बापू की गोद में (१५) : मेरे लिए एक स्वामी बस है !

   देश के सामने बापू ने एक भी राजनीतिक कार्यक्रम ऐसा नहीं रखा , जिसके साथ कोई – न – कोई रचनात्मक कार्यक्रम भी न जुड़ा हो ।देश में स्वदेशी का आन्दोलन शुरु हुआ तो उसके साथ विदेशी कपड़ों की होली जलाने तक का कार्यक्रम चलाया गया । लेकिन इसीके साथ बापू ने खादी – ग्रामोद्योग का ऐसा एक रचनात्मक कार्यक्रम शुरु किया , जिसका महत्व आज पचास साल के बाद भी इस देश की गरीब जनता के लिए उतना ही बना हुआ है। अस्पृश्यता-निवारण के साथ उन्होंने ग्राम-सफाई का कार्यक्रम दिया ।इतिहास में शायद ही ऐसे किसी राष्ट्र-नेता का निर्माण हुआ होगा , जिसकी प्रतिभा ने इतनी कुशलता से जीर्ण-शीर्ण पुरानी मान्यताओं को नष्ट करके उसकी जगह नवीन मान्यताओं को पेश करने की द्विविध प्रक्रिया चलायी हो ।

    इसी प्रकार भाषावार प्रांतरचना के राजनीतिक कार्यक्रम के साथ – साथ बापू नी मातृभाषा के प्रेम का और राष्ट्रभाषा को शिक्षा में स्थान देने का कार्यक्रम देश के सामने रखा । लेकिन इस देश का दुर्दैव है कि बापू के राजनीतिक कार्यक्रमों को जितने उत्साह से अपनाया गया , उतना उत्साह उनके रचनात्मक कार्यों के प्रति नहीं दिखाया गया । वह दिखाया गया होता तो भाषा के प्रश्न को लेकर जो दंगे – फसाद हुए , उनका कलंक भारत के ललाट पर शायद न लिखा जाता ।

    दक्षिण में हिन्दी के प्रचार का प्रारम्भ बापू ने कई वर्ष पहले ही कर दिया था ।सम्राट अशोक ने जिस तरह बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए संघमित्रा को भेजा था , वैसे हिन्दी – प्रचार के लिए बापू ने अपने कनिष्ठ पुत्र देवदासभाई को दक्षिण में भेजा था । उन्होंने हिन्दी – प्रचार का जो बीज दक्षिण में बोया था , उसका वृक्ष आज फला फूला है ।दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा की बैठक में बापू को अध्यक्ष के तौर पर जाना था। मद्रास में दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा का वातावरण जिन्होंने देखा होगा , उन्होंने यह महसूस ही नहीं किया होगा कि वे किसी अहिन्दी प्रान्त में आये हैं ।छोटे बच्चे भी वहाँ शुद्ध हिन्दी में बात करते थे । वैसे तमिल लोग भाषा सीखने में बड़े तेज होते हैं ।फिर हिन्दी के लिए तो बापू की प्रेरणा थी।बापू के हाथों हिन्दी भाषा के प्रमाणपत्र वितरित हुए । एक छोटी बालिका ने बापू के गले में माला डाली। बापू ने वही माला हँसते-हँसते वापस उस बालिका को पहना दी। बापू के हिन्दी भाषण से उस बालिका की हिन्दी की किसी प्रकार कम दर्जे की नहीं थी । दक्षिण के लोगों को हिन्दी और उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण की कोई एक भाषा सीखनी चाहिए,ऐसी सिफारिश बापू ने की । बापू दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूरों के बीच काम करते थे ,तभी उन्होंने तमिल कुछ – कुछ सीख ली थी । बापू के भाषण से प्रेरणा पाकर काका ने भी तमिल सीखना शुरु किया । उस समय के उनके तमिल शिक्षक श्री अरुणाचलमजी ने उस प्रसंग को याद करते हुए मुझसे कहा : ‘ वैसे महादेवभाई मुझसे तमिल भाषा सीखते थे । लेकिन तमिल भाषा की कई खूबियाँ तो मैं उनसे ही सीखा । भाषा किस प्रकार सिखायी जाए , यह भी उन्होंने ही मुझे सिखाया, ऐसा कहना चाहिए । ‘

    बापू का सुझाया हुआ शायद ही ऐसा कोई रचनात्मक कार्यक्रम होगा , जिसे काका ने हाथों हाथ न लिया हो । सूत कताई सम्बन्धी काका निष्ठा नि:सीम थी । चाहे जितना काम हो , काते बगैर एक दिन भी नहीं सोते थे । आखिर के दिनों में हर रोज ५०० गज सूत कातने का उन्होंने नियम बना लिया था । ( मुझे पढ़ाने के लिए काका को कताई का समय ही उपलब्ध था ।) १५ अगस्त १९४२ के दिन काका आगा खाँ महल में दिवंगत हुए ।१४ अगस्त तक ५०० गज सूत कातने का अपना नियम उन्होंने निभाया था ।

    हृदय को जोड़ने की शक्ति भाषा में और रचनात्मक कार्य में है ,इस बात पर बापू की कितनी श्रद्धा थी उसका एक उदाहरण यहाँ देना चाहूँगा ।बापू अपनी अन्तिम जेलयात्रा से बाहर आने पर बीमारी के कारण पंचगनी गये थे । उस समय मैं बापू को उनकी सूत-कताई के समय एक घण्टा अखबार पढ़कर सुनाता था । एक दिन श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन बापू से मिलने आये । मुझे देखकर वे बापू से कहने लगे , ‘ इसे मेरे पास बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए भेज दीजिए ।’ स्वराज्य मिलने तक किसी स्कूल-कॊलेज में न पढ़ने का अपना निश्चय मैंने उनको सुनाया। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने बापू से इस सम्बन्ध में अलग से बात की होगी । दूसरे दिन मैं जब अखबार पढ़ने बैठा तो बापू ने कहा : ‘ आज अखबार नहीं पढ़ेंगे। आज तेरे भविष्य के सम्बन्ध में बात करनी है। तूने राधाकृष्णन के पास जाने इन्कार किया , यह तो उचित ही किया। लेकिन भविष्य में क्या करना है , इसका निर्णय तुझे कर लेना चाहिए ।’ मैंने बापू से कहा : ‘ तो उसके लिए तो पूरा एक घण्टा देने की जरूरत नहीं है। पाँच मिनट काफी हैं।’ ५५ मिनट तक अखबार पढ़ने के बाद मैंने बापू से कहा : ‘ भविष्य में क्या करना है , इसका निर्णय मैंने कर लिया है ।आज आपके साथियों में से कुछ राजनीति में पड़े हैं और कुछ रचनात्मक कामों में पड़े हैं। मुझे वे दोनों एकांगी लगते हैं । मुझे इन दोनों के बीच का पुल बनना है। ‘ इतना कहकर मैं चुप हो गया।बापू ने तीन मिनट तक मेरा मार्गदर्शन किया । उसमें एक मिनट तो मेरी खबर लेने में बिताया । उन्होंने कहा : ‘तूने एक घण्टे के बदले पाँच मिनट इस चर्चा में देना चाहा , यह मुझे अच्छा लगा।तूने जो निश्चय किया है , वह भी अच्छा है। लेकिन उसके लिए तुझे दो काम करने चाहिए। एक यह कि तू खादी-विद्या में प्रवीण बन जा । दूसरा यह कि भारत की सब भाषाएँ सीख ले । भारत को समझने के लिए यह जरूरी है ।’

    दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा से वापसे आते समय एक घटना घटी,उसका भी यहाँ जि्क्र कर दूँ । मद्रास से वर्धा आते समय रास्ते में बेझवाड़ा (विजयवाड़ा) स्टेशन पड़ता है। दो बड़े पहाड़ों में से बहती आयी कृष्णा नदी यहाँ विशाल रूप धारण करती है। आज इस नदी पर बने बाँध के कारण वहाँ बिजली की बत्तियों की जगमगाहट है ।लेकिन उन दिनों वहाँ प्रकृति का अकृतिम सौन्दर्य शोभायमान था । विजयवाड़ा स्टेशन आने से पहले बात शुरु हुई। जमनालालजी रमण महर्षि के आश्रम होकर आये थे ।उन्होंने उस आश्रम की पवित्रता और शांति की भूरि-भूरि प्रशंसा बापू से की। किसी साधु पुरुष की चर्चा चलते ही काका का हृदय गदगद हो जाया करता था । वे बड़े भक्तिभाव से और उत्साह से रमण महर्षि के सम्बन्ध में पूछने लगे । बापू,काका और जमनालालजी तीनों को समान दिलचस्पी का विषय चर्चा के लिए मिल गया । बातें चल रही थीं , इतने में बापू ने सुझाया , ‘ महादेव , तुम एक बार उस आश्रम में क्यों नहीं हो आते ?’ काका का हृदय आनन्दविभोर हो उठा । जमनालालजी ने प्रोत्साहन दिया ,’ हाँ-हाँ , एक बार अवश्य जाना चाहिए । तिरुवण्णामलय जाने के लिए बेझवाड़ा में गाड़ी बदलना अधिक अनुकूल है। यहाँ तक आये ही हो तो अभी ही हो आओ । फिर कब तुमको फुरसत मिलेगी ? ‘

    काका ने मुझे बिस्तरा तैयार करने को कहा । गाड़ी कृष्णा नदी के पुल पर आ पहुँची थी। जमनालालजी बापू से कह रहे थे , ‘ वहाँ के जितनी शान्ति तो मुझे आपके आश्रम में भी नहीं दिखाई दी । ‘

    कुछ देर के बाद बापू ने काका से कहा : ‘ वहाँ से वापस आने की जल्दी मत करना । तुम्हें भी जमनालालजी की तरह वहाँ शान्ति का अनुभव हुआ तो वहाँ अधिक दिन तक खुशी से रहो। काम की चिन्ता मत करो । ‘

    बापू ने तो सहज भाव से यह कह दिया , लेकिन बापू को अधिक समय तक छोड़कर रहने का विचार ही काका के लिए असह्य था ।उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा : ‘ बाबला , बिस्तर खोल दे । मैं सुनकर हैरान रह गया। बापू भी आश्चर्य से काका की तरफ देखने लगे । उन्होंने पूछा,’क्यों महादेव, बिस्तर खोलने को क्यों कहते हो ? ‘

    ‘मैंने जाने का विचार छोड़ दिया है । ‘

    ‘ क्यों ? ‘

    ‘ मेरे लिए एक स्वामी बस है ! ‘

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3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “बापू की गोद में (१५) : मेरे लिए एक स्वामी बस है !

  1. सर गांधी जी के संदर्भ में कुछ अनोखी बातें
    जानने को मिली हैं…गांधी जी भारत के वह
    व्यक्तित्व थे जिन्होनें कर्म करना ज्यादा उचित
    समझा और एक सामान्य मानव से परम मानव
    बनने का उनका सफर मात्र आम इंसान के इच्छाशक्ति पर ही
    निर्भर करता है,साबित कर दिया…यही हमारे बापु थे।

  2. पिंगबैक: इस चिट्ठे की टोप पोस्ट्स ( गत चार वर्षों में ) « शैशव

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