बापू की गोद में : प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी

    श्री नारायण देसाई कि ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ मूल गुजराती में पढ़ी । एक अनूठी कलाकृति है । उसमें आत्मकथा की सजीवता और प्रतीति है , फिर भी अहन्ता का दर्प नहीं है । जिन घटनाओं और परिस्थियों का वर्णन इस छोटी-सी पुस्तक में है , उनके साथ लेखक का घनिष्ठ और प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहा है । वह केवल एक तटस्थ प्रेक्षक नहीं रहा है । कई प्रसंगों में उसकी अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण है । परन्तु अन्य व्यक्तियों की भूमिका का चित्रण करने में उसने अपने को गौण स्थान ही दिया है । लेखक की सदभिरुचि का यह द्योतक है ।

     ‘मोहन और महादेव’ इस सुन्दर पुस्तक की दो विभूतियाँ हैं । ‘हरि-हर’ की तरह उनका विभूतिमत्त्व अविभाज्य है । अनेक घटनाओं और प्रसंगों के चित्रण में नारायणभाई ने उस विभूतिमत्त्व की जो झाँकियाँ दिखाई हैं , वे नितान्त मनोज्ञ हैं । ‘साबरमती’ और ‘सेवाग्राम’ आधुनिक भारत के विश्व-तीर्थ माने जाते हैं। वहाँ के आन्तरिक जीवन के जो दर्शन इस पुस्तक में कराये गये हैं , वे हृदयस्पर्शी हैं । नारायणभाई की भाषा में एक अन्लंकृत लावण्य है ।

    पृष्ठ २३ पर लेखक के मानस पर जो छाप पड़ी , उसकी उपमा उसने कृष्णपक्ष के नभोमण्डल से दी है । पुस्तक में करुण , उदात्त आदि रसों के साथ-साथ ऋजु और सौजन्ययुक्त विनोद की छटाएँ भी हैं , जो उसे अधिक चित्ताकर्षक बनाती हैं
लेखक की सहृदयता की छाप तो पृष्ट-पृष्ट पर है ।

    इस पुस्तक का हिन्दी-भाषान्तर हमारे मित्र श्री दत्तोबा दास्ताने ने किया है । दत्तोबा का ‘उपनयन’ पवनार के सन्त ने किया है । उनके जीवन में जो संस्कारिता और प्रगल्भता है , वह विनोबा के साथ दीर्घ-सहवास का परिपाक है। नारायणभाई को भाषान्तरकार भी समानशील मिले । पाठक की दृष्टि से यह बड़ा शुभ संयोग है। गांधी की विभूति की विविधता की झाँकी जो देखना चाहते हों , उनके लिए यह पुस्तक निस्सन्देह उपादेय है ।

शिवकुटी , माउण्टआबू

२० – १ – ‘६९                                                                  – दादा धर्माधिकारी

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One response to “बापू की गोद में : प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी

  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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