Daily Archives: जनवरी 22, 2007

बापू की गोद में : कुछ चित्र

परचुरे शास्त्री की सेवा परपीड़ा

गांधीजी और महादेवठ??ई महादेवभाई और गांधीजी

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बापू की गोद में : प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी

    श्री नारायण देसाई कि ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ मूल गुजराती में पढ़ी । एक अनूठी कलाकृति है । उसमें आत्मकथा की सजीवता और प्रतीति है , फिर भी अहन्ता का दर्प नहीं है । जिन घटनाओं और परिस्थियों का वर्णन इस छोटी-सी पुस्तक में है , उनके साथ लेखक का घनिष्ठ और प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहा है । वह केवल एक तटस्थ प्रेक्षक नहीं रहा है । कई प्रसंगों में उसकी अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण है । परन्तु अन्य व्यक्तियों की भूमिका का चित्रण करने में उसने अपने को गौण स्थान ही दिया है । लेखक की सदभिरुचि का यह द्योतक है ।

     ‘मोहन और महादेव’ इस सुन्दर पुस्तक की दो विभूतियाँ हैं । ‘हरि-हर’ की तरह उनका विभूतिमत्त्व अविभाज्य है । अनेक घटनाओं और प्रसंगों के चित्रण में नारायणभाई ने उस विभूतिमत्त्व की जो झाँकियाँ दिखाई हैं , वे नितान्त मनोज्ञ हैं । ‘साबरमती’ और ‘सेवाग्राम’ आधुनिक भारत के विश्व-तीर्थ माने जाते हैं। वहाँ के आन्तरिक जीवन के जो दर्शन इस पुस्तक में कराये गये हैं , वे हृदयस्पर्शी हैं । नारायणभाई की भाषा में एक अन्लंकृत लावण्य है ।

    पृष्ठ २३ पर लेखक के मानस पर जो छाप पड़ी , उसकी उपमा उसने कृष्णपक्ष के नभोमण्डल से दी है । पुस्तक में करुण , उदात्त आदि रसों के साथ-साथ ऋजु और सौजन्ययुक्त विनोद की छटाएँ भी हैं , जो उसे अधिक चित्ताकर्षक बनाती हैं
लेखक की सहृदयता की छाप तो पृष्ट-पृष्ट पर है ।

    इस पुस्तक का हिन्दी-भाषान्तर हमारे मित्र श्री दत्तोबा दास्ताने ने किया है । दत्तोबा का ‘उपनयन’ पवनार के सन्त ने किया है । उनके जीवन में जो संस्कारिता और प्रगल्भता है , वह विनोबा के साथ दीर्घ-सहवास का परिपाक है। नारायणभाई को भाषान्तरकार भी समानशील मिले । पाठक की दृष्टि से यह बड़ा शुभ संयोग है। गांधी की विभूति की विविधता की झाँकी जो देखना चाहते हों , उनके लिए यह पुस्तक निस्सन्देह उपादेय है ।

शिवकुटी , माउण्टआबू

२० – १ – ‘६९                                                                  – दादा धर्माधिकारी

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बापू की गोद में : प्रकाशकीय

वर्षों पूर्व ‘जन्मभूमि’ गुजराती – पत्र में प्रतिसप्ताह ‘स्वातंत्र्य संग्रामनी गाथा’ स्तम्भ में श्री नारायणभाई ने बापू के सम्बन्ध में धारावाहिक रूप में संस्मरण लिखे थे , जो बाद में ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशित हो गये । सौभाग्य से आज वे हिन्दी में रूपान्तरित होकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हैं । २२ प्रकरणों की यह छोटी-सी पोथी गांधीजी के अनेक अनजाने अलौकिक गुणों पर प्रकाश डालती है । प्रस्तुत संस्मरणों की विशेषता श्री दादा धर्माधिकारी ने प्राक्कथन में लिपिबद्ध कर दी है । संस्मरण तो अनूठे हैं ही , लेखक की साहित्यिक प्रतिभा ने उन्हें रसाप्लुत भी बना दिया है ।

    गांधी – शताब्दी के शुभ -अवसर पर हमें इस पुस्तक के प्रकाशन का सुअवसर मिला था । अब हम इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्र्काशित कर यह आशा करते हैं कि पाठकों को प्रथम संस्करण की भाँति निश्चय ही यह रोचक और उद्बोधक सिद्ध होगा। गुजराती-भाषी जनता ने जिस प्रकार इस श्रेष्ठ रचना का आदर किया है , हम समझते हैं कि कि हिन्दी-भाषी जनता भी इसमें पीछे नहीं रहेगी । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता का हिन्दी-रूपान्तर करने में श्री भवानीप्रसाद मिश्र ने सहयोग दिया, अत: हम उनके आभारी हैं ।

         – सर्व सेवा संघ प्रकाशन , राजघाट , वाराणसी-२२१००१.

(जून १९९६)

    

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बापू की गोद में : पुस्तक समर्पण

साबरमती नदी

और वर्धा की

हनुमान टेकड़ी

को

– नारायण.

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बापू की गोद में (२२) : अग्नि – परीक्षा

    आगा खाँ महल में जाने के बाद छह दिनों के अन्दर काका का स्वर्गवास हो गया । उनकी मृत्यु के बारे में सरकार की ओर से हम लोगों को कोई समाचार नहीं दिये गये थे । हम सेवाग्राम में हैं , यह जानकारी सरकार को थी , फिर भी रेडियो पर खबर सुनकर मित्रों ने दूसरे दिन यानी १६ तारीख को खबर दी , तब हमें जानकारी मिली । जेल में काका अचानक गुजर गये , इसके कारण देश में उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में तरह – तरह की अफवाहें फैलीं। किसीने कहा , सरकार ने उनको विष दे दिया । किसीने कहा बिजली के शॊक दिये । हम जानते थे कि काका को हृदय – विकार था । और हम यह भी जानते थे कि बापू के उपवास को लेकर काका के मन पर चिन्ता का बड़ा भारी बोझ था  । इसलिए अफवाहों पर हमारा विश्वास नहीं था । मुझे और माँ को जीवन में एकमात्र काका का ही आधार था । हम दोनों की जो हानि हुई , वह किसी तरह भरनेवाली नहीं थी ।दोनों ने उनकी विरह – व्यथा दीर्घकाल तक सहन की थी । फिर भी हम दोनों में से किसीके मन में अंग्रेज सरकार के प्रति एक क्षण के लिए भी कड़वाहट की भावना उठी हो , ऐसा याद नहीं आता । मैं तो काका की मृत्यु जेल में हुई इस घटना के कारण मन में गर्व का अनुभव करता था । अंग्रेज सरकार के साथ की लड़ाई का ही यह एक अंग (पार्ट ओ दि गेम) मैंने माना । अहिंसक लड़ाई की यह खूबी थी ।

    काका की चिता जल रही थी तब बापू ने हमारे नाम एक तार भिजवाया था । उस तार की मूल प्रति तीन सप्ताह के बाद सेवाग्राम में पहुँचायी गयी । तार में लिखा था , ‘ महादेव को एक योगी और देशभक्त की मृत्यु प्राप्त हुई है – Mahadev died yogi’s patriot’s death । इस मजमून के कारण शायद तार पहुँचाने में देर की गयी होगी । सरकार की ओर से इतना ही कहा गया था कि ‘ हमारे ऒफ़िस की भूल के कारण देर हुई , उसके लिए हमें अफसोस है । ‘ इस स्पष्टीकरण के कारण मेरे मन में चिढ़ जरूर हो गयी थी ।

    इस समय बापू के पास जाने की हमने इजाजत माँगी । लेकिन इजाजत नहीं मिली । काका के शव का दाह – संस्कार कहाँ किया गया , इस सम्बन्ध में भी हमें किसी प्रकार की जानकारी नहीं दी गयी । उनकी भस्मी भी हमें नहीं दी गयी ।

    लेकिन काका का दाह – संस्कार आगा खाँ महल के आहाते में ही किया गया था , इसकी खबर हमें लग गयी थी । बापू हर रोज उस स्थान पर जाकर फूल चढ़ाकर आते हैं , यह भी जानकारी मिली थी । लेडी प्रेमलीला ठाकरसी की ‘ पर्णकुटी ‘ से दूरबीन द्वारा हर रोज वह दृश्य दिखाई देता था ।

    बापू ने जेल में उपवास शुरु किये , उस समय फिर से हमने उनके पास जाने की माँग की। उस समय जवाब मिला कि ‘ आप जाना चाहेंगे तो एक कैदी की तरह वहाँ रहना होगा , बाहर की दुनिया के साथ आपका सारा सम्पर्क बन्द कर दिया जायगा । ‘ हमने यह शर्त मंजूर की और मैं , मेरी माँ , और कनुभाई को आगा खाँ महल में जाने की इजाजत मिली ।

    आगा खाँ महल की चहारदीवारी के पास कँटीले तार की ११ फुट ऊँची बाड़ बनायी गयी थी। पूना शहर की तरफ के महल के हिस्से में लकड़ी की जाली लगा दी गयी थी । इसके अलावा महल के चारों ओर बन्दूकधारी संतरी चौबीस घन्टे खड़ा पहरा दे रहे थे ।

    बापू का पलंग महल के लम्बे बरामदे में बीचोबीच रखा हुआ था । हमने बापू के चरण छुए , तब मेरी माँ के छह महीनों से रोके हुए आँसुओं का बाँध फूट पड़ा । बापू ने कुछ बोलने की कोशिश की , लेकिन ‘ महादेव . . .’ इस एक शब्द का उच्चारण करते ही उनका गला भर आया । आँख से गंगा – जमना की धारा बहने लगी । उस दिन पहली बार बापू की आँखों में मैंने आँसू देखे । बापू के अनशन का वह सातवाँ दिन था । उनको कष्ट न हो , इस खयाल से मेरी माँ वहाँ से तुरन्त हट गयीं । इसके बाद इक्कीस दिन तक हम लोग आगा खाँ महल में रहे , लेकिन बापू के साथ शायद ही बोले होंगे । काका की रक्षा बापू ने सुरक्षित रखी थी , वह माँ के सिपुर्द की । शुरु में कुछ दिन वह रक्षा बापू अपने भाल-प्रदेश में लगाते थे , यह जानकारी प्यारेलालजी और सुशीलाबहन ने हमें दी ।

    प्यारेलालकाका के साथ मेरी हमेशा बात होती रहती थी । मुझे उस समय पता चला कि सन १९४२ की तोड़-फोड़ के लिए बापू का समर्थन नहीं था । लेकिन मैं तो प्रत्यक्ष में भले न हो , लेकिन मन से तोड़-फोड़ के पक्ष में था ।मैंने भी अँधेरी रात में खेतों में धारियावाले लोगों के गिरोह में शामिल होकर डाक-विभाग के डिब्बे जलाने की योजना बनायी थी । गिरोह में से एक व्यक्ति ने मुझसे रिवाल्वर की माँग की , तब मैं सचेत हो गया और उससे कहा कि अहिंसा में रिवाल्वर को स्थान नहीं है । किसी व्यक्ति के जान-माल को नुकसान नहीं पहुँचाना है , इतना ध्यान में रखकर बाकी सब कार्रवाइयाँ अहिंसा में बैठती हैं , ऐसा मैं भी मानता था । टेलीफोन के तार काटे जाने की खबर पाकर मुझे खुशी होती थी । ट्रेन की पटरियाँ उखाड़ी गयीं , यह सुनकर मैं गर्व से फूल उठा था । बिहार और बलिया में तोड़-फोड़ की वृत्ति के कारण थोड़े दिन तक वहाँ का शासन जनता के हाथ में आ गया था , यह सुनकर तो मेरी छाती गजभर फूली थी । मैंने भी नकाबपोश टोलियों के साथ सम्पर्क साधने का प्रयास किया था । बम्बई में कई मकानों में घूम-घूमकर मैं श्री अच्युत पटवर्धन से मिला था । वे उस समय भूमिगत थे । छिप-छिपकर मैं बुलेटिन भी निकालता था । और ये सारे काम मैं यह मानकर करता था कि मैं बापू के आदेश का पालन कर रहा हूँ । इसकी चर्चा मैंने प्यारेलालजी के साथ की । उन्होंने सारा किस्सा बड़े धीरज के साथ सुन लिया । केवल धीरज के साथ ही नहीं , बल्कि सहानुभूतिपूर्वक सुन लिया । फिर धीरे – धीरे समझाना शुरु किया कि किसी भी प्रकार के माल को नष्ट करने में कैसे हिन्सा है , गुप्तता अहिंसक आन्दोलन को कैसे नुकसान पहुँचाती है । सारी चर्चा में मुख्य बात यह थी कि सारी हिंसा का प्रारम्भ सरकार ने किया था , अनेक प्रकार के कार्यक्रमों के संकेत भी सरकार ने ही दिये थे और अंत में इस सारी हिंसा के लिए कांग्रेस जिम्मेवार है , यही सरकार मानती थी । इसलिए हमलोगों ने जो रास्ता सोचा था , वह गलत था , यह तो मैं समझ गया । लेकिन मेरे मन में विफलता की (frustration) की भावना नहीं थी । देश में जो गैर बातें हुईं वे गलत थीं , यह बापू ने कहा था । और देश को सही रास्ते पर लाने की उन्होंने कोशिश भी की थी । फिर भी देश-प्रेम की भावना से की गयी इन गलत कार्रवाइयों की बापू ने निन्दा नहीं की । इसीसे वे राष्ट्र के सामान्य नागरिकों को अपने साथ रख सके थे और उनको सही रास्ते पर ला सके थे ।

    आगा खाँ महल में काफी समय खाली रहता था , इसलिए मैंने वहाँ विक्टर ह्युगो के प्रसिद्ध उपन्यास ‘ ला मिज़रेबल ‘ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ लिया । बापू ने यह सुना तो उनको थोड़ा आश्चर्य हुआ । शायद उनके मन में पुराने छोटे बाबला की ही प्रतिमा अब तक थी । उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर मेरा विशेष अभिनन्दन किया । मैं शरमा गया । प्यारेलालकाका ने बापू से कहा , ‘आप तो इसको बिलकुल बच्चा समझते हैं ।लेकिन यह तो मेरे साथ देश के प्रश्नों की चर्चा करता है । इतने दिनों में अहिंसा का बहुत सारा विवेचन इसने मेरे साथ किया । ‘ मैं और भी शरमा गया ।

    बापू ने कहा , ‘ यह तो मैं जानता ही था । बचपन से ही इसे बहस करने की आदत है । मुझे तो इसके अंग्रेजी ज्ञान के बारे में आश्चर्य हुआ। और अहिंसा की बात निकली है तो इतना कह देता हूँ कि अहिंसाविषयक मेरे विचारों में भी विकास हुआ है । एक जमाना था , जब मैं मानता था कि देश में कहीं भी हिंसा हुई तो वह समय अहिंसा के प्रयोग के लिए अनुकूल नहीं है। आज तो मैं मानता हूँ कि सच्ची अहिंसा की ज्योति ऐसी होगी कि उसके चारों ओर हिंसा की तूफानी हवा बहती हो तो भी वह जलती रहेगी । ‘

    उपवास के समय एक नेता ने बापू से कहा था , ‘ आपकी मृत्यु होने पर देश में जो प्रचंड ज्वाला भड़केगी , उसे दबाने के लिए सरकार ने टैंक तैयार रखे हैं । ‘

    उपवास के बारहवें या तेरहवें दिन बापू बड़ी नाजुक अवस्था में से गुजरे थे । उस दिन उनके गले के नीचे पानी भी नहीं उतर रहा था । ऐसी अवस्था हो जाय तो नारंगी या ऐसे खट्टे फलों (साइट्रिक फ्रूट) का रस पानी में घोलकर पीने की छूट उपवास के प्रारम्भ में बापू ने जाहिर कर दी थी । पानी में संतरे का रस ४-५ चम्मच घोलकर वह गले के नीचे उतर जाय , ऐसा बनाकर बापू को दिया गया ।

    लेकिन सरकार ने इस प्रसंग का दुरुपयोग करने की ठानी । हर रोज बापू का वजन लिया जाता था । इस प्रसंग के दूसरे दिन वजन लिया गया ,तो एकाएक ४ पौंड वजन बढ़ा हुआ पाया । सरकार इसीकी राह देख रही थी कि उपवास के समय खुराक ली है , यह कैसे सिद्ध किया जाय । डॊ. सुशीलाबहन इस मामले में बहुत सतर्क थीं । उन्होंने कहा , ‘यह असम्भव है। जरूर कुछ दाल में काला है ।’  फिर उसी काँटे पर मेरा वजन करके देखा गया तो वह भी ४ पौंड अधिक पाया गया ।फिर एक-एक करके सबका वजन देखा गया और सबका वजन ४ पौंड बढ़ा हुआ मिला । इस प्रकार बापू की फजीहत करने पर तुली हुई बेमुरव्वत सरकार का साथ यांत्रिक काँटे ने नहीं दिया । वह सरकार से अधिक निष्पक्ष था । उसने अपनी भूल की पोल खुद ही खोल दी ।

   

     

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