा ‘बक-अप तिवारीजी ताल'(यह धा गि ना ति ना क धि न पर सटीक बैठता है) वाले कल्याणजी-आनन्दजी का संगीत मैं पहचान लेता था ।

    पिताजी को साबरमती आश्रम में पण्डित खरे के सान्निध्य में संगीत-संस्कार मिला था। नानी विश्व-भारती के पहले बैच की छात्रा थीं और वीणा बजातीं थीं । पन्नालाल घोष की बाँसुरी , बिस्मिलाह ख़ान की शहनाई ,पलुस्कर और सुब्बलक्ष्मी के भजन और निखिल बनर्जी के सितार के रेकॉर्ड भी हम सुनते ।

 

    स्कूल में पहले गिरिजा देवी की योज्ञ शिष्या . डॉ. मन्जू सुन्दरम और बाद में पण्डित छन्नूलाल मिश्र मेरे कण्ठ-संगीत के शिक्षक थे । स्कूल से निकलने के तीस साल बाद सहपाठी महेश से जब हाल ही में फोन पर बात हुई तब उसने स्कूल की ‘गीतमालिका’ जुटाने की गुजारिश की । मन्जू गुरुजी उन गीतों का सीडी बनाती हैं तब संजाल पर प्रस्तुत कर सकूँगा। स्कूल में उनसे सीखा एक गीत स्मृति से दे रहा हूँ ।इसे बेटी प्योली को लोरी के रूप में सुनाता था।

   अतहि सुन्दर पालना गढ़ि लाओ रे बढ़इया, गढ़ि लाओ रे बढ़इया

    शीत चन्दन कटाऊँ धरी,खलादि रंग लगाऊँ विविध ,

चौकी बनाओ रंग रेशम ,लगाओ हीरा, मोती ,लाल बढ़इया ।

    आनी धर्यो नन्दलाल सुन्दर,व्रज-वधु देखे बार-बार

    शोभा नहि गाए जाए ,धनी ,धनी ,धन्य है बढ़इया ।।

    अमेरिका के अश्वेत ‘नागरिक अधिकार आन्दोलन’ का सांस्कृतिक पक्ष अत्यन्त प्रभावशाली रहा है । जॉन बेज़ और पीट सीगर गीत अत्यन्त प्रभावशाली थे । इस दौर के काफ़ी पहले पॉल रॉबसन की रोबीली धीर गंभीर आवाज में नीग्रों प्रार्थना और गीत आए थे । इन तीनों हस्तियों के बारे में फिर कभी ।

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17 टिप्पणियाँ

Filed under शैशव का संगीत, Uncategorized

17 responses to “बचपन की कुछ यादें

  1. अच्छा लगा पढकर । फिर कभी ,उम्मीद है ,जल्दी ही, होगा

  2. प्रमोद सिंह

    ऊपर प्‍लेस्‍ड आपके प्‍लेयर्स का लिंक सब गड़बड़ आ रहा है, महाराज…

  3. अच्‍छी यादें हैं । पर थोड़ी गड़बड़ हो गयी है । प्‍लेयर आने की बजाय एच टी एम एल कोड दिख रहा है । मेरा अंदाज़ा है कि आपने इसे कंपोज़ मोड में ही कॉपी कर दिया है । अगर आप पोस्‍ट को एडिट करके एच टी एम एल मोड में जाकर ये कोड कॉपी करें तो प्‍लेयर दिख सकेगा और हम सब सुन भी सकेंगे ।

  4. दु:ख है कि प्लेयर की कड़ियाँ ठीक से नहीं दे पाया था । अब खटका मार कर अलग खिड़की पर सुन सकते हैं ।

  5. आपका एक नया ही रूप देखा — व्यक्तित्व का एक नया पक्ष . बचपन और संगीत तथा बचपन का संगीत . आपने कुछ सुलगा दिया है मन में . मेरा भी कुछ लिखने का मन बन रहा है .

  6. अच्छा लगा। अगले संस्मरण का इंतजार है।

  7. अफ़लातून जी लेख बहुत अच्छा लगा संगीत भी बहुत अच्छा लगा…।

  8. मन को भाया आपका यह शैशवकालीन संस्मरण. बधाई. और लायें.

  9. बहुत मनोहारी, पर इतना कम
    आगे की कडि़यां भी दीजिये

  10. आफ़लू: बहुत बढिया लिखते हो भाई. नेतागिरी के बदले पत्रकार या लेखक बनते तो ज्यादा नाम कमाते.

  11. बढ़िया लगा यह संस्मरण। नचिकेताजी ने लिखना कम क्यों कर दिया। :)

  12. पिंगबैक: संवेदनाशून्य तारीखों की असहमत यादें » ब्लॉगबाबा

  13. संस्मरण पढ़कर अच्छा लगा । माउथ आर्गन पर बेकरार कर सुनकर बहुत ही अच्छा लगा।

  14. भई वाह, बहुत खूब!! आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी.

  15. पिंगबैक: लिफ्ट आणि एस्केलेटर (अर्थात माडी आणि जिना सुद्धा)..

  16. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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