खेल – खेल में थोड़ी सी राम-कहानी

    [मैथिलीजी के सवाल और डॉ. सुनील दीपक द्वारा बढ़ाए गए सवालों के जवाब मुझे देने हैं।]

    बचपन की यादें बहुत खुशनुमा हैं । मैथिली जी के प्रश्न के बाद कई घटनाएं याद आईं । ‘शैशव’ नाम का यह चिट्ठा बच्चों के लिए है । बचपन में सीखी कुछ कविताओं को यहाँ रखा है ।बच्चों के लायक संस्मरण भी यहाँ हैं।इसीलिए मैथिलीजी के एक प्रश्न के उत्तर के लिए इस ‘उत्तर-पुस्तिका’ का चयन किया है।

    ‘छोटे बचपन’ से शुरु करता हूँ । ‘छोटा बचपन’ , ‘बड़ा बचपन’ मेरी बेटी के दिए हुए काल-विभाजन के नाम हैं । छोटे बचपन की कई बातें बड़ों से सुनी हुई भी होती हैं और उन्हे भी भी ‘मुझे याद है’ कह कर चला दिया जाता है । मेरे बचपन का मित्र सितान्शु जब अपने बड़े बचपन में छोटे बचपन की बातें बताता था तब उसका भाई सुधान्शु हमेशा यह कहने से नहीं चूकता था,’सित्तू को अपने जनम के पहले की बातें भी याद हैं ।’ मैं यहाँ जिन घटनाओं का हवाला दूँगा उन्हें मैंने बडों से नहीं सुना ।

    ‘बालवाड़ी’ में छोटे-छोटे खेती-बाड़ी के साधन थे – छोटी खुरपी , छोटा फावड़ा ,छोटा बेलचा ,पौधों को सींचने के लिए छोटा झारा ,छोटी टोकरी और छोटी बाल्टी । इनकी मदद से क्यारियों में कुछ लगाया जाता था । एक बार मेरी माँ ने एक तैयार क्यारी में उंगली से मेरा नाम लिख दिया।लिखे हुए पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर मेथी के बीज उंगली से किए छेदों में डालकर उसे समतल कर,सींचा गया । मेथी के नन्हे पत्ते मेरी नाम की आकृति में निकले तब बड़ी खुशी हुई ।

    बालवाड़ी के बाद स्कूल जाना शुरु किया । मैं बँयहत्था हूँ और कोई शिक्षिका बार-बार दाहिने हाथ में पेन्सिल या खड़िया बाँए से छीन कर पकड़ा देतीं। मैं शायद लिखने से चिढ़ने लगा और कहता था कि टाइप करूँगा,लिखूँगा नहीं ।’ आँखें मूँद कर टाइपिंग’ अब तक नहीं सीखी। पिताजी और बड़े भाई जानते हैं ।

    हर घण्टी की शुरुआत में एकाध मिनट शान्ति से बैठना होता था ।इस अवधि में आँखें मुँदी हों,यह भी  अपेक्षित था।एक बार ‘शान्ति’ के बाद हमारी आशा गुरुजी ने तीन-चार बच्चों का नाम लेकर टोका कि इन लोगों ने आँखें बन्द नहीं की थी। मुझे याद है  कि मैंने तुरन्त कहा,’कि यह आपको कैसे मालूम हुआ?आपने भी आँख खोल कर ही हमे देखा था ।’

    अब बड़े बचपन की कुछ बातें । मैं जिस परिसर में रहता था उसके एक तरफ वरुणा , दूसरी तरफ गंगा और तीसरी तरफ काशी रेलवे स्टेशन है ।गंगाजी  बड़ों के बिना नहीं जाते थे। गंगाजी में पिताजी तैरते तो उनकी चड्डी का नाड़ा पकड़ कर पैर हिलाते थे ।वरुणा साल के बड़े हिस्से में क्षीणकाय रहती थीं खेलने,बेर खाने जाते थे ।स्टेशन पर टहलने भी अक्सर जाते थे । स्टेशन के माल-गोदाम तक डिब्बों को लाने के लिए पटरियाँ थी । कोयले के इंजन द्वारा उनकी शन्टिंग की जाती थी । कभी-कभी ड्राइवर को ताकते रहने पर वे ऊपर खींच कर इंजन-दर्शन करा देते थे ।काफी दिनों बाद एक बार विलायत से आए दो परिचितों को बनारस दिखाने ले गया था(बाहर से आए मेहमानों से माँ कहती यह अच्छी पण्डागिरी कर लेता है)। उन विलायती मित्रों में से एक ने बिल्ली-मुख कोयला इंजन की ढेर सारी फोटू खींचीं तब कुछ महत्व समझ में आया । डीजल इंजन वाली मालगाड़ियों से कोयला ढ़ोना तब भी होता था। डीजल विदेशी मुद्रा खर्च करके भी मंगवाया जाता है और कोयला – भण्डार उसके बाद खत्म होगा,तब भी ऐसा क्यों किया जा रहा है?इस सवाल पर काफ़ी बाद में विचार हुआ ।

    ऐसे ही एक बार जब मित्र-मण्डली स्टेशन पहुँची तब पता चला कि स्टेशन पर पाकिस्तानी युद्ध बन्दियों की ट्रेन खड़ी है । उत्सुकता के साथ हम सब उस प्लैट्फॉर्म पर पहुँचे । प्रथम श्रेणी के जिन डिब्बों में पाक सैन्य अफसर थे उनके बाहर भारतीय सैनिकों को सलाम बजा,आदेश लेते देखा।युद्ध बन्दियों को मिलने वाले ओहदानुकूल सम्मान का अन्दाज समझ में आया । तब भारतीय रेल में तीसरा दर्जा भी था और तीसरे दर्जे के डिब्बों में खिड़कियाँ बिना छड़ों की होती थीं(जनाना डिब्बे की खिड़्कियों में छड़ें होती थीं,माँ के साथ उस में भी यात्रा की है,आधी टिकट के जमाने में।)। हमने गाड़ी की परिक्रमा की और छोटे बचपन में इंजन ड्राइवरों को जैसे ताकते थे शायद वैसे ही ताक रहे होंगे क्योंकि एक डिब्बे की खुली खिड़की से हमे खींच लिया गया ।कुछ देर सैनिकों की चुहलबाजी चली,हम बच्चों से सब बहुत खुश थे।डिब्बे में युद्धबन्दी ज्यादा थे, भारतीय सैनिक कम थे। फर्क सिर्फ़ वर्दी में था।

    पूर्वी कमान के मुख्य अधिकारी जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा देश के हीरो थे। उनके सहपाठी रहे पाकिस्तानी अफ़सर नियाज़ी के आत्मसमर्पण का आकाशवाणी पर देवकीनन्दन पान्डेय ने आँखों देखा हाल सुनाया था। उसके पहले पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए बने शिविरों में भी जाने का मौका मिला था।’ओपार थेके आशचे कारा,आमादेरी भाई-बोनेरा'( उस पार से आ रहे हैं कौन? हमारे ही भाई-बहन) कह कर २४ परगना के बोनगाँ की गलियों में अन्न-वस्त्र जुटाने के लिए निकले जुलूस में शामिल था।देश बना नहीं था लेकिन उसका राष्ट्र-गान, ‘आमार सोनार बाँग्ला,आमि तोमाय भालो बाशी’ तय हो चुका था और शिबिर में सिखाया जाता था,हमने भी सीखा।यह गीत भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का लिखा है- जैसे ‘सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दोस्ताँ हमारा’ और पाकिस्तान का राष्ट्रीय-गान ‘ए पाक सर-जमीं’ दोनों अल्लामा इक़बाल के लिखे गीत हैं।इन सुन्दर संयोगों की जानकारी भी उसी शिबिर में हुई थी । बांग्लादेश के साथियों के साथ बांग्ला के महान कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम के दर्शन करने का भी मौका मिला था।धर्म के आधार पर हुआ बँटवारा टिकाऊ नहीं होता।लोकमत की उपेक्षा के विरुद्ध संघर्ष ने एक नए राष्ट्र को जन्म दिया।बांग्ला भाषा की उपेक्षा के विरुद्ध छठे दशक में हुए छात्र -आन्दोलन से ही शायद जमीन बनने लगी थी। शेख मुजीब की ‘सिंहध्वनि’ ‘रेडियो बाँग्लादेश’ से रह रह कर सुनाई जाती थी –  ‘ए बारेर एई संग्राम- स्वाधीनतार संग्राम,ए बारेर एई संग्राम मुक्तिर संग्राम’।

    एक और घटना का उल्लेख करने का मोह है । जिद्दू कृष्णमूर्ति से जुड़े स्कूल में मैं पढ़ा।आम तौर पर साल में एक बार वे भारत आते तब स्कूल के विद्यार्थियों और जनता के बीच उनके अलग-अलग भाषण होते थे । स्कूल की मामूली समस्याओं को लेकर ‘बड़े बच्चों’ (कक्षा ९,१०,११ के छात्र) ने उनका भाषण शुरु होने के पहले हॉल से बहिर्गमन कर दिया ।कृष्णमूर्ति फाउन्डेशन के कर्ता-धर्ताओं को लगा मानो किसी विधर्मी ने मूर्ति को छू दिया हो । ‘गुरुडम’ के आलोचक कृष्णजी ने शिद्दत से जानना चाहा कि बहिष्कार क्यों हुआ?उनकी सभा में ऐसा कभी नहीं हुआ था ।हम लोगों की कृष्णजी के साथ अलग से चर्चा आयोजित की गई ।शुरु में ही हमने कह दिया कि हम हिन्दी में बोलेंगे।उन्होंने पूछा कि अनुवादक किसे रखना चाहते हो ? मैंने अच्युत पटवर्धनजी का नाम दिया। बीच-बीच में कृष्णजी की बातों से अनुवाद लम्बा हो जा रहा था तब उन्होंने पूछा कि वे उतना ही अनुवाद कर रहे हैं या नहीं? अच्युतजी ने कहा कि वे थोड़ा समझा भी दे रहे हैं। कृष्णजी ने कहा कि वे उतना ही अनुवाद करें जितना बोला जा रहा है । कृष्णमूर्ति ने हम लोगों से जो कहा वह महत्वपूर्ण है । उन्होंने कहा कि दो तरह के नियम हो सकते हैं।ऐसे नियम जिन से दूसरों की सुविधा जुड़ी हो-जैसे भोजन के के लिए निर्धारित समय पर न पहुँचन पर रसोइए के भोजन में भी देर हो जाएगी । ऐसे नियमों को मानना चाहिए । बाल छोटे रखें या बड़े ? कपड़े कैसे हों? ऐसे प्रश्नों पर विद्यार्थियों को छूट होनी चाहिए।

    विश्विद्यालय के छात्रावास के कमरे में मैंने कृष्णमूर्ति का उद्धरण लगा रखा था ,’ It is the intelligence that brings order,not discipline.’ ( अच्छा सा अनुवाद अनूप शुक्ला कर सकते हैं) ।

   अब उत्तर पुस्तिका बदली जा रही है। अन्य सवाल यहाँ के लायक नहीं हैं : चिट्ठेकारी का भविष्य,चिट्ठेकारी से मुझ में आए परिवर्तन आदि,आदि।

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15 टिप्पणियाँ

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15 responses to “खेल – खेल में थोड़ी सी राम-कहानी

  1. ‘छोटा बचपन’ , ‘बड़ा बचपन’ मेरी बेटी के दिए हुए काल-विभाजन के नाम हैं । :)

    वाह, अच्छा घटनाक्रम, दूसरी वाली उत्तर पुस्तिका कहाँ हैं?

  2. सुनील

    पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. यह तो बहुत दिलचस्प संस्मरण हैं, इनकी बात तो आगे बढ़नी चाहिये!

  3. वाह! बहुत अच्छा लगा यह पढ़कर! मेरा अनुरोध है आप अपने बनारसी जीवन के सारे अनुभव लिखें। विश्वविद्यालय में क्या बदलाव आये, वहां बगल में डीजल लोकोमोटिव की कहानी क्या है, संकट मोचन वाले मिसिरजी का गंगा सफ़ाई अभियान कैसे बोल गया। और भी तमाम यादें नियमित रूप से लिखते रहें। अनुवाद तो तात्कालिक रूप से यही समझ में आता है- मेधा से संगति आती है अनुशासन से नहीं। संगति से बेहतर शब्द सोचता हूं तब तक आप बी कापी जमा क्रिये!

  4. बहुत अच्छा लगा । आगे भी लिखें । इंतज़ार रहेगा ।

  5. बेहतरीन संस्मरण . कृपया और भी लिखें इस श्रंखला में . ये अपने समय के अद्भुत सामाजिक दस्तावेज़ हैं.

  6. होली की शुभकामनाएँ !
    वाह! अच्छा विभाजन किया है बचपन का ! पढ़कर अच्छा लगा ।
    घुघूती बासूती

  7. बहुत सुन्दर! सच पूछिए तो आपने कई पुरानी यादें ताजा कर दी।
    संस्मरण जितनी बार भी पढे जाएं, हर बार वही मजा देते है।

    अफलातून जी,
    यदि आप इस ब्लॉग को बच्चों के लिए रखना चाहते है तो इसकी थीम थोड़ी, बदलिए, कुछ रंग डालिए इसमे, बच्चों को पसन्द आएं।

  8. बचपन की मधुर यादें जितनी लिखी और पढ़ी जाये उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है। आपके संस्मरण पढ़ कर बचपने की तमाम बातें याद आ रही है। इस उत्तर पुस्तिका का बाग दो भी पढ़ने की इच्छा है।
    बहुत देर से टिप्पणी करने के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ

  9. शानदार संस्मरण। बचपन की महत्वपूर्ण यादें सचमुच अपने समय का सामाजिक दस्तावेज बन गई हैं , जैसा प्रियंकरजी कह रहे हैं। आभार…यादों की गलियों में ले चलने के लिए

  10. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव


  11. बहुत दीलचस्प संस्मरण लिखा है आपने
    हमारे भीतर छिपे शिशु को शैशव से
    वयस्क होने तक का सफर
    याद करवा दिया आपने
    आगे भी और स – विस्तार लिखिए अफलातून भाई
    स — स्नेह
    – लावण्या

  12. आपके अंग्रेजी ब्लाग पर गया था…उतना लम्बा अंग्रेजी में लिखा नहीं पढ़ सकता…सो नहीं पढ़ा…वैसे भी अंग्रेजी तो आती-जाती नहीं…हाफ टिकट शायद अभी भी चलता-मिलता है…हमारे यहाँ तो कुछ साल पहले तक मिलता था…पता नहीं अब क्या हाल है…

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