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बापू की गोद में (२०) : जमनालालजी

     सन १९४२ – ४३ का वर्ष भारत के इतिहास में बड़ि धूमधाम का था । देश में पिछले पचास वर्षों में जो परिवर्तन नहीं हो सके थे , वे इस एक ही वर्ष में हो गये । बापू के आश्रम की दृष्टि से देखा जाय तो १९४२ की फरवरी से ले कर १९४४ की फरवरी तक बापू ने पहले जमनालालजी , फिर महादेवभाई और कस्तूरबा को खो दिया था । एक से एक बढ़कर निजी सम्बन्ध के ये व्यक्ति ! हरएक से गहरा आत्मीय सम्बन्ध । बापू के जीवन में इन दो वर्षों के जैसा शायद ही काल होगा , जिसमें उनको इतने व्यक्तिगत आघात सहन करने पड़े होंगे । स्वातंत्र्य-संग्राम के यज्ञ में अंतिम आहुति का यह काल था । उसमें इन तीनों का बलिदान एक पवित्रतम बलिदान माना जाएगा ।

    जमनालालजी को बापू के दरबार के नवरत्नों में से एक कहा जायगा । उनके सम्बन्ध में बापू ने एक बार लिखा था : ‘ बाईस साल पहले की बात है , तीस साल का एक नवयुवक मेरे पास आकर कहने लगा , ‘ आपके पास मेरी एक माँग है । ‘ मैंने चकित होकर कहा , ‘माँगो – माँगो , मुझसे वह माँग पूरी हो सकती है तो जरूर पूरी करूँगा । ‘ नवयुवक ने कहा , ‘ आप मुझे अपने देवदास की जगह पर समझें । ‘ मैंने कहा अच्छा मान लिया। लेकिन इसमें आपने क्या माँगा ? वास्तव में इसमें आपने दिया और मैंने प्राप्त किया , ऐसा हुआ है।’

    ‘ यह नवयुवक जमनालाल थे । वे मेरे पुत्र बनकर कैसे रहे , यह तो भारतवासियों ने अपनी नजर से देखा ही है। लेकिन मैं तो यही कहूँगा कि मेरी जानकारी में ऐसा पुत्र आज तक किसीको नहीं मिला होगा । ‘

    मृत्यु के कुछ दिन पहले जमनाललजी ने बापू के सामने राजनीति से मुक्त होकर रचनात्मक काम में लग जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी । वे कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य थे और अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के खजांची थे । इस समय बापू ने उनके लिए गोसेवा का काम चुना , जो जमनालाजी को हृदय से प्रिय था ।

    बाहर से देखा जाय तो जमनालालजी बापू से मिलने आनेवाले छोटे-बड़े अतिथियों को प्रेमपूर्वक सत्कार करनेवाले यजमान , उनके सम्पर्क में आनेवाले विशाल कार्यकर्ताओं की जमात के जवान लड़के-लड़कियों की शादियाँ तय करा देनेवाले बापू के शब्दों में ‘शादीलाल’ तथा वर्धा और आसपास की दर्जनों संस्थाओं के संस्थापक , पोषक तथा एक दूरदर्शी कुशल व्यापारी थे । लेकिन अन्दर से वे सत्संग के पिपासु , विरक्त और मुमुक्षु थे । आदमी की सही परीक्षा करने में वे किसी पारखी जौहरी को भी शरमा देनेवाले थे ।  साबरमती- आश्रम मे बापू से वर्धा के लिए उन्होंने माँग की तो वह विनोबा जैसे व्यक्ति की , अपने राजनीतिक मामलों में सलाहकार और निजी मंत्री के तौर पर उन्होंने दादा धर्माधिकारी का चुनाव किया , रचनात्मक कार्यों में सत्यनिष्ठ तथा व्यावहारिक सलाह देने के लिए उन्होंने श्रीकृष्णदासजी जाजू को चुना , बजाजवाड़ी में अपने निवास के बगल में उन्होंने किशोरलाल मशरूवाला को बसाया , इसके अलावा कितने ही अप्रसिद्ध , लेकिन चुनिन्दा कार्यकर्ताओं को वे वर्धा खींच लाये थे , उनके सामने उन्होंने अपनी भूमिका नम्र भक्त , जिज्ञासु और जीवनसाधक की ही मानी थी । बापू के काम में आये , तब उन्होंने अपने पास की सारी अर्जित संपत्ति राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दी । लेकिन इस दान के कारण लेशमात्र अहंकार का स्पर्श उनको नहीं हुआ था । संपत्ति के सम्बन्ध में उनकी वृत्ति जनक के जैसी अनासक्त थी ।

    जमनालालजी की बीमारी की खबर सुनते ही बापू सेवाग्राम से वर्धा आने के लिए निकल पड़े । रक्तचाप की अपनी सर्पगंधा नामक दवा साथ लाये थे। लेकिन बापू के पहुँचने से पहले ही बापू के प्राण-पखेरू दुर्भाग्य से उड़ चुके थे । उनका सिर अपनी गोदी में लेकर बापू कहने लगे , ‘ भाई , तू मेरा पाँचवाँ पुत्र बना था , तो मुझसे पहले जाना तो तेरा धर्म नहीं था । ‘

    मृत्यु के बाद उनके मुख पर जो शांति और कांति दिखाई दे रही थी , वैसी क्वचित ही देखने को मिलती है । सारा वर्धा शहर और आसपास के देहातों से बहुत सारे लोग उनकी श्मशान-यात्रा में इकट्ठा हो गये थे । उनका दाह-संस्कार वर्धा से दो मील की दूरी पर गोपुरी में ‘शांति-कुटीर’ नाम के उनके तत्कालीन निवासस्थान के सामने के मैदान में किया गया था। आखिर के दिनों में बजाजवाड़ी का अपना बँगला छोड़कर वे शांति -कुटीर में रहने लगे थे ।

    उनकी पत्नी जानकीदेवी बजाज ने उस समय जमनालालजी की चिता पर ही अपनी देह का विसर्जन करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनको बापू ने सलाह दी कि जमनालालजी का गोसेवा का अधूरा काम पूरा करने के लिए उनको जीवित रहना चाहिए। वैसा संकल्प बापू ने उनसे करवाया। जानकीदेवी ने भी अपने हिस्से की सारी संपत्ति गोसेवा-संघ को अर्पण कर दी ।

    जमनालालजी के निमित्त होनेवाली शोक-सभा में विनोबा ने कहा था , ‘जमनालालजी के साथ मेरा बीस साल का परिचय था ; लेकिन उनके मन की जो उन्नत अवस्था पिछले डेढ़-दो महीनों में मैंने देखी , वैसी पहले कभी नहीं देखी थी । मन की ऐसी दुर्लभ अवस्था में मृत्यु हो जाना दुर्लभ बात है । जमनालालजी को वह भाग्य प्राप्त हुआ है ; इसलिए उनकी मृत्यु से मुझको दु:ख नहीं बल्कि आनन्द ही हुआ । इस तरह की पवित्र मृत्यु का लाभ हो , ऐसी हम सब कोशिश करें । आत्मा जब अपनी संकल्प-पूर्ति का दर्शन शरीर में करना सम्भव नहीं मानती है , तब वह शरीर का त्यागकर सबमें प्रवेश करके अपना काम पूरा करती है ।’

    जमनालालजी द्वारा साधु-पुरुषों की जो खोज चलती थी , वह केवल सर्वोदय के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी । रमण महर्षि के आश्रम में उनको शान्ति मिलती थी ।माता आनन्दमयी के साथ उनका हार्दिक सम्बन्ध था ।माँ आनन्दमयी जमनालालजी के स्वर्गवास के बाद वर्धा आयीं थीं ।बापू से मिलने वह सेवाग्राम गयी थीं ।अपनी बातचीत में उन्होंने सहज रूप से कहा कि ‘ छह माह के अन्दर-अन्दर और एक महापुरुष का निर्वाण होनेवाला है ।’ यह सुनकर काका को लगा कि यह वचन बापू को लक्ष्य करके कहा गया होगा ।इसलिए वे बहुत उद्विग्न हो उठे थे । काका ने अपनी चिन्ता हमारे सामने भी व्यक्त की थी । लेकिन उन्हें या हमें क्या कल्पना थी कि वह वचन उन्हीं पर लागू होनेवाला था ।

    बापू ने ‘भारत-छोड़ो’ आन्दोलन शुरु किया , तब से काका का काम बहुत बढ़ गया था । मुलाकातों का ताँता लग जाता था । पत्र-व्यवहार का ढेर भी बढ़ गया था । लेख अधिक लिखने पड़ते थे । कुछ कसर रह गयी होगी तो बापू ने पूरी की। उन्होंने कहा,’इस समय की जेल-यात्रा अब तक की यात्राओं से अलग प्रकार की होगी। जेल में पहुँचते ही मैं अन्न-जल का त्याग करने का सोच रहा हूँ।’ इससे काका की चिन्ता और बढ़ गयी।जेल जाते ही अनशन शुरु करने का बापू का विचार काका को जरा भी पसन्द नहीं था । उन्होंने सेवाग्राम में रहते ही बापू के साथ इस सम्बन्ध में पत्रों की झड़ी लगा दी।

    काका का स्वास्थ्य उन दिनों ठीक नहीं रहता था ।आन्दोलन के नगाड़े बजने शुरु हो गये थे । काका को कुछ दिन आराम लेकर अपना स्वास्थ्य ठीक कर लेना चाहिए , इस बात के लिए बापू ने उनको मना किया था ।श्री घनश्यामदास बिड़ला काका को अपने साथ नासिक ले जाने को तैयार हुए । एक सप्ताह आराम लेने का कार्यक्रम बना था । उनके साथ हम में कोई नहीं जाने वाला था।

    वर्धासे फिर फोन आया कि महादेवभाई को स्टेशन पर चक्कर आ गया , इसलिए वे रुक गये हैं। बापू ने संदेशा भिजवाया कि उनको तुरंत सेवाग्राम वापस लाओ। रास्ते में काका को सिविल सर्जन को दिखा दिया गया ।उस दिन बापू की जो व्याकुलता मैंने देखी , वैसी कभी नहीं देखी थी । रविवार का दिन था । हर रविवार की शाम को बापू मौन शुरु करते थे और सोमवार की शाम तक वह जारी रहता था। मौन के दरमियान बापू अपने कमरे से बाहर आकर पास के छोटे कमरे में चले जाते थे , जहाँ टेलीफोन रखा हुआ था। थोड़ी-थोड़ी देर में वे काका के समाचार पूछने की सूचना देते थे ।आखिर काका को लेकर मोटर आ गयी। उनको सीधे हमारे मकान पर लिवा गये। बापू दौड़कर वहाँ पहुँच गये। माँ ने उनके लिए जो बिस्तर तैयार करके रखा था,उसपर उनको सुलाया गया ।बापू ने उनका सिर अपनी गोद में लेकर कहा , ‘क्यों महादेव,अब कैसे हो?’ मगनलालकाका की मृत्यु के के बाद बापू द्वारा अपना मौन-भंग करने का यह पहला प्रसंग था ।

    ‘ बस, मेरी इच्छा पूर्ण हो गयी। स्टेशन पर लगता था कि अब चला। इसीलिए मैंने आग्रहपूर्वक कहा कि मुझे नासिक नहीं जाना है और अस्पताल में भी नहीं जाना है। मरना ही होगा तो बापू की गोद में मस्तक रखकर मरूँगा । फिर भी ये लोग मुझे डॊक्टर के पास ले ही गये । ‘

    बापू अपनी गोद में काका का सिर सहलाते रहे। थोड़े दिनों के बाद यानी १५ अगस्त की सुबह आगा खाँ महल में काका की मृत्यु हुई , तब उनका मस्तक बापू की गो में ही था ।

[ अगला प्रसंग : ९ अगस्त , १९४२ ]

   

     

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