बापू की गोद में (२१) : ९ अगस्त , १९४२

    ८ अगस्त सन १९४२ की रात को बम्बई के बिरला हाउस में दो प्रकार की राय व्यक्त की जा रही थी । उस दिन शाम को ‘ भारत छोड़ो ‘ के प्रस्ताव पर बापू कांग्रेस – महासमिति की बैठक में भाषण कर चुके थे । काका का अभिप्राय था कि सारे राष्ट्र मे बिजली का संचार करानेवाले बापू के इस भाषण के बाद सरकार उनको अधिक दिन बाहर नहीं रहने देगी । उसी रात वे पकड़े जायेंगे । बापू ने अपने भाषण में वाइसराय को पंद्रह दिन का समय दिया था । उन्होंने कहा था कि वे वाइसराय को अन्तिम पत्र लिखेंगे और १५ दिन के अन्दर उनकी ओर से अनुकूल उत्तर नहीं मिला तो वे ‘ भारत – छोड़ो ‘- आन्दोलन छेड़ देंगे । बापू की राय थी कि सरकार उनको पंद्रह दिन तक नहीं पकड़ेगी । बापू जिस सरकार के लिए भारत से चले जाने का आवाहन कर चुके थे , उसके प्रतिनिधि की ओर से अभी भी उनको इतनी आशा थी कि पंद्रह दिन की मर्यादा वे नहीं तोड़ेंगे ।

    सभा से लौट कर बिरला हाउस में बापू ने प्रार्थना की ।प्रार्थना के बाद वे निश्चिंत मन से गाढ़ निद्रा में सो गये । केवल दो व्यक्तियों को नींद नहीं आ रही थी – कस्तूरबा और महादेवभाई। मेरा और काका का बिछौना पास-पास था ।बिरला हाउस की बड़ी घड़ी ने रात का का एक बजाया ।

    ‘ कितने बजे महादेव ? ‘ कस्तूरबा ने पूछा ।

    ‘ एक बजा है बा । ‘

    ‘ तुमको क्या लगता है ? बापू को पकड़ेंगे ? ‘

    ‘ मुझे तो ऐसा ही लगता है । लेकिन बापू मानते हैं कि उनको नहीं पकड़ा जायगा । मन तो यही कहता है कि अ. भा. कंग्रेस-कमेटी के भाषण के बाद सरकार उनको बाहर नहीं रहने देगी । लेकिन कह नहीं सकते । बहुत दफ़ा बापू की बुद्धिगम्य न होनेवाली बातें सही निकलती हैं । इस समय भी वैसा नहीं होगा , ऐसा कौन कह सकता है ? ‘

    मैं बीच – बीच में झपकी ले लेता था और घड़ी के ठोके सुनकर बीच में जाग पड़ता था ।

    दो . . . तीन . . . चार !

    क्स्तूरबा और काका सारी रात जागकर इसी विषय में बात करते रहे थे । चार बजे काका ने कहा , ‘ बा , अब तो बापू की ही बात सही निकलेगी , ऐसा लगता है । बम्बई की पुलिस को आधी रात में चोर की तरह आकर गिरफ्तार करने की आदत है । अब तो सुबह हो रही है । अब शायद उनको नहीं पकड़ेंगे । लेकिन सरदार को तो अवश्य पकड़ा होगा ।सरदार का कल का भाषण ऐसा तीखा था कि सरकार उनको एक क्षण के लिए भी बाहर रहने देने को तैयार नहीं होगी । चलो सरदार के घर पर फोन करके खबर पूँछेंगे। फोन नहीं लगा । लाइन काट दी गयी थी । पड़ोस के बँगले में फोन करने स्वामी आनन्द बाहर गये ही थे कि फाटक से ही वापस आकर उन्होंने खबर दी कि ‘ वे आ गये । यजमान आ पहुँचे हैं । ‘

    बापू को पकड़ने के लिए वारंट का जो कागज पुलिसवाले लाये थे , वह कुछ अजीब ढंग का था । उसमें बापू , मीराबहन और काका को पुलिस-इन्स्पेक्टर के साथ जाने का ( यानी गिरफ्तारी का ) हुक्म था । लेकिन बा और प्यारेलालजी के लिए उस कागज में विचित्र फ़रमान था । लिखा था कि ये लोग बापू के साथ आना चाहें तो आ सकते हैं , लेकिन न आना हो तो उनको छूट है ।

    यह जेल – यात्रा आखिर की है , यह अंदज़ सबको ही हो गया था । अंतिम जेल – यात्रा में बापू के साथ रहने का मौका मिल रहा है , यह देखकर मीराबहन खुश हो रही थीं । लेकिन बा के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया । बा ने बापू से पूछा , ‘ इस हुक्म का अर्थ क्या है ? ‘

    बापू ने अर्थ समझाकर पूछा , ‘ तुम्हारी क्या इच्छा है ? ‘

    बा ने कहा , ‘ आप ही कह दीजिये न ! ‘

    बापू ने कहा , ‘ मेरी इच्छा पूछती हो तो मैं चाहूँगा कि अभी मेरे साथ चलने के बदले शिवाजी पार्क में मेरे लिए जो सभा रखी गयी है , उस सभा में मेरी ओर से तुम भाषण करो और स्वतंत्र रूप से पकड़ ली जाओ तो अच्छा होगा । लेकिन मेरे साथ चलने की इच्छा हो तो मैं मना नहीं करूँगा ।तुम्हें अलग से पकड़ने पर सरकार मेरे साथ तुम्हें न रखे , यह भी संभव है । यह सब सोचकर निर्णय करना चाहिए । ‘

    बा के सामने कठिन पेंच खड़ा हुआ । एक तरफ सारी जिन्दगी का सवाल था । जेल में बापू जिन्दा रहेंगे या नहीं , इसमें भी शंका थी । फिर से बापू से भेंट हो सकेगी या नहीं , यह भी अनिश्चित था । दूसरी तरफ बापू की इच्छा का प्रश्न था ।

    लेकिन इस प्रसंग को लिखने में मुझे जितना समय लगा , उतना भी बा को निर्णय करने में नहीं लगा । उन्होंने तुरंत गम्भीर स्वर में कहा , ‘ मेरी इच्छा पूछोगे तो इस समय आपके साथ रहना मैं पसन्द करूँगी , लेकिन उससे भी अधिक आपकी इच्छा पूरी करना मुझे अच्छा लगेगा , इसलिए रुक जाती हूँ । ‘

    मैं तो अवाक होकर इस सती की ओर देखता ही रह गया ! त्रेता-युग में राम और सीता के वियोग का प्रसंग आया , तब राम ने सीता को जंगल में साथ चलने के बदले महल में ही रुक जाने का आग्रह किया था , लेकिन सीता ने राम का साथ नहीं नहीं छोड़ा था । कलिकाल में बापू कस्तूरबा से किसी प्रकार का आग्रह नहीं करते । निर्णय भी उन्हीं पर छोड़ते हैं । और चमत्कार यह कि बा को बापू की इच्छा पूरी करने के लिए उनसे दूर रहना पसन्द है ।

    मैंने काका का सामान बाँधना शुरु किया । मैं कई बार काका से कहता था , ‘ काका , आप कुछ मौलिक साहित्य तो लिखते ही नहीं । जो लिखते हैं , वह बापू के भाषणों की रिपोर्ट या किसी पुस्तक का अनुवाद । ‘ काका हँसकर जवाब देते , ‘ मौलिक साहित्य तू लिख। ‘ कभी कहते थे कि पाँच – छह उपन्यासों की कथावस्तु मन में तैयार है । कभी लम्बे समय की फुरसत मिलेगी , तो लिखा जायगा । गुरुदेव टैगोर की ‘गीतांजलि’ के सभी गीतों का मूल छंद में गुजराती अनुवाद करने की भी इच्छा थी । अंतिम बार जब शांतिनिकेतन गये थे , तब कुछ गीतों की धुन सुन कर आये थे । मैं यह सब जानता था , इसलिए सन १९४२ की लड़ाई के आसार दिखायी देने लगे , तब से बंगला गीतांजलि की एक प्रति और लिखने के लिए पाँच-छह कोरे कागज पैड मैं हमेशा साथ रखता था । वह इस समय ले आया और काका से पूछा कि ‘ सामान के साथ यह भी बाँध दूँ न ? अब तो आपको फुरसत मिलेगी । ‘

    लेकिन काका को उत्साह नहीं था । उन्होंने कहा , ‘ कुछ भी सामान साथ में मत दो । बापू के उपवास की बात डेमोक्लीस की तलवार की तरह मेरे सिर पर लटक रही है । इस समय बापू अनशन करेंगे तो सरकार शायद उनको मरने देगी । यह सब देखने के लिए मैं जिन्दा नहीं रहूँगा । मैं जेल में एक सप्ताह तक भी जिन्दा रह सकूँगा या नहीं , कह नहीं सकता । तू किसी प्रकार की लेखन – सामग्री साथ मत दे । ‘

    मैंने कहा : ‘ आप ऐसा कुछ मत बोलिये । ‘ काका ने कुछ जवाब नहीं दिया ।

    पुलिस-इन्स्पेक्टर देसाई के साथ निकलने से पहले बापू ने प्रार्थना की । सारे वातावरण में एक बिजली-सी थी । बापू ने कह दिया था कि उनके पकड़े जाने के बाद हरएक भारतवासी अपना नेता है , ऐसा समझकर अहिंसा का विचार ध्यान में रखकर आन्दोलन जारी रखे । यह आन्दोलन अल्पकालीन , लेकिन गतिमान ( शार्ट एण्ड स्विफ़्ट) होगा , ऐसा इशारा भी बापू ने दिया था । इसलिए हम सबके मन में एक अजीब उत्साह था ।

    पुलिस-इन्स्पेक्टर की गाड़ी में सब बैठे । काका बैठने जा रहे थे , तब मैंने कहा : ‘ अब तो स्वतंत्र भारत में मिलेंगे । ‘

    इसके जवाब में काका ने मुझे चूम लिया ।

यह उनका अंतिम चुम्बन था ।

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2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “बापू की गोद में (२१) : ९ अगस्त , १९४२

  1. सुंदर है यह प्रस्तुतिकरण,हमेशा की तरह्…

  2. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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