मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक

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[ ‘८० के दशक की शुरुआत में यह गीत जो ‘वंचितों के शिक्षा-शास्त्र’ के पॉलो फ़्रेरे के दर्शन से मेल खाता है , लमही गाँव में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के सम्मेलन में कृषक जी से तरन्नुम में सुना था । पूरा याद  नहीं है। भरोसा है,कोई जनवादी इसे पूरा कर देगा,यहीं । चिट्ठेकार अविनाश की पसन्द पर यहाँ दे रहा हूँ । ]

‘ क ‘ से काम कर ,

‘ ख ‘ से खा मत ,

‘ ग ‘ से गीत सुना ,

‘ घ ‘ से घर की बात न करना ,  खाली ।

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ च ‘ को सौंप चटाई ,

‘ छ ‘ ने छल छाया ,

‘ ज ‘ जंगल ने , ‘ झ ‘ का झण्डा फहराया ,

झगड़े ने बीचोबीच दबा डाली ,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ ट ‘ टूटे , ‘ ठ ‘ ठिटके ,

यूँ ‘ ड ‘ डरा गया ,

‘ ढ ‘ की ढपली हम ,

जो आया , बजा गया ।

आगे कभी न आई ‘ ण ‘ पीछे वाली,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

रामकुमार कृषक

9 टिप्पणियाँ

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9 responses to “मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक

  1. क्‍या बात है। अद्भुत कविता। हिंदी कविता का मैदान इन दिनों ऐसी कविताओं से कितना खाली है! उफ्फ!

  2. संजय बेंगाणी

    त से आगे भी बढ़ाएं.

  3. मेहनतकशों का ककहरा अपूर्ण ही तो है अबतक, शायद इसके प्रतीक में ही ये ककहरा पूरा नहीं हुआ.
    एक दिन सुबह जरूर आयेगी और मेहतनतकशों का ककहरा पूरा होगा.
    ये कविता वाकई अद्भुत है.

  4. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

  5. ककहरा का शेष हिस्सा तो अब मेहनतकशों को खुद ही पूरा करना पड़ेगा।

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