बा

[कटनी स्टेशन पर लोगों की भीड़ से अन्य स्टेशनों से कुछ दूसरा ही जयघोष सुनाई , ‘ माता कस्तूरबा की जय ‘।यह नया जयघोष सुनकर स्वाभाविक रूप से हम सब का ध्यान उस ओर गया ।देखा तो हरिलालकाका!शरीर जर्जर हो चुका था।सामने के दाँत गिर चुके थे।सिर के बाल सफ़ेद हो गये थे।]

    महापुरुषों के जीवन में उनकी अर्धांगिनियों का क्या स्थान होता है , यह इतिहास-संशोधन का एक विषय बन सकता है । एक तरफ सीता के कारण रामायण की रचना हुई , तो दूसरी तरफ तुलसीदासजी को पत्नी से वैराग्य की प्रेरणा मिली । पण्डित नेहरू का जीवन जो बना , उसमें कमला नेहरू का हिस्सा कम नहीं था । वैसे तो बापू के जीवन में बा का स्थान वही था , जो अन्य गृहस्थों के जीवन में उनकी पत्नियों का होता है । फिर भी वह असाधारण था। काठियावाड़ के एक राजा के दीवान के सुशिक्षित पुत्र की अशिक्षित पत्नी के रूप में कस्तूरबा के वैवाहिक जीवन का और एक तरह से उनके पूरे जीवन का प्रारम्भ हुआ । आगा खाँ महल में बापू के सान्निध्य में जब उनकी मृत्यु हुई ,तब बापू ने बा के सम्बन्ध में कहा था : ‘ वह तो जगदम्बा थी । ‘ एक सामान्य भारतीय नारी ने अपने जीवन-काल में ही इतनी बड़ी मंजिल कैसे तय कर ली ? यह सही है कि महात्मा गांधी जैसे कि पत्नी बनने का सौभाग्य हर सामान्य भारतीय नारी को नहीं मिलता । कस्तूरबा के विकास का सबसे महत्त्व का कारण यही था कि वह नित्य विकासशील महात्मा की पत्नी थीं । लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं था । वह सच्चे अर्थ में महात्मा की सहधर्मचारिणी थीं । महात्मा के साथ – साथ धर्म का आचरण करना कोई छोटी बात नहीं थी । काका के शब्दों में कहा जाय तो वह ज्वालामुखी पर्वत के मुँह पर बैठने जितना कठिन था ।

    भारतीय पुराणों और वांग्मय में पत्नी की जो श्रद्धामयी मूर्ति की कल्पना की गयी है , उस श्रद्धामयी निष्ठावंत सती का दर्शन इस युग में बा में होता था । ऐसी सोलह आने श्रद्धा के कारण ही वह बापू की सहधर्मचारिणी बन सकीं ।

    लेकिन ऐसी श्रद्धा होते हुए भी उन्होंने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व खो नहीं दिया था । समय – समय बापू को सीधे रास्ते पर लाने का भी काम उन्होंने किया है । दक्षिण – अफ़्रीका में अपने एक हरिजन सहयोगी के मल – मूत्र का बर्तन साफ करने से बा ने इनकार किया था । तब बापू उनको घर से बाहर निकालने जा रहे थे । तब बा ने कहा , ‘ कुछ तो शरम रखो, इस दूर परदेश में आप मुझे घर से निकालने पर उतारू हो गये हैं । ‘ अपने सिद्धान्तों के आग्रह में अन्धे बने बापू को जागृत करने का यह प्रसंग बापू ने खुद ही अश्रुपूर्ण कलम से अपनी आत्मकथा में अंकित किया है । इसके बाद जिन्दगीभर बा ने अपनी स्वतंत्र अस्मिता कायम रखी थी । बापू के साथ वह काफी तपी-तपायी , बापू के साथ निरन्तर उनका जीवन-परिवर्तन भी हुआ। परन्तु यह सारा परिवर्तन उन्होंने स्वेच्छापूर्वक किया । बापू की सर्वधर्म-प्रार्थना में शामिल होती थीं , फिर भी तुलसी और पीपल के पेड़ की पूजा वह नियमित रूप से करती थीं । बापू के विशाल परिवार को बा एक मातृस्थान लगती थीं, फिर भी बा अपने रक्त-सम्बन्धी सगे लोगों के विषय में बापू के जितनी अलिप्त नहीं रहती थीं ।

    इस समबन्ध में सबसे कठिन परीक्षा हरिलालकाका ( बापू के ज्येष्ठ पुत्र ) ने करायी । बचपन से उनको शिकायत थी कि बापू ने उनकी शिक्षा का ठीक प्रबन्ध नहीं किया । तब से ही उनका स्वभाव बापू के खिलाफ़ बग़ावत करने का बन गया था । खास करके उनकी पत्नी गुलाबबहन ( नाम के जैसा ही उनका स्वभाव था ) की मृत्यु के बाद हरिलालकाका रस्ते से भटक गये । उनको ऐसी संगत मिली , जिससे वे कुमार्ग पर उतर गये । उनके इस व्यवहार का बा को बड़ा दुख था । काफी कोशिश की गयी , लेकिन आखिर तक वे वापस नहीं आये । कुछ दिन बाद खबर आयी कि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया । उस समय कस्तूरबा ने हरिलाल के नाम पत्र लिखकर अपनी अंतर्वेदना प्रकट की । इस पत्र के विषय में हरिलालकाका ने इतना ही कहा , ‘ यह पत्र बा का नहीं है । उनके नाम से किसी और ने लिखाया है । ‘

    लेकिन हरिलालकाका के चित्त के किसी गहरे कोने में बा के विषय में कोमल भावना थी । ऐसा एक प्रसंग मैंने वनमालाबहन की ‘ अमारां बा ‘ पुस्तक के लिए लिख भेजा था । वही आज स्मरण के आधार पर लिख देता हूँ । हम लोग इलाहाबाद से वर्धा जा रहे थे । कटनी स्टेशन पर लोगों की भीड़ से अन्य स्टेशनों से कुछ दूसरा ही जयघोष सुनकर स्वाभाविक रूप से हम सबका ध्यान उसकी ओर गया । देखा तो हरिलालकाका ! शरीर जर्जर हो चुका था । सामने के दाँत गिर चुके थे । सिर के बाल सफेद हो गये थे । फटे कपड़ों की जेब में से एक मौसंबी निकालकर उन्होंने कहा , ‘ बा ,यह तुम्हारे लिए लाया हूँ । ‘

    बापू ने पूछा , ‘ मेरे लिए कुछ नहीं लाया ? ‘

    ‘ नहीं , आपके लिये कुछ नहीं लाया हूँ । आपसे मुझे इतना ही कहना है है कि बा के पुण्य के कारण ही आप इतने बड़े हुए हैं , इस बात को भूलियेगा नहीं । ‘

    ‘ यह तो ठीक है । लेकिन क्या तुझे अब हमारे साथ चलना है ? ‘

   ‘ नहीं , मैं तो बा से मिलने आया हूँ ।लो बा , यह मोसंबी तुम्हारे लिए माँगकर लाया हूँ।’

    बा ने मोसंबी हाथ में ली । लेकिन इतने से ही हरिलालकाका को सन्तोष नहीं हुआ । पूछा , ‘ क्यों बा , यह मोसंबी तुम ही खाओगी न ? न खानेनाली हो तो मुझे वापस कर दो ।

    बा ने मोसंबी खाने का वचन दिया । फिर उन्होंने भी हरिलालकाका से आग्रह किया कि वे बापू के साथ चलें ।

    बा को जवाब देते समय हरिलालकाका की आँखें भर आयीं । ‘ साथ चलने की बात अब छोड़ दो बा , अब मैं इसमें से नहीं निकल सकूँगा । ‘

    अधिक बातचीत करने के लिए समय भी नहीं था । सीटी हुई और गाड़ी चल दी । हरिलालकाका फिर से याद देते हुए कह रहे थे ‘ मेरी मोसंबी तुम ही खाना, बा । ‘

    गाड़ी कुछ आगे बढ़ी तब बा को लगा ‘ अरे , उस बेचारे से कुछ खाने – पीने का पूछा तक नहीं। अपने पास तो टोकरीभर फल पड़े थे । बेचारा भूखा मरता होगा । ‘ लेकिन गाड़ी प्लेट्फार्म छोड़ चुकी थी । लोगों के जयघोष के बीच में से अभी भी हमारे कानों में वह क्षीण आवाज घूम रही थी ‘ माता कस्तूरबा की जय । ‘

    मणिलालकाका दक्षिण -अफ़्रीका में रहकर ‘ इंडियन ओपीनियन ‘ अखबार चलाते थे । रामदासकाका रेशमी स्वभाव के व्यक्त । कहीं भी गांधी के पुत्र के नाते अपनी पहचान नहीं देते हैं । नागपुर में एक सामान्य नौकरी करके अपने कुटुंब का भरण-पोषण किया । देवदासकाका ‘ हिन्दुस्तान टाइम्स ‘ के मैनेजिंग डाइरेक्टर थे । इस तरह बा के सभी पुत्र बा से दूर-दूर थे। लेकिन पौत्र और पौत्रियाँ बा के पास ही रहती थीं । साबरमती – आश्रम में कांतिभाई , रसिकभाई और मनुबहन थे । इनके अलावा छगनलाल,मगनलाल,नारण्दास गांधी ( बापू के भतीजे ) के अनेक बालक आश्रम में थे । सेवाग्राम में रामदासकाका का कनु था । बाद में गांधी – परिवार के बालकों में जयसुखलाल गांधी ( बापू के पैतृक भतीजे ) की पुत्री मनु भी थी। इन बालकों के प्रति बा का वात्सल्यभाव विशेष था ।

    इसके अलावा बापू के सगे भी बा के सगे बनकर आते थे , वे अलग। एक बार मध्यप्रदेश के डॊ. खरे के मन्त्रिमण्डल में हरिजनों को नहीं लिया गया , इसको लेकर कुछ हरिजनों ने बापू के आश्रम में आकर ‘सत्याग्रह’ करने का निश्चय किया ।उनके सत्याग्रह का स्वरूप बापू के सत्याग्रह से कुछ अलग ही था । बापू सत्याग्रह करते थे तो अपने प्राणों की बाजी लगा देते थे। इनके सत्याग्रह में उपवास था , लेकिन मृत्यु का भय नहीं था । क्योंकि बारी-बारी से एक आदमी २४ घण्टों का उपवास करता था । इन लोगों ने सत्याग्रहियों के रहने के लिए आश्रम में जगह की माँग की ।बापू ने उनको ही जगह पसंद कर लेने को कहा । इन लोगों ने सब कुटियों को देखकर बा की कुटी ही पसन्द की । (जारी)

 

 

1 टिप्पणी

Filed under gandhi

One response to “बा

  1. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s